Pages

देवनागरी में लिखें

Wednesday, 27 March 2013

सारा खेल किस्मत-लकीरों का है !!





* 51वीं पोस्ट * कोशिश कुछ शब्दों का खेल !
आपसे नहीं बराबरी , नहीं आपसे कोई मेल !!

किसी की दिल से दिल्लगी !
किसी के दिल को लग गई !!

तुझे हक़ मिला नहीं दिल्लगी का
किसी के दिल से ना खेल
खुद का दिल बहलाने के लिए
की किसी दिन ख़ुदा ने दिल्लगी
तेरी दिल्लगी बन जायेगी दिल की लगी
ना सुखेगे अश्क ,तरसेगा दिल के लगी के लिए

सच का गाँस
गले में डाले फाँस
क्लेश जनक !!

थी वो पत्थर
रूबी-पन्ना सरीखी
मान ना दिया !!

थी ही पत्थर
गढ़ते मन-मूर्ति
ज़ज्बात लगा !!

उदास जिया
भाये न ऋतुराज
लागे वो बैरी !!

रास्ता नहीं आसां
पथरीले डगर
पाने में लक्ष्य !!

ना तेरी  हथेली अलग है
ना उसकी हथेली अलग है
ना प्यार का अंदाज़ अलग है
ना प्यार का ज़ज्बात अलग है

सारा खेल किस्मत-लकीरों का है ?
कोई किसी को क्यूँ कमतर आंकते ?

                                                 
                                    कमतर = निकृष्ट



Tuesday, 19 March 2013

होली की उमंग




ठंडाई संग भंग 
मस्त चढ़े रंग 
फाग तरंग 
मिष्ट स्वाद के संग
सब बुढवा 
करे तंग 
समझे 
अपने को 
देवरवा मलंग
होली की उमंग .....।


1)
आ होलाष्टक 
हरकारा लगता 
लाता है ख़ुशी 

(2)
रंग होली का 
भीगा धरा ,बनाया 
इन्द्रधनुष 

(3)
भंग औ रंग 
नाचे धरा -गगन 
गोरी को लागे 

(4)
कामदेव ने 
मधुमास ले आये 
तीर चलाये 

(5)
श्री रूपा राधा 
शरारत कान्हा का 
रंग दे चुन्नी 

(6)
देवर-भाभी 
मिलकर रंगों की 
होड़ लगाईं 

(7)
बैर ना पालो 
रंग में क्लेश घोलो 
तनाव टालो !!



Thursday, 7 March 2013

नारी नापे त्रिभुवन




किस्सा सुना सबनें 
विष्णु बने बामन
नापे तीन डग में त्रिलोक 
नारी ने की अनुसरण 
स्नेह बेटी रूप में 
साहस पत्नी रूप में 
संवेदना बहू रूप में 
स्नेह ,साहस और संवेदना
पा माँ रूप में ,
नारी नापे त्रिभुवन 

बनना नहीं किसी की देवी 
बनना नहीं किसी की दासी 
भुलाना नहीं तुम हो जननी जगतजननी रूपा 
भुलाना नहीं अपने जज्बातों को 
निभाना अपने चुने रिश्तों को 
निभाना अपने मिले दायित्वों को 
डरना नहीं दहलीज़ पार की तो 
डरना नहीं मंजिल नहीं दिख रही तो 
थामना अपने हौसले के पंख को 
थामना मदद मांगने वाले हांथो को
दहाड़ना दिखे कामुक आँख तो 
दहाड़ना रोके कोई राह तो 
पकड़ना अपने ऊपर उठे हाँथ को 
पकड़ना कलम बेलन तलवार को 
जूझना जो झंझावत आये तो 
जूझना दक्षता का अवसर आये तो 
सीखना नए युग के चलन को 
सीखना पुराने युग के अनुभव को 
गुर्राना हक़ है तुम्हारा तो 
गुर्राना सही अवसर हो तो ....... 






Monday, 4 March 2013

प्यार का एक रंग ....


वैलेन्टाइन डे बीत गया .... वसन्त आ गया ..... 
प्यार का मौसम .....
देशी हो या विदेशी ..... प्यार सब करते हैं .....
प्यार पहचान लेना ....
प्यार समझ लेना ....
प्यार पा लेना ....
 क्या सच में सहज होता है .... ??

 नौवें-दसवें कक्षा में रही होगी वो पुष्पा .... !! एक दिन किताब-कौपी ,बक्सा-पेटी ,पलंग-विस्तर सब को उलट-पलट कर युद्ध-स्तर पर खोज़-अभियान चला तब उसे पता चला कि कोई उसे चाहता था ....
 जिस घर में वो रहती थी उस घर के सामने और दाहिने तरफ पक्की सड़क थी .... दोनों तरफ के सड़क जहाँ कॉर्नर बनाते थे वहीं पर एक तरफ के घर में वो रहती थी दूसरी तरफ एक डॉ.दंपति रहते थे .... उन के साथ डॉ.साहब का छोटा भाई रहने आया था .... पुष्पा सुबह से रात तक जब भी घर से बाहर होती ,उसे सामने पाती .... सुबह ब्रश करते करते बाहर आती तो भी सामने वो बारामदे में खड़ा होता .... स्कूल जाने के लिए घर से निकलती तो भी वो उसके पीछे-पीछे स्कूल तक जाता .... दोपहर में लंच के लिए स्कूल से निकलती ,तो वो स्कूल के गेट पर खड़ा मिलता .... घर आती खाना खाती .... स्कूल के लिए जाती , स्कूल में शाम में छुट्टी होती तो गेट पर होता ,घर तक पीछे-पीछे आता .... शाम में घर से बाहर निकलती तो वो अपने घर के गेट पर या बारामदे में होता .... किसी के साथ भी होता तो उसका चेहरा पुष्पा की तरफ ही होता .... रात में खाना खाने बाद भी पुष्पा अपने परिवार वालों के साथ बाहर निकलती तो वो बाहर ही होता .... बाज़ार जाती किसी काम से तो वो भी एक दूरी पर उसे जरूर देखती .... कभी परिवार वालों के साथ सिनेमा देखने सिनेमा हॉल जाती तो इंटरवल में देखती कि वो भी हॉल में कहीं न कहीं वो है .....
एक बार पुष्पा को बुखार लग गया कुछ दिन तक वो बाहर नहीं निकल सकी .... तो उसकी सखियाँ उससे मिलने ,उसके घर आईं .... वे बताई कि पुष्पा के स्कूल नहीं जाने की वजह से कुछ लड़के उन्हें छेड़ते हैं .... पुष्पा को कोई लड़का छेड़ने का हिम्मत नहीं कर पाते थे क्यूँ कि उसके बड़े भाइयों का दबदबा था .... जब पुष्पा की तबीयत ठीक हो गई और वो स्कूल अपनी सहेलियों के साथ जाने लगी तो फिर पहले की तरह कुछ लड़के ,लड़कियों को छेड़ने के नियत से सामने से आते नज़र आए लेकिन चुकि पुष्पा सब लड़कियों के पीछे चल रही थी इसलिए उन लड़कों को दूर से वो दिखाई नहीं दी .... सब लड़के साईकिल पर थे .... लड़के ,सब लड़कियों के चारों तरफ गोल घेरा बना हँस-हँस के परेशान किया करते थे .... उस दिन भी उन लड़कों का वही इरादा रहा होगा .... लेकिन पुष्पा पर नज़र पड़ते ही सब भाग गए .... लेकिन एक दूरी बना कर वो डॉ.साहब का भाई अपना नित का रूटीन फॉलो करता रहा .... कुछ दिनों-महीनों में पुष्पा की नज़र भी उसे ढूँढने लगी ....
कभी-कभी ऐसा हुआ कि पुष्पा किसी वजह से ,सुबह से रात तक घर से बाहर नहीं निकल पाई ,तो दूसरे दिन उसके बाहर आने पर ,वो लड़का अपने चेहरे पर गहरी उदासी लिए , हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लाता और सामने पड़े गमले को उठा कर ज़ोर से पटक देता .... दो-चार बार ऐसा होने पर पुष्पा को मज़ा आने लगा .... वो जानबूझ कर बाहर नहीं आती और छुप कर उस लड़के को परेशान होता देखती ...............,लड़का बैचैनी से टहलता नज़र आता .... साईकिल से पुष्पा के घर के सामने वाले सड़क पर चक्कर लगाता , साईकिल की घंटी बेवजह बजाता .... लड़का अपने घर के ग्राउंड-गेट के ग्रिल को ज़ोर-ज़ोर से बजाता .... रात होने पर टॉर्च को जलाता-बुझाता .... पुष्पा को खिलखिला कर हँसने का मन करता .... लेकिन मुस्कुराते हुये वो सो जाती .... न जाने वो लड़का सोता या रोता ..... खाना खाता या खाना खाता भी नहीं .... पुष्पा को कुछ पता नहीं चलता .... पुष्पा उस लड़के को जान बुझ कर तंग कर रही है , ये लड़के को भी कभी नहीं पता चला होगा .... जिस दिन भी ऐसा पुष्पा करती , दूसरे दिन उसके दीदार होने पर , वो लड़का उठा-पटक .... धूम-धड़ाम जरूर करता .... कभी गमला फूटता .... कभी मेज़-कुर्सी ज़ोर से पटकता .... कभी तो साईकिल ही .... एक आदत बन जाती है न ....
 लेकिन पुष्पा और उस लड़के के बीच में , एक शब्द भी बात , कभी भी नहीं हुई .... लड़के का नाम तक नहीं जान पाई .... क्यूँ वो घर को छोड़ कर चला गया , कहाँ गया ,पुष्पा को कभी भी पता नहीं चला .... आज भी उसे एक सवाल के जबाब का इंतजार है कि अगर वो प्यार करता था तो कभी लिख कर , बोल कर प्यार का इजहार क्यूँ नहीं उससे किया .... लेकिन करता भी तो वो कैसे .... पुष्पा कभी अकेली कहाँ होती थी .... 
घर वाले जो ढूंढ रहे थे , 
वो मिलता भी तो कैसे ,
कोई निशानी ..... ??
प्यार का एक रंग ............