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देवनागरी में लिखें

Friday, 8 May 2015

विवाद और बहस

पक्ष विपक्ष हर बात का होता है
नजरिया सबकी अपनी अपनी
सोच समझ जो होती अपनी अपनी
ग्रहण करने की क्षमता जो होती अपनी अपनी
विवाद हो बहस हो लेकिन बात पर हो
लोग बात से हट व्यक्तिगत
आरोप प्रत्यारोप पर उतर
मंदबुद्धी के परिचय देने में
जुझारु हो जाते हैं
 अपने अपने समझ के सिरे से
सोच सार्थक रखना वो भी सच्ची
चलो सही है लेकिन आत्ममुग्ध हो
सामने वाले को सिरे से नाकार देना
सारे आविष्कार एक सोच से ही सम्भव रहा क्या ?
वाद-विवाद बहस हमेशा से जरुरत रही है
100% आप अपने को सही समझे
सामने वाला भी तो अपने को 100% सही समझेगा
आप अगर गलत नहीं हैं तो वो कैसे गलत होगा
+ + मिलकर + ही होता है
सोच तो सकारात्मक हो
हम विवाद और बहस से क्यों भागते हैं। … हमारे पास तर्क नहीं होता है या हम दूसरे की बात को अपनाने में अपनी बेइज्जती समझते हैं। … कहीं हमें कोई अल्पज्ञानी ना समझ बैठे। … डर हमें सही बात को भी अपनाने से रोकता है। …
जब मैं BEd की पढ़ाई कर रही थी तो एक क्लास होता था जिसमें सभी को कुछ सुनाना होता था। …। जब एक लड़के की बारी आई तो वो सुनाया
पत्थर पूजन हरी मिले
तो मैं पूजूं पहाड़
या तो भली चक्की
 पीस खाए संसार
मेरी भी बारी आई। … मैं भी सुना बैठी
कंकड़ पत्थर जोड़ के
दिए मस्जिद बनाये
ता पे मुल्ला बांग दे
बहिरा हुआ खुदाई
पूरी कक्षा पहले तो एन्जॉय किया फिर बहस शुरू हुआ लगा मानो हिन्दू मुस्लिम युद्ध हो जाएगा
मुझे सीख मिला अपने गुस्से पर हमेशा नियंत्रण रखना चाहिए  …।