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देवनागरी में लिखें

Tuesday, 22 March 2016

होली की हार्दिक शुभकामनायें




ठूंठ सिखाये जीवनियाँ
बन्ना सा वन
जमे बन ठनके
बाँध मुरेठा केसरियाँ
चीथड़े पोशाकें
बदरंग चेहरे
सतरंगी बनाए
जोश फगुनियाँ 
भेज कनकनियाँ
आये कुनकुनियाँ
शुरू हुए उठंगुनियाँ 

किलो के किलो बड़े आलू का रूप बिगाड़ते
तब महंगाई का हम बच्चे कहाँ थे समझते
चार सौ बीस .... चाचा चोर ... भतीजा पाजी
तैयार करने के लिए भैया को करते थे राजी
रंग लगा .. धीरे से मौका ढूंढ़ , पीठ पे चिपकाते
सूखा रंग छिड़कने के लिए गंजा सर खोजते
भोले भाले .... शैतानी करना नहीं सोचा करते 

_/\_


Sunday, 6 March 2016

छोटी सी बात




करुणावती पत्रिका के लिए जब राशि देने का समय आया तो दुविधा ये हुई कि मैं रहती पटना में हूँ .... पैसा भेजना कानपूर है ... { तब NEFT  जैसे कार्य से परिचित नहीं थी } बैंक का जमाना है .... लेकिन खुद कभी बैंक की कार्यवाही की नहीं थी .... अपने पति से कहने का मतलब था .... ना .... जबाब पाना ...
घर के अलमीरा पुस्तकों से भरी पड़ी है ..... ऐसे में नई किताबें खरीदने के इच्छुक ना खुद हैं , ना इजाजत देते हैं .... तब वे पुतर आनंद जी से परिचित भी नहीं थे .... परिचित भी होते तो मना कर देते .... बिना बताये कार्य कर लेती हूँ ... लेकिन मना किये कार्य करना अच्छा नहीं लगता है .... जब महबूब - माया के शादी के पार्टी में पुत्र आनंद जी आये तो उन्हें करुणावती पत्रिका की राशि उन्हें चुपके से थमा दी ..... 
जब साझा नभ का कोना हाइकु साझा संग्रह छपने की योजना चली तो फिर इनकी इजाजत मिलना दुरूह कार्य था .... तब तो मेरे पति हाइकु का सुबह शाम मजाक उड़ाया करते थे .... उनका मज़ाक होता था 
1. किसी अनुवाद कर्ता को रखना होगा
2. तीन पंक्तियों के लिए तीन पेज की कुंजिका छपवानी होगी
तब मुझे एक शादी में लखनऊ जाना पड़ा .... वहीँ से मौका मिल गया कानपूर जाने का .... कानपूर में मिल गया सभी समस्याओं का हल ..... लेकिन साझा नभ का कोना छपने के पहले ही .... कलरव तानका सेदोका साझा संग्रह छपने की बात चली और उसकी राशि देने के लिए हिम्मत कर अपने पति से बात कर ही ली और तभी हाइकु की बात भी बता दी .... विमोचन दिल्ली में होना तैय था तो .... टिकट दिल्ली का भी करवाना था .... सब छिपा कर नहीं किया जा सकता था .... इनके विरोध का सामना करना ही था और इनको सहमत भी करवाना था .... पैसा तो महबूब - माया भी देने के लिए तैयार थे .... लेकिन मुझे अपने पति को तैयार करना था .... क्यूँ कि वो मेरा हक़ भी था और सबकी ख़ुशी भी तभी शामिल होती .... 

अपनी दशा दिशा बदलने के लिए हिम्मत करनी चाहिए ....
स्त्री नारी महिलाओं को बहुत छोटी सी बात बता रही हूँ .... छोटी छोटी कोशिश ही कामयाबी की नीव होती है

तीसरी - चौथी किताब की भी बात चली है .... और पटना में विमोचन के लिए भी 
इनके सहयोग की उम्मीद लगा रखी हूँ ..... 

छोटी सी बात 


विष पी स्त्री जी
ना तैय होती सीमा
क्यों ड्योढ़ी छोड़े

सच है न धरा धारा स्त्री की सीमा तैय करना आसान नहीं ..... कूल तब नासती है जब ऊब-चुभ की स्थिति तक पहुंचती है ..... ऊब-चुभ की मनोस्थिति तक प्रतीक्षा ही क्यों करें ..... ड्योढ़ी लांघ , खुले नभ के निचे , बियाबान , मरुथल क्यों झेलें

*बेंवड़ा चढ़ा परेशानियों को ही क्यों ना कुटें 😜

*बेंवड़ा = वह लकड़ी जो बन्द द्वार के पीछे लगाई जाती है = अरगल


Saturday, 5 March 2016

कन्या स्त्री नारी महिला




तनी ठहरीं ना .... हमरो ठोक लेबे दीं ..... दिन में हमरा मारले रहले हां ..... इतना कहते हुए ,रजाई में लिपट सोये बड़े भाई को मुक्के मुक्के पिट हंसते हुए बहन संतोष कर लेती थी .... दोनों भाई बहन एक पीठिया थे और दोनों में पटता नहीं था .... ये बचपन की बातें थी .... लेकिन जब बहन बड़ी हुई और उसकी शादी हुई तो कई बार पति के हाथों पिटी .... लेकिन भाई की तरह पति को क्यूँ नहीं पिटने का सोची .... पति परमेश्वर की घुट्टी पिलाई गई थी ..... असहनीय अशोभनीय बातें तब तक सहती रही जब तक सहनशक्ति जबाब नहीं दे दिया ..... एक दिन बिफर ही पड़ी और चिल्लाई .... खाने में जहर दे .... सबको मार कर , घर में आग लगा दूंगी .... सब स्तब्ध रहे ..... पिटने का अंत हुआ ..... धीरे धीरे खुद के लिए लड़ना सीख गई और आत्मसम्मान से जीने की कोशिश करने लगी .... 

1
कूटे शरीर
*पी नशेड़ी , कुपूत
पले स्त्री बेच
*पी=पति
2
धी भ्रूण हन्ता
माँ बाप ना हों आप
दें सम हक़ 

सब में एक कॉमन बात ये हैं कि स्त्रियों की जिम्मेदारी ज्यादा है ,खुद के हालात के लिए ....

महिला दिवस की शुभकामनायें 
केवल एक दिन के लिए नहीं
 सालो साल के लिए होनी चाहिये ..

एक दिन का नहीं हो उत्सव
हर दिन का हो उत्साह हो

लड़ाई पुरुष वर्ग से नहीं
 ये लड़ाई अपने आप से होनीं चाहिये
सबकी सहमति होनी चाहिए