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देवनागरी में लिखें

Tuesday, 12 April 2016

गाँठ सुलझा रफ़ू


प्रेम का धागा नहीं टूटता .....
जब तक उसमें शक का दीमक
या
अविश्वास का घुन ना जुड़ता .....
खोखला होगा तभी तो टूटेगा .....

मैं जब कढ़ाई या बुनाई करती हूँ ...... तो जब गाँठ डालना होता है ..... 
गाँठ डालना होगा न ... क्योंकि लम्बे धागे उलझते हैं 
और उलझाव से धुनते धुनते कमजोर भी होने लगते हैं ....... 
और ऊन का 25 या 50 ग्राम का गोला होता है ..... 
400 से 600 ग्राम का गोला तो मिलता नहीं ना .....




              ---- जहाँ खत्म हुआ सिरा और शुरू होने वाला सिरा के पास
 थोड़ा थोड़ा उधेड़ती हूँ फिर दोनों के दो दो छोर हो चार छोर हो जाते हैं ....  
दो दो छोर सामने से मिला बाट लेती हूँ ...... 
फिर गाँठ का पता नहीं चलता है ...... 

क्या रिश्ते के गाँठ को यूँ नहीं छुपाया जा सकता है ..... 
कुछ कुछ छोर तक उधेड़ डालो न मन को .....
हर गाँठ को सुलझाया जा सकता है
रफ़ू से चलती है जिंदगी

Thursday, 7 April 2016

घूरा को घूरो और सीख लो


तब का ज़माना ये नहीं था कि द्वारे द्वारे सीटी बजे और घर से कूड़ेदान बाहर रखा जाये ..... तब हर घर के थोड़ी दुरी पर बड़ा गढ़ा खोद कर रखा जाता था और उसमें घर से निकलने वाले सारे कचरे , गाय बैल के गोबर , अनाज के डंठल , खर पतवार भरा जाता था ..... तब जमीन को बंजर बनाने वाली प्लास्टिक का भी पैदाइश नहीं हुई थी न
खढे को मैं हमेशा घूरा करती थी

मेरी माँ कहती थीं
सुनअ घूरा के दिनवा भी बारह बरिस में फिर जाला
मेरे समझ में ये आया कि सड़ गल कर खाद बन जाता होगा घूरा
खेतों में फसल को दिया जाता होगा
खेत सोना उगलती होगी

आत्म हत्या करने वालों को करीब से देखी हूँ निश्चित उनकी माँ मेरी माँ जैसी ज्ञानी नहीं थी
अगर होती तो 12 साल तक धैर्य रखने की सीख जरूर दी होती
12 साल में तो एक युग बदल जाता है
तो क्या हम अपनी स्थिति नहीं बदल सकते

Tuesday, 5 April 2016

वक्त वक्त की टेर


काअ हो तहरा घरे सभन चाचा लोगन के अलग अलग न्योता के कार्ड जाई नु
ना ना हमरा घरे ऐ गो कार्ड जाई
काहेए ….. जब हम तहरा भाई के शादी में अलग न्योता भेजनी अउरी तहरा चचेरा भाई बहीन के शादी में अलीग से न्योता भेजले बानी …..
हमरा ईहाँ अइसने होला कि इगो ही न्योता आवेला … चचेरी बहिन लोग के घरे भी बिआह भईल बा नु …. अउरी हमरो घरे कईगो शादी हो चुकल
बढियाँ बा …. लेबे बेरा कई जाना बा लोग ….. ली लोग कई गओ …. अउरी दी लोग एगो
आगे से हमरा चचेरा भाई बहिन के बिआह होखी त रउआ न्योता मत भेजब …. लेकिन ई बेरा ईगो ही कार्ड भेजल जाव , ना त सभे हमरा के दू चार गो बात सुना दी लोग कि हम बतवले ही ना हओखेब
ना ना हम त चार गओ ही कार्ड भेजेब अउरी हमरा चार गओ न्योता चाहीं त चाहीं
मौका था पुष्पा की ननद की शादी का और बहस छिड़ी थी , पुष्पा और उसकी सास में ….. बहुत समझाने के बाद भी उसकी सास उसके मइके चार कार्ड भेज दी ….. मइके से उसके अपने और चचेरे भाई शादी में शामिल होने आये …. उसके भाई से उसके चचेरे भाई लोग पूछे कि क्या अलग अलग न्योता का चलन शुरू करना है ? नहीं जो अब तक नहीं हुआ वो अब क्यों शुरू होगा
पुष्पा के सगे भाई एक न्योता लाये थे उसे देते हुए बोल दिए कि हमारे घर का रीत इक न्योता ही देने का है , पुष्पा आपलोगों को बताई होगी , आपलोगों को उसकी बात समझनी चाहिए थी …. हर घर की रीत अलग अलग होती है और संयुक्त परिवार की बात ही अलग होती है ….. पुष्पा के ससुर जी बोले कि हाँ पुष्पा बताई थी लेकिन उसकी सास अपनी जिद में किसी की बात सुनती नहीं है
पुष्पा को याद आ रही थी सारी बातें ….. मौका था उसी ननद की बेटी की शादी तैय हुई थी और घर में न्योता देने की बात चल रही थी तो वो बोली कि तीन न्योता जायेगा न ….. आपके घर की रीत जो आपलोगों की माँ मुझे बताई थी … तो उसके पति और देवर मानने के लिए तैयार नहीं हुए …… ऐसा नहीं है ….. आपको याद नहीं है
कार्ड पर हुई बहस के कारण उसकी सास उसे उसकी ननद के शादी की सारी तैयारियों से अलग रखी ही थी साथ कोशिश की थी कि शादी की रस्मों में भी भाग कम से कम ले सके ….. केवल शादी में आये लोगों के भोजन वो पकाये खिलाये
काश सास चार साल और जीवित रहती …… सुनती
वक्त वक्त की टेर  …
अच्छे अच्छे होते ढ़ेर
ढ़ेर  ढ़ेर के हेर फेर