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देवनागरी में लिखें

Saturday, 29 October 2016

दीपावली की असीम शुभकामनायें





 ज
दीन
लोनिनी
आशनाई
धन ते रस
जलापा अलस
तेजस्कर दीवाली ।
<><><>
सत्व
संदीप
मोल दीप
सेंत उजास
चैत्य कारी वास
दीपावली उल्लास ।



"क्यों नहीं आएगा पटाखा ?" पटाखों के लिए रोते-मचलते और जिद करते हुए अपने पोते को देख कर बैचेन होते हुए सिन्हा जी अपने आदत के विपरीत थोड़ी ऊँची आवाज में अपने बहु से बोल दिए ।
"आप ना बोलें कुछ पापा , आपके सह देने से बिगड़ जाएगा । आज ही सुबह में इसके स्कूल ना जाने के जिद को बचपना कह टाल रहे थे आप। "
"बचपन में इसका बाप भी स्कूल नहीं जाना चाहता था ।" 
"यही बात ! यही बात, आपकी इसे शोख बना देगी "सिन्हा जी की बहु थोड़ी तीखे अंदाज़ में बोली ।
"मैं सह दूंगा ? क्या मैं चाहूँगा कि वो बिगड़ जाए ?"तेज आवाज और धुंआ प्रदूषण फैलाती है । शगुण के लिये अनार , चक्करी , फुलझड़ी आते ही हैं , कुछ लाल मिर्चा वाले आ जाएंगे । शगुण भी हो जाएगा और मेरे पोते की ख़ुशी भी बढ़ जाएगी । तेज आवाज और ज्यादा धुंआ वाले पटाखे से प्रकृति प्रदूषित होती है और आस पास के वृद्ध जन परेशान होते हैं ।
"आप अभी भी नहीं समझ रहे हैं"
"हाँ हाँ नहीं समझने की बारी मेरी है ,मेरे पोते के संग ।
याद करना जब तुम्हारे बच्चों के बच्चे होंगे 
राम कथा के साथ दीवाली कथा सुनाते "





Friday, 21 October 2016

खोजवा


कहानी :- खोजवा
विभा रानी श्रीवास्तव

5000 टका ... हाँ जी 5000 ही टका आपलोगों से मिलेगा हमें कि आपलोग हमलोगों से बद्दुआ ही लेने के लिए तैयार हैं , मेरे मकान मालिक के बेटे के शादी के बाद आये , किन्नरों की टोली का मुखिया चिल्लाया/चिल्लाई ... बहुत वर्षों की बात है , तब 5000 रूपये की कीमत बहुत थी । किसी मध्यम परिवार वालों के लिए किन्नरों पर , आशीष के बदले लुटाना हृदयाघात की बात थी , लेकिन किन्नरों की बद्दुआ फलती है , ये अंधविश्वास भी फैली हुई थी ।
      किन्नरों को समीप से देखने का पहला मौका था मेरा ...  उस घटना के बाद रुपया पैसा के लिए किन्नरों का शोर कई बार देखने सुनने का मौका मिला । कभी किसी के घर शादी हुई हो , कभी किसी का नया घर बना हो , कभी किसी के घर बच्चे का जन्म हुआ हो , हिजड़ों की टोली गाने बजाने आशीर्वाद देने के बहाने , लूटने जरूर पहुँचती है । लूटना इस सन्दर्भ में कहती हूँ कि वे बद्दुआ की धमकी दे कर , गंदे गंदे शब्दों का प्रयोग कर , अपनी मुँहमाँगी कीमत वसूलती हैं टोली । जब भी किन्नरों से मुलाकात हुई उनका विभस्त व अश्लील रूप ही देखने को मिला । कई बार रेल यात्रा में उनको यात्रियों को लूटते पाई । महिला यात्री का स्तन छू देना , पुरुष यात्री का गाल या शिश्न को छूने के हाथ बढ़ाना ,सबको एक अजीब परिस्थितियों का सामना करने के लिए बाध्य करना । मुँहमाँगी कीमत दो नहीं तो नंगा हो जाए कहते कहते नीचे से साड़ी उठाने का भय दिखाना । एक बार तो एक ने अपने सारे कपड़े उतार ही डाले । मुझे हमेशा खौफ़ में डाले रखा । अभी हाल में कई दुकानों में हफ्ता यानि कभी आकर पैसे की मांग करते देखी ।
केवल एक अंग में अंतर होने से ये ना तो स्त्रीलिंग वर्ग में या ना तो पुलिंग वर्ग में तो क्या कहें इन्हें होते है या होती हैं
सिक्के का एक पहलू ही तो था खौफ़ का अनुभव मेरा जब तक .....समय के साथ सोच बदलता है या अलग अलग मनुज की अलग अलग सोच होती ही है … समय काल कोई भी हो .... मेरी शादी में एक दूर के रिश्ते की ननद से मेरी मुलाकात दो चार दिनों की हुई वो बहुत सुलझी हुई लगी .... एक दो साल बाद उनकी भी शादी हुई ….. मेरी जब उनसे मुलाकात हुई तो मैं उनसे पूछी ….
"आपको कैसा लगा जब आप जानी कि वे नामर्द हैं ?"

"भाभी क्या शब्दों में कोई कह सकता हैं कि जब वो मर जाता है तो कैसा लगता है ?"

"आप सम्बन्ध विच्छेद कर नई जिंदगी क्यों नहीं शुरू करती हैं ?"
उनका जबाब था "जैसी किस्मत मेरी भाभी उनमें एक ही कमी है ..... लेकिन वे बहुत अच्छे इंसान हैं ..... फिर कौन जानता है , दूसरा कैसा इंसान मिले … ?
इतने अनाथ बच्चे हैं दुनिया में किसी को गोद ले अपने आँचल भर लुंगी ।"

"शारीरिक सुख का क्या होगा ?"
"कैसा सुख ? जब भूख कभी लगी ही नहीं । पाकर खोना कष्टप्रद होता है । जो चीज का अनुभव ही नहीं तो ना मिलने का दुःख कैसा !"
त्याग का मिसाल था ये रिश्ता , लेकिन निभाने का हौसला साथी से मिला साथ ,प्यार ,अपनापन संग उचित व्यवहार ही था न ।
उफ्फ्फ्फ़ क्या दर्द  ! उन किन्नरों को समाज परिवार अपनों से मिला होता है , जो ये इतने क्रूर होते/होती हैं , हम साधारण इंसान इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ।
समाज में फैले इस कोढ़ को मिटाने का उपाय भी मुझे नज़र आया खुद के ननद के त्याग में
जिस परिवार में भी ऐसे बच्चे का जन्म हो उसकी परवरिश परिवार समाज में सच्चाई के साथ सामान्य बच्चों की तरह हो ..... जब ऐसे बच्चे वंश बढ़ाने में सहायक नहीं हैं तो शादी क्यों हो ! जैसे

दो साल पहले मेरे पड़ोसी की लड़की की भव्य शादी हुई , फिर एक बार लड़के वालों के धोखे की शिकार एक लड़की हुई उसकी भी शादी हिंजड़े के साथ कर दी गई

लड़की दो तीन दिन में ही लड़के को तलाक दे अपने नौकरी पर लौट गई

दोनों लडकियों के नजरिये से मुझे दोनों का निर्णय मुझे सही लगा

हम हमेशा अपने को आजमायें …. खुद में जितनी सहनशक्ति हो उतनी ही क्षमता की कार्य जरुर करें .... खोजवा के बारे में एक बार फिर से खोज हो और उन्हें समाज की मुख्य धारा से जुड़ा जरुर रहने दिया जाये ... पूरे मान सम्मान अधिकार के संग ... दया का पात्र ,उपहास का पात्र बना क्रूर बनने पर मजबूर ना किया जाए .... स्त्रीलिंग पुलिंग नपुंसकलिंग ... तीन धारा .... तीन प्रकार के इंसान ....

भैया की पोती के लिए आये टोली को कल देख भी विचार जन्में