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देवनागरी में लिखें

Tuesday, 22 January 2019

उलझन में लिपटा जीवन



अनेकानेक दलों के मैनिफेस्टो को वह अबतक आकंलन-निरीक्षण-परीक्षण करता रहा था... आजतक कोई सरकार उसे ऐसी नहीं दिखी जो जारी किए अपने मैनिफेस्टो को पूरा लागू करने में सक्षम रही हो।
फिर चुनावी मौसम गरमाया हुआ था.. उसके गाँव की याद सभी दलों को बारी-बारी से आना स्वाभविक ही था...
सबसे उलझता रहता, "तुम्हारे दल के मैनिफेस्टो में बेरोजगारी हटाना था, बेरोजगार को आलसी बनाया जा रहा है, राम मंदिर बनाना , धारा 370 हटाना था..!"
"तुम्हारे दल ने जनसंख्या नहीं रोकी, गरीबी पर चुनाव लड़ती रही गरीबी खत्म नहीं की.. किसान खत्म होने के कगार पर हैं...।"
"तुम्हारी पार्टी समाजवाद नहीं ला सकी..।
 "तुम्हारे लोग बहुजन के मुद्दे को हल नहीं कर पाए।  राज्यो में समानता और सबको रोजगार नहीं दे पाए..।"
"किसी भी कंपनी के प्रोडक्ट अपने मानदण्ड पर खरे न उतरे तो कंपनी का लाइसेंस रद्द हो जाना चाहिए जब ऐसा हो सकता है... तो कोई पार्टी चुनावी मेनिफेस्टो पर खरी न उतरे उसकी मान्यता रद्द हो जानी चाहिए.. ऐसी पार्टी के लिए तो ताली बजनी ही नहीं चाहिए जहाँ से गाली की धारा बहती हो... ये क्या चमड़े की जुबान फिसलती ही रहती ।"  80-85 साल का समाज सेवक सत्तू पिसान की गठरी बाँधें.. गाँव वालों को जगाने के लिए पहरु बना हुआ है।

Monday, 21 January 2019

हो सके तो किसी का दर्द बाँट लो

गरिमा सक्सेना(फेसबुक से मिली एक प्यारी बिटिया) से जानकारी मिली कि बैंगलोर में केवल महिलाओं का एक साहित्यिक समूह 'प्रेरणा मंच' है उसकी एडमिन का व्हाट्सएप्प नम्बर मुझे वो दी... मैं एडमिन से व्हाट्सएप्प पर बात की और एडमिन मुझे 'प्रेरणा-मंच' व्हाट्सएप्प समूह से जोड़ दी... जब मैं वहाँ अपना परिचय दी तो मुझे वहाँ राही राजेन्द्र जी मिले... राही राजेन्द्र जी के घर पर 13 जनवरी को एक बैठक रखा गया तो वहाँ दुर्गेश मिश्रा जी मिले... दुर्गेश जी से परिचय के दौरान पता चला कि उनको एक लड़का था जो कुछ महीनों पहले एक दुर्घटना में उनसे बिछुड़ गया...
 दुर्गेश जी का इकलौता बेटा चल बसा है... सुनकर धक्क सा रह गया मेरा मन... वे बेहद दुखी थे... स्वाभाविक था.. : सब लोगों ने कहा कि आप आये तो अपनी पत्नी को साथ क्यों नहीं लाये ?
"वो कहीं जाने की स्थिति में नहीं है... कहीं जाना नहीं चाहती है.."
मुझे भी लगा कि जिसका जवान बेटा साथ छोड़ गया हो उसको कहीं जाने का मन क्यों करेगा... जब गोष्ठी खत्म हुई और मैं वापस आने के लिए ओला बुक करने लगी तो दुर्गेश जी बोले कि"दीदी! आप मेरे साथ चलिए.. कुछ देर और का आपका साथ मिलेगा.."
: मैं तैयार हो गई और हम साथ चले.. रास्ते में बातों के क्रम में पता चला उन्हें एक बेटी भी है.. थोड़ी दूर आने पर वे बोले कि दीदी आप मेरे घर चलिए वहीं से ओला बुक कर दूँगा... जो प्रतीक्षा करनी होगी उतनी देर मेरे घर पर ही बैठ लीजियेगा.. मैं तैयार हो गई.. रात का समय ना जाने ओला वाला कितनी देर में आये
: उनके घर गई... पहुँचते ओला बुक कर दी.. पहली मुलाकात थी उनकी पत्नी और बेटी से बस हैलो हाय हुआ और ओला आ गया... निकलने लगी तो उनकी पत्नी बोली ,"आप फिर आइयेगा फिर कब आइयेगा... ?"
दुर्गेश जी भी बोले, "दीदी आपको फिर आना होगा, जल्द आइयेगा..!"
मैं रास्ते भर और रात भर सोचती रही , ऐसा क्या था जो पहली मुलाकात में वे लोग चाहते थे कि मैं आऊँ?
सुबह-सुबह राही राजेन्द्र जी का फोन आया,"कैसी हैं दी? रात में ठीक से पहुँच गई थीं?"
"हाँ.. सब ठीक रहा.. दुर्गेश जी अपने घर ले गए वहीं से ओला बुक हुआ और मैं आराम से घर वापस आ गई। सुनिए न भाई, दुर्गेश जी और उनकी पत्नी मुझे अपने घर फिर बुलाएं.. क्या आप और भाभी भी मेरे साथ चलिएगा.. अकेले जाऊँगी तो क्या बात होगी.. कितनी देर बात होगी...? जवाहर जी को भी बोल दीजियेगा वे भी अपनी पत्नी के साथ चलेंगे..।"
"ठीक है दी! जवाहर जी को भी बोल देते हैं.. हम चारों व्यक्ति चलते हैं।"
"ठीक है जवाहर जी को भी बोल दीजियेगा... उसके पहले दुर्गेश जी से फोनकर दिन और समय तय कर लीजियेगा... एयरफोर्स में काम करते हैं तो रविवार को छूट्टी होती है या कोई और दिन पता कर लीजियेगा..!"
"ठीक है दीदी... फोन से बात कर बताते हैं...।" कुछ ही देर के बाद राही जी का फोन आया,"सुनिए न दीदी! दुर्गेश जी से बात हुई लेकिन वे बहुत उत्साहित नहीं लगे। बोले कि आप आइये बात-चीत होगी, लेकिन गोष्ठी नहीं होगी... हमें जाना चाहिए कि नहीं?"
"क्यों नहीं जाना चाहिए..! वे काव्य पाठ में रुचि नहीं रख रहे होंगे कि आस-पास के लोगों की चिंता कर रहे होंगे कि,'क्या कहेंगे लोग'..।"
"जी इसलिए उन्होंने केवल मिलने के बुलाया है... क्या जाना ही चाहिए?"
"प्रयागराज का संगम हमें सिखलाता है दूसरों के लिए अपने अस्तित्व को खो देना...!"
"ठीक है दीदी! मैं जरूर जाऊँगा लेकिन जवाहर जी को बोल दिये हैं... आप उन्हें भी लेने के लिए बोल दी थीं...!"
"कोई बात नहीं बोल दिया गया है तो मना तो किया नहीं जा सकता है... और किसी को नहीं बोला जाएगा... लेकिन प्रतीक्षा रहेगी कि वे रविवार के पहले , हमलोगों के आने के लिए स्वयं से वे सुनिश्चित करते हैं कि नहीं...!"
दो दिन बाद राही जी का फोन आया कि दीदी वे रास दादा को भी आने के लिए बोले हैं... रास दादा जा रहे हैं तो हमलोग भी चलेंगे...! है न दीदी...?"
"जरूर चलेंगे...!"
शनिवार को दुर्गेश जी के ही फेसबुक के पोस्ट पर दुर्गेश जी मेरे टिप्पणी के जबाब में टिप्पणी कर दिए कि "कल आ रही हैं दीदी?"
 कल यानी रविवार 20 जनवरी को सुबह से सारे कार्यों से निवृत्त होकर ओला बुक करना शुरू किए... 12:20 ओला बुक हो गया... 13 मिनट में आएगा... मेरी प्रतीक्षा शुरू हुई 13 मिनट 10 मिनट में बदला और रेकॉर्ड पर अटके सुई की तरह अटक गया... डेढ़ बजे दस मिनट अट्ठाइस मिनट में जब बदल गया और मैं प्रतीक्षा में ऊब चली थी क्यों कि डेढ़ से दो के बीच मुझे दुर्गेश जी के घर पर पहुँच जाना था... दुर्गेश जी और जवाहर जी का फोन भी लगातार आ रहा था कि मैं घर से निकली या नहीं निकली... दुर्गेश जी का कहना था कि देर भी हो तो थोड़ी देर के लिए भी अवश्य आऊँ...। खैर! मैं निर्णय ली कि अब ओला की प्रतीक्षा नहीं करनी है किसी से लिफ्ट ले मुझे शहर के मुख्य सड़क तक जाना होगा और वहाँ से ओला बुक करना होगा...

अपने पति महोदय को सूचित की और सन्न निकल भागी क्यों कि उनके जबाब मुझे मालूम थे
–क्यों जाना है इतनी परेशानियाँ उठाकर
–जाना ही क्यों जरूरी है... इत्यादि
बाहर आकर कुछ देर इंतजार के बाद एक ऑटो मिला, हो सकता है किसी ने रिजर्व कर लाया हो वह वापस हो रहा था उससे मुझे सड़क तक आये... ओला बुक किये एक नौजवान की मदद से और दुर्गेश जी के घर लगभग तीन बजे पहुँच गई... ढ़ाई-पौने तीन बजे के लगभग रास दादा-उनकी पत्नी, राही राजेन्द्र-उनकी पत्नी और जवाहर जी पहुँच चुके थे.. जवाहर जी की पत्नी को अनजानों से मिलने में कोई रुचि नहीं..
मुख्यतः रास दादा राजनीतिक बातें करते रहे, कुछ गुनगुनाते रहे.. कुछ देर में बिना पत्नी को लिए कन्हैया प्रसाद जी भी आ गए... उनकी पत्नी भी काव्य वालों के बीच नहीं जाती हैं...
रास दादा के गुनगुनाये दो पंक्ति मुझे बेहद पसंद आई तो पूरी रचना सुनाने का आग्रह कर बैठी... फिर खुद दुर्गेश जी चार पंक्ति–चार पंक्ति कह माहौल बदल डाला... सबकी कविताओं की धारा बह निकली.. राही जी की पत्नी एक भजन सुनाई... जब मैं सुर पकड़ती कि अब वापस हुआ जाए तो दुर्गेश जी की पत्नी मुझे पकड़ लेती,"दीदी थोड़ी देर और!" रास दादा बोलते कि आप अब तक कुछ सुनाई ही नहीं चार पंक्ति सुना दीजिये... तबतक किसी और की रचना फड़फड़ाने लगती.. कुछ समय बढ़ जाता... अंततः जब शाम के छः बजे गए तो मुझे कहना पड़ा कि अब मैं सबका धन्यवाद करती हूँ और अपनी कुछ बात कहती हूँ...
"मैं राम-रहीम, शिव कृष्ण को नहीं मानती हूँ लेकिन एक शक्ति को जरूर मानती हूँ जो हमारी साँसों की डोर को नचाता रहता है... सब कहते हैं कि उसकी मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलता , बात सही भी है हम किसी को जीवित कहाँ कर पाते हैं... तो अगर उसने कोई ऐसा गम दिया है जिससे हमारी साँसों की डोर वह काट नहीं सका है तो हमें इतनी और शक्ति दिया है कि उसके दिए और भारी चोट को हम बर्दाश्त कर सकें... *दिया उसने, लिया उसने* पता नहीं साँसों का डोर कब कट जाए... ऐसा नहीं होकर ऐसा होता मानों जन्में बच्चे की नाल कटती हो... बहुत छोटी जिंदगी है... सबका जाना तय है... तो क्यों न हम मुस्कुराते हुए काट लें... आज हम सारे बिहारी एक जगह जमा हैं लेकिन बिहार में कभी नहीं मिले... आज आने में रुकावटें आ रही थी लेकिन उसने मेरा मनोबल बढ़ाये रखा कि आऊँ और आपको बता दूँ कि मेरे भाई के जाने के बाद उनके गम में मेरी माँ चली गई... मेरी माँ के लिए एक बेटा गया महत्वपूर्ण रहा, चार बच्चे उनके प्यार के लिए तरसता उनमें एकबाल पुत्र महत्त्वपूर्ण नहीं रहा... ऐसा ना हो कि गए पुत्र के गम में आप दोनों पति पत्नी इतने डूब जायें कि समाज को एक और विभा मिले प्यार और सहारे के लिए छछनती... बिन माँ की बेटी का जीवन... जेठ की दोपहरी में रेत पर नंगे पाँव चलना और सर पर दहकता सूर्य ढ़ोना...

Thursday, 17 January 2019

"जद्दोजहद"




"दी! दीदी! सामने देखिए वह वही हैं न , जिन्हें समाज की धारा में लाने के लिए हम इनके आशियाने के अंदर गए थे... गोष्ठी में कभी आना होता था तो पहले अपने घर वालों से आपसे फोन पर बात करवाती थीं , घर वाले सुनिश्चित हो पाते थे तब गोष्ठियों में आ पाती थीं...!"
"अरे कहाँ? ना! ना! कोई दूसरी होगी.. तुम्हें कोई गलतफहमी हो रही हैं!"
"बिलकुल नहीं। मुझे कोई गलतफहमी नहीं हो रही है.., उड़ती चिड़िया के पर गिनती हूँ.. रात्रि, थोड़ी दूरी और थोड़ा अंधेरा होने से आपको ठीक से पहचान में नहीं आ रही होगी..!"
"नहीं ना रे! ना दूरी है और ना अंधेरा... चकाचौंध पैदा करने वाली चेहरे की सजावट और ग्लैमरस पोशाक से धोखा खाने पर विवश हो रही हूँ... समीप जाकर पूछ लूँ, राजनीत गलियारे में आने वाली दो परती चेहरे का राज..., कैसे उड़ान भरी होगी वो इतनी ऊँची...!"
"ना ,दीदी! ना! बेहद कठिनाई से आपके सहारे देहरी लाँघी है..., शिखर से तो अभी जलधारा निकली है!"
"शिखर से गिरी जलधारा जलजला न बन जाये उसके लिए उसका तट तय करना होता है...!"

Saturday, 12 January 2019

"संतोष नहीं तो सुख नहीं'







#पटना_वाला_प्यार पुस्तक का लेखक ,"जीवन में कुछ फैसले इंसान खुद नहीं ले पाता है। उसे एक पुश की जरूरत होती है। कुछ यही हुआ इस बार के 'विश्व पुस्तक मेला,दिल्लीमें। मेरी पहली किताब को दिल्ली पुस्तक मेला में जगह मिला। सपना सच होने जैसा था। फिर मेरे प्रकाशक Samdarshi Prakashan के संपादक योगेश समदर्शी जी ने बताया वह मेरी किताब का लोकार्पण दिल्ली पुस्तक मेला में करवा रहे हैं। तो यकीन मानिए मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। एकबार तो मन हुआ चला जाऊँ कैसे भी...!
पर बॉस से छुट्टी मांगने की हिम्मत नहीं हुई। फ्लाइट का टिकट भी देखा। फिर छोड़ दिया, सोचा डेढ़ घण्टे के कार्यक्रम के लिए कौन इतना खर्च करे? मैं भूल गया था, इतना बड़ा मौका मैं कैसे हाथ से निकलने दे रहा हूँ...।
   लोकार्पण वाले दिन दिल्ली से बड़ी दी Anupama Das का फ़ोन आया उसने समझाया इतना बड़ा मौका कैसे निकलने दे रहे हो। तुरंत निकलो एयरपोर्ट के लिए। मैं एयरपोर्ट के लिए निकला भी , लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। अब अफ़सोस के अलावा और कुछ नहीं बचा था...।"
"5 मिनट से ज्यादा समय नहीं मिलता.. तस्वीर खिंचवाने के संग शायद मंच से कुछ बोलने के लिए... उसके लिए इतना अफसोस..!🤔 4 दिसम्बर 2018 को दिग्गज समीक्षकों के समीक्षा के संग
माता-पिता, चाचा-चाची अपने पराए की उपस्थिति में लोकार्पण... किया-धरा सब पानी में...?
*पंजे से उचक कर नभ पर इंद्रधनुष खींचने की कोशिश जारी रखो.."*
"लेकिन सही में जाने की इच्छा थी। हम मैनेज नहीं कर सके।
4 दिसंबर का किया धरा सब पानी मे कैसे? वह दिन जीवन का सबसे बड़ा दिन था। मृगतृष्णा.."
"बिलकुल 'मृगतृष्णा'
–प्रकाशक मंगनी में पुस्तक नहीं छापते..
–पुस्तक मेला में भी वे स्व के प्रचार के लिए स्टॉल लगाते हैं
–इतना ही था तो सम्मानित करने के लिए बुला लेते लेखक को...
–दिल्ली या दिल्ली के आस-पास हो लेखक तो चला जाये... पटना से दिल्ली जाने में जो खर्च है... पटना से दिल्ली जाने में सामान्यतया दस हजार का खर्च दान कर दो न ठंढ़ में कम्बल खरीद कर...!" 

Tuesday, 8 January 2019

"परीक्षा"



"माँ! माँ आज मैं बेहद खुश हूँ... आप पूछेंगी ही क्या कारण है... पहले ही बता दूँ कि हमारी सारी चिंताएं-परेशानियाँ खत्म होने वाली है... मैं जिस कम्पनी में काम करती हूँ उसी कम्पनी में साकेत की नौकरी पक्की हो गई... अगले महीने से जॉइन कर लेंगे... पाँच साल से मची अफरा-तफरी खत्म होगी और वे हीन भावना से बाहर आ जायेंगे...।" खुशी से उफनती मोहनी की आवाज फोन के स्पीकर से निकलकर ससुर मोहन के कानों में चुभ रही थी..
वे उफन पड़े,"मैं पहले भी मना कर चुका हूँ कि पति-पत्नी का एक ही ऑफिस या कम्पनी में काम करना उचित नहीं है... दोनों के आपसी रिश्ते पर असर पड़ेगा...।"
"जानती हूँ! आपको कभी पसंद नहीं था कि साकेत और मोहनी एक कम्पनी में काम करे.. जब साकेत एक बड़ी कम्पनी में काम करता था और उस कम्पनी ने मोहनी को रखना चाहा था तो आपने विरोध किया था... समय का पहिया बहुत तेज़ी से बदला... साकेत को विदेश का प्रलोभन हुआ, अपनी कम्पनी खोलने का चक्कर... विदेश में अडिग होना , असफलता चखना, अवसाद में घिरना... वो तो शुक्रिया ईश का, मोहनी ड्योढ़ी के खूंटे से बंधी नहीं रही थी... कश्ती भंवर से निकाल रही है... इस बार आप बिलकुल विरोध नहीं करेंगे...।" मोहनी के सास की बातों पर मोहर लगना ही था।

Friday, 4 January 2019

हिन्द , हम व हिन्दी..



"हेल्लो मैम! वन मिनट...,"
"जी हाँ! कहिए..,"
"क्या आप ऑथर हैं?"
"नहीं ! नहीं तो..! क्यों क्या हुआ?"
"पापा के पास आपकी लिखी बुक मैंने पढ़ा है...!"
"देख लो बेटा ... इसे कहते हैं बड़प्पन... आठ पुस्तक का संपादन कर भी अपने को लेखक मानने से इंकार करती... सीखने की भूख अभी बाकी है... शीर्ष का मंजिल अभी बाकी है...!"
"मेरे गुरू अस्सी पुस्तक लिख चुके..., उनसे पूछा गया उनकी द बेस्ट कृति कौन सी है ? तो उन्होंने कहा ,"अभी लिखना बाकी है!"
"आप पहली ऑथर हैं जिनसे मैं मिला हूँ... आज तक बहुत सी पुस्तक पढ़ा लेकिन कभी किसी ऑथर से मिला नहीं था...!" झुककर चरणस्पर्श कर लिया
"मुझे आपकी ब्लेसिंग चाहिए, मैं भी बुक लिखना चाहता हूँ!"
"बेहद खुशी की बात... आपको कामयाबी मिले... अच्छी शुरुआत हो...!"
"कैसे बुक छपेगी... माने कैसे छपती है...?"
"आपके लेखन पर निर्भर करता है... उत्तम लेखन हुआ तो प्रकाशक खुद से छाप देंगे... वैसे कहना मुश्किल है कि ऐसा हो ही चाहेगा... आप अच्छा लेखन कर भी लेंगे तो जल्दी कोई प्रकाशक मिल जाएगा... आप अपनी पूँजी लगाकर छपवा सकते हैं...,"
"क्या मेरी उम्र यानी क्या लोग उनतीस-तीस साल के लेखक के लेखन को महत्त्व देंगे या मैं कुछ साल रूक जाऊँ?
"लेखन का उम्र से क्या ताल्लुक? चेतन भगत की पहली पुस्तक किस उम्र में आई ?
"जी! जी! यह तो आपने ठीक कहा...!"
"आप किस विषय पर पुस्तक लिखना चाहते हैं?"
"स्प्रिचुअल! कैसे लिखूँ ? शुरुआत कैसे करूँ ? अंत कैसे करूँ ? बहुत उलझनें हैं..! थॉट को कैसे..,"
"आप श्री गणेश तो करें... लिखते जाएं... एक दिन का तो काम है नहीं... लिखने के क्रम में लगे कि इसे शुरू में होना चाहिए तो कट-पेस्ट शुरू में कर लीजिए... लगे कि मध्य या अंत में होना चाहिए तो उस क्रम में सजा लीजियेगा.. लेकिन पहले यथाशीघ्र शुरू कीजिए...।"
"क्या पाठक को मेरी उम्र देखते हुए मेरे ज्ञान की बातों पर विश्वास होगा?"
"क्यों नहीं होगा...? पहले भी कह चुकी हूँ अनुभव का उम्र से कोई ताल्लुक नहीं... मैं आपसे उम्र में बहुत बड़ी हूँ... लेकिन हमारा माहौल अलग है... मैं पूर्णतया साधारण गृहणी हूँ... चौके से चौखट तक की दिनचर्या है मेरी... आपका दिनभर में ना जाने कितने लोगों से मिलना-जुलना होता है... किस भाषा में लेखन करना है आपको ?"
"जी! इंग्लिश!"
"क्यों लिखना चाहते हैं ? लेखन किसके लिए करना चाहते हैं?"
"अपने नॉलेज को दूसरे तक पहुँचाने की चाह है... लेखन से ही तो बाँट सकूँगा...।"
"बिलकुल सही... अपनी भाषा में क्यों नहीं लिख रहे ?.. ताकि जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते उनतक भी आपकी बातें पहुँच सके... ऐसे तबके के लोगों के पास ही भ्रांतियाँ ज्यादा है... ,"
"इंग्लिश बुक ज्यादा लोगों को प्रभावित करती है...। ज्यादा बिकेगी..।"
"मृगतृष्णा में नहीं भटकें... अनुवाद कई भाषाओं में हो सकती है...। आप बस लेखन शुरू करें...।"
"मुझे आपसे मदद की बहुत जरूरत पड़ेगी क्या जब चाहूँ आपसे बात कर सकता हूँ..?"
"निसंकोच जब इच्छा हो बात कर लें... मैं आपको अंग्रेजी में मदद नहीं कर पाऊँगी ज्यादा... हम हिन्दी में विमर्श कर सकते हैं , आप उसे अंग्रेजी में अनुवाद कर लीजियेगा..।"
"जी!जी! मैम! हम मातृभाषा में ही सोचते भी हैं न...!"