Saturday, 29 February 2020

29-02-2020

गुरू जी पर कुंडलिया-1
(आ विभा रानी श्रीवास्तव)
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दिदिया हउवें गुरू जी,ई सैनिक के भाय।
घूमत रहलीं इत व उत,कविता दिहिन सिखाय।।
कविता दिहिन सिखाय,वर्ण सत्रह गो होला।
ओमें भइलीं पास,लिखीं अब दोहा रोला।
कह मणि बा उपकार,भले उड़ि जाला निंदिया।
इनसे बानी आज,गुरूजी हउवें दिदिया।।

मणि

बर्फ बौछारें–
चम्मच पे निहारें
चाशनी बूँदें। विभा रानी


इस विश्व में आज के दिन 28 कलम चले.. 29 फरवरी 2020 का लेखन प्राप्त हुआ

01. मधुरेश नारायण *मुक्तक*
02. राजेन्द्र पुरोहित *कथा*
03. सीमा रानी *कविता*
04. प्रियंका श्रीवास्तव *कथा*
05. पूनम कतरियार कथा
06. डॉ. पूनम देवा कथा
07. शाइस्ता अंजूम कविता
08. मेनका त्रिपाठी कविता
09. डॉ. निशा महाराणा कविता
10. निधि राज ठाकुर कविता
11. राहुल शिवाय मुक्तक
12. संजय कुमार 'संज' कविता
13. आदर्श सिंह निखिल मुक्तक
14. गरिमा सक्सेना
15. श्वेता सिन्हा
16. डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
17. नूतन सिन्हा
18. अंकिता कुलश्रेष्ठ
19. डॉ. विद्या चौधरी
20. टी. आनन्द विक्रम
21. विष्णु सिंह
22. हेमंत दास हिम
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26.
27.
28

[29/02, 8:24 am] विरानीश्रीवास्तवदंतमुक्ता: 13 नम्बर ~पड़~ पर आये वो भी हड़काने पे
[29/02, 8:25 am] विरानीश्रीवास्तवदंतमुक्ता: गर्व होता है..  हैं तो ऐसे बच्चे मेरे झोली में
[29/02, 7:50 am] राहुल शिवाय: एक रचना समीक्षार्थ

यूँ ही सूर्य नभ में निकलता नहीं है
यूँ ही कोई भी फूल खिलता नहीं है
किसी सिंह के सोचने से ही केवल
हिरण उसको खाने को मिलता नहीं है

-राहुल शिवाय
29.02.2020
[29/02, 7:51 am] आदर्श सिंह: अहा क्या खूब भाई
[29/02, 8:00 am] विरानीश्रीवास्तवदंतमुक्ता: आपकी लेखनी यहाँ क्यों नहीं चल पाती ?
[29/02, 8:01 am] आदर्श सिंह: माँ अभी सब कुछ बन्द है पता नहीं क्यों लिखा ही न जा रहा कुछ
[29/02, 8:03 am] विरानीश्रीवास्तवदंतमुक्ता: माँ की लाज बच गई
[29/02, 8:04 am] विरानीश्रीवास्तवदंतमुक्ता: 🤔 फौजी और बहाना है..❓
[29/02, 8:05 am] राहुल शिवाय: माँ की इच्छा थी... पालन होना ही था...
[29/02, 8:07 am] राहुल शिवाय: पटना के अन्य साथी भी जरूर लिखेंगे... अभी 29 खत्म नहीं हुआ.. मैं बंगाल में एक कार्यक्रम में व्यस्त था तो विलम्ब हो गया.. अभी घर लौट रहा
[29/02, 8:09 am] आदर्श सिंह: नेवर
[29/02, 8:09 am] आदर्श सिंह: बहाकर के लहू अपना हमेशा आचमन करना
भरी हो गर्व से छाती तिरंगे को नमन करना
यही बोला मेरी माँ ने मैं निकला जब मेरे घर से
तुम वंदे मातरम गाना सुनो जब भी भजन करना।
[29/02, 8:10 am] राहुल शिवाय: आहा! लाजवाब
[29/02, 8:11 am] विरानीश्रीवास्तवदंतमुक्ता: पता है माँ को खड़ूस क्यों हो जाना पड़ता है ...
[29/02, 8:12 am] आदर्श सिंह: 😃😃😃😃
[29/02, 8:12 am] आदर्श सिंह: सॉरी कह रहे थे हम
[29/02, 8:15 am] राहुल शिवाय: कुछ पाने को श्रम तो करना पड़ता है
धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ता है
यूँ ही बच्चा सरपट दौड़ नहीं पाता
उसको पहले गिर-गिर चलना पड़ता है

राहुल शिवाय
29.02.2020
"अधूरी ख्वाहिश" लघुकथा


Friday, 28 February 2020

बलि



कोई रात ऐसी नहीं गुजरती थी , जिस रात उसे स्याह अनुभव ना होता हो । स्याह अनुभव शायद होता नहीं भी हो । क्यों कि विक्षिप्तावस्था में कैसी अनुभूति ।

"एक कट्ठा जमीन मेरे नाम से कर दीजियेगा तो मैं आपकी बेटी को अपने साथ रखने के तैयार हूँ ; वरना मैं चला , आप अपनी बेटी को अपने पास रखिये ।

उसके पति की कही बातों पर नीरा के पिता कोई जबाब देते ; उसके पहले उसकी भाभी चिल्ला पड़ी :- शादी के इतने सालों के बाद धमकी देने से हम डरने वाले नहीं हैं । आपको नीरा को ले भी जाना होगा और हम जमीन देने वाले भी नहीं , आप ही एक दामाद नहीं घर में | अभी एक और मेरी ननद की शादी करनी बाकी है । कल मेरी भी बेटी सयानी होगी । जमीन नहीं दी जायेगी तो नहीं दी जायेगी ।
जमीन नहीं दिए जाने के कारण मायके में ही रहना पड़ा नीरा को ।

जब तक नीरा के माँ बाप जिन्दा रहें , नीरा का पेट भरता रहा । माँ बाप के मृत्यु के बाद उसे उसी शहर के मन्दिर में आश्रय लेना पड़ा । समृद्ध घर के मालिक के पास सैकड़ो एकड़ जमीन थी ।

Wednesday, 26 February 2020

किनारों पर वापसी



"इतनी सारी पुस्तकें एक साथ/एक बार में आपने निर्गत(issue/इशु) करवा लिया?" पुस्तकालय में अध्ययनरत इशिका का ध्यान बरबस नब्बे-सौ पुस्तकों के ढ़ेर के साथ लगभग पाँच-छ साल की बच्ची अपने अभिभावक के साथ खड़ी ने आकर्षित किया तो इशिका का सवाल पूछना स्वाभाविक हो गया।
"जी! मेरी बेटी को पढ़ना बहुत पसंद है साथ में विद्यालय से लगभग पाँच-छ: महीने की छुट्टियों के लिए गृह कार्य मिला हुआ है।"
"क्या पाँच-छ: महीनों के लिए भी इतनी पुस्तकें कुछ ज्यादा नहीं है?" अचंभित थी इशिका।
"अरे! नहीं... बिलकुल ज्यादा नहीं है । इतनी पुस्तकें तो यह एक महीने में पढ़ लेती है। विद्यालय से गृहकार्य मिला है, दो पुस्तकों को लेकर समुन्दर के किनारे बैठकर पढ़ें और छुट्टी खत्म होने के बाद कक्षा में पूरे अनुभव को सबसे साझा करें। पुस्तकालय में इंट्री फ्री और पुस्तकें मुफ्त में मिल जाने से हम अभिभावकों को बहुत सुविधा हो जाती है।"
"ग्रेट! काश भारत में भी यह लहर चलती और बचपन को असामयिक नष्ट होने से बचाया जा सकता।" इशिका कुछ करने की योजना सोच रही थी जब वह भारत वापसी करेगी।


Tuesday, 25 February 2020

स्लीपओवर

शिकायतें तब तक ही रही अधूरे सपनों की,
जब तक तलाशती रही बैसाखी अपनों की।



"ये सोनू की परिचित हैं, अतः हमसे मिलने आई हैं..!"
सोनू ("बोलो जिंदगी" का संस्थापक श्री राकेश सिंह 'सोनू') की बुआ ने आगंतुक का परिचय अपने पति से करवाते हुए अपने निवास स्थान का अवलोकन कराया।
"आपलोग कब आये अमेरिका, बच्चों के संग या उनके पूरी तरह व्यवस्थित हो जाने के बाद ?"आगंतुक की वाणी में सवाल से ज्यादा उत्सुकता थी मानों वह अपने आने का समर्थन चाह रही हो।
"हम अपने बेटे के चिकित्सा के सिलसिले में पहली बार आये, लगभग चालीस-बयालिस साल पहले। तब वह बहुत ही छोटा था। उसके दोनों कानों का शल्य-चिकित्सा करवानी थी। आपका भी अब यहीं रहना होगा? अमेरिका के अनेक हिस्सों में भारतीय ज्यादा बस गए हैं।"
"हाँ! हमें जानकारी मिल रही है। मुझे लगता था कि आज की पीढ़ी के युवा विदेशी प्यारे पिंजरे फँसे हैं। जब तक मैं होश में हूँ स्थाई रहने का तो नहीं सोच सकती।"आगुन्तक ने दृढ़ता से कहा
"हमलोगों का भी भारत में ही ज्यादा मन लगता है, लेकिन देश की जो स्थिति है...,"
"क्या देश की स्थिति के जिम्मेदार वो नहीं जो जन्म लेते हैं उस मिट्टी में और जब कर्ज चुकाने की बारी आती है तो केवल स्व में सिमटी जिंदगी जीते हैं..!"आगुन्तक के आवाज में थर्राहट कम गुर्राहट ज्यादा था
"आपको क्या लगता है देश में गृह युद्ध होगा?"
"जब जिद कायम रहेगा कट्टरपंथी का तो मुमकिन है..!" आगुन्तक गुस्से से बोल पड़ी ।
"मेरा बड़ा पोता अगले साल महाविद्यालय में नामांकन लेगा इसके साथ रहने का मोह है।जानती ही हैं मूल से ज्यादा...!"

Wednesday, 19 February 2020

"मदर इन लव"अद्धभुत पल

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, लोग बैठ रहे हैं और अंदरचित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, अंदर



पथ पै गड्ढ़े-
तम में बाँह खींचे
गुरु भुवेश ।

मेरा पहली बार अमेरिका आना हुआ या यूँ कहें तो पहली विदेश यात्रा। नेपाल बिहार से सटा है, उसके कई शहरों में आना-जाना हुआ तो  वहाँ जाना विदेश जाना कभी लगा नहीं।
रिक्शा-बस-गाड़ी से विदेश थोड़े न जाते हैं। जब तक गगन छूने का एहसास ना हो... काले/भूरे पहाड़ पर श्वेत चादरें ना बिछी दिखे ,उसके पास समुन्दर छूटकी लगे और रेत की आँधी भी संग हो।
दिसम्बर 2020 में सेन होस आते ही जानकारी मिली कि फरवरी 2020 में रानी बेटी (विभा रानी की बेटी) ह्यूस्टन जाने वाली है भजन कार्यक्रम में। उसकी तैयारी में, लगन से लगी, दिखी भी। घर में चर्चा हुई कि वो अकेली जाए या पूरा परिवार जाए। पूरा परिवार संग होना चाहिए हर पल। (यह दिखा भी गुरु माँ , गुरु जी उनकी दोनों बेटियों और बेटे को एक मंच पर देखकर.. बेहद खुशी हुई)। नियत तिथि पर हम कार्यक्रम में उपस्थित हुए। नमन गुरु जी को जो सारे प्रतिभागियों को 'एक सा मान' दिए। मंच पर एक साथ सत्तर साल के बुजुर्ग भी थे तो लगभग दस साल का बालक भी। शायद सभी धर्म के लोगों को भी एक साथ का मौका था। यह आज के समय के लिए बड़ी उपलब्धि लगी।
अपनी बेटियों को अंत तक में मौका देना गुरु के प्रति सम्मान बढ़ाया तो सबके साथ शुरू से अंत तक हारमोनियम से संग बना रहना पूजनीय बनाया।
और सबसे बड़ी बात जो मुझे लगी Skype द्वारा अन्य दूसरे देशों के नागरिक को प्रतिभागी बनने का मौका देना। सभी प्रतिभागियों की प्रस्तुति अद्धभुत थी।
श्री नूर अली मोमिन जी का अपने गाने के बाद रो पड़ना मैं समझ सकती हूँ, जब माया शेनॉय श्रीवास्तव के गाने के बाद मेरे बगल में बैठे दम्पत्ति ने एक साथ कहा ,-"सी सिंगिंग वेरी वेल" तो मेरे आँखों से भी आँसू निकल पड़े और मेरा गला भर्रा गया। मंच संचालक, गुरु जी और गुरु माँ का कहना कि आपलोगों का सपोर्ट करना बड़ी बात है ही आपके दामाद , हमें मजबूरी में कहना पड़ा कि माया हमारी बहू है...। बहू को बेटी सी कहना आसान होता है, बहू को इंसान समझना मुश्किल होता है। हम कोशिश करते हैं कि अपनी बहू को इंसान समझ सकें।
 Live करने की अनुमति नहीं मिलना थोड़ा खला... इसपर गुरु जी को पुनः विचार करना चाहिए
 हम विश्व के किसी कोने में कहीं कोई काम कर रहे हैं तो उसकी जानकारी सभी को होनी चाहिए.. विधा के हित में ही होता है

Tuesday, 18 February 2020

खुशी की लहरें

सेन हौस से ह्यूस्टन जाने के लिए सास-ससुर व बहू एयरपोर्ट पहुँच गए। उनके टिकट का नम्बर B-4 , B-5 व B-6 था। हवाई जहाज के अंदर जाते ही बहू ने सास-ससुर को कहा कि,–"आपलोग किसी भी सीट पर बैठ जाएं।"
"अरे! यह तो सीवान(बिहार) के सिनेमा हॉल सा है!" सास ने खिलखिलाकर कहा तो सभी उसे अजूबा समझकर मुस्कुराने लगे।
"जानती हो बहू जब मैं शादी के बाद पहली बार रक्सौल में फ़िल्म देखने गई तो अंदर जाने के लिए पँक्ति में सबसे आगे आदतन लगी और अंदर जाकर पता लगा कि कुर्सी पर नम्बर लिखे होते हैं और टिकट पर लिखे नम्बर वाली कुर्सी पर बैठना होता है। उस समय भी सभी ऐसे ही मुस्कुरा रहे थे। कुर्सी लूटने/छेकने का अपना आनन्द होता है। आज पुनः सुखी हूँ।"
"गंवार ही रह जाओगी सदा!" ससुर के चेहरे से आवाज तक में स्पष्ट खिन्नता दिख रहा था
"हाँ! आज सीट लूटते इन अंग्रेजों सा... जो दोनों तरफ की अगली पँक्ति छोड़कर बैठे, जिनके पास A-1 से A-60 तक के नम्बर थे।"

Sunday, 16 February 2020

मीन की आँख

"अच्छी है या बुरी अभी नहीं समझ पा रहा हूँ, लेकिन अभी आपको बता रहा हूँ। इस बात को आप अपने तक ही रखियेगा। मैं पत्नी व बच्चियों के संग एक साल के लिए अमेरिका का सब छोड़-छाड़ कर भारत वापस जा रहा हूँ..," हिमेश के इतना कहते ही रमिया स्तब्ध रह गई।
लगभग बारह साल से पारिवारिक दोस्ती है। हिमेश की पत्नी और रमिया में तथा रमिया के पति और हिमेश में गहरी छनती है.. रमिया को दो बेटे हैं तो हिमेश को दो बेटियाँ। हिमेश नौकरी के सिलसिले में अमेरिका आया। नौकरी व्यवस्थित होने पर शादी और समयानुसार दो बच्चियाँ हुई। हिमेश बहुत सालों से अपने माता-पिता को अपने संग अमेरिका में ही रखना चाह रहा था। भारत में माता-पिता के पास अन्य बच्चे भी थे देखभाल के लिए , परन्तु वृद्ध के लिए रस्साकस्सी शुरू हो गए थे । सभी हिमेश पर बराबर दबाव बना रहे थे कि वो भारत वापस आ जाये।
"क्या बेवकूफी वाली बात कर रहे हो मेरे दोस्त। तुम्हारी बच्चियाँ भारत में समझौता क्यों करें? देखो हमने निर्णय किया है कि जब ऐसा समय आयेगा कि हमारी जरूरत हमारे माता-पिता को होगी और वे यहाँ अमेरिका में आकर नहीं रहेंगे तो तीन महीना मैं जाकर रहूँगा और तीन महीना रमिया जाकर रहेगी।" रमिया के पति ने हिमेश को राह सुझाने की कोशिश किया।
"और आगे का छ महीना?" हिमेश उलझन में था।
"तब का तब और सोचेंगे...," रमिया ने कहा।
"तब का तब क्या तुम सेवा करने योग्य रह जाओगे? पिता का धन पुत्र को नहीं मिलता,भविष्य का कुछ सोचकर यह कानून बना होगा।" हिमेश की पत्नी गहरी तन्द्रा से जगी थी।

Friday, 14 February 2020

सुख का धोखा


सर्प चाल में
श्रृंग से भू पे जल–
सद्यस्नाता स्त्री।

 सद्यस्नाता स्त्री की तस्वीर
कब बनी कैसे बनी चिंतनीय नहीं है।
चिंतनीय है बुजुर्गों के पसंद में पाया जाना।
नारी सौंदर्य के कई पुजारियों से भेंट
आते जाते टहलते सफर करते हो ही जाती है।

सही गलत की बात मत करो
मुद्दे की बात मत करो
शाहीन बाग में बैठना हो
या दिल्ली में मतदान करना हो
आरोप की बात मत करो
मादा गोश्त के लिए मुद्दे की बात
कभी नहीं रही।
इश्क मोहब्बत की बात ही मत करो।

नारी तय तो कर ले!
वो शिकार , शिकारी या
सामान्य इंसान के रूप में है
उसे अपनी स्वतंत्रता सीमांत
तय करना आसान हो जायेगा..
आज तक में हर पड़ाव पार कर
नारी यहाँ तक पहुँच चुकी है...
अधिकार और दायित्वबोध नारी में है
तो वह पूरी तरह स्वतंत्र है
वरना...
चित्र में ये शामिल हो सकता है: पाठ

बच्चे पालती सेज सजाती पत्नियाँ पसंद है और
पुरुष के पसंद को अपना भाग्य बनाती
औरतों ने ही उन्हें ऐसा रहने दिया है
फेसबुक सूची से जुड़ा मैसेंजर में गुलाब दें
 सुंदर लड़कियों की तस्वीर पोस्ट पर लगायें
और उनके ही फेसबुक सूची में
जुड़ा कोई मनचला भाभी सम्बोधित कर दे...
इन बलात्कारियों को क्या कहें
 दोष कुछ महिलाओं का भी है
 जिनके कारण
सब धान बाइस पसेरी नजर आता है...


Saturday, 8 February 2020

लाइलाज तो प्रेम है



[07/02, 8:03 am] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता : सबके लिए

[07/02, 8:26 am] : विभा दी गुलाब के काँटों से डरती हूँ...।

[07/02, 8:27 am] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता : 🤔आप और डर😜🍫

[07/02, 8:28 am] : गोली से नहीं चुभन से डरती हूँ...
[07/02, 8:30 am] : बिना काँटों के फूलों के साथ यही उपहार भी देती हूँ....

[07/02, 8:35 am] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता: बिन कांटों के फूल का चयन किया जा सकता है

शब्दों में के कांटों का क्या किया जाए

जिन्हें शब्दों के कांटों की आदत हो जाती है

उन्हें गुलाब के कांटों के चुभन अच्छे लगने लगते हैं...
[07/02, 9:23 am] : बहुत खूब कही आपने
[07/02, 5:33 pm] : बहुत प्यारी बात
कांटों के चुभन का क्या है बस थोड़ी सी शक्कर...

Friday, 7 February 2020

आया बसंत

फ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.

[05/02, 12:11 pm] +1 (925): Hi, I have sent my little poetry to the email ..

[05/02, 12:12 pm] +1 (925) : I do have a long song as well with many paragraphs.. if that is fine I can send it .. too

[05/02, 12:20 pm] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता: 🤔मुझे आपकी बातें बिलकुल भी समझ में नहीं आ रही है 🙏
भारतीय हूँ न गाँव वाली
केवल हिन्दी समझ पाती हूँ..

[05/02, 12:37 pm] +1 (925) : दुसरे गाने के बोल कुछ इस प्रकार है
पढ्ने दे मुझे पढ्ने दे
इश्क़ का कलमा पढ्ने दे!!
[05/02, 12:39 pm] +1 (925) : कृपया ये वाला प्रयोग करे  *पनाहो* शब्द  ठीक किया है

[05/02, 12:47 pm] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता: बेहद खुशी हुई कि आप हिन्दी पत्रिका के लिए अपनी हिन्दी की रचना दी हैं।
हार्दिक धन्यवाद आपका 🙏🌹

क्या करूँ खड़ूस बन जाना मजबूरी है...

अंग्रेजी शब्दों को अपना वजन डालना आता होगा,
हिप्नोटिज्म सफल हुआ गिटपिट करना आता होगा,
तुम अंधी मोहब्बत कर कीमत चुकाने में चूको नहीं-
हिप्नोटाइज्ड होना है आई लव यू सुनना आता होगा।

Wednesday, 5 February 2020

बस यूँ ही..



सदा सोचती हूँ
बड़े-बड़े नाखून
कैसे संभाले जाते होंगे!
लाख जतन करो
गीले नाखून से
चटक ही जाते हैं रिश्ते!

काश! रिश्तों में आये पतझड़ के
पत्तो सी आई सिकुड़न को भी
उबलते पानी पर
चलनी में रखकर
भाप से सीधे किये जा सकते
बुनावट में निखार आ जाता।

Tuesday, 4 February 2020

“गौरवशाली यादें”


अभी तो हर गली हर मुहल्ले हर शहर में लाउडस्पीकर लगाकर निर्भया/दामनी/चुन्नी/मुन्नी के बलात्कारियों के संग न्याय-व्यवस्था को गाली देने की इच्छा बलवती होती जा रही है।

"राउर पापा बहुते गंदा-गंदा गाली दी ले बबुनी!" मैं कई महीनों के बाद अपने मायके के गाँव गई थी.. घर के बाहर मुझे खड़ा देखकर धान पीटती, चूड़ा कूटती महिलाओं में से कई बोल उठी तो अन्य कई अनुमोदन के स्वर मिला बैठी।
  मैं चौंक गई। उन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। घर के अंदर गई तो पापा के गाली देने की बात को भाई-भाभियों द्वारा भी पुष्टि की गई। अब मेरे स्तब्ध होने की बारी थी।
    मेरी माँ की पहचान थी, उनकी शीतल व शांत वाणी, नपा-तुला बोलना, इतना धीमा बोलना कि जिससे बोल रही हैं केवल वही सुन पाए। हम बच्चों को उनसे कभी डाँट नहीं मिला। वे बहुत ही मधुर गाती थीं। उनके गाये गीत बहुत लंबे होते थे। मैं सदा सोचती कि उन्हें यह याद कैसे रह जाता है। बेहद अनुशासन प्रिय व्यक्तित्व पापा का भी था। हम भाई-बहनों में कभी झगड़ा हुआ भी तो अपशब्द किसी के मुँह से नहीं निकलता था। सुलह करने/कराने में हमने माता-पिता को भी गुस्सा में कभी नहीं देखा। जैसे अन्य दम्पतियों में नाराजगी-उलाहना पाया जाता है, वैसा कभी भी हमने अपने माता-पिता में नहीं पाया। अगर कभी हमारे बड़े भैया बहुत तेज गुस्सा होते थे तो एक अपशब्द बोलते थे वो था 'सुअर'। इसके अलावे हम अपने घर में दूसरी कोई गाली सुने ही नहीं थे। पापा कब , कैसे , क्यों गाली देने लगे यह मेरे लिए खोज का विषय हो गया। लेकिन पता कैसे लगाती ! ना तो वे मेरे सामने किसी को गाली देते और ना स्वीकार करते कि वे गाली देते हैं। आज भी पापा को मैं याद करती हूँ तो चार बजे भोर में , दोनों आँखों को बंद किये,  दादी-दादा के चरण-स्पर्श के बाद ही, सांसारिक वस्तुओं को देख पाते हुए पिता का स्मरण होता है।
 मेरी माँ की मृत्यु बहुत वर्षों पहले हो चुकी थी। हमारे पापा के जीवन का बहुत लंबा समय अकेलापन में कटा। बच्चों के पास रहे, संग होना सबके लिए थोड़ा कठिन होता है। क्या सठियाना वजह रही होगी उनका गाली देने की..। कहते हैं लोग न कि हिन्दू के वृद्ध सठिया जाते हैं।
 साठ साल की तो मैं भी हो चली हूँ। क्या मैं भी गाली देने लगूँगी...!
सच कहूँ ...! जब बलात्कार का वीडियो वायरल होता है तो चिल्ला-चिल्ला कर गाली देने की इच्छा होती है। बलात्कार करने वाले से लेकर वीडियो को वायरल करने वालों पर। न्यायालय में बलात्कारियों के वकीलों पर..! न्याय में होने वाले देरी पर कानून बनाने से लेकर लागू करने वालों पर।

जब कोई बहन की पिटाई का वीडियो , मरने का वीडियो वायरल करने का अनुरोध करता नजर आता है तो उस लड़की के ससुराल वालों को गाली देने की इच्छा होती है। ज्यादा इच्छा होती है गाली दूँ.. लड़की के मायके वालों को। अरे! मार खाने से लेकर, मरने तक सहने की घुट्टी पिलाई गई रहती है लड़कियो में.. आज भी समाज की चिंता ज्यादा है लोगों में। उफ्फ यह समाज भी तो उन जैसों से ही बना है जिन्हें बेटियाँ-बहुएँ इंसान ही नजर नहीं आती हैं। दकियानूसी समाज की औरतों को ही औरतों के हर मामले में पुरुषों की गलती छोटी बात लगती है।
"जाने भी दो, औरत को थोड़ा-बहुत बर्दाश्त करना आना चाहिए।" कहती बड़ी-बुजुर्ग औरतें माँ-सास को... क्या गाली दिया जाए सोचती रहती हूँ!
एसिड अटैक करने वालों.. ऐसी सूची बनाऊँ तो लम्बी फेरहिस्त है..! खोज करनी थी मुझे गाली देने की वजह की तो बात यह समझ में आई कि जब हम लाचार-बेबस हो जाते हैं, व्यवस्था से पीड़ित होते हैं। तो गाली देकर अपने मन का भड़ास निकालते हैं..!
परिवेश और परवरिश माता-पिता का ही दिया हुआ है कि मैं कैसी भी परिस्थिति में रहूँ, मेरे शब्दकोश में अपशब्द नहीं है। स्नेह करना सम्मान देना मुझे मेरे पिता ने ही सिखाया। मेरे पिता अपनी भगनी-भतीजियों के संग-संग आस-पड़ोस की बेटियों को भी अपनी बेटी समझते थे.. उनके ससुराल के गाँव में जल ग्रहण नहीं करते थे..! तब बेटियाँ समाज की साझेदारी की होती थी।
 पापा से मिले ही संस्कार है फुर्सत ही नहीं कल की नकारात्मक बातें आज में याद रखने की.. नई सुबह में नई बातों की लम्बी सूची मिल जाती है।
रश्मि प्रभा जी ने विभा को धरा-यायावर कहा मधु जी ने धरा से धैर्य लेने की बात...
रश्मि प्रभा जी ने विभा को यायावर सी किसी से कहीं भी प्यार से मिल लेती है कहा।
पद्मश्री डॉ. उषा किरण खाँ ने दंतमुक्ता कहा एहसास पद्मश्री अवार्ड मिलने सा
    आज के समय में जब ड्योढ़ी के अंदर की सारी जिम्मेदारियों को पूरा कर ली... बेटा , बहू के संग विदेश चला गया और तन्हाई का स्थायी रूप से निवास हो गया तो ड्योढ़ी के बाहर की दुनिया में अपने को रमा देना उद्देश्य हो गया... समाजिक ऋण जिस रूप में उतार सकूँ प्रयास करती हूँ... कल पर यकीन है, कौन सा आज ही प्रलय आ जाने वाला है। संयम, समझ व संवेदना का साथ समय पर छोड़ देते हैं तो शिक्षित होने का क्या फायदा..
 मरने के बारे में सोचती ही नहीं... यानी सोचने के लिए समय नहीं निकाल पाती कि कभी मरना भी है... हर पल जीत लेती हूँ जीने के लिए... सहित्योपचार नहीं मरेगा, हमलोगों द्वारा स्थापित साहित्य और समाज के प्रति जागरूकता और पागलपन नहीं मरेगा... मर ही नहीं सकता न... बूँद हूँ! दरिया के संग मिलकर सागर का दशा-दिशा बदलने की चाहत रखती हूँ..!

परबचन गीत

अ नोखी रीत समझ में बात है आयी, आ त्ममुग्धता  समझ में घात है आयी। थ मे राह लो परंजय उँगली थमाया क्यों झट गर्दन दबोचने नहीं दिया ...