Tuesday, 9 June 2026

ब्याज का टापू

दिन की चुभती हुई धूप की जगह अब एक ठंडी, मखमली हवा ने ले ली थी। पेड़ों पर चहचहाहट तेज हो गई थी। हरीश बाबू ने अपनी किराने की दुकान का शटर आधा गिराया और गल्ले (कैश बॉक्स) के पास बैठ गए। गल्ले से नोटों की गड्डी निकाली। कुल मिलाकर पन्द्रह हजार चार सौ रुपये। हरीश बाबू के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उनके लिए यही उनकी 'दिन की पूँजी' थी, जिससे उनका घर चलता था और बैंक बैलेंस बढ़ता था। वे दुकान पूरी तरह बंद करने ही वाले थे कि तभी एक कमजोर सी आवाज आई, "बाबूजी... कुछ खाने को दे दो। बड़ी भूख लगी है।"

हरीश बाबू ने पलटकर देखा। सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। फटे-पुराने कपड़े, चेहरे पर झुर्रियों का जाल और आँखों में बेबसी। हरीश बाबू का हाथ अनजाने में ही जेब के नोटों की तरफ गया, लेकिन फिर कुछ सोचकर उन्होंने नोट हाथ में ही दबाए रखा।

उन्होंने दुकान के अन्दर देखा। एक शेल्फ पर ताजे ब्रेड का पैकेट, जैम की शीशी और दही की थैली रखी थी। हरीश बाबू ने शटर थोड़ा ऊपर उठाया, अन्दर गए और ब्रेड-जैम और दही ले आए। उस सामान को उस बूढ़ी औरत के हाथों में थमा दिया।

बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से सामान थाम लिया। उसकी सूखी आँखों में अचानक चमक आ गई। "जुग-जुग जियो बाबू! भगवान तुम्हारी तिजोरी हमेशा भरी रखे।" उसने आसमान की तरफ हाथ उठाया और भरभराई आवाज में कहा।

उसकी आँखों से छलकते आँसू और चेहरे पर के उस सुकूँ को देखकर हरीश बाबू के चेहरे पर सन्तोष का गाढ़ापन छा गया। बूढ़ी औरत दुआएँ देती हुई आगे बढ़ गई।

हरीश बाबू ने दुकान का ताला लगाया और घर की तरफ चल दिए। रास्ते में उन्होंने जेब में हाथ डाला।

"आज समझ में आया... तिजोरी की पूँजी तो बस जेब का बोझ है, असली 'दिन की पूँजी' तो वे दुआएँ हैं जो आज कमा कर घर ले जा रहा हूँ।" मुस्कुराते हुए आसमान की तरफ देखा और बुदबुदाए।


अन्त की साँसें

बारूद के काले धुएं ने, वो नीला अम्बर निगल लिया,

इंसान के अंधी नफरत ने, हँसता हुआ चमन कुचल दिया।

जहाँ कभी थी नदियों की कल-कल, और पेड़ों की घनी छाँव,

वहाँ आज बस सन्नाटा है, मर गए शहर, उजड़ गए गाँव।

वो बम के गोले, वो मिसाइलें, वो बारूदी अन्धियारा,

जीत की खातिर इंसानों ने, अपनी ही साँसों को मारा।

जहरीली गैसों के तांडव ने, पत्तों का यौवन छिन लिया,

सूख गए सब बाग-बगीचे, पंछियों का जीवन छिन लिया।

जो शहर कभी था धड़कन जैसा, कंक्रीट का कंकाल हुआ,

नदियों का पानी तेजाब बना, हर कोना-कोना निवाला काल हुआ।

हवा हो गई इतनी कड़वी, फेफड़ों में अब अंगारे हैं,

हम जीत गए जो जंग मगर, खुद अपनी ही किस्मत हारे हैं।

पर देखो! उस मलबे के नीचे, काली राख को चीरकर,

एक नन्हा अंकुर उग आया, विपदा का सीना बींधकर।

वो चीख-चीख कर कह रहा, इंसानी इस नादानी से—

"ये धरती फिर सज सकती है, प्यार और बस पानी से।"

ग़ज़ल

नदी में जो दिखे वो चाँद बेकल है 

मगर क्यों काँच के परदे में धूधल है।


धरा और चाँद की दूरी नहीं घटती,

उदासी में कटा जो वो ही इक पल है।


भटकता फिर रहा जो दिल वो है अक्खड़

मोहब्बत का कोई भी अब नहीं हल है।


दुआओं से बदल जाती है ये दुनिया

मुक़द्दर की लकीरें भी मुसज्जल है


हक़ीक़त की ज़मीं पर पैर हैं जलते

विभा ख़्वाबों का रिश्ता सिल्क मख़मल है।

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