Wednesday, 14 August 2013

हिंदुस्तानी हैं


विहस पड़ा
देश तुझ पे नाज
नाचे सैनिक
~~
गर्व से कहो
अमन चैन प्यारा
हैं हिंदुस्तानी
~~
धोखा है मिला
दर्द भरी आह का
हिसाब मांगो
~~





फिर गुलामी ?
नेताओं की तैयारी
फूट डाल दें
~~
प्रतिस्पर्धा थी
लाये ये शुभ घड़ी
क्रांतिकारी में
~~


Painting Of Indian Flag


भागे अंग्रेज
कब विदा होगा ये
मुआ अंग्रेजी ....??
~~
कहते सब
इंडिपेंडेंस डे है
खुशी-खुशी से
~~



कैसे हो नाज़
सिफारिश शान की
होती है आज
~~
"ट्रिगर खींच
 मामला मत खींच
निकाल खिज़(खीझ)"
~~
माता की धोती
वर्चस्व ज्योति हीन
पूत पे रोती
~~
भटक गई
भारत – तरुणाई
अक्ल पे काई
~~
बजा लो नाद
लो यलगार ज्योति
बैरी भगा लो
~~





Friday, 9 August 2013

आज ईद है






आज ईद है ....
सावनी तीज है …

पेडो पे झुले
सोणी याद मैके की
तीज ले आया

गोरी विहसे
हरी-हरी चुड़ियाँ
कलाई साजे

हरी-हरी चुड़ियाँ ही
डाल लेती हूँ ....
अपनी कलाई
सजा लेती हूँ ....

 देना चाहती हूँ
सबों को बधाई - ईदी
बचपन से शौक रहा है
 ईदी के लिए मचलने का
पापा के दोस्तों में
चाची जान से उलझने का  
छोटे मांग बैठे
 तो
हर्ष से देने का


आज पड़ोस से आते
शहीद के अबोध बच्चों का रोना ....
पत्नी का चीत्कार ....
मांग 5 शहीद के बदले 5000 शत्रु के लाश का ...
माँ-बाप के सहारे की
लाठी छिनने का
(कोई उचित शब्द नहीं मिल रहा)

याद आ रही है ,
शहीद के पत्नी की
सुनी मांग
और
सूनी कलाई
कल ही तो
पोछी-तोड़ी गई है ….




आज ईद है
दिल से बधाई औ
ईदी लो औ दो .... 



Thursday, 8 August 2013

सोच रही ....

देश के हालात पर लिखना
मूर्खता है ....

वो हालात और रहे होगें
ज़मीर ज़िंदा रहा होगा
जब कलम से लोग डरते होंगे ....

डर जाना कहो
हार जाना कहो
जज़्बात का ह्रास कहो
सुनता कौन है
 जिससे कुछ कहूँ

शुतुरमुर्ग के साथ रह रही
जिसकी फितरत रही
मुड़ी गाड़ दो
आया तूफान ,
टल जायेगा

सोच रही
सफेद कपड़े वाले का
खून भी होता सफेद क्या ?
मेरा खून भी
क्यूँ नहीं नहीं उबल रहा

थोड़ा संतोष
बलिदानी में
बिहारी भी



Wednesday, 31 July 2013

सगी माँ का ये कैसा रूप ??

माँ

रिश्ते में बहू से मुलाकात वर्षो बाद हुई ....
बात-चीत के क्रम में ....
आपबीती सुनते सुनाते दौरान ,
बहू अपने पति की जुल्म की इंतहा सुनाने लगी ...
फिर वो अपने आप को दिलासा भी देती जाती ....
इसी क्रम में वो बताई कि
जब उसका पति छोटा था ....
एक दिन सास(पति की माँ) पुआ तल रही थी ,
पति दौड़ता आया और माँ से पुआ की मांग कर बैठा ....
माँ ,खौलते घी से पुआ निकाल कर ,
खौला पुआ ,बेटे के हथेली पर रख दी ....
पुआ की चाह ....
बेटे ने हथेली को बचाने के चक्कर में पुआ मुंह में डाल लिया ....
हथेली ,मुंह और पेट की जलन ,
उस बेटे को औरत के प्रति क्रूर बना दिया ...
बेटे से छोटी सी भी गलती हो जाती .... माँ मारते-मारते लहूलुहान कर देती ....
वही बेटा जब पत्नी के साथ जुल्म करता तो
माँ कहती मर्द है .... मर्दांगी दिखा रहा है ....          
सगी माँ का ये कैसा रूप ??

मुझे तो लगता है
माँ के हाथो में
मिल जाता है आसमां
तभी ,जब पहली बार
सुनती है माँ ....

http://sarasach.com/vibha-7/

Tuesday, 30 July 2013

क्या मिला चाची को ?






चाचा(पड़ोसी ,हम 10 साल से साथ थे)की मिट्टी कल( 29-07-2013)मिट्टी में मिल गई ....
चाची अकेली रह गई ....
चाची बहुत ,बहुत ,जल्दी-जल्दी और अस्पष्ट बोलती हैं .... और ... एक ही बात को बहुत बार दोहराती हैं .... इस लिए दूसरे उन्हें झेलना पसंद नहीं करते हैं .... ये बात चाची कहती भी और समझती भी हैं .... लेकिन मेरे पास उनके लिए हमेशा समय रहा .... उनकी बेटी और मैं एक ही उम्र की होने के कारण और प्यार-सम्मान के कारण भी चाची और मेरे बीच ,माँ-बेटी का संबंध बना रहा ....
चाची जब 10 साल की और चाचा 20 साल के थे तो उनकी शादी हुई थी  .... चाची की शादी एक बड़े परिवार में हुई थी .... चाचा 12-13 भाई-बहन थे .... चाचा सबसे बड़े थे .... देवर-ननद के साथ ही चाची भी बड़ी हुई .... चाची को एक बेटी और एक बेटा हुआ .... चाचा की जब नौकरी लगी तो चाची साथ रहने लगी .... चाचा की आमदनी साधारण थी .... किसी तरह से जोड़-गाँठ कर अपने बच्चों की परवरिश और बेटी की शादी की .... बेटा ONGC में एक अच्छे पद पर नौकरी करने लगा लेकिन शादी के लिए तैयार नहीं हो रहा था .... क्यूँ कि ना जाने उसकी पत्नी कैसी आये .... उसके माता-पिता का ख़्याल ना रखे तो घर में कलह होगा .... बेटा अपने माता-पिता से बहुत प्यार करता है .... परिवार-समाज के समझाने और दबाब बनाने पर बेटा की शादी हुई .... परंतु बहू और सास-ससुर में ताल-मेल नहीं ही बैठ सका .... बेटा अपनी पत्नी को बहुत समझाने का प्रयास करता .... बहू समझौता करने की कोशिश भी करती .... लेकिन सोच की समस्या थी .... ससुर पुराने विचारों के और बहू नए विचारो की ....
 जिंदगी गुजरती रही .... बेटा के साथ जब माँ-बाप रहने के लिए तैयार नहीं हुये तो पटना में ही एक फ्लैट खरीद कर , सब सुख-सुविधा का इंतजाम कर , एक नौकर रख दिया ....लेकिन.... बुढ़ापा तो सुख-सुविधा से नहीं कटती .... वो किसी अपने के देखभाल से कटती है .... करीब 3-4 साल पहले, पटना के घर में ताला लगा कर माँ-बाप को अपने साथ(बरौदा, जहां वो नौकरी करता है)ले गया .... चाची जाते समय मेरे गले लग कर बहुत रोई कि वे अब वापस नहीं आ सकेगी और बहू के साथ वहाँ कैसे रहेंगे ....
लेकिन एक साल के बाद ही वापस आ गए चाची-चाचा .... बेटा के घर में चाची का मन नहीं लगा .... चाचा को अच्छा लगता था ,पोता का साथ था ....
चाची का कहना था कि बहू ध्यान नहीं रखती थी .... वे लोग को रखना नहीं चाहती थी .... यहाँ पटना आने के बाद चाचा-चाची दोनों बीमार रहने लगे .... चाची को ब्रेन-हेमरेज हो गया .... चाचा को बुढ़ापा परेशान करने लगा .... बेटा बार-बार आता ले जाने की जिद करता .... लेकिन चाची जिद पर अड़ी रही .... नहीं जाना था नहीं गई .... इस बीच बहू भी आई .... मेरी बहू से भी बात हुई .... नासमझी का मामला था .... जरूरत तो चाची का था बेटा -बहू का साथ .... एक साल पहले चाचा के बीमारी के कारण चाचा - चाची बेटी के घर (पटना में ही) रहने लगे .... हर महीने होता कि कुछ तबीयत संभल जाता है तो अपने घर लौट आयेंगे .... लेकिन चाचा नहीं आ सके .... आज चाची बेटे बहू के साथ घर लौटीं हैं .... चाचा का श्राद्ध-कर्म बेटे के घर से ही होना चाहिए ....
 श्राद्ध-कर्म बेटे के हाथो ही हो सकता है ना ....
चाचा को बेटी के घर अच्छा नहीं लगता था .... वे अपने पोता के साथ रहना चाहते थे .... अब चाची उसी बहू के साथ रहेगी .... क्या मिला चाची को .... ??


Saturday, 6 July 2013

कितने सहमत हैं आप आलेख से


हम सोच सकते हैं कि विकट परिस्थितियाँ ही पैदा ना हो जिससे किसी प्रकार की विकृति को पनपने का अवसर मिले .... ऐसा बस सोचा जा सकता है , पर ऐसा हो नहीं सकता , हो ही नहीं सकता .... यदि ऐसी परिस्थिति पैदा ही ना हो तो ,हमें परखने की कसौटी का क्या होगा .... किसी प्रतिकूल परिस्थिति में घबराहट हो जाये तो साधना कैसी होगी ....
साधना ....
कबीर के शब्दों में :- ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया ;  जिस उज्जवल चादर को ओढा ,उसे उतनी ही उज्जवलता की स्थिति में उतार कर रख देना .... 
जबतक शरीर है ,पग-पग पर बीमारी की संभावना बनी रहती है …. पर उससे भयभीत होकर हताश हो जाए तो जीना कठिन हो जाता है ….
कौन है जो बीमार नहीं होता ,बल्कि आज के दौर में कम ही लोग हैं ,जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं नहीं झेल रहे होते  हैं .... लेकिन क्या कोई है जो सार्वजनिक तौर पर बीमार आदमी कहलाना पसंद कर पता है .... वैसे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं ,जिन्हे ऐसे पात्र बन कर रहना अच्छा लगता है .... अपनी बीमारियों को बढ़ा-चढ़ा कर जिन्हे प्रचार करने की आदत हो जाती है …. जिम्मेदारी वहन करने में अपनी हर विफलता का ठीकरा वे बीमारी पर ही फोड़ते  हैं  …. लेकिन दुनिया में ऐसे लोगो की संख्या ज्यादा है …. जो अपनी बीमारियों को दरकिनार करके नई राह बनाते हैं ....
शिंडलर  कहते हैं कि डॉक्टर के पास केवल इसलिए पहुंचते हैं कुछ कि उन्हें अपने भावनाओं पर काबू रखने की कला नहीं मालूम होती है ....
आस्तिक का अर्थ यह नहीं कि जो भगवान में विश्वास करता है ….
नास्तिक वह है जो भगवान में विश्वास नहीं करता ....  ये अर्थ गलत है ....
जो जीवन को पूरी तरह से स्वीकार करता है वह आस्तिक है .... जीवन के नियमों को अस्वीकार करना नास्तिकता है ....
इस अर्थ में ,हर मांग हर चाह नास्तिक है .... जब भी हम अस्तित्व(ईश्वर)के सामने अपनी चाह रखते हैं ,उसी वक़्त हम उस अस्तित्व के विपरीत हो जाते हैं .... चाह उठती ही है इसलिए कि जो है  ,पसंद नहीं है …. और उससे कुछ अलग चाहिए ....
अस्तित्व(ईश्वर)की मर्ज़ी के खिलाफ हम जब भी करेंगे ,तो उसमें हारेंगे भी ,और टूटेंगे भी …… तो सभी चाह , हमें ईश्वर के खिलाफ करती है ….. हम तो परमपिता परमेश्वर से भी उसके खिलाफ ही प्रार्थना करते हैं , उस परमेश्वर के दर-मंदिर में भी ……..
घर  में कोई बीमार है तो प्रार्थना करते हैं , हे ईश्वर ! मेरे अपने बहुत कष्ट में हैं, इसे ठीक कर दो …. 
अगर परमात्मा ही सब कुछ करता है तो यह बीमारी भी उसके द्वारा ही प्रदत्त है ….
जब हम कहते हैं, इसे ठीक कर दो, तो हम यह कह रहे हैं कि हम तुझसे ज्यादा समझदार हैं और  तूने हमसे सलाह क्यों नहीं ले ली ,इस आदमी को बीमार करने के पहले ? 
हमारी पूरी जिंदगी ऐसी ही घटनाओं से भरी हुई है …. सच में .... सुख चाहते हैं लेकिन दुख मिलता है …. सफलता चाहते हैं ,पर विफलता हांथ लग जाती है …. जीतना चाहते हैं ,परंतु हर के सिवाय कुछ नहीं मिलता ….
फिर हम सब रोते रहते हैं कि ना जाने कौन से कर्मों का फल है ….. पिछले जन्म का पाप-पुण्य का हिसाब करना चाहते हैं  …..
जो जैसा हैं ,उसे जब तक उसी रूप में हम स्वीकार नहीं करेंगे , तब तक जो भी हम चाहेंगे ,उससे उल्टा ही होगा …सभी मांग-चाह को छोड़ लें और जो हो रहा हैं  ,उसे स्वीकार कर लें तो हमें आस्तिकता का अनुभव होगा ……. 
कितने सहमत हैं आप उपर्युक्त आलेख से ..... ?? 

Monday, 1 July 2013

01 - 07 - 2013



आजीवन हो
आह्लादित हृदय
एक साथ तेरा   ......
1-7-13

संतापी मन
बना जा सर्वसह                (सबका क्लेश हरनेवाला या सब सहनेवाला)
सार्वलौकिक                             (सब लोगों से संबंध रखने-वाला )

~~~~~

1 July
Happy Dr's Day    

रोग भगाता
जाँ बचाता हमारा
ख़ुदा बनता

अर्थ का मोह
तोड़ दे मरीज़ से
विश्वासी रिश्ता

 भारत में डाक्टर'स डे पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डा॰ विधान चन्द्र राय (1 जुलाई 1882 ~~~ 1 जुलाई 1962) के सम्मान में मनाया जाता है !!....

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कहाँ कृष्ण है
बस यही प्रश्न है
व्याकुल मन ..... (Sowaty)

कहाँ कृष्ण है
बस यही प्रश्न है
अन्तर्मन है ?

कहाँ कृष्ण है
बस यही प्रश्न है
सखी(नारी)चीर में ........

Friday, 28 June 2013

बड़े भैया





मेरे पिता-तुल्य बड़े भैया ......
माँ के बाद , माँ की सारी जिम्मेदारी इन्हों ने ही पूरी की ......

जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई और ढेरों शुभकामनायें .....
आपका साया हमारे सिर पर तब-तक रहे ,
जब तक ये दुनिया रहे ....

 इनकी एक खास बात आज कहने को रोक नहीं सकी .....
अगर आपको बुरा लगे तो क्षमा-प्रार्थी हूँ *बड़े भैया .....
 इन्हें मेरी शादी करने के बाद और लड़की (जैसे :- छोटी साली ,बड़ी साली की लड़कियां , भतीजी-भगिनी , दोस्त की बेटी , आस  -पड़ोस की बेटी यानि समाज सेवा) की शादी करवाना अपनी ही जिम्मेदारी लगती और बहुत कुशलता पूर्वक सम्पन्न भी करवाते ....
लेकिन जैसा हमारा समाज है ..... शादी के बाद लड़का-लड़की तो बहुत खुश होते .... लेकिन लड़के की माँ को कोई ना कोई शिकायत अगुआ से हो ही जाती है ....
अगुआ को बहुत अपशब्द , गाली ,बुरा-भला सुनने को मिल जाता है .....
इन्हें बुरा लगता या ना लगता मुझे बहुत बुरा लगता ....
क्यूँ कि जिन लड़कियों की शादी ,ये करवाते  ,लड़का-पक्ष वाले मेरे परिचित जरूर होते ....
सुनने को मुझे मिल ही जाता .....
मैं अक्सर इनसे बोलती कि आप को बुरा नहीं लगता .... ??

ये हँसते हुये बोलते .... देखअ तअ कहीं हमराअ देहाअ मे कौनो सटलअ बा अपशब्द , गाली ,बुरा-भला ..... पुण्य होला आ लड़की केअ बिहाआ करवावलअ ......
काश !!
ये शिकायते नहीं होते
काश !!
ऐसा हो जाता
इनके जैसा बन पाती
किसी का
कहा-किया खो जाता
असर नहीं हो पाता
दिल पर नहीं ले पाती  ......



Photo: * जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई



Tuesday, 25 June 2013

सज़ा एक ही होनी चाहिए थी .... ??



एक बार .... एक अदालत में तीन खूनी पकड़ कर लाये गये .... उनमें से एक को बरी कर दिया गया .... दूसरे को पाँच साल की सज़ा मिली .... तीसरे को फांसी की सज़ा मिली ....

जिसे बरी किया गया ,वो मकान बनाने वाला एक मजदूर था .... ,छत पर काम करते वक़्त एक बड़ा पत्थर उसके हांथ से अचानक छुट कर गिर गया और वो पत्थर नीचे चलते एक राहगीर के सिर पर लगा और उससे उस राहगीर की मृत्यु हो गई .... हत्या तो हुई लेकिन मजदूर ने वो जान-बुझ कर पत्थर नहीं फेंका था उसकी नियत गलत नहीं थी इसलिए उसे बरी कर दिया गया ....

दूसरा मुजरिम एक किसान था .... उसके खेत में लगे फसल को एक चोर काट रहा था ,उस चोर को किसान ने ऐसी लाठी मारी कि चोर मर गया .... चोरी गलत काम है ,किसान का नुकसान भी हो रहा था .... लेकिन ऐसा अपराध नहीं था कि उसकी हत्या कर दी जाये .... इस लिए उस मुजरिम किसान को 5 साल की सज़ा हुई ....

तीसरा मुजरिम एक मशहूर डाकू था .... एक धनी इंसान के घर में रात को डकैती के नियत से गया और धनी पुरुष की हत्या कर के घर का सारा धन चुरा लिया .... उस डकैत का अपराध जघन्य था ,इसलिए उसे फांसी की सज़ा दी गई ....

तीनों ही अपराधी ने खून किया था .... जुर्म का बाहरी रूप एक सा था .... सतही सोच के आधार पर सज़ा एक ही होनी चाहिए थी .... ??


ऊपर के न्यायलय में भी ऐसा ही न्याय होता होगा ना .... ??

हम सभी को भी अपने अन्तर्मन के सत्यनिष्ठ जज के फैसले के अनुसार न्याय का साथ देना चाहिए .... ??

अन्तर्मन कोई काट -छांट  नहीं करता .... लोभ - लालच ,भय - स्वार्थ उसे प्रभावित नहीं करता .... अन्तर्मन तो बस विश्वास पर निर्णय (जजमेंट) देता है ....


Saturday, 22 June 2013

मैं स्तब्ध हूँ


सैलाब ,प्रलय ,प्रकृति आपदा या दैविक प्रकोप जो रहा हो ....
मैं मूक थी ....
मेरी लेखनी को शब्द नहीं मिल रहे थे ....

कल ये प्रसाद मेरे हांथों  में आया ....

मैं स्तब्ध हूँ ....
इस प्रसाद के लोभ में
आकांक्षा के प्रलोभन में
कितनों की बलि चढ़ गई  ....

मैं अब स्तब्ध हूँ
इस चाँदी के सिक्के को देख कर
जो भोले-भण्डारी
धतूर कनेल भांग से खुश हो जाते हैं
उनके प्रसाद में ..............



खुश कौन ज्यादा होगा
केदार नाथ या
चढ़ा प्रसाद पाने वाला ???




Saturday, 15 June 2013

एक क्षण .......


खिलखिलाने के लिए एक क्षण बहुत है 





Advisory excellerator fy13 q3 jan to mar 2013.pps (6) from Vibha Shrivastava


Mehboob Shrivastava को इस साल 

“Excellerator” is an award that recognizes individuals who 


demonstrate excellence in their field of work and stand out 


as champions.


Please refer page#21.......


Photo

महबूब को उसकी कंपनी अवार्ड देने की घोषणा की है ....

महबूब सफलता की एक एक सीढ़ी चढ़ता जाता है और मैं अपने पिता के आगे नतमस्तक होती हूँ ....
 आज जो भी हो रहा उनके आशीर्वाद से ....

बस एक कसक है .... जो कभी भी मिट नहीं सकती ....
महबूब को जब नौकरी लगी तो तैय किया गया कि उसकी पहली सैलरी को उसके बुजुर्ग(दादा-दादी ,नाना) को दिया जाएगा .... क्यूँ  कि हमारे घर में कोई पूजा-दान नहीं होता है .... सैलरी आते ही दादा-दादी को उनके मन मुताबिक दे दिया गया और नाना के लिए रख दिया गया कि जब उनके पास जाया जाएगा तो दे दिया जायेगा ..... लेकिन ,हम कुछ दिनों तक ना जा सके और नाना की मौत की खबर आ गई .......... कल(16/6) फादर्स डे है और कल(14/6)महबूब को अवार्ड मिलने की घोषणा हुई .... कसक फिर ..........



अदर्ज लेखा

“भैया ने मुझे तीन लाख रुपये कब दिए?” “यह किसने कहा?” “आपने छोटी भाभी से कहा है न?” “चुग़लीखोर से मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि गृहप्रवेश पर एक...