Friday, 23 August 2013

BTPS का GM कोठी











ये BTPS का GM कोठी है जहां अभी मेरा निवास स्थान है इस के कैम्पस में धान की खेती से शुरू होती है और सारे फल के पेड़ ,सभी तरह के फूल और सभी तरह के सब्जी के बगान है .... सभी परिवार के सभी (इनके और मेरे भाई-बहन जुटे )सदस्य .... हाइकू इनसे ही जुड़े हुये ....





चखें औ चीखें
करौंदा खट्टा कहाँ
 हैं आँख मिचें....



है प्यारा कौन
गुलाब लिली या मैं
पुछे ये हवा ....



जाऊत मेरा
अचंभित है देख
धान की खेती ....


जाऊत =(देवर का बेटा)



लिली मिली तो
ये मुरझा ना जाये
कैसे बचाऊँ ?



संगी सहेली
खुश सफेद लिली
ख़ुद पहेली ....


Thursday, 22 August 2013

कुछ भी तो नहीं ...



सुत को सुता 
बांधे एक सूत से 
सुलग्न जो था 
माँ हो गई हर्षित 
छलछलाई आँखें
~~
ये मेरा सपना था   
~~
जब चारो ओर रक्षा-बंधन का शोर था 
उसी दिन एक तेरह साल की बच्ची 
अपने दो छोटे-छोटे भाइयों के साथ माँ को भी मुखाग्नि दी 
उस पर क्या गुजरा होगा ....
शब्दों में ब्यान करना नामुमकिन है .... 
बहुत सालो के बाद इस बार मैं किसी भाई को राखी न बांध पाई ....
लेकिन उस बच्ची के दुख को समझने का दावा नहीं कर सकती ...
20 अगस्त को राखी के दिन ही मेरी माँ की पुण्य-तिथि थी 
मन विचलित था 
लेकिन उस बच्ची के बारे में सोच कर देखि 
मेरा दुख उसकी तुलना में क्या था 
कुछ भी तो नहीं 



अपने अश्रु रोके हुये गगन को रोते देख रही थी 




तभी मेरा साथ देने आए 



एक अपने साथी से विछुड़ा अकेला भी था .....
दूसरे के आँसू अनुभव कर देखिये अपने कम लगेंगे .....




Sunday, 18 August 2013

*(मदर इन लव)*



मेरी अमानत 
मुझे मिली  
जो दूसरे के 
घर में पली
जो मुझे बनाई 
mother in law(मदर इन लॉं) 
But
मुझे रहना है 
mother in love(मदर इन लव)

जो मेरे आस-पास रहेगी पूरी जिंदगी 
उसे विदा नहीं करना होगा पूरी जिंदगी ….

नवीन अनुभूति 
सासु माँ 
शब्दो में बांधा जा सकता है .... ??
(*_*)

मैं माँ बनने का दावा नहीं कर सकती .... कर ही नहीं सकती हूँ .... 
कैसे करूँ .... ना नौ महीनें खून से सींचा .... ना प्रसव वेदना सही .... ना एक रात जग कर बिताई .... ना कभी ख़ुद गीले में सो कर , उसे सूखे में सुलाई ....
कैसे बनू माँ .... माँ जैसी .... ये जो जैसी* है .... हर रिश्ते में मुझे पसंगा लगता है .... और पसंगा कैसे सहज स्वीकार होगा .... 
मदर में दुमछल्ले की तरह लगा लॉं ,रिश्तो को कटुता और असहजता के कठघरे में ला खड़ा करता है  …. जैसे लव में कोई ला नहीं होता है  …. वैसे ही भावनाशून्य और संवेदनहीन लॉं  में रिश्तों की भीनी महक व प्यार की मिठास हो ही नहीं सकती है  …. ऐसा मेरा भी मानना है  
रिश्ते एक-दूसरे का दर्द समझने से बनते हैं .... 
एक दूसरे के प्रति स्नेह और विश्वास से पनपते हैं .... 
आज और अभी से अपने रिश्तों के बीच से लॉं को निकाल कर फेंकने की कोशिश जारी रहेगी .... कोशिश करूंगी कि उसे ये घर अपना लगे .... आज कोई वादा नहीं करती .... समय तैय करेगा कि वो कितनी खुश रह पाती है .... 
बस एक बात कहना चाहूँगी ….
हम छोटे से छोटे बदलावों को लेकर असहिष्णु हो जाते हैं .... इसलिए हम बहुत सी चीजों से अछूते रह जाते हैं .... बदलाव को स्वीकार करना ,मतलब जीवन को नए रंग देना .... जिंदगी तभी मुकम्मल होती है जब रंग-बिरंगी हो .... बदलाव को स्वीकार करना या नकारना बाद की बात है .... पहले हर बदलाव को प्यार करना जरूरी होता है .... क्योंकि बदलाव से ,हमें प्राप्त होती है ,अनुभव की समृद्धि जो सबको नई पहचान देती है .... नए बदलाव से हमारे इर्द-गिर्द बहुत सी चीजें बदल जाती है ,जिन्हें लेकर हमेशा झल्ला जाना ,कुढ़ना - चिढ़ना बेबकूफी होती है .... बेबकूफ कहलाना किसे पसंद ?
जीवन का एक परम उद्देश्य सेवा होना चाहिए .... सेवार्थ होना .... संकल्परहित मन दुखी रहता है .... संकल्प से जुड़ा मन कठिनाइयाँ अनुभव कर सकता है ,परंतु अपने श्रम का फल पाता है .... जब सेवा का संकल्प जीवन का एक मात्र उद्देश्य बन जाता है तो भय दूर होता है मन केंद्रित होता है और एक लक्ष्य मिलता है .... यदि केवल देने और सेवा के लिए जीवन हो तो पाने के लिए ,कुछ बचता ही नहीं है ....
सफलता श्रेयष्ठता की कमी को इंगित करती है .... सफलता यह दर्शाती है कि असफल होने की संभावनाएं भी है .... जो सर्वश्रेष्ठ है वहाँ , असफलता के हारने का प्रश्न ही नहीं .... जब हम अपनी अनंतता को समझते हैं तो तब कोई भी कार्य प्राप्ति या उपलब्धि नहीं होती यदि स्वय को बहुत सफल समझते हैं तो इसका अर्थ है कि हम अपना मूल्यांकन कम कर रहे हैं ...। अपनी प्राप्तियों पर अभिमान करना, स्वयम को छोटा करना है ....  
तब 
दूसरों की सेवा करते समय यह महसूस हो सकता कि हमने पर्याप्त नहीं किया ,पर यह कभी महसूस नहीं होगा कि हम असफल रहे ....
कार्य करना जितना हमें नहीं थकाता उतना कार्य करने का भाव थका देता है .... हमारी सारी प्रतिभाएं दूसरों के लिए है ....
 यदि 
सुरीला गाते हैं .... वह दूसरों के लिए 
स्वादिष्ट भोजन बनाते हैं .... वह दूसरों के लिए 
अच्छी पुस्तक लिखते हैं .... वह दूसरों के पढ़ने के लिए
अच्छे बढ़ई हों  .... तो यह इसलिए कि दूसरों के इस्तेमाल के लिए अच्छी चीजें बना सके 
निपुण सर्जन हों ... तो दूसरों को स्वस्थ्य करने के लिए  
कुशल शिक्षक हों तो वह भी दूसरों के लिए,समाज शिक्षित करने के लिए
 हमारी सारी निपुणताएं दूसरों के लिए है ....

Thursday, 15 August 2013

Mrs.GM बरौनी में हूँ ....




Barauni Thermal Power Station (BTPS) 

बहुत पुरानी बात है …. करीब 22-23 साल पहले की बात है ....
मैं ,इनके साथ ,इनके नई-नई नौकरी पर KTPS आई थी .... नौकरी थर्मल-पावर की थी .... थर्मल-पावर की कॉलोनी थी .... कॉलोनी में सभी तरह के स्टाफ थे .... विवाद होने की संभावना ज्यादा थी .... इसलिए केवल इंजीनियर की पत्नी के लिए क्लब खोला गया .... क्लब खोलने के बाद सभी का विचार बना कि कुछ सीखने-सिखाने की व्यवस्था की जाये जिसमें पूरे स्टाफ की पत्नियों , बच्चियों और छोटे-छोटे बेटे को भी आने की अनुमति दी जाये ....

EA = Engineer Assistant 
AEE = Assistant Executive Engineer
EE = Executive Engineer
Superintending Engineer 
Superintending Engineer ही Deputy General Manager 
Chief Engineer ही General Manager 

क़ल्ब में इंजीनियर की पत्नी लोगों का ही दायित्व बना कि जिस समय पेंटिंग-सिलाई-कढ़ाई-स्केचिंग-बांधनी-बाटिक को सिखाया जाएगा तो वे दो ,बारी-बारी से उपस्थित रहेगी .... हमउम्र की बहुत सारी औरतें थीं जिनके पति AEE थे  ….  लेकिन कुछ EE  , कुछ SE , एक DGM की पत्नी और एक GM की पत्नी थी .... Mrs.DGM को लगता कि स्टाफ के पत्नी बच्चों की निगरानी वे क्यूँ करें .... AEE की पत्नी ही सबसे नीचे पोस्ट की औरत है .... वे ही रोज ड्यूटि करे .... वे AE की पत्नी को हिक़ारत की नज़र से भी देखती थीं .... एक दिन मेरे(AEE की पत्नी) साथ उनका ड्यूटि पड़ा .... वे आईं तो मुझे बोली कि आप देखिये मुझे अच्छा नहीं लगता इनलोगों के बीच .... मैं पुछी क्यूँ ? वे बोली :- आप अभी नहीं समझेगी .... मैं बोली :- अभी क्यूँ नहीं समझूँगी (जवानी का खून .... थोड़ा ज्यादा ही  गुस्सा आता था).... वे बोली मैं DGM की पत्नी हूँ .... मुझे अच्छा नहीं लगता बस .... मुझे अच्छा नहीं लगा .... मैं झल्लाते हुये बोली :- मेरे पति AEE या आपके पति DGM हैं .... मैं या आप या ये स्टाफ की पत्नी सिर्फ पत्नी हैं .... आपके पति जब जॉइन किये थे तब एक और पोस्ट हुआ करता था EA .... मेरे पति के जॉइन करते वक़्त उस पोस्ट को खत्म कर दिया गया और एक आगे के पोस्ट AEE पर पोस्टिंग की गई .... इसलिए अगर इस समय आपके पति DGM हैं तो आने वाले वक़्त पर मेरे पति GM बन सकते हैं .... इस लिए दूसरे को हिक़ारत की नज़र से देखना बंद कीजिये और केवल ये याद रखिए कि आप पत्नी हैं खुद DGM नहीं …. जिस समय मेरे पति GM बनेगें … आप देखने के लिए भी नहीं होगीं या ना जाने आप किस स्थिति में होगीं .... उस दिन से मेरा ख़्वाब सा बन गया मेरे पति का GM बनना .... हर घड़ी ,हर पल सोच में ये रहता कि ये GM बने तो थर्मल पावर का ही ....
बिहार के बंटवारा के बाद एक PTPS झारखंड में चला गया .... कुछ साल पहले KPTS ,NTPC को बिहार सरकार के चलते चला गया .... मेरा ख़्वाब देखना बंद हो गया .... क्यूँ कि केवल एक BTPS बिहार में था और ये वहाँ जाएँगे ये उम्मीद नहीं थी .... क्यूँ कि GM का पोस्ट तो मिलता लेकिन BTPS का मिलेगा ये तो हो ही नहीं सकता था .... इनसे ऊपर 3-4 SE थे जो ज्यादा हक़दार थे .... सरकारी नौकरी थी .... लेकिन कहते हैं ना .... कुछ भी असंभव नहीं होता .... बस ख़्वाब में तासीर होनी चाहिए ....
 आज मैं Mrs.GM बरौनी में हूँ .... लेकिन समझ ,मैं अभी भी नहीं पाई ....


खुशी के साथ गर्व है कि मैं झंडोतोलन कर पाई
आते ही विनोद भवन की अध्यक्षा जो बन गई ........



इन्हें टॉफी देने में गर्व हुआ लेकिन उन्हें धन्यवाद भी …. 




ये अपने सहयोगी को संबोधित करते हुए 




आये हैं तो मुंह मीठा करके जाइये 
(*_*)



Wednesday, 14 August 2013

हिंदुस्तानी हैं


विहस पड़ा
देश तुझ पे नाज
नाचे सैनिक
~~
गर्व से कहो
अमन चैन प्यारा
हैं हिंदुस्तानी
~~
धोखा है मिला
दर्द भरी आह का
हिसाब मांगो
~~





फिर गुलामी ?
नेताओं की तैयारी
फूट डाल दें
~~
प्रतिस्पर्धा थी
लाये ये शुभ घड़ी
क्रांतिकारी में
~~


Painting Of Indian Flag


भागे अंग्रेज
कब विदा होगा ये
मुआ अंग्रेजी ....??
~~
कहते सब
इंडिपेंडेंस डे है
खुशी-खुशी से
~~



कैसे हो नाज़
सिफारिश शान की
होती है आज
~~
"ट्रिगर खींच
 मामला मत खींच
निकाल खिज़(खीझ)"
~~
माता की धोती
वर्चस्व ज्योति हीन
पूत पे रोती
~~
भटक गई
भारत – तरुणाई
अक्ल पे काई
~~
बजा लो नाद
लो यलगार ज्योति
बैरी भगा लो
~~





Friday, 9 August 2013

आज ईद है






आज ईद है ....
सावनी तीज है …

पेडो पे झुले
सोणी याद मैके की
तीज ले आया

गोरी विहसे
हरी-हरी चुड़ियाँ
कलाई साजे

हरी-हरी चुड़ियाँ ही
डाल लेती हूँ ....
अपनी कलाई
सजा लेती हूँ ....

 देना चाहती हूँ
सबों को बधाई - ईदी
बचपन से शौक रहा है
 ईदी के लिए मचलने का
पापा के दोस्तों में
चाची जान से उलझने का  
छोटे मांग बैठे
 तो
हर्ष से देने का


आज पड़ोस से आते
शहीद के अबोध बच्चों का रोना ....
पत्नी का चीत्कार ....
मांग 5 शहीद के बदले 5000 शत्रु के लाश का ...
माँ-बाप के सहारे की
लाठी छिनने का
(कोई उचित शब्द नहीं मिल रहा)

याद आ रही है ,
शहीद के पत्नी की
सुनी मांग
और
सूनी कलाई
कल ही तो
पोछी-तोड़ी गई है ….




आज ईद है
दिल से बधाई औ
ईदी लो औ दो .... 



Thursday, 8 August 2013

सोच रही ....

देश के हालात पर लिखना
मूर्खता है ....

वो हालात और रहे होगें
ज़मीर ज़िंदा रहा होगा
जब कलम से लोग डरते होंगे ....

डर जाना कहो
हार जाना कहो
जज़्बात का ह्रास कहो
सुनता कौन है
 जिससे कुछ कहूँ

शुतुरमुर्ग के साथ रह रही
जिसकी फितरत रही
मुड़ी गाड़ दो
आया तूफान ,
टल जायेगा

सोच रही
सफेद कपड़े वाले का
खून भी होता सफेद क्या ?
मेरा खून भी
क्यूँ नहीं नहीं उबल रहा

थोड़ा संतोष
बलिदानी में
बिहारी भी



Wednesday, 31 July 2013

सगी माँ का ये कैसा रूप ??

माँ

रिश्ते में बहू से मुलाकात वर्षो बाद हुई ....
बात-चीत के क्रम में ....
आपबीती सुनते सुनाते दौरान ,
बहू अपने पति की जुल्म की इंतहा सुनाने लगी ...
फिर वो अपने आप को दिलासा भी देती जाती ....
इसी क्रम में वो बताई कि
जब उसका पति छोटा था ....
एक दिन सास(पति की माँ) पुआ तल रही थी ,
पति दौड़ता आया और माँ से पुआ की मांग कर बैठा ....
माँ ,खौलते घी से पुआ निकाल कर ,
खौला पुआ ,बेटे के हथेली पर रख दी ....
पुआ की चाह ....
बेटे ने हथेली को बचाने के चक्कर में पुआ मुंह में डाल लिया ....
हथेली ,मुंह और पेट की जलन ,
उस बेटे को औरत के प्रति क्रूर बना दिया ...
बेटे से छोटी सी भी गलती हो जाती .... माँ मारते-मारते लहूलुहान कर देती ....
वही बेटा जब पत्नी के साथ जुल्म करता तो
माँ कहती मर्द है .... मर्दांगी दिखा रहा है ....          
सगी माँ का ये कैसा रूप ??

मुझे तो लगता है
माँ के हाथो में
मिल जाता है आसमां
तभी ,जब पहली बार
सुनती है माँ ....

http://sarasach.com/vibha-7/

Tuesday, 30 July 2013

क्या मिला चाची को ?






चाचा(पड़ोसी ,हम 10 साल से साथ थे)की मिट्टी कल( 29-07-2013)मिट्टी में मिल गई ....
चाची अकेली रह गई ....
चाची बहुत ,बहुत ,जल्दी-जल्दी और अस्पष्ट बोलती हैं .... और ... एक ही बात को बहुत बार दोहराती हैं .... इस लिए दूसरे उन्हें झेलना पसंद नहीं करते हैं .... ये बात चाची कहती भी और समझती भी हैं .... लेकिन मेरे पास उनके लिए हमेशा समय रहा .... उनकी बेटी और मैं एक ही उम्र की होने के कारण और प्यार-सम्मान के कारण भी चाची और मेरे बीच ,माँ-बेटी का संबंध बना रहा ....
चाची जब 10 साल की और चाचा 20 साल के थे तो उनकी शादी हुई थी  .... चाची की शादी एक बड़े परिवार में हुई थी .... चाचा 12-13 भाई-बहन थे .... चाचा सबसे बड़े थे .... देवर-ननद के साथ ही चाची भी बड़ी हुई .... चाची को एक बेटी और एक बेटा हुआ .... चाचा की जब नौकरी लगी तो चाची साथ रहने लगी .... चाचा की आमदनी साधारण थी .... किसी तरह से जोड़-गाँठ कर अपने बच्चों की परवरिश और बेटी की शादी की .... बेटा ONGC में एक अच्छे पद पर नौकरी करने लगा लेकिन शादी के लिए तैयार नहीं हो रहा था .... क्यूँ कि ना जाने उसकी पत्नी कैसी आये .... उसके माता-पिता का ख़्याल ना रखे तो घर में कलह होगा .... बेटा अपने माता-पिता से बहुत प्यार करता है .... परिवार-समाज के समझाने और दबाब बनाने पर बेटा की शादी हुई .... परंतु बहू और सास-ससुर में ताल-मेल नहीं ही बैठ सका .... बेटा अपनी पत्नी को बहुत समझाने का प्रयास करता .... बहू समझौता करने की कोशिश भी करती .... लेकिन सोच की समस्या थी .... ससुर पुराने विचारों के और बहू नए विचारो की ....
 जिंदगी गुजरती रही .... बेटा के साथ जब माँ-बाप रहने के लिए तैयार नहीं हुये तो पटना में ही एक फ्लैट खरीद कर , सब सुख-सुविधा का इंतजाम कर , एक नौकर रख दिया ....लेकिन.... बुढ़ापा तो सुख-सुविधा से नहीं कटती .... वो किसी अपने के देखभाल से कटती है .... करीब 3-4 साल पहले, पटना के घर में ताला लगा कर माँ-बाप को अपने साथ(बरौदा, जहां वो नौकरी करता है)ले गया .... चाची जाते समय मेरे गले लग कर बहुत रोई कि वे अब वापस नहीं आ सकेगी और बहू के साथ वहाँ कैसे रहेंगे ....
लेकिन एक साल के बाद ही वापस आ गए चाची-चाचा .... बेटा के घर में चाची का मन नहीं लगा .... चाचा को अच्छा लगता था ,पोता का साथ था ....
चाची का कहना था कि बहू ध्यान नहीं रखती थी .... वे लोग को रखना नहीं चाहती थी .... यहाँ पटना आने के बाद चाचा-चाची दोनों बीमार रहने लगे .... चाची को ब्रेन-हेमरेज हो गया .... चाचा को बुढ़ापा परेशान करने लगा .... बेटा बार-बार आता ले जाने की जिद करता .... लेकिन चाची जिद पर अड़ी रही .... नहीं जाना था नहीं गई .... इस बीच बहू भी आई .... मेरी बहू से भी बात हुई .... नासमझी का मामला था .... जरूरत तो चाची का था बेटा -बहू का साथ .... एक साल पहले चाचा के बीमारी के कारण चाचा - चाची बेटी के घर (पटना में ही) रहने लगे .... हर महीने होता कि कुछ तबीयत संभल जाता है तो अपने घर लौट आयेंगे .... लेकिन चाचा नहीं आ सके .... आज चाची बेटे बहू के साथ घर लौटीं हैं .... चाचा का श्राद्ध-कर्म बेटे के घर से ही होना चाहिए ....
 श्राद्ध-कर्म बेटे के हाथो ही हो सकता है ना ....
चाचा को बेटी के घर अच्छा नहीं लगता था .... वे अपने पोता के साथ रहना चाहते थे .... अब चाची उसी बहू के साथ रहेगी .... क्या मिला चाची को .... ??


Saturday, 6 July 2013

कितने सहमत हैं आप आलेख से


हम सोच सकते हैं कि विकट परिस्थितियाँ ही पैदा ना हो जिससे किसी प्रकार की विकृति को पनपने का अवसर मिले .... ऐसा बस सोचा जा सकता है , पर ऐसा हो नहीं सकता , हो ही नहीं सकता .... यदि ऐसी परिस्थिति पैदा ही ना हो तो ,हमें परखने की कसौटी का क्या होगा .... किसी प्रतिकूल परिस्थिति में घबराहट हो जाये तो साधना कैसी होगी ....
साधना ....
कबीर के शब्दों में :- ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया ;  जिस उज्जवल चादर को ओढा ,उसे उतनी ही उज्जवलता की स्थिति में उतार कर रख देना .... 
जबतक शरीर है ,पग-पग पर बीमारी की संभावना बनी रहती है …. पर उससे भयभीत होकर हताश हो जाए तो जीना कठिन हो जाता है ….
कौन है जो बीमार नहीं होता ,बल्कि आज के दौर में कम ही लोग हैं ,जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं नहीं झेल रहे होते  हैं .... लेकिन क्या कोई है जो सार्वजनिक तौर पर बीमार आदमी कहलाना पसंद कर पता है .... वैसे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं ,जिन्हे ऐसे पात्र बन कर रहना अच्छा लगता है .... अपनी बीमारियों को बढ़ा-चढ़ा कर जिन्हे प्रचार करने की आदत हो जाती है …. जिम्मेदारी वहन करने में अपनी हर विफलता का ठीकरा वे बीमारी पर ही फोड़ते  हैं  …. लेकिन दुनिया में ऐसे लोगो की संख्या ज्यादा है …. जो अपनी बीमारियों को दरकिनार करके नई राह बनाते हैं ....
शिंडलर  कहते हैं कि डॉक्टर के पास केवल इसलिए पहुंचते हैं कुछ कि उन्हें अपने भावनाओं पर काबू रखने की कला नहीं मालूम होती है ....
आस्तिक का अर्थ यह नहीं कि जो भगवान में विश्वास करता है ….
नास्तिक वह है जो भगवान में विश्वास नहीं करता ....  ये अर्थ गलत है ....
जो जीवन को पूरी तरह से स्वीकार करता है वह आस्तिक है .... जीवन के नियमों को अस्वीकार करना नास्तिकता है ....
इस अर्थ में ,हर मांग हर चाह नास्तिक है .... जब भी हम अस्तित्व(ईश्वर)के सामने अपनी चाह रखते हैं ,उसी वक़्त हम उस अस्तित्व के विपरीत हो जाते हैं .... चाह उठती ही है इसलिए कि जो है  ,पसंद नहीं है …. और उससे कुछ अलग चाहिए ....
अस्तित्व(ईश्वर)की मर्ज़ी के खिलाफ हम जब भी करेंगे ,तो उसमें हारेंगे भी ,और टूटेंगे भी …… तो सभी चाह , हमें ईश्वर के खिलाफ करती है ….. हम तो परमपिता परमेश्वर से भी उसके खिलाफ ही प्रार्थना करते हैं , उस परमेश्वर के दर-मंदिर में भी ……..
घर  में कोई बीमार है तो प्रार्थना करते हैं , हे ईश्वर ! मेरे अपने बहुत कष्ट में हैं, इसे ठीक कर दो …. 
अगर परमात्मा ही सब कुछ करता है तो यह बीमारी भी उसके द्वारा ही प्रदत्त है ….
जब हम कहते हैं, इसे ठीक कर दो, तो हम यह कह रहे हैं कि हम तुझसे ज्यादा समझदार हैं और  तूने हमसे सलाह क्यों नहीं ले ली ,इस आदमी को बीमार करने के पहले ? 
हमारी पूरी जिंदगी ऐसी ही घटनाओं से भरी हुई है …. सच में .... सुख चाहते हैं लेकिन दुख मिलता है …. सफलता चाहते हैं ,पर विफलता हांथ लग जाती है …. जीतना चाहते हैं ,परंतु हर के सिवाय कुछ नहीं मिलता ….
फिर हम सब रोते रहते हैं कि ना जाने कौन से कर्मों का फल है ….. पिछले जन्म का पाप-पुण्य का हिसाब करना चाहते हैं  …..
जो जैसा हैं ,उसे जब तक उसी रूप में हम स्वीकार नहीं करेंगे , तब तक जो भी हम चाहेंगे ,उससे उल्टा ही होगा …सभी मांग-चाह को छोड़ लें और जो हो रहा हैं  ,उसे स्वीकार कर लें तो हमें आस्तिकता का अनुभव होगा ……. 
कितने सहमत हैं आप उपर्युक्त आलेख से ..... ?? 

Monday, 1 July 2013

01 - 07 - 2013



आजीवन हो
आह्लादित हृदय
एक साथ तेरा   ......
1-7-13

संतापी मन
बना जा सर्वसह                (सबका क्लेश हरनेवाला या सब सहनेवाला)
सार्वलौकिक                             (सब लोगों से संबंध रखने-वाला )

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1 July
Happy Dr's Day    

रोग भगाता
जाँ बचाता हमारा
ख़ुदा बनता

अर्थ का मोह
तोड़ दे मरीज़ से
विश्वासी रिश्ता

 भारत में डाक्टर'स डे पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डा॰ विधान चन्द्र राय (1 जुलाई 1882 ~~~ 1 जुलाई 1962) के सम्मान में मनाया जाता है !!....

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कहाँ कृष्ण है
बस यही प्रश्न है
व्याकुल मन ..... (Sowaty)

कहाँ कृष्ण है
बस यही प्रश्न है
अन्तर्मन है ?

कहाँ कृष्ण है
बस यही प्रश्न है
सखी(नारी)चीर में ........

छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों ...