Sunday, 12 April 2015

बुढ़ापा





पिता जैसा बनना ..... हर लडकी का सपना ..... लक्ष्य निर्धारित किया अपना ....
संयुक्त परिवार विलीन नहीं हो सकते हैं
रफू का गुण सीखो रिश्ते रफ़ू से ही चलते हैं ..
.
बुढापे पर बात चली है ... और मैं उम्र गुजारते उस पडाव पर आने वाली हूँ .... बीच की पीढ़ी हूँ ..... कई सीढ़ी चढ़ चुकी हूँ .... कई घरों को बनते ,बिगड़ते देखने की पूंजी है मेरे पास .... 
घर संस्कारों से बना होना चाहिए .... नई पीढ़ी ,अगर पुरानी पीढ़ी को ,अपने बुजुर्गों का अहमियत देते देखी होगी तो वो जरुर सीखेगी ....
=
कुछ दिनों पहले चंडीगढ़ की यात्रा थी
हम बुजुर्गों के टोली में बैठे
चर्चा कर रहे थे बुढापे पर
मेरा कहना था … बुढ़ापा यानि बिछावन लेटा शरीर
अगर हम दो रोटी सेक कर खिला सकते हैं तो बुढ़ापा कैसा ?
हमसे पहले की पीढ़ी में 10 से 20 साल की उम्र में शादी हुई
40 साल में सारी जिम्मेदारी पूरी और दादी नानी बन गुजर गई जिन्दगी
आज 30 से 35 साल की उम्र में शादी होती है
50 से 55 की उम्र गुजर गई जिम्मेदारी में
अपने लिए अभी तो जीना शुरू किये। ....
बच्चों को पंख मिले उन्हें उड़ने दो। ...
बनाने दो खुद से खुद के लिए नीड़
पालने दो खुद के छौने
मत जिओ केवल बन दादी नानी
जब शरीर बिछावन पर जाएगा
एहसास कहाँ होगी , कहाँ पड़े हैं

अस्पताल या वृद्धाश्रम या गली के सडको पर
=

Friday, 3 April 2015

हाइकु


रोज गार्डन चंडीगढ़

आठ सौ पच्चीस तरह के गुलाबों के बीच हमारी गोष्ठी

विभिन्न विषयों के साथ हाइकु पर भी बातें हुई
कुछ लोग बहुत ही अच्छा लिखना जानते हैं।


मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था
 कि ये कनैल का वृक्ष है ....

कनेर कला
स्वर्ण हँसी बिखरे
हरे घर में।
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1
नभ को छूते
आओ सखियाँ कूदें
रुढी को तोड़ें।
2
पद्मा बनती
लक्ष्मी आस बांटती
पैसों की पौद ।
3
नव लें साँसें
निशीथ स्त्री जीवन
तरणी आस।
4
आँगन पौधे
दुरुक्ति चटखारे
समय राग।
5
आँख मिचौली
रवि मेघ के संग
चीड बिचौली।
6
कुलाचें , चुस्की
ग्रीन टी मेघ लेता
गिरि खंगाले ।
7
पढते छौने
सुस्ती मिटाये चुस्की
पौ फटते ही। 
8
आकुल सिन्धु
उफने क्रोधी उर्मी
बेवश घन/वाणी।

=

Thursday, 12 March 2015

हाइकु


1
वीर हँसते
जिन्दगी ज्यूँ छेड़ती
भीरु रो लेते ।

2
वसंत शोर
रवि-स्वर्णाभा-होड़
पीले गुच्छों से।

3
असार स्वप्न
भस्म हुई उम्मीदें 
धुँआ जिन्दगी ।

4
दुःख व हंसी
जिंदगी की सौगातें
रूप सिक्के के ।

5
पद के मद
आंगन में दीवारें
घर कलह।

6
घर कलह
बरसे रिश्तों पर 
बेमौसम सा।

7
अँक हो तंग 
मिटे जलन जंग
स्नेह बौछारें ।

8
मेघों की टोली
लाये रंगीन डोली
महके बौर 

=

Tuesday, 24 February 2015

क्षणिकाएँ


 होली की ठिठोली
=
1

झूमो झनको
रंग पानी सा मिलकर
भूलें गिले होकर गीले
झगड़ना या झरना बन बहना
एक दूजे में झलको

2

स्वप्न का धनक निखरे
गैर बिराना मौन ना बचे
पुताई हर दिल हर चेहरे हो
प्यार खरीदार सारे बचे
चहक चहुँ ओर बिखरे

3

जर्द धरा चेहरे पे दर्द
किसने क्यूँ फैलाई
यादों की बुक्कल हटाओ
मलो रंग अबीर मलाई
हटे फिजाओं से सर्द

4

मन ना अश्लील करो
डूबा रंग पोखरे हलकान करो
सलहज भौजी ननद साली
हो जाती सब दिलदार भोली
व्यवहार हमेशा श्लील करो

5

कर गया चोरी दर्जी
सिल दी तंग चोली
बरजोरी की , ले रंग
दंग हमजोली
तोड़ डाले कांच से रिश्ते
बिना जाने उस की मर्जी 

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Sunday, 15 February 2015

फागुनी प्यार

तीन महीनों से अलग अलग कई शहरों में ; अपनों के बीच
कई शादी समारोह में शामिल होने का मौका मिला ...
हर स्त्री -पुरुष को सजते संवरते देख अच्छा लगा .... 
सब जगह मैं अलग थलग सी लगती बिना सजे संवरे ..... कई लोगों ने टोका ..... मैं कल सोची ... कुछ मैं भी अभ्यास कर लूँ ,दो-तीन दिन बाद फिर एक शादी समारोह में शामिल होने जाना है ..... जैसे ही चेहरे पर कुछ लगाने का शुरू ही की कि ये पीछे से आकर पूछे क्या हो रहा है .....
मैं चुप ....
ये गहरी मुस्कान बिखरते हुए ..... चमेली है क्या 
प्यार का नमूना हजारो में से एक .....
हिन्द में प्यार जाहिर करने के लिए , ना दिन तारीख और ना समय तैय है …..
 हम तो प्रतिदिन प्रतिपल इजहारे इश्क में होते हैं

1

खड़का कुण्डा
हुआ ठूंठ बासंती
फागुनी थापी ।

2

बिंधे सौ तीर
बिन पी , मीन साध्वी
फागुनी पीर ।

3

बिखरी रोली
तरु बाँछें खिलती
फगुआ मस्ती।

4

शिकवा / सताया हेम
विरही-भृंग पीड़ा
कली सुनती।


तब शुरु शुरु कांटी थर्मल में रहने आये थे
कुछ भी खरीदना हो तो मुजफ्फरपुर जाना होता था ;पहली बार बाजार गए ,साडी ही खरीदने  उस बाजार में दोनों तरफ दुकानें और बीच की सडक गली जैसे हालात और भीड़ आदमी पर आदमी
साडी खरीद कर बाहर हम आये तो मैं भीड के चलते मोटरसाइकिल पर बैठने में देर कर दी पति महोदय को लगा होगा मैं बैठ चुकी वो नौ दो ग्यारह
भीड के शोर के कारण मेरी आवाज भी नहीं सुन पाये
अब मैं कैसे कहाँ जाऊँ बैचैन खडी सोच रही थी थोडी देर में मेरे देवर सामने से मोटरसाईकिल से गुजर गये मैं बाबु बाबु पुकारती रह गई तब किसी का नाम लेना अपराध था
पति महोदय देवर के घर गए आराम से नाश्ता किये जब चाय पीने लगे तो मेरी देवरानी पुछी दीदी क्यों नहीं आईं तो होश आया अरे तुम्हारी दीदी तो आई है
कहाँ हैं ? बाजार में तो नहीं छुट गई
तब हडबडाये घबडाये आये
मैं तो वहीं खडी थी जहाँ छोड गये थे


Wednesday, 17 December 2014

काश



काश तुममें
काश्मीर की
चाहत ना होती
माँ गोद छिना
बच्चों का घर जख्मी
भू अंक मिला
तुमने क्या पाया
जेहाद व जे हाल
तमन्ना तुम्हारी थी
=
मैं बीएड में पढ़ रही थी तब 
एक कहने सुनने की कक्षा चल रही थी .... 
पूरे कक्षा में हम तीन चार थे जो थोड़े ज्यादा ही गर्म मिजाज के थे। …। 
जिसमें एक लड़का मुसलमान था। .... उसने सुनाया ......
पत्थर पूजन हरि मिले
तो मैं पूजूं पहाड़
या भली चक्की
पीस खाए संसार
= मैं उबल पड़ी और थोड़े जोर से ही चिल्ला बैठी .....
कंकड़ पत्थर चुन के
मुल्ला दिए मस्जिद बना
ता पर चढ़ के मौला बांग दे
बहरा हुआ क्या खुदा
= बहुत वर्षों तक लगता रहा कि बचकानी हरकत थी .....
सबकी घूरती निगाह हमेशा पीछा करती रही ....
आज तो सच में बहरा लगा ख़ुदा
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Wednesday, 26 November 2014

ये ……… यूँ ही .....


एक मुक्तक

प्यार का बदला मिले सम्मान कम से कम हक़ तो होता है
मृत सम्वेदनाओं वाले पले आस्तीन में सांप शक तो होता है
अदब-तहज़ीब को भूल कर खुद को ख़ुदा से ऊपर समझे
हाय से ना डरने वाला जेब से नही दिल से रंक तो होता है

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एक क्षणिका

 मौत का आभास नहीं मुझे
लेकिन
जिन्दगी में युद्ध नही
जीने के लिए तो
जीने में मज़ा नही
उबना नही चाहते
बिना समय मारे
मरना नही चाहते।

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ताँका 

1
बेदर्दी शीत
विग्रही गिरी हारे
व्याकुल होता 
विकंपन झेलता
ओढ़े हिम की घुग्घी।

फिरोजा होती
प्रीत बरसाती स्त्री
शीत की सरि
ड्योढ़ी सजी ममता
अंक नाश समेटे।

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Tuesday, 18 November 2014

ओस



1
कांच की मोती
किरणें फोड़ देती
पत्ते लटकी।
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2
कांच भी साक्ष्य
स्वप्न दुर्वाक्षि टंगा
नभ के आँसू।
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3
क्यूँ पहचाने
अपने व पराये
स्व दर्द पाये।
===
4
जीवी का रोला
वल्ली खिली कलासी
पंक में पद्म ।

रोला = घमासान युद्ध
कलासी = दो पत्थर या दो लकड़ी के जोड़ के बीच का स्थान
===
5
हिम का झब्बा
काढ़े शीत कशीदा
भू शादी जोड़ा।

रेशम ,कलाबत्तू के तारों का गुच्छा = झब्बा 
silk and silver or gold thread twisted together

===
6
भय से पीला
सूर्य-तल्खी है झेले
नीलाभ सिन्धु ।
===
7
चिप्पी ज्यूँ जोड़े
उधेड़ ही जायेंगे
दिया जो धोखा ।

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एतकाद मेहनत पर हो जाता है
वक्ती - मुसीबत हल हो जाता है
हो जाता है खुद पर अगर भरोसा
पसोपेश मुश्तबहा दूर हो जाता है 

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Tuesday, 11 November 2014

चोका



विषय - सूखे गीले का गिला 

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घटा घरनी 
सूखे गीले का गिला 
कान उमेठूँ
मनुहार सुनोगे 
जाल विछाये
मनोहर दृश्य हो 
भ्रम फैलाये
श्वेत श्याम बादल 
साथ धमके 
बरसे न बरसे
दे उलझन 
दुविधा में सताए
काम बढाये
आँख मिचौली खेले 
घर बाहर 
दौड़ती गृहलक्ष्मी 
वस्त्र सुखाती 
माथापच्ची करती
रेस लगाती 
पल दुरुपयोग
क्रोध बढ़ाये 
स्वयं की आपबीती
भयावहता
मेघ पर बरसे 
दे उलाहना 
नौटंकी तुझे सूझे 
परे तू हट 
बरसो या घिसको
समझूँ तुझे 
ना उलझाओ मुझे
धनक दिखा
काम है निपटाने
सीलन है हटाने 

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Saturday, 8 November 2014

शीत आगमन





1
ठूँठ का मैत्री
वल्लरी का सहारा
मर के जीया।

2
शीत में सरि
प्रीत बरसाती स्त्री
फिरोजा लगे।

3
गरीब खुशियाँ
बारम्बार जलाओ
बुझे दीप को।

4
क्षुधा साधन
ढूंढें गौ संग श्वान
मिलते शिशु।

5
आस बुनती
संस्कार सहेजती
सर्वानन्दी स्त्री।

सर्वानन्दी  = जिसको सभी विषयों में आनंद हो 

6
स्त्री की त्रासदी
स्नेह की आलिंजर
प्रीत की प्यासी।

आलिंजर =  मिटटी का चौड़े मुंह का बर्तन = बड़ा घड़ा


Wednesday, 5 November 2014

शीत आगमन




1
साँझ ले आई 
नभ- भेजा सिंधौरा
भू मांग भरी।

2
झटकी बाल
नहाई निशा ज्यूँ ही 
ओस छिटके।

3
पीड़ा मिटती
पाते ही स्नेही-स्पर्श
ओस उम्र सी ।

4
बिज्जु की लड़ी
रजतमय सजी 
नभ की ड्योढ़ी।

5
सुख के तारे
लूता-जाल से घिरे 
तम के तले।

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शीत ढिठाई 
स्वर्ण चोरी कर ले
सहमा रवि 
दहकता अंगार
हिम को रास्ता दे दे।

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लूक सहमे
सूर्य-तन में लीन
शीत का धौंस
ठिठुरी या गुलाबी
मानिनी भू रहती।

*मानिनी =गर्भवती

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चटके रिश्ते
सर्द हवा मिलते
छल – धुंध से
दिल की आग बुझी
बर्फ जमती जाती।

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छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों ...