Wednesday, 20 January 2016

आभारी हूँ

सब की शुभकामनायें बटोर रही हूँ और हिम्मत जुटा रही हूँ ... नये पुस्तक में सम्पादन के लिए ....

आभार सभी का ...




शशि शर्मा 'खुशी'

मेरा परम सौभाग्य कि 17 जनवरी 2016 को मुझे विश्व पुस्तक मेले में दिल्ली जाने का मौका मिला। वो भी मेरी शादी की 25 वीं वर्षगांठ पर,,, मेरे लिए इस से बेहतरीन तोहफा कोई और हो ही नहीं सकता था। मैं अपने जीवन साथी का दिल से आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होंने इतना अद्भुत उपहार मुझे दिया। मेरे श्रीमान कभी भीड़ का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं रहे। आजकल जहाँ सब लोग बेतहाशा पैसे खर्च कर पार्टी करके शादी की वर्षगांठ मनाते हैं वहीं हमारे साहब इसे फिजूलखर्ची व दिखावा मानते हैं। वैसे सबकी अपनी पसंद व अपना तरीका होता है 😊 जिसमें जिसे खुशी मिले वही सही है। ये मेरा मानना है।
खैर, इस विषय को यहीं विराम देते हुए हम फिर से पुस्तक मेले की तरफ आते हैं।
मुझे पुस्तक मेले में ढ़ेर सारी पुस्तकें एक जगह देखकर कितना सुखद एहसास हो रहा था इसे तो मैं शब्दों में ब्यां नहीं कर पाऊंगी। लेकिन हाँ, वहीं मुझे अपनी आदरणीया व प्रिय दीदी (विभा श्रीवास्तव) द्वारा संपादित पुस्तक "साझा नभ का कोना" भी मिली, जो हायकु से संबंधित है। उसके बारे में अवश्य कुछ कहना चाहूँगी।
चुंकि मैं भी आजकल हायकु सीख रही हूँ सो मुझे इसे पढ़ने में बेहद आनंद आ रहा है। साथ ही आप सभी को बताते हुए प्रसन्नता भी हो रही है कि इसी साल के अंत में दिसंबर माह में हायकु शताब्दी वर्ष पर विभा दी के संपादन में आने वाली पुस्तक के एक कोने में मैं भी आप सभी को नजर आऊंगी।
सभी ने बहुत ही अच्छा लिखा है बेशक अब हम जो हायकु सीख रहें हैं ये उन से बेहद अलग हैं, उसके बावजूद भी ये अपनी जगह बेहद अच्छे हायकु हैं जिन्हें पढ़ना मजेदार अनुभव रहा है। विभा दीदी सहित सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ 

"साझा नभ का कोना" में विभा रानी श्रीवास्तव जी की रचनायें पढ़ी | आपकी रचनाओं का आंकलन कर सकूँ इतना ज्ञान कहाँ है मुझे फिर भी एक छोटी सी कोशिश करता हूँ | आपने अपनी ख्याति के अनुरूप बहुत ही नए शब्दों का प्रयोग किया है और आप टीम की कप्तान की भी हैं | आपने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है और एकदम सटीक रचनाएँ लिखी हैं | मुझे आपकी रचना :
श्रम लिखते
माँ, भू-लाल के भाल
स्वेद क्षणिका
और
वंश उऋणी
बीजती माता जाई
बीज संस्कारी
बहुत पसंद आई | इसके अतिरिक्त प्रार्थना, दया, स्वप्न, श्रृंगार, कलम, तृषा, शून्य, बीज, माँ , मन पखेरू, म्लान, धूप छाँव, प्रतीक्षा, बेख़ौफ़, कर्म, उड़ान, कल्पना आदि विषयों पर मुझे आपका लेखन बहुत अच्छा लगा |
हार्दिक शुभकामनाएं |

'साझा नभ का कोना' – (नव हस्ताक्षरों का हाइकु संग्रह)
– संपादक : विभा रानी श्रीवास्तव
*
परम आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी ने इस सम्पादित हाइकु संग्रह में नव हस्ताक्षरों को स्थान दिया है । मगर कुछ नाम पढ़ते ही अपनापन लगा । अच्छे और जाने-पहचाने रचनाकार भी इस संग्रह में है, हो सकता है कि उन्हों ने 'हाइकु' विधा में शुरुआत की हो ।
'हाइकु' विधा मूलत: जापानी काव्य विधा है जो हिंदुस्तान में भी काफी हद तक सफल रही, क्योंकि हमारे साहित्यकारों ने इसे पूरा सम्मान दिया । ख्यातिप्राप्त साहित्यकार श्री नन्द भारद्वाज जी ने सही कहा; 'हाइकु विधा में कुछ लोगों को लिखना बड़ा आसान लगता है, लेकिन संजीदगी से देखा जाय और अगर रचनाकार इस विधा की गम्भीरता को समझते हुए इस विधा में रचनारत हो तो यह काफी चुनौतिपूर्ण भी है ।'
उनके इन शब्दों के बाद कहने को कुछ नहीं रहता फिर भी इतना ही कहूँगा कि – 'हाइकु' 5+7+5 शब्दों में आपको अपनी अभिव्यक्ति के लिए श्रेष्ठ शब्द चयन, अर्थपूर्ण संदेश, काव्यात्मकता और मौलिकता का समायोजन करने के लिए लम्बे समय का रियाज़ करना आवश्यक होता है । कई बार ऐसा होता है कि किसी भी विधा में लिखने से पहले उस विधा का अध्ययन अनिवार्य होता है । शब्द तो हमें मिल जायेंगे, अभिव्यक्ति भी शायद ईश्वर के आशीर्वाद से मिली हो मगर उनमें काव्य तत्व तब मिलता है जब हम उस विषय की गहराई तक जाएं और समझें । इतना ही नहीं, उनमें अगर काव्यात्मक लय न हों तो वो आकर्षक कागज़ी फूल साबित होंगे ।
आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी ने बड़ी मेहनत से इस संपादन किया और आशास्पद नव हस्ताक्षरों में पूर्ण भरोसा रखा । मैं उन्हें बधाई देते हुए नतमस्तक हूँ । साथ ही सभी रचनाकारों का अभिवादन करते हुए अपनी प्रसन्नता व्यक्त करता हूँ ।

Sunday, 17 January 2016

साझा नभ का कोना


कांच ही सही
अपना के देखते
अक्स दिखता


आज हिंदी की लोकप्रिय विधा "हाइकू"पहले जापान के प्राक्रतिक,आध्यात्मिक एवं प्रेम विषय तकही सीमित था किंतु कालान्तर में इसके स्वरुप में परिवर्तन हुआ.अब ये सामयिक विषयो पर भी लिखा जा रहा है 5-7-5वर्ण में अपनी संपूर्ण बात कह देने वाला"हाइकू "तीज की चॉद की तरह है .यह विश्व वान्ग्मय का लघुतम छन्द है.इस लघुतम छन्द में बहुत कुछ अनकहा रहा रह जाता है .लेकिन कभी कभी अनकहे लफ्ज कहे हुए लफ़्जसे ज्यादा कीमती होते है.
5-6 दिन पहले आनंद जी द्वारा प्रेषित विभारानी श्रीवास्तव जी के संपादकत्व में आई किताब "साझा नभ का कोना"पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .160पेज की इस किताब में विभिन्न रचनाकारो के हाइकू संग्रहित है.यद्यपि हमे हाइकू विधा कम पसंद है तथापि -"जीवन पथ/जब तुमको खोया /शून्य ही बचा
2-"छल कपट /कुत्सित व्यवहार/रिश्ते पाषाण
जैसे हाइकू ने मन मोहा
कुछ कमियो के बावजूद भी ये किताब पठनीय व संग्राहनीय है इसके लिये मैं विभा जी को विशेष रुप से बधाई देना चाहूंगी जिनकी कडी मेहनत ,ईमानदारी और साहित्यिक निष्ठा का प्रतिफल है "साझा नभ का कोना".साहित्य के प्रति आपका झुकाव आपकी भावनाशीलता का द्योतक है .निश्चय ही हाइकू का इतिहास आपको कभी विस्मृत नही कर पायेगा.मैं क्षमाप्रार्थिनी हूं आपके काव्य की भूमिका न लिख पाने के लिये लेकिन मैं वचनबद्ध भी हूं आपकी अगली किताब में आपके पूरे सहयोग के लिये
धन्यवाद!
साझानभ क कोना मगाने के लिये सम्पर्क करे
रत्नाप्रकशन
इलाहाबाद
7054179762
 



विश्व पुस्तक मेले में 
हिंदी युग्म प्रकाशक के स्टॉल पे "साझा नभ का कोना के साथ "
Shailesh Bharatwasiजी आभार आपका
रत्नाकर प्रकाशन इलाहाबाद

आदरणीय Nand Bhardwaj जी 

'साझा नभ का कोना' यह नाम है उस अनूठे काव्‍य-संकलन का जिसमें फेसबुक के माध्‍यम से प्रकाश में आए 25 हाइकू रचनाकारों के हाइकू संकलित हैं और इसे इलाहाबाद की वरिष्‍ठ कवयित्री विभारानी श्रीवास्‍तव ने संपादित किया है, यह संकलन अभी कुछ ही अरसा पहले दिल्‍ली के हिन्‍दी भवन में लोकार्पित हुआ था, जो आत्‍मीय मित्र अंजलि शर्मा के माध्‍यम से मुझ तक पहुंचा है, इसमें अंजलि के भी 32 हाइकू शामिल किये गये हैं। 160 पृष्‍ठ के इस संकलन में इस विधा के नये रचनाकारों को पढ़ना एक सुखद अनुभव है। सभी को शुभकामनाएं।
 — शर्मा मनीष अंजलि और विभा रानी श्रीवास्तव के साथ.



प्रियंवदा अवस्थी :-  विभा माँ के अथक संघर्ष और दृढ आत्मविश्वास को मेरा सलाम है । आदरणीय nand bharadwaj जी के हाथों में साझा नभ और उसके एक कोने में चुहल करते हम कोमल पंखों वाले उड़ान भरने को प्रयासरत पंछियों की कोशिशो पर पैनी दृष्टि के उपरांत प्रोत्साहित करती समीक्षा । मन खुश हो गया देखकर ।



हमारी पहली कोशिश थी ..... उम्मीद से निगाहें बहुत लोगों की तरफ उठी .... बहुत लोगों ने आगे बढ़ कर हौसला बढ़ाया 
हम सब आभारी हैं 



Monday, 7 December 2015

सपना











एक आयोजन सफल हुआ कि आँखें फिर नई संजो लेती है

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने सन् 1916 में पहली बार हाइकु की चर्चा किये थे
उस हिसाब से 2016 हाइकु शताब्दी वर्ष है
तो
क्यों न हम 100 हाइकुकार इक किताब में सहयोगाधार पर शामिल हो , विमोचन पर एकत्रित हो यादगार आयोजनोत्सव मनायें
जो शामिल होना चाहें
स्वागत है

Monday, 26 October 2015

अथ से इति - वर्ण स्तम्भ


शरद पूर्णिमा की ज्योत्स्ना और हमारी धवल इच्छा आपके सामने


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वर्ण पिरामिड लेखन की एक पुस्तक लाने की योजना है
51 प्रतिभागियों का
ये प्रयास है लोगों को जोड़ने की
अथ से इति -- वर्ण स्तम्भ पुस्तक में
 लाखों का 416 पेज का बुक
इच्छुक मुझसे फेसबुक पर जुड़ सकते हैं



Monday, 12 October 2015

अंत हो मरने के बाद के श्राद्ध का




आज अंतिम दिन पितृपक्ष का कल से नवरात्र शुरू

जान में जान हो
जाने में राह आसान हो
जान लें जाना कहाँ है
जाने से पहले

आत्मतृप्ति के बाद आत्मा तृप्ति की जरूरत नहीं होती

 तीन में कि तेरह में

एक बार चाची(पड़ोसन) से बातचीत के दौरान पता चला इसका सही सही अर्थ

चाची बताई कि 
मिथिला में बेटियां तीन दिन में अपने माता पिता का श्राद्ध करती हैं
और बेटे तेरह दिन में

मिथिला में बेटियों का कन्यादान तिल विहीन किया जाता है इसलिए तिल भर सम्बन्ध या यूँ कहें दायित्व निभाने की जिम्मेदारी मिल जाती है

वहीं छपरा जिला में बेटियां ना तीन में ना तेरह में होती हैं

लेकिन
बेटे बहुत लायक होते हैं तो बेटियां चैन से रहती हैं
~~

Wednesday, 7 October 2015

प्यासी जल में सीपी



~~
 प्यासी जल में सीपी

भूल जाओ पुरानी बातें ....... माफ़ कर दो सबको ..... माफ़ करने वाला महान होता है ...... सबके झुके सर देखो ..... बार बार बड़े भैया बोले जा रहे थे .....

बड़े भैया की बातें जैसे पुष्पा के कान सुन ही नहीं रहे थे .....
आयोजन था पुष्पा के 25 वें शादी की सालगिरह का ...... ससुराल की तरफ से सभी जुटे थे ...... सास ससुर देवर देवरानी ननद संग उनके बच्चे ..... मायके  से आने वाले केवल उसके बड़े भैया भाभी ही थे । बुलाना वो अपने पिता को भी चाहती थी लेकिन उसके पति ने बुलाने से इंकार कर दिया था क्यों कि ..............
नासूर बनी पुरानी बात , ख़ुशी के हर नई बात पर भारी पड़ जाती है न

सास को पुष्पा कभी पसंद नहीं आई ..... पसंद तो वो किसी को नहीं करती थी .... उन्हें केवल खुद से प्यार था और बेटों को अपने वश में रखने के लिए बहुओं के खिलाफ साजिश रचा करती थी ...... बेटे भी कान के कच्चे , माँ पर आँख बन्द कर विश्वास करते थे ..... बिना सफाई का मौका दिए , बिना कोई जबाब मांगे अपनी पत्नियों की धुलाई करते
पुष्पा तब तक सब सहती रही जब तक उसका बेटा समझने लायक नहीं हुआ

फिर धीरे धीरे विरोध जताना शुरू किया  लेकिन शादी का सालगिरह क्यों मनाये खुद को समझा नहीं पा रही थी

घर छोड़ चली गई होती तब जब बार बार निकाली गई थी तो..........

बुजुर्ग से बदला कभी नहीं लिया ......लेकिन सोचती रही बुढ़ापा तब दिखलाई नहीं दिया था क्यों

??

 http://atootbandhann.blogspot.in/2015/10/blog-post_39.html



दमाद बेटी को खुश रखे
बेटा श्रवण पूत बने
??
जिस घर में बेटी हो बेटा ना हो
बेटा भ्रूण की हत्या करें
??
जिस घर में बेटा हो , बेटी ना हो
बेटी भ्रूण की हत्या करें
??
अरे नहीं रे
छोटा परिवार सुखी परिवार
हम दो हमारे एक की रीत निभायें

पहली सन्तान जो हो वो रहे बस
सारा फसाद एक घर में दोनों होना ही है
दमाद घर जमाई बन बेटे का धर्म निभाये
बेटी माँ बाप का ज्यादा ख्याल रखती हैं न

श्रवण पूत अल्पायु था कुँवारा बेचारा

सारा टँटा बहुयें से ही तो है

झगड़ा - फसाद के जड़ को ही खत्म करते हैं
बहु के अस्तित्व को ही मिटा देते हैं

बेटे के माँ बाप काशी वास करें

ना रहेगा बांस ना बजेगी बाँसुरी
ननद भौजाई भी नहीं बचेगी

ह न त



4 सितम्बर 201

Saturday, 3 October 2015

बकबक



जले दीप को
गर्म चाय प्याली को
कौतुक में स्पर्श को
धैर्य स्व माँ को
डुबो दी ऊँगली को
सीख देने शिशु को

~~~

दो कदम पीछे हट कर ज्यूँ छलांग भरते हैं

तो

अविवेकी की पहचान क्रोधी

हाँ तो

मत ललकारो उन्हें , जिनके पास कुछ खोने के नहीं होता

नहीं तो

मूलमंत्र है सम्भाल कर रखो

मानोगे नहीं ....... जिद्दी हो ...... सैद्धांतिक तो बुजुर्गों के बकबक बुढ़ापे की निशानी है ...... प्रायोगिक ही व्यावहारिक होता है ...... ये कठकरेजि जानती है

महबूब भी बहुत जिद्दी था ....... उसे लाल चीज छूने की ज़िद थी ..... जलते लैम्प लालटेन का शीशा .... बिहार में बिजली की दुश्मनी बहुत पुरानी है .....

गर्म चाय की प्याली ..... दादी गोद में बैठाये रखती

लकड़ी गोहरा की अग्नि ...... तब गैस घर में नहीं आया था ..... घर में पेड़ पौधे व गाय रखने का फायदा था

उसके लपकने पर सब खुश होते ....... लेकिन मेरी जान अटकी रहती ...... एक दिन उसकी ऊँगली जला ही दी ..... तब सब मुझे कहने लगे ....... कठकरेजि

बुजुर्गों के पास ज्ञानी बुकची होती है ..... बकबक नहीं 


Friday, 25 September 2015

वर्ण पिरामिड



हम ख़ुद की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा लें तो वही बहुत है
बलि का मीट
बिना लहसुन प्याज का पकता
दशहरा में शोर क्यों नहीं मचता
हिन्दुओं-बात हिन्दुओं को पचता
1
स्व
सरी
निश्छल
स्थिर होती
सींचती जीव
डूबा देती नाव
ज्यूँ उबाल में आती
2
हो
नाव
मोहक
जलयान
धारा की सखी
क्षुधा पूर्ति साध्य
जीविका मल्लाह की

Monday, 21 September 2015

क़ाबिले तारीफ़

विभा दीदी पीछे में तारीफ करते हैं भाई साहब 😊😃उस दिन जब आप किचेन में थी तब आपकी काफी तारीफ कर रहे थे भाईसाहब 😊फिर आप को देख कर चुप हो गए 😊
कल लल्ली ने लिखा ...... पत्नी प्रोत्साहन दिवस था कल 
पीठ पीछे जो तारीफ़ होती हो ..... सामने भी कुछ यूँ तारीफ़ करते हैं

हमारे परिचित में जितनी औरतें हैं उनमें सबसे कम काम तुम करती हो 
कैसे ?
देखो ! सुबह शाम टहलने जाती हो खुद के लिए तो सब्जी दूध घर का सामान ले आती हो ...... काम ना तुम्हारा टहलना हुआ और समान ले आई तो कितने तनाव से बची ..... खुद के लाये समान में नुक्ताचीनी कर नहीं सकती हो ...... ना सवाल कि क्या पकायें

रोटी कन्ट्रोल सब्जी पकाती हो ...... कम खाने से मोटापा नहीं होता तो ...... ना bp ना सुगर ..... ना कोई सेवा का मौका ..... ना डॉ का दौड़ धूप तुम्हें करना पड़ता है

ना रोज कपड़ा धोती हो ना रोज आयरन करती हो ..... दो जोड़ी कपड़े तो निकलते हैं ..... एक दिन बीच कर वाशिंग मशीन चलाती हो ..... एक दिन बीच कर आयरन करती हो
आयरन करने से रोटी पकाने से तुम्हारा ही फायदा है .... मुफ़्त का कसरत कलाई का होता है

बर्तन खुद धोती हो कि दाई का किचकिच कौन सुने .... ना आई तो बर्तनों का अम्बार देख कौन कुफ्त होये ...... यहां भी फायदा तुम्हारा ......

आज चाय में ऐसा क्या पड़ गया 
क्यों क्या हुआ ?
गलती से शायद ! अच्छा बन गया


है न काबिले तारीफ़ ; तारीफ़ करने का अंदाज , दिल बाग़ बाग़ करता ...... झुँझलाने का हक़ नहीं पत्नियों का 😘

Friday, 11 September 2015

हिंदी हर बोली में होती



शादी के बाद ...... मेरे पापा की लिखी चिट्ठी ...... मुझे लिखी , पढ़ने को मिली(शादी के पहले हमेशा साथ रहने की वजह) .... चिट्ठी की ख़ासियत ये होती थी कि ..... कभी वे भोजपुरी से शुरुआत करते तो ..... मध्य आते आते हिंदी में लेखन हो जाता था या ..... कभी हिंदी से शुरुआत करते तो मध्य आते आते भोजपुरी में लेखन हो जाता था ..... बेसब्री से इंतजार रहता था उनकी चिट्ठियों का .... तब मोबाइल नहीं था .... लैंड लाइन भी तो नहीं था ....... 
~~~~~~~~~~~ मेरे माइके में हम सभी घर में भोजपुरी में बात करते थे ...... सहरसा में जबतक हमारा परिवार रहा ; घर के बाहर मैथली का बोलबाला था , सबसे मैथली में बात करना पड़ा ...... बहुत ही मीठी बोली है *मैथली* ....... जब पापा सहरसा से सीवान आ गए तो घर बाहर केवल भोजपुरी का सम्राज्य हो गया ....
 आरा छपरा घर बा कवना बात के डर बा
 शादी के बाद रक्सौल आये तो घर बाहर भोजपुरी का ही राज्य था लेकिन केवल मेरे पति को मुझसे हिंदी में बात करना पसंद था ..... फिर राहुल का जब जन्म हुआ तो राहुल से सब हिंदी में ही बात करने लगे ..... इनकी नौकरी में बिहार (तब झारखंड बना नहीं था) में कई जगहों पर रहने का मौका मिला ..... भोजपुरी+मगही+ मैथली+आदिवासी+हिंदी+उर्दू = खिचड़ी मजेदार लज्जतदार मेरी भाषा

1
शब्दों की खान
हिंदी उर्दू बहनें
भाषायें जान
2
हिंदी समृद्धी
हर धारा मिलती
माँ कहलाती



Tuesday, 8 September 2015

दंश ~ कालिख संघ मुख



कलियाँ खिली
ब्याही सुता हो जाती
स्व समर्पित

एक ब्याहता स्वयं समर्पण करती है .....
बलात्कृत तो कली कुचली जाती है ...... खिलती नहीं

 परिवार में लड़की अगर सुरक्षित नहीं तो परिवार की जरूरत ही नहीं

हम फिर इतिहास दोहराएंगे बहुत जल्द

आज ही फेसबुक पर जानकारी मिली कि किसी लड़की ने अपने साथ हुए ...... उसके घर के ही किसी सदस्य के हैवानियत के कारण ...... आत्महत्या कर ली ......

छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों ...