Tuesday, 7 June 2016

साधू - बिच्छू




Fb जैसा असली दुनिया में भी ब्लॉक का आप्शन होना चाहिये था
बार बार साधू की भूमिका नहीं निभानी पड़ती किसी बिच्छू के लिए

नजरों के सामने गुलाटी मारते देखना ज्यादा दंश देता होगा न

..... दिल ब्लॉक हो तो ........




सच को ..... चाशनी में लपेटना ..... हमेशा भूल जाती हूँ ..... जबकि जलेबी पसंद है ..... लेकिन मिर्ची ज्यादा लुभाती है .....





Tuesday, 12 April 2016

गाँठ सुलझा रफ़ू


प्रेम का धागा नहीं टूटता .....
जब तक उसमें शक का दीमक
या
अविश्वास का घुन ना जुड़ता .....
खोखला होगा तभी तो टूटेगा .....

मैं जब कढ़ाई या बुनाई करती हूँ ...... तो जब गाँठ डालना होता है ..... 
गाँठ डालना होगा न ... क्योंकि लम्बे धागे उलझते हैं 
और उलझाव से धुनते धुनते कमजोर भी होने लगते हैं ....... 
और ऊन का 25 या 50 ग्राम का गोला होता है ..... 
400 से 600 ग्राम का गोला तो मिलता नहीं ना .....




              ---- जहाँ खत्म हुआ सिरा और शुरू होने वाला सिरा के पास
 थोड़ा थोड़ा उधेड़ती हूँ फिर दोनों के दो दो छोर हो चार छोर हो जाते हैं ....  
दो दो छोर सामने से मिला बाट लेती हूँ ...... 
फिर गाँठ का पता नहीं चलता है ...... 

क्या रिश्ते के गाँठ को यूँ नहीं छुपाया जा सकता है ..... 
कुछ कुछ छोर तक उधेड़ डालो न मन को .....
हर गाँठ को सुलझाया जा सकता है
रफ़ू से चलती है जिंदगी

Thursday, 7 April 2016

घूरा को घूरो और सीख लो


तब का ज़माना ये नहीं था कि द्वारे द्वारे सीटी बजे और घर से कूड़ेदान बाहर रखा जाये ..... तब हर घर के थोड़ी दुरी पर बड़ा गढ़ा खोद कर रखा जाता था और उसमें घर से निकलने वाले सारे कचरे , गाय बैल के गोबर , अनाज के डंठल , खर पतवार भरा जाता था ..... तब जमीन को बंजर बनाने वाली प्लास्टिक का भी पैदाइश नहीं हुई थी न
खढे को मैं हमेशा घूरा करती थी

मेरी माँ कहती थीं
सुनअ घूरा के दिनवा भी बारह बरिस में फिर जाला
मेरे समझ में ये आया कि सड़ गल कर खाद बन जाता होगा घूरा
खेतों में फसल को दिया जाता होगा
खेत सोना उगलती होगी

आत्म हत्या करने वालों को करीब से देखी हूँ निश्चित उनकी माँ मेरी माँ जैसी ज्ञानी नहीं थी
अगर होती तो 12 साल तक धैर्य रखने की सीख जरूर दी होती
12 साल में तो एक युग बदल जाता है
तो क्या हम अपनी स्थिति नहीं बदल सकते

Wednesday, 6 April 2016

वक्त वक्त की टेर


काअ हो तहरा घरे सभन चाचा लोगन के अलग अलग न्योता के कार्ड जाई नु
ना ना हमरा घरे ऐ गो कार्ड जाई
काहेए ….. जब हम तहरा भाई के शादी में अलग न्योता भेजनी अउरी तहरा चचेरा भाई बहीन के शादी में अलीग से न्योता भेजले बानी …..
हमरा ईहाँ अइसने होला कि इगो ही न्योता आवेला … चचेरी बहिन लोग के घरे भी बिआह भईल बा नु …. अउरी हमरो घरे कईगो शादी हो चुकल
बढियाँ बा …. लेबे बेरा कई जाना बा लोग ….. ली लोग कई गओ …. अउरी दी लोग एगो
आगे से हमरा चचेरा भाई बहिन के बिआह होखी त रउआ न्योता मत भेजब …. लेकिन ई बेरा ईगो ही कार्ड भेजल जाव , ना त सभे हमरा के दू चार गो बात सुना दी लोग कि हम बतवले ही ना हओखेब
ना ना हम त चार गओ ही कार्ड भेजेब अउरी हमरा चार गओ न्योता चाहीं त चाहीं
मौका था पुष्पा की ननद की शादी का और बहस छिड़ी थी , पुष्पा और उसकी सास में ….. बहुत समझाने के बाद भी उसकी सास उसके मइके चार कार्ड भेज दी ….. मइके से उसके अपने और चचेरे भाई शादी में शामिल होने आये …. उसके भाई से उसके चचेरे भाई लोग पूछे कि क्या अलग अलग न्योता का चलन शुरू करना है ? नहीं जो अब तक नहीं हुआ वो अब क्यों शुरू होगा
पुष्पा के सगे भाई एक न्योता लाये थे उसे देते हुए बोल दिए कि हमारे घर का रीत इक न्योता ही देने का है , पुष्पा आपलोगों को बताई होगी , आपलोगों को उसकी बात समझनी चाहिए थी …. हर घर की रीत अलग अलग होती है और संयुक्त परिवार की बात ही अलग होती है ….. पुष्पा के ससुर जी बोले कि हाँ पुष्पा बताई थी लेकिन उसकी सास अपनी जिद में किसी की बात सुनती नहीं है
पुष्पा को याद आ रही थी सारी बातें ….. मौका था उसी ननद की बेटी की शादी तैय हुई थी और घर में न्योता देने की बात चल रही थी तो वो बोली कि तीन न्योता जायेगा न ….. आपके घर की रीत जो आपलोगों की माँ मुझे बताई थी … तो उसके पति और देवर मानने के लिए तैयार नहीं हुए …… ऐसा नहीं है ….. आपको याद नहीं है
कार्ड पर हुई बहस के कारण उसकी सास उसे उसकी ननद के शादी की सारी तैयारियों से अलग रखी ही थी साथ कोशिश की थी कि शादी की रस्मों में भी भाग कम से कम ले सके ….. केवल शादी में आये लोगों के भोजन वो पकाये खिलाये
काश सास चार साल और जीवित रहती …… सुनती
वक्त वक्त की टेर  …
अच्छे अच्छे होते ढ़ेर
ढ़ेर  ढ़ेर के हेर फेर

Wednesday, 23 March 2016

होली की हार्दिक शुभकामनायें




ठूंठ सिखाये जीवनियाँ
बन्ना सा वन
जमे बन ठनके
बाँध मुरेठा केसरियाँ
चीथड़े पोशाकें
बदरंग चेहरे
सतरंगी बनाए
जोश फगुनियाँ 
भेज कनकनियाँ
आये कुनकुनियाँ
शुरू हुए उठंगुनियाँ 

किलो के किलो बड़े आलू का रूप बिगाड़ते
तब महंगाई का हम बच्चे कहाँ थे समझते
चार सौ बीस .... चाचा चोर ... भतीजा पाजी
तैयार करने के लिए भैया को करते थे राजी
रंग लगा .. धीरे से मौका ढूंढ़ , पीठ पे चिपकाते
सूखा रंग छिड़कने के लिए गंजा सर खोजते
भोले भाले .... शैतानी करना नहीं सोचा करते 

_/\_


Monday, 7 March 2016

छोटी सी बात




करुणावती पत्रिका के लिए जब राशि देने का समय आया तो दुविधा ये हुई कि मैं रहती पटना में हूँ .... पैसा भेजना कानपूर है ... { तब NEFT  जैसे कार्य से परिचित नहीं थी } बैंक का जमाना है .... लेकिन खुद कभी बैंक की कार्यवाही की नहीं थी .... अपने पति से कहने का मतलब था .... ना .... जबाब पाना ...
घर के अलमीरा पुस्तकों से भरी पड़ी है ..... ऐसे में नई किताबें खरीदने के इच्छुक ना खुद हैं , ना इजाजत देते हैं .... तब वे पुतर आनंद जी से परिचित भी नहीं थे .... परिचित भी होते तो मना कर देते .... बिना बताये कार्य कर लेती हूँ ... लेकिन मना किये कार्य करना अच्छा नहीं लगता है .... जब महबूब - माया के शादी के पार्टी में पुत्र आनंद जी आये तो उन्हें करुणावती पत्रिका की राशि उन्हें चुपके से थमा दी ..... 
जब साझा नभ का कोना हाइकु साझा संग्रह छपने की योजना चली तो फिर इनकी इजाजत मिलना दुरूह कार्य था .... तब तो मेरे पति हाइकु का सुबह शाम मजाक उड़ाया करते थे .... उनका मज़ाक होता था 
1. किसी अनुवाद कर्ता को रखना होगा
2. तीन पंक्तियों के लिए तीन पेज की कुंजिका छपवानी होगी
तब मुझे एक शादी में लखनऊ जाना पड़ा .... वहीँ से मौका मिल गया कानपूर जाने का .... कानपूर में मिल गया सभी समस्याओं का हल ..... लेकिन साझा नभ का कोना छपने के पहले ही .... कलरव तानका सेदोका साझा संग्रह छपने की बात चली और उसकी राशि देने के लिए हिम्मत कर अपने पति से बात कर ही ली और तभी हाइकु की बात भी बता दी .... विमोचन दिल्ली में होना तैय था तो .... टिकट दिल्ली का भी करवाना था .... सब छिपा कर नहीं किया जा सकता था .... इनके विरोध का सामना करना ही था और इनको सहमत भी करवाना था .... पैसा तो महबूब - माया भी देने के लिए तैयार थे .... लेकिन मुझे अपने पति को तैयार करना था .... क्यूँ कि वो मेरा हक़ भी था और सबकी ख़ुशी भी तभी शामिल होती .... 

अपनी दशा दिशा बदलने के लिए हिम्मत करनी चाहिए ....
स्त्री नारी महिलाओं को बहुत छोटी सी बात बता रही हूँ .... छोटी छोटी कोशिश ही कामयाबी की नीव होती है

तीसरी - चौथी किताब की भी बात चली है .... और पटना में विमोचन के लिए भी 
इनके सहयोग की उम्मीद लगा रखी हूँ ..... 

छोटी सी बात 


विष पी स्त्री जी
ना तैय होती सीमा
क्यों ड्योढ़ी छोड़े

सच है न धरा धारा स्त्री की सीमा तैय करना आसान नहीं ..... कूल तब नासती है जब ऊब-चुभ की स्थिति तक पहुंचती है ..... ऊब-चुभ की मनोस्थिति तक प्रतीक्षा ही क्यों करें ..... ड्योढ़ी लांघ , खुले नभ के निचे , बियाबान , मरुथल क्यों झेलें

*बेंवड़ा चढ़ा परेशानियों को ही क्यों ना कुटें 😜

*बेंवड़ा = वह लकड़ी जो बन्द द्वार के पीछे लगाई जाती है = अरगल


Sunday, 6 March 2016

कन्या स्त्री नारी महिला




तनी ठहरीं ना .... हमरो ठोक लेबे दीं ..... दिन में हमरा मारले रहले हां ..... इतना कहते हुए ,रजाई में लिपट सोये बड़े भाई को मुक्के मुक्के पिट हंसते हुए बहन संतोष कर लेती थी .... दोनों भाई बहन एक पीठिया थे और दोनों में पटता नहीं था .... ये बचपन की बातें थी .... लेकिन जब बहन बड़ी हुई और उसकी शादी हुई तो कई बार पति के हाथों पिटी .... लेकिन भाई की तरह पति को क्यूँ नहीं पिटने का सोची .... पति परमेश्वर की घुट्टी पिलाई गई थी ..... असहनीय अशोभनीय बातें तब तक सहती रही जब तक सहनशक्ति जबाब नहीं दे दिया ..... एक दिन बिफर ही पड़ी और चिल्लाई .... खाने में जहर दे .... सबको मार कर , घर में आग लगा दूंगी .... सब स्तब्ध रहे ..... पिटने का अंत हुआ ..... धीरे धीरे खुद के लिए लड़ना सीख गई और आत्मसम्मान से जीने की कोशिश करने लगी .... 

1
कूटे शरीर
*पी नशेड़ी , कुपूत
पले स्त्री बेच
*पी=पति
2
धी भ्रूण हन्ता
माँ बाप ना हों आप
दें सम हक़ 

सब में एक कॉमन बात ये हैं कि स्त्रियों की जिम्मेदारी ज्यादा है ,खुद के हालात के लिए ....

महिला दिवस की शुभकामनायें 
केवल एक दिन के लिए नहीं
 सालो साल के लिए होनी चाहिये ..

एक दिन का नहीं हो उत्सव
हर दिन का हो उत्साह हो

लड़ाई पुरुष वर्ग से नहीं
 ये लड़ाई अपने आप से होनीं चाहिये
सबकी सहमति होनी चाहिए


Wednesday, 17 February 2016

सीपी





मेरा दिया नाम सीपी सुन बच्चों सी किलकती थी
साझा नभ का कोना में हाइकु लेखन समय कभी गलती से भी शान्ति जी या Shanti जी कह दी तो भड़क जाती थी
उसे हमेशा शिकायत रहती थी कि उसे कभी i love you नहीं बोली  मैं , जैसे अपनी बेटियों को बोलती हूँ
एक साँस में तुम्हें दस बार बोलना चाहती हूँ
नाम , जिसे प्यार , दिल से करते हैं , उसे ही देते हैं न

साझा नभ का कोना के लिए हाइकु लिखते समय ही सीपी बहुत परेशान रही .... लगभग पन्द्रह सालों के बाद उनकी बेटी को बच्चा होने वाला था ..... सीपी मन नहीं लगा पाती थी लेखन में जिसके कारण वो हमारी दूसरी किताब कलरव में शामिल नहीं हुई ..... या यूँ कहिये मैं उसे शामिल नहीं की .... मुझे उनकी कमी खलती थी लेकिन हडबडी(सीपी का दूसरा नाम , मैं उसे इसी नाम से बुलाने लगी थी , वो समझती थी , खुद की हडबडाहट) को शामिल करना गड़बड़ी ......

कलरव के बाद वर्ण पिरामिड पर बात चली तो सबसे पहले आकर msg की इस बार मैं आपकी सारी शर्तें मानूगी , मुझे शामिल जरुर कीजियेगा .... मैं बोली .... सोचूंगी .... दीदु आप मुझसे प्यार नहीं करती ..... जाओ शर्त ये है तो हाँ नहीं करती ....
जब 51 लोगों को शामिल करने की बात मन में आई तो उन्हें msg की ... किताब में शामिल हो जाओ .... पैसा जमा करा दो ..... हडबडी पैसा जमा करवाई तो 2167 की जगह 22000 जमा करवा दी .... अब खुद उसकी हदबदाहत शुरू .... दीदु पैसा लौटा दो .... नहीं लौटाती जाओ .... उसके पैसे लौट गये 2167 काट कर .... वो एक मेल भेजी 6 रचना की

कुछ दिन ही बीते कि उनके दमाद की बीमारी शुरू और सीपी की परेशानी शुरू ..... दमाद की मृत्यु के बाद वो निराश हो गई कि उससे लेखन अब नहीं होगा .... सुबह से शाम वो मानसिक कष्ट में जी रही थी ..... दिसम्बर के अंत में वो बोली , मेरे पैसे लौटा दो , मैं लिख नहीं पाउंगी ..... कई दिन समझाने के बाद ये तैय हुआ कि फरवरी तक देखो अगर फरवरी तक लिखने की स्थिति में नहीं रहोगी तो मैं पैसे तुम्हारे लौटा दूंगी ....
मुझे लगा कि फरवरी तक वो जरुर सम्भल जायेगी .... मई तक लिख लेगी पूरा .....

एक दिन जनवरी में मैं उसे msg की आज निर्णय करो कि तुम्हें लिखना है या तुम्हारे पैसा लौटा दूँ .... दीदु आप फरवरी तक समय खुद दी थीं ... अब क्या हो गया .... मुझे हडबडी पर भरोसा नहीं ... ना जाने कब वो पलटी मारे .... अभी मेरे पास समय नये लोगों को जोड़ने का .... बाद में ना तुम रहो और ना समय रहे कि मैं नया जोड़ पाऊं

वो सक्रिय होने लगी .... हडबडी में वो थी या मुझे कुछ आभास हो रहा था ....

Wednesday, 20 January 2016

आभारी हूँ

सब की शुभकामनायें बटोर रही हूँ और हिम्मत जुटा रही हूँ ... नये पुस्तक में सम्पादन के लिए ....

आभार सभी का ...




शशि शर्मा 'खुशी'

मेरा परम सौभाग्य कि 17 जनवरी 2016 को मुझे विश्व पुस्तक मेले में दिल्ली जाने का मौका मिला। वो भी मेरी शादी की 25 वीं वर्षगांठ पर,,, मेरे लिए इस से बेहतरीन तोहफा कोई और हो ही नहीं सकता था। मैं अपने जीवन साथी का दिल से आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होंने इतना अद्भुत उपहार मुझे दिया। मेरे श्रीमान कभी भीड़ का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं रहे। आजकल जहाँ सब लोग बेतहाशा पैसे खर्च कर पार्टी करके शादी की वर्षगांठ मनाते हैं वहीं हमारे साहब इसे फिजूलखर्ची व दिखावा मानते हैं। वैसे सबकी अपनी पसंद व अपना तरीका होता है 😊 जिसमें जिसे खुशी मिले वही सही है। ये मेरा मानना है।
खैर, इस विषय को यहीं विराम देते हुए हम फिर से पुस्तक मेले की तरफ आते हैं।
मुझे पुस्तक मेले में ढ़ेर सारी पुस्तकें एक जगह देखकर कितना सुखद एहसास हो रहा था इसे तो मैं शब्दों में ब्यां नहीं कर पाऊंगी। लेकिन हाँ, वहीं मुझे अपनी आदरणीया व प्रिय दीदी (विभा श्रीवास्तव) द्वारा संपादित पुस्तक "साझा नभ का कोना" भी मिली, जो हायकु से संबंधित है। उसके बारे में अवश्य कुछ कहना चाहूँगी।
चुंकि मैं भी आजकल हायकु सीख रही हूँ सो मुझे इसे पढ़ने में बेहद आनंद आ रहा है। साथ ही आप सभी को बताते हुए प्रसन्नता भी हो रही है कि इसी साल के अंत में दिसंबर माह में हायकु शताब्दी वर्ष पर विभा दी के संपादन में आने वाली पुस्तक के एक कोने में मैं भी आप सभी को नजर आऊंगी।
सभी ने बहुत ही अच्छा लिखा है बेशक अब हम जो हायकु सीख रहें हैं ये उन से बेहद अलग हैं, उसके बावजूद भी ये अपनी जगह बेहद अच्छे हायकु हैं जिन्हें पढ़ना मजेदार अनुभव रहा है। विभा दीदी सहित सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ 

"साझा नभ का कोना" में विभा रानी श्रीवास्तव जी की रचनायें पढ़ी | आपकी रचनाओं का आंकलन कर सकूँ इतना ज्ञान कहाँ है मुझे फिर भी एक छोटी सी कोशिश करता हूँ | आपने अपनी ख्याति के अनुरूप बहुत ही नए शब्दों का प्रयोग किया है और आप टीम की कप्तान की भी हैं | आपने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है और एकदम सटीक रचनाएँ लिखी हैं | मुझे आपकी रचना :
श्रम लिखते
माँ, भू-लाल के भाल
स्वेद क्षणिका
और
वंश उऋणी
बीजती माता जाई
बीज संस्कारी
बहुत पसंद आई | इसके अतिरिक्त प्रार्थना, दया, स्वप्न, श्रृंगार, कलम, तृषा, शून्य, बीज, माँ , मन पखेरू, म्लान, धूप छाँव, प्रतीक्षा, बेख़ौफ़, कर्म, उड़ान, कल्पना आदि विषयों पर मुझे आपका लेखन बहुत अच्छा लगा |
हार्दिक शुभकामनाएं |

'साझा नभ का कोना' – (नव हस्ताक्षरों का हाइकु संग्रह)
– संपादक : विभा रानी श्रीवास्तव
*
परम आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी ने इस सम्पादित हाइकु संग्रह में नव हस्ताक्षरों को स्थान दिया है । मगर कुछ नाम पढ़ते ही अपनापन लगा । अच्छे और जाने-पहचाने रचनाकार भी इस संग्रह में है, हो सकता है कि उन्हों ने 'हाइकु' विधा में शुरुआत की हो ।
'हाइकु' विधा मूलत: जापानी काव्य विधा है जो हिंदुस्तान में भी काफी हद तक सफल रही, क्योंकि हमारे साहित्यकारों ने इसे पूरा सम्मान दिया । ख्यातिप्राप्त साहित्यकार श्री नन्द भारद्वाज जी ने सही कहा; 'हाइकु विधा में कुछ लोगों को लिखना बड़ा आसान लगता है, लेकिन संजीदगी से देखा जाय और अगर रचनाकार इस विधा की गम्भीरता को समझते हुए इस विधा में रचनारत हो तो यह काफी चुनौतिपूर्ण भी है ।'
उनके इन शब्दों के बाद कहने को कुछ नहीं रहता फिर भी इतना ही कहूँगा कि – 'हाइकु' 5+7+5 शब्दों में आपको अपनी अभिव्यक्ति के लिए श्रेष्ठ शब्द चयन, अर्थपूर्ण संदेश, काव्यात्मकता और मौलिकता का समायोजन करने के लिए लम्बे समय का रियाज़ करना आवश्यक होता है । कई बार ऐसा होता है कि किसी भी विधा में लिखने से पहले उस विधा का अध्ययन अनिवार्य होता है । शब्द तो हमें मिल जायेंगे, अभिव्यक्ति भी शायद ईश्वर के आशीर्वाद से मिली हो मगर उनमें काव्य तत्व तब मिलता है जब हम उस विषय की गहराई तक जाएं और समझें । इतना ही नहीं, उनमें अगर काव्यात्मक लय न हों तो वो आकर्षक कागज़ी फूल साबित होंगे ।
आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी ने बड़ी मेहनत से इस संपादन किया और आशास्पद नव हस्ताक्षरों में पूर्ण भरोसा रखा । मैं उन्हें बधाई देते हुए नतमस्तक हूँ । साथ ही सभी रचनाकारों का अभिवादन करते हुए अपनी प्रसन्नता व्यक्त करता हूँ ।

Sunday, 17 January 2016

साझा नभ का कोना


कांच ही सही
अपना के देखते
अक्स दिखता


आज हिंदी की लोकप्रिय विधा "हाइकू"पहले जापान के प्राक्रतिक,आध्यात्मिक एवं प्रेम विषय तकही सीमित था किंतु कालान्तर में इसके स्वरुप में परिवर्तन हुआ.अब ये सामयिक विषयो पर भी लिखा जा रहा है 5-7-5वर्ण में अपनी संपूर्ण बात कह देने वाला"हाइकू "तीज की चॉद की तरह है .यह विश्व वान्ग्मय का लघुतम छन्द है.इस लघुतम छन्द में बहुत कुछ अनकहा रहा रह जाता है .लेकिन कभी कभी अनकहे लफ्ज कहे हुए लफ़्जसे ज्यादा कीमती होते है.
5-6 दिन पहले आनंद जी द्वारा प्रेषित विभारानी श्रीवास्तव जी के संपादकत्व में आई किताब "साझा नभ का कोना"पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .160पेज की इस किताब में विभिन्न रचनाकारो के हाइकू संग्रहित है.यद्यपि हमे हाइकू विधा कम पसंद है तथापि -"जीवन पथ/जब तुमको खोया /शून्य ही बचा
2-"छल कपट /कुत्सित व्यवहार/रिश्ते पाषाण
जैसे हाइकू ने मन मोहा
कुछ कमियो के बावजूद भी ये किताब पठनीय व संग्राहनीय है इसके लिये मैं विभा जी को विशेष रुप से बधाई देना चाहूंगी जिनकी कडी मेहनत ,ईमानदारी और साहित्यिक निष्ठा का प्रतिफल है "साझा नभ का कोना".साहित्य के प्रति आपका झुकाव आपकी भावनाशीलता का द्योतक है .निश्चय ही हाइकू का इतिहास आपको कभी विस्मृत नही कर पायेगा.मैं क्षमाप्रार्थिनी हूं आपके काव्य की भूमिका न लिख पाने के लिये लेकिन मैं वचनबद्ध भी हूं आपकी अगली किताब में आपके पूरे सहयोग के लिये
धन्यवाद!
साझानभ क कोना मगाने के लिये सम्पर्क करे
रत्नाप्रकशन
इलाहाबाद
7054179762
 



विश्व पुस्तक मेले में 
हिंदी युग्म प्रकाशक के स्टॉल पे "साझा नभ का कोना के साथ "
Shailesh Bharatwasiजी आभार आपका
रत्नाकर प्रकाशन इलाहाबाद

आदरणीय Nand Bhardwaj जी 

'साझा नभ का कोना' यह नाम है उस अनूठे काव्‍य-संकलन का जिसमें फेसबुक के माध्‍यम से प्रकाश में आए 25 हाइकू रचनाकारों के हाइकू संकलित हैं और इसे इलाहाबाद की वरिष्‍ठ कवयित्री विभारानी श्रीवास्‍तव ने संपादित किया है, यह संकलन अभी कुछ ही अरसा पहले दिल्‍ली के हिन्‍दी भवन में लोकार्पित हुआ था, जो आत्‍मीय मित्र अंजलि शर्मा के माध्‍यम से मुझ तक पहुंचा है, इसमें अंजलि के भी 32 हाइकू शामिल किये गये हैं। 160 पृष्‍ठ के इस संकलन में इस विधा के नये रचनाकारों को पढ़ना एक सुखद अनुभव है। सभी को शुभकामनाएं।
 — शर्मा मनीष अंजलि और विभा रानी श्रीवास्तव के साथ.



प्रियंवदा अवस्थी :-  विभा माँ के अथक संघर्ष और दृढ आत्मविश्वास को मेरा सलाम है । आदरणीय nand bharadwaj जी के हाथों में साझा नभ और उसके एक कोने में चुहल करते हम कोमल पंखों वाले उड़ान भरने को प्रयासरत पंछियों की कोशिशो पर पैनी दृष्टि के उपरांत प्रोत्साहित करती समीक्षा । मन खुश हो गया देखकर ।



हमारी पहली कोशिश थी ..... उम्मीद से निगाहें बहुत लोगों की तरफ उठी .... बहुत लोगों ने आगे बढ़ कर हौसला बढ़ाया 
हम सब आभारी हैं 



Monday, 7 December 2015

सपना











एक आयोजन सफल हुआ कि आँखें फिर नई संजो लेती है

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने सन् 1916 में पहली बार हाइकु की चर्चा किये थे
उस हिसाब से 2016 हाइकु शताब्दी वर्ष है
तो
क्यों न हम 100 हाइकुकार इक किताब में सहयोगाधार पर शामिल हो , विमोचन पर एकत्रित हो यादगार आयोजनोत्सव मनायें
जो शामिल होना चाहें
स्वागत है

अदर्ज लेखा

“भैया ने मुझे तीन लाख रुपये कब दिए?” “यह किसने कहा?” “आपने छोटी भाभी से कहा है न?” “चुग़लीखोर से मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि गृहप्रवेश पर एक...