Sunday, 19 June 2016

पिता









कड़क छवि ...... अनुशासन .... कायदे कानून ..... केयरिंग ..... हम छोटे भाई बहन को ..... बड़े भैया में देखने को मिले ..... यानि पिता का जो रोल हम सुनते पढ़ते आये वो रोल तो बड़े भैया निभाये ..... इसलिए शायद पिता की कमी हमें आज भी महसूस नहीं होती ...... 

हमारे पिता (मेरे पिता + मेरे पति के पिता) बेहद सरल इंसा थे ..... दोनों घरों में मुझे माँ की भूमिका मुख्य दिखी ..... 


एक बार मेरे पति बोले कि .... * राहुल का बाहर जाना , मुझे शायद इसलिए नहीं खला कि ...... या तो मैं उसे सोया नजर आया या वो मुझे सोया नजर आया * ..... या कभी जगे में भेंट हो गई तो जितनी बात होती थी , उतनी बात आज भी फोन पर हो जाती है ...... कैसे हो ..... पढ़ाई कैसी चल रही है .... कोई जरूरत हो तो बताना ..... 


शायद इसलिए मेरे विचार ये बने कि बच्चों का भविष्य माँ के हाथों से सुघड़ होता है ..... पिता बस प्यार प्यार प्यार प्यार .................. बाँटते हैं ......




नीम बरगद पहाड़ नारियल ..... पिता को क्या परिभाषित किया जा सकता है .....




बेटी होना इक कर्ज

कुछ हिसाब एक जन्म में चुकता नहीं हो सकता है .... समय रहते या तो बुद्धि काम नहीं करती या हौसला में कमी हो जाती है .... समय रहते बुद्धि काम करती या समाज से लड़ने का हौसला होता तो ..... आज समाज से बहुत सी कुरितीयों का समूल नाश हो गया होता .... जिन कुरितीयों को सहना स्त्री भाग्य का लिखा मान लेती है .....
बेटी के बाप की गलती ना भी हो तो वो दामाद के पैर पकड़ माफ़ी मांगता है ताकि बेटी खुशहाल जिंदगी जिए ..... वैसी परिस्थितियों में बेटी तब क्या सोचती होगी ?
बेटी होना एक कर्ज है जो इक जन्म में अदा नहीं होता .......

Wednesday, 15 June 2016

वर्ण पिरामिड

वर्ण-पिरामिड सप्ताहाँक - 56 = ( सम्मान्य प्रमुख :: डी डी एम त्रिपाठी जी {भाई बड़े मणि } )
संचालन : आदरणीय श्री सुरेश पाल वर्मा जसाला जी
और समूह के सभी सदस्यगण
शीर्षक = बेहाल / परेशान / दुखी
चै
डूबा
डहार
लू कासार
टूटे ज्यूँ तट
तलमलाहट
काकतालीय दुःख {1}
हो
चूनी
कुपंथी
छीने चुन्नी
स्त्री परेशानी
समाज बेहाल
देख दुष्कर्मी चाल {2}
 

वर्ण-पिरामिड सप्ताहाँक - 48 = ( सम्मान्य प्रमुख :: कुसुम वियोगी जी )
शीर्षक = जयहिंद
>>>>
1
है
भीती
अधीती
जयहिंद
हिम ताज है
तोड़ न सका है
जयचंद संघाती
>>>>>
2
भू
गीती
चुनौती
अग्रवर्ती
नेक-नीयती
जुडाये अकृती
जयहिंद उदोती
>>>> हिन्द की जितनी जय की जाये ..... कम ही होगा
जय हिन्द

Thursday, 9 June 2016

पेड़ अधिक आबादी कम , इन बातों में कितना दम ?



परवचन में कुशल बहुत मिलेंगे ..... मुझे मेरे जिन्दगी में ..... बहुत ऐसे मिले भी .... जिनके हाथी जैसे खाने के और दिखाने के और .... अलग अलग दांत थे ..... बिना अपनी जिन्दगी में अपनाये केवल परोपदेश देना .... गाल बजाने जैसा होता है .... केवल थ्योरी की बातें असरदार नहीं होती है .....



1982 में मेरी शादी आर्थिक रूप से समृद्ध मध्यम परिवार में इंजीनियर से हुई ..... उस समय भारत में ...... हम दो हमारे दो .....  दो बच्चे होते अच्छे ..... छोटा परिवार सुखी परिवार .... का नारा गूंज रहा था .... क्यों कि उस समय तक ..... अधिकतर लोगों को चार से छः बच्चे होते थे ..... जनसंख्या बढ़ने से बेरोजगारी बढ़ रही थी ....  बेरोजगारी का असर मंहगाई पर भी पड़ती है ... बेरोजगारी हो और मंहगाई हो तो चारों तरफ त्राही त्राही मचना स्वाभाविक था .... तभी मेरे पति का निर्णय हुआ कि हम एक बच्चे को जन्म देंगे और उसकी ही परवरिश अच्छे से कर लें ..... यही बहुत होगा .... उस समय हमारे इस निर्णय से हमारे परिवार में एक तूफ़ान सा आ गया .... सभी का कहना था कि चार छः नहीं तो दो तीन तो होना ही चाहिए ..... समृद्ध होते हुए , भगवान का अपमान है .... कम बच्चा होना .... एकलौता बच्चा के सुख दुःख में कौन साथ देगा .... { संयुक्त परिवार टूटने के कगार पर था .... कारण था सुख-दुःख में साथ ना होना ही }

बाँझ का मुंह देखना चल भी जाता है ..... एकौंझ का मुँह देखना बहुत बड़ा अपसगुण है .......

बहुत बातों को सुनते .... नजरन्दाज करते हुए .... हम अपने निर्णय पर अडिग रहे और बाद में हमारे अनुकरण में हमारे देवर ननद का भी एक एक ही बच्चा रखने का निर्णय हुआ ...
मेरी ननद को एक बेटी ही रही मुझे एक और मेरे एक देवर को एक बेटा + एक बेटी तथा एक देवर को एक ही बेटा रहा ..... 
यानि जितने हम भाई बहन थे ..... उतने की ही संख्या बरकार रही ....


आज सभी बच्चे बड़े हो चुके हैं .... उनकी परवरिश में ... हमें ... कभी किसी तरह की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा .... चाहे उच्च शिक्षा दिलानी हो या चाहे उनकी पसंद की चीजे .... कहीं भी मन नहीं मारना पड़ा ..... जिस रफ़्तार से महंगाई बढ़ी .... हर क्षेत्र में कहीं ना कहीं समझौता करना पड़ सकता था ....

कम बच्चे होने से या यूँ कहें कम आबादी होने से भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकती है .... सुरसा महंगाई को रोका जा सकता है .....


इतने सालों में मेरा अनुभव ये रहा कि पेड़ की कटाई काफ़ी तेज़ी से हुई है ..... कंक्रीट का शहर बसाने का जरिया हो या उद्योग लगाने का हो .... रोजगार बढ़ाने का साधन बना हो या फैशन के अनुसार फर्नीचर बनवाने का हो ..... उसका नतीजा ही है ... आज की गर्मी का बढ़ना ..... बारिश का नहीं होना या पहाड़ का खिसकना .... क्षति से परेशान मनु अपनी गलती मानने के लिए तैयार नहीं है ....  लेकिन मानना जरूरी है  ..... उस क्षति की पूर्ति के लिए ... हर जगह मैं और मेरे परिवार के सदस्य , हर आयोजन पर पेड़ लगा रहे हैं ...... कई शहरों में अनेकों प्रकार के पेड़ हम लगा चुके हैं ..... और .... सभी से अनुरोध करते हैं कि हर आयोजन पर पेड़ लगा कर , पर्यावरण से प्रदुषण को दूर करने में सहायक बनें .....


TAKE THE WORLD and PAINT IT GREEN!

मेरी रानी बेटी Maya Shenoy Shrivastava

पेड़ अधिक आबादी कम , इन बातों में बहुत है दम 

Tuesday, 7 June 2016

साधू - बिच्छू




Fb जैसा असली दुनिया में भी ब्लॉक का आप्शन होना चाहिये था
बार बार साधू की भूमिका नहीं निभानी पड़ती किसी बिच्छू के लिए

नजरों के सामने गुलाटी मारते देखना ज्यादा दंश देता होगा न

..... दिल ब्लॉक हो तो ........




सच को ..... चाशनी में लपेटना ..... हमेशा भूल जाती हूँ ..... जबकि जलेबी पसंद है ..... लेकिन मिर्ची ज्यादा लुभाती है .....





Tuesday, 12 April 2016

गाँठ सुलझा रफ़ू


प्रेम का धागा नहीं टूटता .....
जब तक उसमें शक का दीमक
या
अविश्वास का घुन ना जुड़ता .....
खोखला होगा तभी तो टूटेगा .....

मैं जब कढ़ाई या बुनाई करती हूँ ...... तो जब गाँठ डालना होता है ..... 
गाँठ डालना होगा न ... क्योंकि लम्बे धागे उलझते हैं 
और उलझाव से धुनते धुनते कमजोर भी होने लगते हैं ....... 
और ऊन का 25 या 50 ग्राम का गोला होता है ..... 
400 से 600 ग्राम का गोला तो मिलता नहीं ना .....




              ---- जहाँ खत्म हुआ सिरा और शुरू होने वाला सिरा के पास
 थोड़ा थोड़ा उधेड़ती हूँ फिर दोनों के दो दो छोर हो चार छोर हो जाते हैं ....  
दो दो छोर सामने से मिला बाट लेती हूँ ...... 
फिर गाँठ का पता नहीं चलता है ...... 

क्या रिश्ते के गाँठ को यूँ नहीं छुपाया जा सकता है ..... 
कुछ कुछ छोर तक उधेड़ डालो न मन को .....
हर गाँठ को सुलझाया जा सकता है
रफ़ू से चलती है जिंदगी

Thursday, 7 April 2016

घूरा को घूरो और सीख लो


तब का ज़माना ये नहीं था कि द्वारे द्वारे सीटी बजे और घर से कूड़ेदान बाहर रखा जाये ..... तब हर घर के थोड़ी दुरी पर बड़ा गढ़ा खोद कर रखा जाता था और उसमें घर से निकलने वाले सारे कचरे , गाय बैल के गोबर , अनाज के डंठल , खर पतवार भरा जाता था ..... तब जमीन को बंजर बनाने वाली प्लास्टिक का भी पैदाइश नहीं हुई थी न
खढे को मैं हमेशा घूरा करती थी

मेरी माँ कहती थीं
सुनअ घूरा के दिनवा भी बारह बरिस में फिर जाला
मेरे समझ में ये आया कि सड़ गल कर खाद बन जाता होगा घूरा
खेतों में फसल को दिया जाता होगा
खेत सोना उगलती होगी

आत्म हत्या करने वालों को करीब से देखी हूँ निश्चित उनकी माँ मेरी माँ जैसी ज्ञानी नहीं थी
अगर होती तो 12 साल तक धैर्य रखने की सीख जरूर दी होती
12 साल में तो एक युग बदल जाता है
तो क्या हम अपनी स्थिति नहीं बदल सकते

Wednesday, 6 April 2016

वक्त वक्त की टेर


काअ हो तहरा घरे सभन चाचा लोगन के अलग अलग न्योता के कार्ड जाई नु
ना ना हमरा घरे ऐ गो कार्ड जाई
काहेए ….. जब हम तहरा भाई के शादी में अलग न्योता भेजनी अउरी तहरा चचेरा भाई बहीन के शादी में अलीग से न्योता भेजले बानी …..
हमरा ईहाँ अइसने होला कि इगो ही न्योता आवेला … चचेरी बहिन लोग के घरे भी बिआह भईल बा नु …. अउरी हमरो घरे कईगो शादी हो चुकल
बढियाँ बा …. लेबे बेरा कई जाना बा लोग ….. ली लोग कई गओ …. अउरी दी लोग एगो
आगे से हमरा चचेरा भाई बहिन के बिआह होखी त रउआ न्योता मत भेजब …. लेकिन ई बेरा ईगो ही कार्ड भेजल जाव , ना त सभे हमरा के दू चार गो बात सुना दी लोग कि हम बतवले ही ना हओखेब
ना ना हम त चार गओ ही कार्ड भेजेब अउरी हमरा चार गओ न्योता चाहीं त चाहीं
मौका था पुष्पा की ननद की शादी का और बहस छिड़ी थी , पुष्पा और उसकी सास में ….. बहुत समझाने के बाद भी उसकी सास उसके मइके चार कार्ड भेज दी ….. मइके से उसके अपने और चचेरे भाई शादी में शामिल होने आये …. उसके भाई से उसके चचेरे भाई लोग पूछे कि क्या अलग अलग न्योता का चलन शुरू करना है ? नहीं जो अब तक नहीं हुआ वो अब क्यों शुरू होगा
पुष्पा के सगे भाई एक न्योता लाये थे उसे देते हुए बोल दिए कि हमारे घर का रीत इक न्योता ही देने का है , पुष्पा आपलोगों को बताई होगी , आपलोगों को उसकी बात समझनी चाहिए थी …. हर घर की रीत अलग अलग होती है और संयुक्त परिवार की बात ही अलग होती है ….. पुष्पा के ससुर जी बोले कि हाँ पुष्पा बताई थी लेकिन उसकी सास अपनी जिद में किसी की बात सुनती नहीं है
पुष्पा को याद आ रही थी सारी बातें ….. मौका था उसी ननद की बेटी की शादी तैय हुई थी और घर में न्योता देने की बात चल रही थी तो वो बोली कि तीन न्योता जायेगा न ….. आपके घर की रीत जो आपलोगों की माँ मुझे बताई थी … तो उसके पति और देवर मानने के लिए तैयार नहीं हुए …… ऐसा नहीं है ….. आपको याद नहीं है
कार्ड पर हुई बहस के कारण उसकी सास उसे उसकी ननद के शादी की सारी तैयारियों से अलग रखी ही थी साथ कोशिश की थी कि शादी की रस्मों में भी भाग कम से कम ले सके ….. केवल शादी में आये लोगों के भोजन वो पकाये खिलाये
काश सास चार साल और जीवित रहती …… सुनती
वक्त वक्त की टेर  …
अच्छे अच्छे होते ढ़ेर
ढ़ेर  ढ़ेर के हेर फेर

Wednesday, 23 March 2016

होली की हार्दिक शुभकामनायें




ठूंठ सिखाये जीवनियाँ
बन्ना सा वन
जमे बन ठनके
बाँध मुरेठा केसरियाँ
चीथड़े पोशाकें
बदरंग चेहरे
सतरंगी बनाए
जोश फगुनियाँ 
भेज कनकनियाँ
आये कुनकुनियाँ
शुरू हुए उठंगुनियाँ 

किलो के किलो बड़े आलू का रूप बिगाड़ते
तब महंगाई का हम बच्चे कहाँ थे समझते
चार सौ बीस .... चाचा चोर ... भतीजा पाजी
तैयार करने के लिए भैया को करते थे राजी
रंग लगा .. धीरे से मौका ढूंढ़ , पीठ पे चिपकाते
सूखा रंग छिड़कने के लिए गंजा सर खोजते
भोले भाले .... शैतानी करना नहीं सोचा करते 

_/\_


Monday, 7 March 2016

छोटी सी बात




करुणावती पत्रिका के लिए जब राशि देने का समय आया तो दुविधा ये हुई कि मैं रहती पटना में हूँ .... पैसा भेजना कानपूर है ... { तब NEFT  जैसे कार्य से परिचित नहीं थी } बैंक का जमाना है .... लेकिन खुद कभी बैंक की कार्यवाही की नहीं थी .... अपने पति से कहने का मतलब था .... ना .... जबाब पाना ...
घर के अलमीरा पुस्तकों से भरी पड़ी है ..... ऐसे में नई किताबें खरीदने के इच्छुक ना खुद हैं , ना इजाजत देते हैं .... तब वे पुतर आनंद जी से परिचित भी नहीं थे .... परिचित भी होते तो मना कर देते .... बिना बताये कार्य कर लेती हूँ ... लेकिन मना किये कार्य करना अच्छा नहीं लगता है .... जब महबूब - माया के शादी के पार्टी में पुत्र आनंद जी आये तो उन्हें करुणावती पत्रिका की राशि उन्हें चुपके से थमा दी ..... 
जब साझा नभ का कोना हाइकु साझा संग्रह छपने की योजना चली तो फिर इनकी इजाजत मिलना दुरूह कार्य था .... तब तो मेरे पति हाइकु का सुबह शाम मजाक उड़ाया करते थे .... उनका मज़ाक होता था 
1. किसी अनुवाद कर्ता को रखना होगा
2. तीन पंक्तियों के लिए तीन पेज की कुंजिका छपवानी होगी
तब मुझे एक शादी में लखनऊ जाना पड़ा .... वहीँ से मौका मिल गया कानपूर जाने का .... कानपूर में मिल गया सभी समस्याओं का हल ..... लेकिन साझा नभ का कोना छपने के पहले ही .... कलरव तानका सेदोका साझा संग्रह छपने की बात चली और उसकी राशि देने के लिए हिम्मत कर अपने पति से बात कर ही ली और तभी हाइकु की बात भी बता दी .... विमोचन दिल्ली में होना तैय था तो .... टिकट दिल्ली का भी करवाना था .... सब छिपा कर नहीं किया जा सकता था .... इनके विरोध का सामना करना ही था और इनको सहमत भी करवाना था .... पैसा तो महबूब - माया भी देने के लिए तैयार थे .... लेकिन मुझे अपने पति को तैयार करना था .... क्यूँ कि वो मेरा हक़ भी था और सबकी ख़ुशी भी तभी शामिल होती .... 

अपनी दशा दिशा बदलने के लिए हिम्मत करनी चाहिए ....
स्त्री नारी महिलाओं को बहुत छोटी सी बात बता रही हूँ .... छोटी छोटी कोशिश ही कामयाबी की नीव होती है

तीसरी - चौथी किताब की भी बात चली है .... और पटना में विमोचन के लिए भी 
इनके सहयोग की उम्मीद लगा रखी हूँ ..... 

छोटी सी बात 


विष पी स्त्री जी
ना तैय होती सीमा
क्यों ड्योढ़ी छोड़े

सच है न धरा धारा स्त्री की सीमा तैय करना आसान नहीं ..... कूल तब नासती है जब ऊब-चुभ की स्थिति तक पहुंचती है ..... ऊब-चुभ की मनोस्थिति तक प्रतीक्षा ही क्यों करें ..... ड्योढ़ी लांघ , खुले नभ के निचे , बियाबान , मरुथल क्यों झेलें

*बेंवड़ा चढ़ा परेशानियों को ही क्यों ना कुटें 😜

*बेंवड़ा = वह लकड़ी जो बन्द द्वार के पीछे लगाई जाती है = अरगल


Sunday, 6 March 2016

कन्या स्त्री नारी महिला




तनी ठहरीं ना .... हमरो ठोक लेबे दीं ..... दिन में हमरा मारले रहले हां ..... इतना कहते हुए ,रजाई में लिपट सोये बड़े भाई को मुक्के मुक्के पिट हंसते हुए बहन संतोष कर लेती थी .... दोनों भाई बहन एक पीठिया थे और दोनों में पटता नहीं था .... ये बचपन की बातें थी .... लेकिन जब बहन बड़ी हुई और उसकी शादी हुई तो कई बार पति के हाथों पिटी .... लेकिन भाई की तरह पति को क्यूँ नहीं पिटने का सोची .... पति परमेश्वर की घुट्टी पिलाई गई थी ..... असहनीय अशोभनीय बातें तब तक सहती रही जब तक सहनशक्ति जबाब नहीं दे दिया ..... एक दिन बिफर ही पड़ी और चिल्लाई .... खाने में जहर दे .... सबको मार कर , घर में आग लगा दूंगी .... सब स्तब्ध रहे ..... पिटने का अंत हुआ ..... धीरे धीरे खुद के लिए लड़ना सीख गई और आत्मसम्मान से जीने की कोशिश करने लगी .... 

1
कूटे शरीर
*पी नशेड़ी , कुपूत
पले स्त्री बेच
*पी=पति
2
धी भ्रूण हन्ता
माँ बाप ना हों आप
दें सम हक़ 

सब में एक कॉमन बात ये हैं कि स्त्रियों की जिम्मेदारी ज्यादा है ,खुद के हालात के लिए ....

महिला दिवस की शुभकामनायें 
केवल एक दिन के लिए नहीं
 सालो साल के लिए होनी चाहिये ..

एक दिन का नहीं हो उत्सव
हर दिन का हो उत्साह हो

लड़ाई पुरुष वर्ग से नहीं
 ये लड़ाई अपने आप से होनीं चाहिये
सबकी सहमति होनी चाहिए


छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों ...