Tuesday, 6 December 2016

डर से आगे जीत





तिनका हूँ खुद का वज़ूद ही कितना
चलती गई जिसने राह बताई जितना

    


एक साल के बाद वो घड़ी आ ही गई
अपने किये वादों के अनुरूप एक दिन पहले पटना आये अतिथि

 


हाइकु लिखते समय
छोटे छोटे कम वर्ण के शब्द चुने
और
चुकि आधे वर्ण की गिनती नहीं होती
तो
ऐसे शब्द चुने जिनमें आधे वर्ण हो
! ये चिह्न लगे शब्द भी महत्वपूर्ण होते हैं
श्री भट्ट जी की ये बताई बातें हमें बहुत पसंद आई 




तलाश जारी
एक सौ इक्यावन
शत के बाद





Thursday, 1 December 2016

काला धन


 
काला धन के नाम पर अत्याचार

स
तंज़
स्वाश्रयी
मरी मीन
तिज़ोरी कैद
कत्ल शिष्यकारु
काला धन रंगीन 【01】
<><>
लो
चर्चा
बयानी
अम्र कौमी
नंगा कहर
दाग बेदखल
काला धन महर 【02】

Thursday, 17 November 2016

दिमाग डाल डाल - सोच पात पात


"पंखुरी ! तुम्हारे घर से ऐसी आवाजें किस चीज से आ रही है ?"
पंखुरी अपने फ्लैट से सटे फ्लैट में ,अपनी सहेली के संग खेल रही थी तो सहेली की माँ उससे सवाल की।
"कैसी आवाजें आपको सुनाई दे रही है चाची ?"
"धम - धम की आवाजें ! जैसे कुछ कुटाई हो रही हो। चुड़ा-चावल बनाने के लिए धान कूटते हैं वैसा ?"
"हाँ चाची ! माँ और मेरी चाची मिल कर कुटाई कर रही हैं। "
"वही तो पूछ रही हूँ किस चीज की कुटाई हो रही है ?"
"लुगदी है चाची।"
"लुगदी ! लुगदी कूट कर क्या करेंगी तुम्हारी माँ व चाची ?"
"लुगदी कूट कर बड़ा दउरा बनाया जायेगा चाची।"
"इतनी मेहनत ! और इस जमाने में ? अपार्टमेंट में रहने वाले के लिए दउरा का प्रयोजन !" पड़ोसन होने  का धर्म उनके दिलो दिमाग में खलबली मचाये हुए था .... दोनों घरों में एक ही जासूस सहायिका थी। .. उससे उन्हें खबर मिली कि 500-1000 के नोट को खपाया जा रहा है ... मिक्सी में पिस कर कब तक बहाते रहते !"

Tuesday, 15 November 2016

वजूद


घर मेरा है
चलेगी मर्जी मेरी
स्व का सोचना
छी खुदगर्जी तेरी
पुरातन ख्याल
वजूद पर सवाल
दिल को जलाता
सकूं मिटा जाता
उधेड़े पत्ती पत्ती
ज्ञान अनावर्त्ती
सत झंझकोरता
ज्ञान हिलोरता
बिना स्व बिखेरे
धन्यवाद बोल तेरे
महक आती
 नर्गिसी फूलों
चहक जाती
धमक शूलों

Saturday, 12 November 2016

जलजला






"आज देवोत्थान है तारा ... चलो गंगा स्नान कर आते हैं .. लेकिन उसके पहले थोड़ा नाश्ते की तैयारी कर लेते हैं ताकि जब हम गंगा स्नान से लौटें तो किसी को कोई परेशानी ना हो।" तारा की सास सावित्री देवी आवाज लगाई
                       "किसी को कोई परेशानी नहीं होगी अम्मा जी ... हम रोज पांच बजे उठते हैं तो बच्चों का टिफिन आसानी से बन जाता है। अभी तो सुबह के 3 ही बजे हैं। हम इतनी जल्दी क्यूँ जा रहे हैं ? पौ फटने में तो अभी बहुत देर है "....
"इस समय ही गंगा में काफी भीड़ होगी। .. कार्तिक स्नान करने वाले इसी समय गंगा किनारे जुटने लगते हैं बहू तारा। .. सत्संग लाभ होगा हमें भी "
"ठीक है .. मैं तुरंत आई "
"क्या तुम रमन को फोन की थी कि वो अपने परिवार संग ,हमलोगों से आकर मिले ?"
"नहीं अम्मा जी ! आपकी बताई बातें याद हो आई। "
"कौन सी बातें ?"
"ननदोंई अपने पैसे ,जमीन को साले की पत्नी और उनके बच्चों के नाम पर खर्च करते हैं ,ये सोचते हुए कि कुछ दिनों के बाद उन्हें मिल जायेगा .. ससुराल से मिले तौहफे पर आयकर मुक्त होता । लेकिन पूरी जिन्दगी वापसी की प्रतीक्षा रह जाती है कोई नहीं लौटाता है। "
"अरे हाँ ! चलो छोड़ो ! अच्छा की कि तुम फोन नहीं की। .... मेरी बताई बातें तुम याद रखी। मैं ही भूल गई। ... मैं कपड़े का गट्ठर ले आई हूँ ,चलो स्नान कर आते हैं। " गप्प करते करते दोनों सास बहू गंगा किनारे पहुंच गई थीं।
घाट पर काफी अँधेरा था। तब .... भी बहुत लोग जुटे हुए थे। कार्तिक स्नान ब्रह्ममुहूर्त में या यूँ कहें अँधेरे में करने का नियम है।  ..... सबके स्नान कर जाने के बाद ... जब रवि रश्मियाँ धरा पर फैली तो लक्ष्मी को तैरते देख कर शोर मच गया। .... हजार हजार का बज़ार देख कर।
जलसमाधि ... चिता जलना .... लक्ष्मी के साथ यही होता है .... हो गृह लक्ष्मी या हो कागज की।
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01.
मोक्षदायनी
लक्ष्मी कार्तिक स्नान
पाप तरणी।
02.
लक्ष्मी है पाती
जमाखोरों की सजा
जल समाधि।

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Friday, 11 November 2016

"चहुँमुखी"







घर घर घूम कर हज्जाम न्योता दे रहा था कि आज साहूकार की बहु का जन्मदिन है .... सभी घरनियों का बुलावा है , बहु ! गांव के पुरुषों के सामने आ नहीं सकती है , इसलिए पुरुषों का आना जरूरी नहीं है । जो कोई आये भी तो वो ड्योढ़ी पर ही रुके ।
गांव के सभी लोग अचंभित भी हो रहे थे और दबी जुबान में कानाफूसी भी कर रहे थे कि जो जोंक आज तक हमारे खून पर जी रहा था वो हमारे घरनियों को जीमने बुला रहा है । किसी में बोलने की ना तो हिम्मत थी या ना कुछ पूछने की ।
शाम हुई सभी महिलायें साहूकार के घर उनके बहु के जन्मदिन में शामिल हुईं । देर रात तक आयोजन चलता रहा .... नाच गाना और खाना खाने के बाद महिलाएं लौटीं तो घर के पुरुष सो चुके थे ।
दूसरे दिन बैंक के सामने उन्हीं महिलाओं की लम्बी पंक्ति रुपया जमा कराने और रुपया बदलने की लगी हुई थी । सबके पास 500-1000 की थैली थी । किसी का 2 लाख 8 हजार का , किसी का २ लाख 10 हजार का , किसी का  २ लाख 15 हजार का , किसी का 2 लाख 20 हजार का  ..... गृहणियों को ढाई लाख तक की आयकर छूट मिली हुई है .... साहूकार के कुछ आदमी बैंक के आस पास उनके सुरक्षा के लिए खड़े थे ।

Sunday, 6 November 2016

"विकल्प"



मंडप के बेदी पर माता पिता , बेटी का हाथ होने वाले दामाद के हाथों में थमा कन्यादान करने वाले ही थे कि छोटा बेटा मुन्ना तूफान ला दिया कि कन्यादान की रस्म होने नहीं देगा ।
 "मेरी दीदी कोई वस्तु नहीं , जो दान कर दी जाये । दो इंसानों की शादी हो रही है तो दीदी की ही दान क्यों की जाए ? बारात हमारे घर दान लेने आई है या दहेज से खुद को बेचने आई है तो वर का दान , वर के माता पिता क्यों नहीं कर रहे हैं ?"।
सारा समाज हदप्रद रह गया । रिश्तेदारों में कानाफुंसी शुरू हो गई कि आज कोई नई चीज थोड़े न हो रही है , ये तो सदियों से होती आ रही रस्म है । दो चार उम्र में बड़े लोग ,कन्यादान का विरोध कर रहे बेटे को समझाने में लग गए क्यों कि विवाह विधि रुकी हुई थी और मुहूर्त बीता जा रहा था । परन्तु दीदी का लाड़ला भाई पगलाये हाथी की तरह आक्रोश में विरोध पर अड़ा रहा । उसके अड़ियल व्यवहार को देखते हुए वर ने वादा किया कि "आपकी दीदी का दान नहीं होगा । इस रस्म का मैं भी विरोध करते हुए आपके साथ हूँ ।"
          मिथिला में कन्यादान के रस्मों में तिल का प्रयोग नहीं होता है , जिससे लड़की का सम्बन्ध पूरी तरह माता पिता से खत्म नहीं होता है । बेटियां माता पिता के सुख दुःख की सहयोगी होती ही हैं , उनके मरणोपरांत उनके श्राद्ध भी तीन दिन का करती हैं । बेटी या बहू है ,इसका पता चल जाता है कि तीन में कि तेरह में से ।"
इस विधा को समझते हुए मुन्ना का क्रोध थोड़ा शांत हुआ और शादी शांतिपूर्वक संपन्न हुई | साथ ही मुन्ना कहावत का अर्थ भी समझ गया .... "ना तीन में ना तेरह में" .....

Saturday, 5 November 2016

// परिवार में चूल्हा बंटता है ,पर्व नहीं //


"दूरदर्शी"

"जानती हो विभा ! राय जी अपने तीनों बेटों को बुला कर बोले कि G+3 फ्लोर मकान बनवाने के पीछे की मंशा ये थी कि तुम तीनों अलग अलग फ्लोर पर शिफ्ट हो जाओ । हम माँ बाप ग्राउंड फ्लोर पर ही रहेंगे ।"
"क्यों पिता जी ? ऐसा क्यों ! हमलोगों से क्या कोई गलती हुई है ? कल ही तो सबसे छोटे भाई की शादी हुई और आज आप हम। तीनों को अलग अलग फ्लोर पर शिफ्ट होने का आज्ञा दे बंटवारे की बात कर रहे हैं ।" तीनों बेटों बहुओं का एक ही सवाल सुन राय जी मुस्कुराये और बोले " आज कोई गलती तुमलोगों से नहीं हुई है । कल तुम लोग कोई गलती कर एक दूसरे से दूर ना हो जाओ दिलों से ,"आज फ्लोर से बस दूर हो जाओ।"
हम माँ बाप जिस फ्लोर पर रहेंगे वो फ्लोर सबका होगा । हमारे रिश्तेदार , हमारे संगी साथी खास कर हमारी बेटियों का निसंकोच मायका आबाद रहेगा ! ...
जया चाची (मकान-मालकिन) की बात सुन विभा अतीत में खो गई ... वर्षों पहले कुछ ऐसे विचार से ही वो अपने पापा को अवगत कराई थी

जी आदरणीया

करीब 27 -28 साल पुरानी सीख है जो मैंने अपने पिता को दी थी 🙏
अवकाश प्राप्त कर नौकरी के क्वाटर को छोड़ कर जब वे घर रहने जा रहे थे .... संजोग से मैं उस समय वहाँ थी .... घर पहुंचते रात हो जाने वाली थी .... मैं भाभी को बोली "सबके लिए यही से खाना बना कर ले चलते हैं ...

मेरी बात खाना बनाने वाली सुनते ही मेरे पिता दुखित हो गए ..... घर पर उनसे बहुत बड़े भाई , भाई=पिता समान यानि मेरे बड़े बाबू जी और बड़ी अम्मा रहते थे ... जो खुद वृद्ध थे .... उनके बच्चे बाहर रहते थे ..... वे लोग जिद से घर रहते थे .. कि गांव का वातावरण भोजन उन्हें स्वस्थ्य रखता है और मन लगता है ....  सच में आज भी जो अपनापन गांवों में बुजुर्गों को मिलता है ... वो शहरी परिवेश नहीं दे सकता है .... गप्पबाज़ी सेहत के लिए ज्यादा जरूरी
 
मेरे पिता को लगा कि आज भोजन लेकर चलेंगे तो बड़े भाई से अलग हो जाना होगा ..... जिसकी शुरुआत उनके कारण होगी .... लेकिन मेरी सोच कह रही थी कि पापा का पूरा परिवार उनके संग रहेगा क्यों कि मेरी माँ नहीं थी तो जब तक मेरे पापा जीवित रहे कोई न कोई भाभी उनके साथ रही तब दो दो भाभियाँ रहती थी ..... उनके बच्चे थे .... सबका अपना अपना स्वाद था .... अपनी अपनी आजादी थी ..... मैं एक ही बात बोली "आज आप चूल्हा अलग करते हैं तो बड़े बाबूजी के दिल से कभी अलग नहीं होंगे" ....  उनको आप अपने साथ रखियेगा दो चौका रहेगा तो परेशानी किसी को नहीं होगी .... नहीं तो कीच कीच स्वाभाविक है और दरारे पड़ने के बाद अलग होने से दीवारें खड़ी होती है .... और आज भी हम सब अपने चचेरे भाई बहन कोई पर्व हो शादी ब्याह हो एक चूल्हा जलता है ...
 
मेरी भाभियों पर मेरे पापा के संग बड़े बाबूजी और बड़ी अम्मा लादे गए बोझ नहीं थे लेकिन एक आँगन में होने से इंसानियत ज्यादा दिखाई सबका बराबर ख्याल रखा गया क्यों कि केवल सुपरविजन करना था
"बांधे रखना चाहते हो कुनबे को तो सबको मुक्त कर दो 🙏"
पिजड़े से फरार पक्षी ,पिंजड़े में नहीं लौटता है .... साख से उड़ा पक्षी ,बसेरा साख को ही बनाता है ....

Friday, 4 November 2016

छठ




कोसी मनौती का ही होता है .... बेटा हुआ तो भरा जायेगा  ... बेटा की शादी हुई तो भरा जायेगा ... बेटों की नौकरी लगी तो भरा जायेगा।


नहाय खाय से आज छठ व्रत शुरू .... सभी व्रती को मेरा सादर नमन .... बहुत कठिन व्रत है .... श्रद्धा और विश्वास से ही पार लगता है .... आस्था श्रद्धा विश्वास के संग स्वच्छता का सन्देश देता पर्व हैं

सयुंक्त परिवार का आनंद है ... पूरा परिवार जुटता है .... वो सबसे अच्छी बात है इस व्रत में ....

कहते हैं छठ बैठाना नहीं चाहिए अपसगुन होता है ... मेरी बड़ी माँ छठ बैठाई तो भाई की मृत्यु हुई .... मझली माँ छठ छोड़ी तो उसी समय एकादशी {देवउठन} के दिन खुद गुजर गईं ... ... मेरी सास छठ बैठा दीं .... हमारे परिवार में एक साथ जुटने का साधन केवल शादी है जो हर साल तो होती नहीं .... अन्धविश्वास लेकिन मुझे विश्वास करने का मन करता है .... पहले छठ से लोग बहुत डरते थे ... घर की कोई वृद्ध महिला ही करती थी ... सभी तैयारियों में मदद करते थे ।

मेरे बड़े भैया का टाँसिल का ऑपरेशन होने वाला था। ... अस्पताल के बाहर में हम जहां प्रतीक्षित थे वहीं पर ... छठ के लिए सुप दौरा बन रहा था। .. मेरी माँ बहुत घबराई हुई थीं ....{माँ का दिल , माँ बनने के बाद ही समझ में आया मुझे } .... वे मनौती मान लीं कि सब कुशल मंगल रहेगा तो वे छठ में सारा सामग्री देंगी एक सूप का। ..... भैया के टाँसिल का ऑपरेशन हुआ और सफल रह ,सब कुशल मंगल रहा। ... मेरी माँ उसी साल से एक सूप के संग सभी सामग्री देने लगी .... मेरी माँ मेरी शादी के तीन साल पहले गुजर गईं सारी जिम्मेदारी पापा भैया भाभी पर छोड़ कर। ... मेरी शादी के लिए मेरे वही भैया मनौती माने कि वे पानी में छठ के दिन खड़े होंगे ....मेरी शादी जून में हुई और वे उसी साल से छठ में पानी में खड़े होने लगे ....साल दर साल गुजरता रहा। ... छोटे भैया की शादी के कुछ सालों के बाद दोनों भाभियाँ मेरी छठ करने का विचार की कि माँ का मनौती का बोझ कब तक दुसरे उठाते रहेंगे। ... भैया हाल के दो-तीन वर्षों से खरना भी करने लगे हैं। ... आस्था का पर्व है छठ ....यूँ भी कहा जाता है ...मानों तो देव नहीं तो पत्थर।



Saturday, 29 October 2016

दीपावली की असीम शुभकामनायें





 ज
दीन
लोनिनी
आशनाई
धन ते रस
जलापा अलस
तेजस्कर दीवाली ।
<><><>
स
सत्व
संदीप
मोल दीप
सेंत उजास
चैत्य कारी वास
दीपावली उल्लास ।



"क्यों नहीं आएगा पटाखा ?" पटाखों के लिए रोते-मचलते और जिद करते हुए अपने पोते को देख कर बैचेन होते हुए सिन्हा जी अपने आदत के विपरीत थोड़ी ऊँची आवाज में अपने बहु से बोल दिए ।
"आप ना बोलें कुछ पापा , आपके सह देने से बिगड़ जाएगा । आज ही सुबह में इसके स्कूल ना जाने के जिद को बचपना कह टाल रहे थे आप। "
"बचपन में इसका बाप भी स्कूल नहीं जाना चाहता था ।" 
"यही बात ! यही बात, आपकी इसे शोख बना देगी "सिन्हा जी की बहु थोड़ी तीखे अंदाज़ में बोली ।
"मैं सह दूंगा ? क्या मैं चाहूँगा कि वो बिगड़ जाए ?"तेज आवाज और धुंआ प्रदूषण फैलाती है । शगुण के लिये अनार , चक्करी , फुलझड़ी आते ही हैं , कुछ लाल मिर्चा वाले आ जाएंगे । शगुण भी हो जाएगा और मेरे पोते की ख़ुशी भी बढ़ जाएगी । तेज आवाज और ज्यादा धुंआ वाले पटाखे से प्रकृति प्रदूषित होती है और आस पास के वृद्ध जन परेशान होते हैं ।
"आप अभी भी नहीं समझ रहे हैं"
"हाँ हाँ नहीं समझने की बारी मेरी है ,मेरे पोते के संग ।
याद करना जब तुम्हारे बच्चों के बच्चे होंगे 
राम कथा के साथ दीवाली कथा सुनाते "





Friday, 21 October 2016

खोजवा


कहानी :- खोजवा
विभा रानी श्रीवास्तव

5000 टका ... हाँ जी 5000 ही टका आपलोगों से मिलेगा हमें कि आपलोग हमलोगों से बद्दुआ ही लेने के लिए तैयार हैं , मेरे मकान मालिक के बेटे के शादी के बाद आये , किन्नरों की टोली का मुखिया चिल्लाया/चिल्लाई ... बहुत वर्षों की बात है , तब 5000 रूपये की कीमत बहुत थी । किसी मध्यम परिवार वालों के लिए किन्नरों पर , आशीष के बदले लुटाना हृदयाघात की बात थी , लेकिन किन्नरों की बद्दुआ फलती है , ये अंधविश्वास भी फैली हुई थी ।
      किन्नरों को समीप से देखने का पहला मौका था मेरा ...  उस घटना के बाद रुपया पैसा के लिए किन्नरों का शोर कई बार देखने सुनने का मौका मिला । कभी किसी के घर शादी हुई हो , कभी किसी का नया घर बना हो , कभी किसी के घर बच्चे का जन्म हुआ हो , हिजड़ों की टोली गाने बजाने आशीर्वाद देने के बहाने , लूटने जरूर पहुँचती है । लूटना इस सन्दर्भ में कहती हूँ कि वे बद्दुआ की धमकी दे कर , गंदे गंदे शब्दों का प्रयोग कर , अपनी मुँहमाँगी कीमत वसूलती हैं टोली । जब भी किन्नरों से मुलाकात हुई उनका विभस्त व अश्लील रूप ही देखने को मिला । कई बार रेल यात्रा में उनको यात्रियों को लूटते पाई । महिला यात्री का स्तन छू देना , पुरुष यात्री का गाल या शिश्न को छूने के हाथ बढ़ाना ,सबको एक अजीब परिस्थितियों का सामना करने के लिए बाध्य करना । मुँहमाँगी कीमत दो नहीं तो नंगा हो जाए कहते कहते नीचे से साड़ी उठाने का भय दिखाना । एक बार तो एक ने अपने सारे कपड़े उतार ही डाले । मुझे हमेशा खौफ़ में डाले रखा । अभी हाल में कई दुकानों में हफ्ता यानि कभी आकर पैसे की मांग करते देखी ।
केवल एक अंग में अंतर होने से ये ना तो स्त्रीलिंग वर्ग में या ना तो पुलिंग वर्ग में तो क्या कहें इन्हें होते है या होती हैं
सिक्के का एक पहलू ही तो था खौफ़ का अनुभव मेरा जब तक .....समय के साथ सोच बदलता है या अलग अलग मनुज की अलग अलग सोच होती ही है … समय काल कोई भी हो .... मेरी शादी में एक दूर के रिश्ते की ननद से मेरी मुलाकात दो चार दिनों की हुई वो बहुत सुलझी हुई लगी .... एक दो साल बाद उनकी भी शादी हुई ….. मेरी जब उनसे मुलाकात हुई तो मैं उनसे पूछी ….
"आपको कैसा लगा जब आप जानी कि वे नामर्द हैं ?"

"भाभी क्या शब्दों में कोई कह सकता हैं कि जब वो मर जाता है तो कैसा लगता है ?"

"आप सम्बन्ध विच्छेद कर नई जिंदगी क्यों नहीं शुरू करती हैं ?"
उनका जबाब था "जैसी किस्मत मेरी भाभी उनमें एक ही कमी है ..... लेकिन वे बहुत अच्छे इंसान हैं ..... फिर कौन जानता है , दूसरा कैसा इंसान मिले … ?
इतने अनाथ बच्चे हैं दुनिया में किसी को गोद ले अपने आँचल भर लुंगी ।"

"शारीरिक सुख का क्या होगा ?"
"कैसा सुख ? जब भूख कभी लगी ही नहीं । पाकर खोना कष्टप्रद होता है । जो चीज का अनुभव ही नहीं तो ना मिलने का दुःख कैसा !"
त्याग का मिसाल था ये रिश्ता , लेकिन निभाने का हौसला साथी से मिला साथ ,प्यार ,अपनापन संग उचित व्यवहार ही था न ।
उफ्फ्फ्फ़ क्या दर्द  ! उन किन्नरों को समाज परिवार अपनों से मिला होता है , जो ये इतने क्रूर होते/होती हैं , हम साधारण इंसान इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ।
समाज में फैले इस कोढ़ को मिटाने का उपाय भी मुझे नज़र आया खुद के ननद के त्याग में
जिस परिवार में भी ऐसे बच्चे का जन्म हो उसकी परवरिश परिवार समाज में सच्चाई के साथ सामान्य बच्चों की तरह हो ..... जब ऐसे बच्चे वंश बढ़ाने में सहायक नहीं हैं तो शादी क्यों हो ! जैसे

दो साल पहले मेरे पड़ोसी की लड़की की भव्य शादी हुई , फिर एक बार लड़के वालों के धोखे की शिकार एक लड़की हुई उसकी भी शादी हिंजड़े के साथ कर दी गई

लड़की दो तीन दिन में ही लड़के को तलाक दे अपने नौकरी पर लौट गई

दोनों लडकियों के नजरिये से मुझे दोनों का निर्णय मुझे सही लगा

हम हमेशा अपने को आजमायें …. खुद में जितनी सहनशक्ति हो उतनी ही क्षमता की कार्य जरुर करें .... खोजवा के बारे में एक बार फिर से खोज हो और उन्हें समाज की मुख्य धारा से जुड़ा जरुर रहने दिया जाये ... पूरे मान सम्मान अधिकार के संग ... दया का पात्र ,उपहास का पात्र बना क्रूर बनने पर मजबूर ना किया जाए .... स्त्रीलिंग पुलिंग नपुंसकलिंग ... तीन धारा .... तीन प्रकार के इंसान ....

भैया की पोती के लिए आये टोली को कल देख भी विचार जन्में



अदर्ज लेखा

“भैया ने मुझे तीन लाख रुपये कब दिए?” “यह किसने कहा?” “आपने छोटी भाभी से कहा है न?” “चुग़लीखोर से मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि गृहप्रवेश पर एक...