Tuesday, 15 May 2018

एक तीर कई निशाने


"यह क्क्य्या नाटक लगा रखी हो... सुबह से बक-बक सुन पक्क गया मैं... जिन्हें अपने पति की सलामती चाहिये वे पेड़ के नजदीक जाती हैं... ई अकेली सुकुमारी हैं..." ड्राइंगरूम में रखे गमले को किक मारते हुए शुभम पत्नी मीना पर दांत पिसता हुआ झपट्टा और उसके बालों को पकड़ फर्श पर पटकने की कोशिश की... ।
    मीना सुबह से बरगद की टहनी ला देने के लिए अनुरोध पर अनुरोध कर रही थी... पिछले साल जो टहनी लगाई थी वह पेड़ होकर, उसके बाहर जाने की वजह से सूख गई थी... वट-सावित्री बरगद की पूजा कर मनाया जाता है... फर्श पर गिरती मीना के हांथ में बेना आ गया... बेना से ही अपने पति की धुनाई कर दी... घर में काम करती सहायिका मुस्कुरा बुदबुदाई "बहुते ठीक की मलकिनी जी... कुछ दिनों पहले मुझ पर हाथ डालने का भी बदला सध गया..."।
     शुभम सहायिका द्वारा यह शुभ समाचार घर-घर फैलने के डर से ज्यादा आतंकित नजर आ रहा था....

वट सावित्री-
सिर पै ठकाठक
बेना लागल
😜🤣

Sunday, 13 May 2018

माँ-सास... बहुत बारीक सा अंतर



"सयंम समझ संस्कार समय पर साथ नहीं हो!"
"तो... ?"
"मत गलथेथरी करो कि माँ का सम्मान बरक़रार है"
"कैसे...?"
"हर स्त्री को उचित मान देकर"

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लफ्ज़ और इश्क का हिस्सा
सास तथा बहू का किस्सा

"विभा जी आपको अपने सास बनने के अनुभव को लिखना चाहिए... जिसे पढ़कर मुझ जैसी चिंताग्रस्त कई माँ निश्चिंत होगी तो कई सास शायद अपने में सुधार कर ले..."
    मौका था माया का अपने जन्मदिन पर अपनी माँ के पास जाना... मैं भी संग गई थी... वापसी के दिन उसकी माँ कुछ उदास लगी तो मैं बोली कि "माया की खुशियों का ख्याल रखने की जिम्मेदारी अब मेरी है... मेरे बेटे से भी कोई गलती होती है तो मैं माया के संग ही खड़ी मिलूंगी..." मेरे इतना कहते माया की माँ की आँखों से गंगा-जमुना...
  कहीं बहू सास की मनपसंद नहीं तो कहीं सास बहू के स्तर की नहीं... समाज में फैले इस रूप को कई बार अनुभव में देखने को मिला... खाई को पाटने की कोशिश दोनों पाटों को थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ पहल कर करनी चाहिए... लेकिन अहम इतना , "क्यों" पर अटकी रह जाती हैं दोनों की दोनों...
    माया रोये जा रही थी... सब हक्का-बक्का... हुआ क्या... उससे पूछने की कोशिश में लगे कि किसकी किस बात से वो इतनी आहत हुई... हम सब (मैं , मेरे पति , मेरा बेटा) एक दूसरे से सवाल कर रहे थे किसने क्या कहा... थोड़ी देर के बाद उसने कहा कि, "मैं जब भी किचन में जाती हूँ हाथ धोकर जाती हूँ... माँ मुझे कुछ करने नहीं दे रही हैं , तो मुझे रोना आ गया"
मैं :- पर काम क्यों करना चाह रही हो? क्यों सोचती हो कि तुम्हारी जिम्मेदारी अभी से है चौका संभालना... तुम वर्किंग-वूमेन हो । जहां रहती हो भागमभाग की जिंदगी गुजारती हो । यहाँ आठ दिन के लिए आई हो... आराम करो और सबके साथ समय अच्छे से गुजारो... तुम्हें हिचक ना हो इसके लिए ही तो खाना बनाना सिखाई सहायिका को..." जहाँ तक हाथ धोकर चौके में जाने की बात है... "सफाई के मामले में मुझे थोड़ा पागल समझते हैं लोग..."
    चौके से उठा धुंआ और दीप से उठे धुएं के कालिख में कितना अंतर... एक से दाग तो एक से नजर ना लगे के बचाव से सुंदरी का श्रृंगार... शक और गलतफहमी का धुंआ दिल में कालिख लगाए उसके पहले चिंगारी को खत्म कर देने की कोशिश सास-बहू को मिलकर करनी चाहिए... राख में भी दबी ना रह जाये चिंगारी... इसमें अहम भूमिका होती है सास के पति व बेटे और बहू के पति व ससुर की... नट की धार है... चलना कठिन नहीं तो आसान भी नहीं... 
  एक बार कल की सुबह मेरी वापसी थी बैंगलोर से पटना... मेरी यात्रा अकेले की थी... जब तक मैं रही अपने सुविधानुसार माया-महबूब घर में मेरे साथ रहे... आज की शाम माया ऑफिस से वापिस आकर अपने कमरे में सीधे चली गई... बहुत देर हो गई वो कमरे से बाहर ही नहीं आई... और इंतजार कर मैं उसके कमरे में झांकी तो वह  पीठ ऊपर किये लेटी हुई थी, चेहरा नहीं दिखा, अंदाज़ा लगा ली मैं कि वह सो रही होगी... दिनभर व्यस्त रही होगी तो थक गई होगी... व्यस्तता के कारण ही तो आज एक बार भी फोन नहीं की नहीं तो नाश्ता कर लीं , खाना क्या बनाईं , ज्यादा काम मत कीजियेगा , कहीं घूम आइयेगा , आज ऑर्डर कर दी हूँ लंच आपका , आज शाम में घूमने चलेंगे रात में डिनर कर वापस होंगे ... दिनभर में कई फोन करती। आज भी ऑफिस जाते बोल कर गई थी , शाम में जल्दी आएंगे मूवी देखेंगे , बाहर से ही डिनर कर वापस होंगे... कल माँ चली जायेगी... मगर अब तो रात बहुत हो गई उठाना चाहिए सोच उसके पास जाकर उसके पीठ पर ज्यूँ हाथ रखी वो तो रो रही थी... मैं स्तब्ध... हुआ क्या ? बहुत पूछने पर किस्सा कुछ यूँ सामने आया...
महबूब जिस कम्पनी में काम करता था उसी कम्पनी में माया के लिए नौकरी की बात चली... इंटरव्यू हुआ सलेक्शन हुआ जॉइनिंग लेटर/ऑफर लेटर आया... माया जिस कम्पनी में पहले से काम कर रही थी उस कम्पनी में बता दी कि वो रिजाइन कर रही है... इतनी प्रक्रिया के बाद खुशी-खुशी अपने ससुर को बताने के लिए फोन की कि अब वह सुकूँ वाले पल जियेगी क्यों कि दोनों के दो कम्पनी में काम करने से यह ज्यादा परेशानी होती थी कि एक की छुट्टी तो दूसरे का ऑफिस खुला... दोनों के ऑफिस जाने का समय अलग-अलग । ससुर जी समझा दिए कि एक ऑफिस में काम करने से दोनों के निजी रिश्ते प्रभावित तो होंगे ही... प्रभावित ऑफिस के कार्यों से भी होगा... समझाने के साथ आदेश भी था कि एक ऑफिस में काम मत करो...
मैं :- तुम पापा की बातों से सहमत हो?
माया :- हाँ! माँ ! महबूब भी यह सही समझ रहे हैं...
मैं :- क्या तुम्हारे पहले वाले ऑफिस में तुम्हारा रिजाइन करना स्वीकृत कर लिया है ?
माया :- अभी नहीं माँ... कर तो लेगा ही न
मैं :- नहीं करेगा! जिस कर्मचारी को पूरा खर्च कर विदेश भेज ट्रेनिंग करवाया है उस कर्मचारी को बिना मूल-सूद वसूल किये ,कभी नहीं , किसी कीमत पर भी नहीं दूसरे कम्पनी को फायदा पहुंचाने देगा...
माया :- मैं तो इस बिंदु पर सोच ही नहीं सकी ... यू आर ग्रेट माँ
मैं :- आज का जो कीमती दिन तुम गंवा दी क्या उसे वापस कर सकती हो....

माँ सी शक्ल पाई हूँ
उनकी खूबसूरती नहीं पा सकी
हर ठिठके पल में उनको याद की
वैसे हर पल में सोचती कि वे होती तो क्या करतीं
और नकल करने से निवारण होता गया
कुछ अगर कमियां रही तो
नकल तो नकल है...

रानी बेटी माया को बताई लिखने जा रही हूँ तो


मातृदिवस की बधाई

Friday, 27 April 2018

"लेखनी की आत्महत्या"




           बिहार दिवस का उल्लास चहुँ ओर बिखरा पड़ा नजर आ रहा... मैं किसी कार्य से गाँधी मैदान से गुजरते हुए कहीं जा रही थी कि मेरी दृष्टि तरुण वर्मा पर पड़ी जो एक राजनीतिक दल की सभा में भाषण सा दे रहा था। पार्टी का पट्टा भी गले में डाल रखा... तरुण वर्मा को देखकर मैं चौंक उठी... और सोचने लगी यह तो उच्चकोटी का साहित्यकार बनने का सपने सजाता... लेखनी से समाज का दिशा दशा बदल देने का डंका पीटने वाला आज और लगभग हाल के दिनों में ज्यादा राजनीतिक दल की सभा में...

स्तब्ध-आश्चर्य में डूबी मैंने यह निर्णय लिया कि इससे इस परिवर्त्तन के विषय में जानना चाहिए... मुझे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी... मुझे देखकर वह स्वत: ही मेरी ओर बढ़ आया।

     औपचारिक दुआ-सलाम के बाद मैंने पूछ लिया , "तुम तो साहित्य-सेवी हो फिर यह यह राजनीति?"

   उसने हँसते हुए कहा, "दीदी माँ! बिना राजनीति में पैठ रखे मेरी पुस्तक को पुरस्कार और मुझे सम्मान कैसे मिलेगा ?"

        मैंने पूछा "तो तुम पुरस्कार हेतु ये सब...?
   बन्धु! राजनीति में जरूरत और ख्वाहिश पासिंग बॉल है...

पढ़ा लिखा इंसान राजनीति करें तो देश के हालात के स्वरूप में बदलाव निश्चित है...
दवा बनाने वाला इलाज़ करने वाला नहीं होता... कानून बनाने वाला वकालत नहीं करता...

    तो साहित्य और राजनीति दो अलग अलग क्षेत्र हैं तो उनके दायित्व और अधिकार भी अलग अलग है..."

मेरी बातों को अधूरी छोड़कर वह पुनः राजनीतिज्ञों की भीड़ में खो गया... साँझ में डूबता रवि ना जाने कहीं उदय हो रहा होगा भी या नहीं...

   अगर स्वार्थ हित साधने हेतु साहित्यकार राजनीतिक बनेगा तो समाज देश का दिशा दशा क्या बदल पायेगा... मैं अपनी मंजिल की ओर बढ़ती चिंतनमग्न थी...

Tuesday, 13 March 2018

"तमाचा"

 **
एक दिन मैं हाथों में तख्ती लिए हर उम्र के लोगों के पंक्ति के सामने से गुजर रही थी। युवाओं की संख्या ज्यादा थी, "तीन तलाक हमारा हक़ है बिल वापस लो" तख्ती पर लिखे थे, तुम्हारी कौम क्यों नहीं चाहती कि औरतें सुखी हो?"
"उन्हें दुख क्या है?"
"तुम युवा हो हज के लिए जा रहे हो क्या झटके से तलाक देने को सही ठहरा रहे हो?"
"व्हाट्सएप्प पर नहीं देना चाहिए!"असहनीय मुस्कान थी इरफान के चेहरे पर,इरफान मेरे घर बिजली बिल देने आया था बातों के क्रम में वो बताया कि अपनी माँ को लेकर हज कराने जा रहा है क्यों कि औरत हज करने पति बेटा या किसी पुरुष के साथ जाएगी तभी फलित है...
"क्रोध में दिया तलाक सही है?"
"…"
"तुम्हारी सोच पर अफसोस हुआ... समय बदल रहा है... ऐसा ना हो कि स्त्रियाँ शादी से ही इंकार करने लगे।"
"मछली हर धर्म की फंस जाती है आँटी!"

Friday, 19 January 2018

ठगी


यूँ तो लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर श्वेत मोती , रंगीन मोती की माला , लकड़ी के समान , चाभी रिंग , मूर्ति पत्थरों पर , चावल पर नाम लिखने वालों की एक सी भीड़ होती है... कांचीपुरम का समुंद्री तट यहाँ बसा पुराना शिव मंदिर सैलानियों के लिए मनमोहक स्थल... पूरे देश से जुटी अभियंताओं (इंजीनियर'स) की पत्नियों को घेर रखी थी छोटी-छोटी बच्चियाँ... सभी बच्चियों के दोनों हाथों गले में दर्जनों तरह-तरह की मालाएँ... मोतियों की ... स्टोन की ... उसी तरह की उनकी बातें... मानों कुशल व्यापारी हों... उनके घेरे के शोर में चलना कठिन हो रखा था....
-दूसरे जगहों पर सौ-सवा सौ से कम में नहीं मिलेगी आँटी जी मैं नब्बे इच में दे रही हूँ...
-सुबे से घूम रही रात हो रही इक भी खरीद लो बहुत तेज़ भूख लगी है...
-दुआओं का असर होगा आपलोग आख़री उम्मीद हो...
दस मिनट के शोर में मोल तोल(बार्गेनिंग) के बाद 10-10₹ में पटा और श्रीमती की मंडली 10-10 माला खरीद कर गाड़ी में बैठीं
एक ने पूछा क्या करेंगी इतनी मालाएँ
-अरे सौ रुपये की ही तो ली है... किसी को देने लेने में काम आ जायेंगे
-दस रुपये की माला पहनेगा कौन
-कन्याओं को पूजन में देने के काम आ जाएंगी..
-काम वाली को देने से बाहर का तौहफा हो जाएगा
-हाँ! उन्हें दाम भी कहाँ पता होगा
-इतना सस्ता मिलता भी कहाँ
-अभी अंधेरा घिर जाने से और समय समाप्त होने से उनकी बिक्री कहाँ होने वाली थी
-लाचारी खरीदी गई?
-मुझे तो सन्तोष है कि मैंने बच्चियों के हौसले को बढ़ावा दिया... भीख तो नहीं मांग रही सब...
-फिर मोल तोल क्यों... यही मालाएँ मॉल में होती तो...
-आपने नहीं एक भी...
-कल शायद बची मालायें सौ में दो बेच लें बच्चियां... मेरे सामने तो मॉल में टँगी मालाओं पर टँगी स्लिप घूम रही थी...

क्षणिका


01.
मेरा है , मेरा है , सब मेरा है
इसको निकालो उसको बसाओ
धरा रहा सब धरा पै बंद हुई पलकें
अनेकानेक कहानियाँ इति हुई
लील जाती रश्मियाँ पत्तों पै बूँदें
तब भी न क्षणभंगुर संसार झलके
02.
माया लोभ मोह छोह लीला
उजड़ा बियावान में जा मिला
दम्भ आवरण सीरत के मूरत
अब खंडहर देख रोना आया
लीपते पोतते घर तो सँवरता
चमकाते रहे क्षणभंगुर सुरत

Tuesday, 16 January 2018

मुक्तक


01.
हद की सीमांत ना करो सवाल उठ जाएगा
गिले शिकवे लाँछनों के अट्टाल उठ जाएगा
लहरों से औकात तौलती स्त्री सम्भाल पर को
मौकापरस्त शिकारियों में बवाल उठ जाएगा
02.
रंगरेज के डिब्बे लुढ़के बिखरे रह गए रंग
सतरंगी भुवन बने धनक सब रह गए दंग
नभ-गर्जन भूडोल उजड़े अनेकानेक नीड़
सपने टूटे प्रेमबंध छूटे बजने से रह गए चंग
03.
मनोरथ पार लगाती लिख डालो मेरे ढ़ंग को ऊर्ध्वा कहती
बवाली तो मैं कहलाती लिख डालो मेरे रंग को हवा कहती
अंतांत रार कर्णधार एकाधिकार का शोर घमासान रहा मचा
गोदी पड़ी जीत सिखाती लिख डालो मेरे खंग को दूर्वा कहती
(खंग=कमजोर शरीर)

Sunday, 14 January 2018

समय की कोमलता


"पुराना कम्बल ही हमें देने लाती न बिटिया!"
"क्यों! ऐसा आप क्यों बोल रही हैं? दान भी दें और कुछ साल ढ़ंग का हो भी नहीं तो वैसे का क्या फायदा"
"ये हमारे पास कल रहेगा कि नहीं तुम क्या जानो!"
"क्क्क्या ?
"तुमलोगों के जाते हमसे छीन लिया जायेगा और बेच दिया जायेगा!..."
"कौन करता है ऐसा?"
"इसी आश्रम का केयर-टेकर"
"क्या आप मेरे मोबाइल के सामने इसी बात को दोहरा सकती हैं ?"
"कल से फिर... ?!"
वृद्धाश्रम में वृद्धाओं और संगठित महिला दल से वार्तालाप चल ही रही थी कि वृद्धाश्रम के केयर टेकर को कैद में लेकर युवाओं का दल अंदर आ गया... संगठित महिला दल की एक सदस्या मोबाईल से लाइव टेलीकास्ट कर रही थी... 

Monday, 1 January 2018

"सुविधा सुमार"



“देखो भाया! आप बिहारी , मैं गुजराती ... उसपर से पक्का बनिया…। पड़ोसी हैं वो अलग बात है... , लेकिन लेना-देना हमारा व्यापार है… मैंने आपकी साल भर से बंद पड़ी स्कूटी ठीक करवा देने में मदद की… बरोबर… है न?”

“बिल्कुल ठीक कहा आपने । आप बड़ा काम करवा दिए…”

“अब हिसाब बराबर करने का है”

“ले आइये ढ़ेर सारा मिठाई… मिठाई से कर्जा थोड़ा उतर जाए…”

“अरे नहीं न । मिठाई तो अलग चीज है, वो तो पड़ोसी और अतिथि के नाते खाऊँगा ही…”

“अरे! फिर?”

“मुझे साहित्य का भूख है… अपनी आँखें इतनी खराब हो गई है कि खुद से पढ़ नहीं पाता कुछ और यहाँ दूसरे हैं नहीं जिनसे चर्चा कर सकूँ। आज विभा जी ने पढ़ कर सुनाई तो बहुत आनंद आया । अब तो आप जब तक यहाँ हैं , हमारी तो रोज यहाँ ही बैठक जमेगी ।”

“मुझे भी अच्छा लगेगा आदरणीय । गुजराती होते हुए भी आपको हिन्दी साहित्य में रुचि है । आप हाइकु जानते हैं । हाइकु सुनने वाले हिन्दी में ही कम मिलते हैं ।”

“एक बात कहूँ आप बुरा नहीं मानेगीं न?”

“बिल्कुल नहीं ! बोलिये…”

“आप अभी चार पृष्ठ पढ़ कर सुनाई हैं , उनमें से एक शब्द खटक गया “ईमानदारी”… ईमानदारी हिन्दी शब्द तो नहीं … “अब चलता है” मत बोल दीजियेगा… ”

“लोगों को मिक्सचर पसंद आने लगा है।”

Friday, 29 December 2017

जिंदगी है यूँ ही मरीचिका


बहुत पुरानी बात है करीब सन् 1972-1973 की
मैं एक साल विद्यालय नहीं जा पाई थी... गाँव में रहना पड़ा था... सुविधा नहीं था... प्रतिदिन विद्यालय जाने के लिए... दिनभर छत के बरामदा में बैठी, नाद से बंधे गाय बैल को खाते जुगाली करते देखती थी...
अभी बैंगलोर में ,वही याद आ रहा है... नाद से बंधी हूँ और खाना जुगाली करना जारी है...
#सोच_रही_हूँ_ना_जाने_कब_तक_यहाँ_हूँ_समय_का_सदुपयोग_करूं_स्कूटर_चलाना_सीख_लूँ...

डर गया सो....
सच पूछो तो कल जब स्कूटी पकड़ी तो अजीब सा डर समाया कि ना बाबा ना इस उम्र में अगर हड्डी टूटी तो जुड़ेगी भी नहीं...
बहुत भारी लगी स्कूटी पीछे से भगनी जबकि पकड़ी हुई थीं...
भगनी बोलीं चलिये मामी मैं भी अभी सीख ही रही हूँ... आपकी सहायता करती हूँ...
कल(28-12-2017) पहली बार उनके सपोर्ट पर पकड़ ही ली हेंडिल..
आज(29-12-2017) जब स्कूटी छुई तो लगा अरे मैँ लिए दिए धड़ाम होने वाली हूँ कोई पकड़ने वाला भी नहीं था
आज दिन भर हर थोड़ी देर पर पकड़ी घिसकाई...
अब डर नहीं है कि गिर जाएगी स्कूटी...
यूँ जाड़ों में धड़कन बढ़ाना ठीक नहीं... लेकिन सीखने की उम्र भी तो तय नहीं....


सत्यता से आँखें क्या चुराना
कल की कल देंखेगे फसाना
छीजे तन मन स्व बोझ बनता
चिंता फिक्र को लगाओ ठिकाना

Wednesday, 27 December 2017

वक्त को अजगर ना बनने दो




विभा :- "पत्रिका के लिए ,अपनी रचना मणि को भेज दीं क्या आप ?"
श्रेया :- "रंग वाली क्या दी? रंग पर अभी लिख ही नहीं पाई न दी कोई..."
विभा :- "अरे आपको लिखने में इतना क्या सोचना... !"
श्रेया :- "अरे नहीं दी ऐसा भी कुछ नहीं... बस ऐंवेंई जब कलम चलती तो लिख जाती कुछ भी... खैर! मैं आजकल में लिखने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करुंगी
विभा :- "ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्जे हुई न श्रेय वाली बात!"
श्रेया ❤️ :- "जै हुई न हमारी दीदिया वाली बात!"
विभा :- "हम प्रतियोगिता में भी अलग अलग नहीं हो सकते चाह कर भी!"
"श्रेय+ज्योत्स्ना"
श्रेया:- "चाहना ही काहे ऐसा? आप पिछले कई दिनों से हमारी ज्योत्सना दीदिया वाली बात नहीं कर रही थी न तो श्रेया को चांदनी मतलब ऊर्जा नहीं मिल पा रही थी न... पक्का पक्का कोशिश करुंगी दी..
आपने क्या लिखा दी ? और हायकु का क्या हुआ दी ?"
विभा :- "जनवरी से पेज बनाउंगी... दिसम्बर में बहुत तनाव रहा कई सवालों को लेकर
श्रेया :- "हम्म्म समझ सकती ! अभी पिछले बहुत से दिन हमारे भी तनाव भरे ही गुजरे परिवार व स्व स्वास्थ्य को लेकर...!"
विभा :- स्वास्थ्य के बारे में तो जानती हूँ हमेशा बात होती रहती है! परिवार ?"
श्रेया :- "अले दी पूछिए मत! जेठानी साहिबा ने बहुत ही परेशान कर रखा है
आए दिन का टेंशन... शराफत का नाजायज फायदा...!"
विभा :- "ओह्ह! आप जब जानती मानती हैं ,
शराफत का नाजायज फायदा तो बंद करने की कोशिश करनी होगी...!"
श्रेया :- "या कहें जीवन के रंग...!
अब तो यही लगता दीदू बहुत ज्यादा हो चुका...!"
विभा :- "बहुत होने के पहले नहीं रोका जाता तो कुछ नहीं बचता... !"
श्रेया :- "पर लगता बहुत ज्यादा तो हो चुका दी... पर फिर भी देखते हैं... अब क्या किया जा सकता...
वो तो नहा धोकर पीछे पड़ गई हैं मेरे... !"
विभा :- "क्यों सहा... मिला क्या ?
श्रेया :- "वही तो दी... हासिल कुछ नहीं!"
विभा :- "विरोध में जरूरी नहीं कि बदतमीजी किया जाए ,
लेकिन विरोध होना चाहिए अपने को सामान्य रख कर भी...!"
श्रेया :- "यानि इज्ज़त से मनाही?"
विभा :- "बिल्कुल... और नहीं तो क्या... "
श्रेया :-"अभी तो बीमारी का ही बोला..."
विभा :- "आत्म सम्मान सबसे पहले जरूरी... वैसे वो क्या चाहती हैं ?"
श्रेया :- "दाई नौकर की तरह समझना... गाहे-बेगाहे अपनी बेटी के ससुराल खुद ना जाकर , काम करने के लिए मुझे ही भेजने के लिए भी जिद करना..."
विभा :- "किसी का हक़ नहीं कि आपकी खुशियाँ छीने... अगर आपको पसंद नहीं तो अब , जब वे बुलाएँ तो आप तब बोलिए... देखते हैं... देखेंगे... इनसे पूछते हैं... खुद जाने का निर्णय आप कर सकती हैं... ऐसा ऊँगली क्यूँ पकड़ाईं आप ? दोषी आप भी हैं... !"


छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों ...