Friday, 22 March 2024

बिहारी की कढ़ी-बड़ी


 ‘कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी’ के तर्ज़ पर बिहार के किसी-किसी इलाक़े {मेरे मायके में नहीं बनता है लेकिन ससुराल में बनाया जाता रहा है} में दीवाली की शाम और होली के एक दिन पहले होलिका जलाने की शाम में चावल और बड़ी-कढ़ी बनाने का रिवाज़ है। सभी के शरीर से उतरे उबटन के संग बिना नमक डाले पाँच बड़ी जलते होलिका में डाली भी जाती है। यूँ तो बड़ी-कढ़ी गर्मी-बरसात भर भी बनती रहती है, लेकिन सावन में कढ़ी का सेवन करना वर्जित माना जाता है।

कुछ वर्षों पहले एक होलिका जलने वाली शाम के नाश्ते में बड़ी ही बना देने के लिए घर में जितना बेसन था सबको घोलकर मेरी बड़ी देवरानी छानने लगी और मेरे बेटे तथा अपने बेटे को ज़िद कर नाश्ता करने के लिए बैठा दी।

  (मुझे एक बेटा और देवरानी को दो बच्चे, उसका बेटा, मेरे बेटे से डेढ़ साल बड़ा तो बेटी लगभग साढ़े तेरह महीने छोटी। तीनों बच्चे एक संग पले थे। दोनों बेटों में गहरी दोस्ती रही। हमारा संयुक्त परिवार था तब सास-ससुर भी थे…। होली-छठ में सबका जुटान होना सुनिश्चित था।) 

बड़ी देवरानी बड़ी छानती जा रही थी और भेजती जा रही थी… बड़ी का घोल समाप्त हो गया तो वो हाथ धोकर चौके से बाहर आ गयी और देखा कि दोनों बेटे ख़ाली तश्तरी लेकर बड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं…! बड़ी की जगह बड़ी देवरानी को देखकर दोनों के बेटे हँस पड़े।

ससुर जी, मेरे पति, दोनों देवर, देवर की बेटी, सासु जी, छोटी देवरानी, उसका बेटा और मैं तो बड़ी चखे भी नहीं हैं…

“ऐसा कैसे हो सकता है?” देवरानी लगभग चीख ही पड़ी। वो बेहद स्तब्ध थी!

“अगली बार से हमें ज़िद करके कोई ऐसी चीज खाने के लिए मजबूर नहीं कीजिएगा चाची-माँ जो हमें पसंद ना हो! हम बड़ों की बात टालकर अवज्ञा नहीं कर पाते हैं और मेरी माँ कहती हैं कि ना कहना अनाज का भी अपमान होता है! आख़िर ज़िद करने वाले बड़ों को सिखलाया कैसे जाये।”

“कढ़ी में आयरन की भरपूर मात्रा होती है.. इसके सेवन से शरीर में हीमोग्लोबिन को बढ़ाने में मदद मिलती है और शरीर भी स्वस्थ रहता है.. कढ़ी बहुत लाभदायक होती है.. इसका सेवन त्वचा संबंधित समस्याओं से निजात दिलाने में मदद करता है…,” मेरी बात पूरी भी नहीं हो सकी,

“बस! बस बस! माँ! बेसन लाने किसी को भेजो! सभी प्रतीक्षा में हैं! और आप कहती हैं ‘अप रूपी भोजन, पर रूपी शृंगार’ हमें उसका हलवा बेहद पसंद है…!” 

“धत्त तेरे की। दोनों बाबूलोग मेरे उम्मीद पर पानी फेर दिए। मैं चुपके से आज कढ़ी-बड़ी बनाना सीख लेती लेकिन…,” छोटी देवरानी ने कहा।

“हा! हा! छोटी मम्मी आपका तो अभिमन्यु सा हाल हो गया…,” बड़ी देवरानी की बेटी ने कहा।

“दीदी! आप हमें कढ़ी-बड़ी बनाना बता दीजिए! मेरी बनायी कढ़ी फट जाती है तो बड़ी कड़ी रह जाती है!” छोटी देवरानी ने कहा।

“खट्टी कढ़ी पसन्द आती है देवर जी को। दही को खट्टा बनाने के लिए जमे हुए दही को कुछ घंटों के लिए कमरे के तापमान पर रख देना चाहिए। कढ़ी बनाने के लिए कमरे के तापमान पर दही का उपयोग करना चाहिए। बस उसे 3-4 घंटे पहले फ्रिज से निकाल लो ताकि यह ठंडा न हो… यदि आप ठंडे दही का उपयोग करते हैं, तो गर्म करने पर वह फट जाएगा और दानेदार हो जाएगा।

बड़ी कड़ी ना हो उसके लिए बेसन ताज़ा हो  और खूब फेंटा गया हो तथा घोल ना बहुत पतला हो और ना बहुत गाढ़ा हो। घोल पूरी तरह से फेटना हो गया है या नहीं इसको जाँचने के लिए किसी गिलास या कटोरी में पानी लेकर उसमें एक बड़ी खोटने पर पता चल जाता है। अगर फेटना हो गया है तो बड़ी पानी के ऊपरी सतह पर आ जाएगी और अगर फेटना नहीं हुआ है तो पानी के निचली सतह पर रह जाएगा । घोल में नमक बड़ी छानते समय मिलाना चाहिए।

एक टोटका तुम्हें बताऊँ ‘बेसन में पानी डालने के बाद जब उँगलियों को डालकर दाहिने तरफ चलाओ तो फिर उसे वापिस उलटा बायीं ओर ना करना।”

“सब डायरी में लिख ही लेती हूँ, चक्रव्यूह भेदन के समय भूल ना जाऊँ…” खिलखिलाते हुए छोटी देवरानी ने कहा।

लिख लो बड़ी बनाने के लिए : सब जुटें तो मन से बनाना यूँ ही अच्छा बनेगा…

सामग्री

1 कप बेसन

1/4 चम्मच हल्दी

1/8 चम्मच हींग

चुटकी भर खाने वाला सोडा

स्वादानुसार नमक

आवश्यकतानुसार पानी

आवश्यकतानुसार तलने के लिए तेल


कढ़ी के लिए:

1 कप दही

1/2 कप बेसन

1/2 चम्मच हल्दी

1 चम्मच लाल मिर्च पाउडर

आवश्यकतानुसार पानी

2 चम्मच तेल

स्वादानुसार नमक

1/2 चम्मच सरसों के दाने

1/2 चम्मच जीरा

दो-तेजपत्ता या 10-12 करी पत्ते

1/2 चम्मच लाल मिर्च पाउडर

1 सूखी लाल मिर्च

-तले बड़ियों को एक बर्त्तन में रखे पानी में डालकर 5 मिनट भिगोकर पानी से बाहर निकाल देती रहना।

-कढ़ी को लगातार चलाती रहना… (उबाल आ जाने से रिश्ते फट जाते हैं…) जिससे तुम्हारे श्रम में बचत होगी..”

“दादा अक्सर कहते रहते हैं ‘गिथिन के बड़ी’ वो क्या है?” 

“उसके बारे में फिर कभी…”

Wednesday, 20 March 2024

आसमान में सुराख


“यह समीक्षाओं की छ खण्ड वाली पुस्तकें हैं जिनका प्रकाशन बेहद कम मूल्य में किया गया है!” वरिष्ठ अतिथिगण लोकार्पित पुस्तकों के संग तस्वीर उतरवा रहे थे और मंच संचालक अबीर से लेखक के चेहरे पर इंद्रधनुष बना रहे थे…! मौक़ा था राष्ट्रीय ग्रामीण साहित्य महोत्सव में प्रतिभागी लेखक के पुस्तक लोकार्पण का…।

“लेखक महोदय अंजनेय भक्त हैं! अधिकांश समय मन्दिर में गुज़ारते हैं और मन्दिर के चढ़ावे में जो राशि मिलती है उसको ऐसी पुस्तकों को प्रकाशित करवाने हेतु प्रकाशक को सौंप देते हैं…?” मंच संचालक के इतना कहते ही पूरे सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट से विस्फारित आँखें वापिस लौटने लगीं!

“इन पुस्तकों को क्या कीजिएगा?” दर्शक दीर्घा से किसी ने प्रश्न किया!

“बाँट दो।” लेखक ने कहा।

“क्या?” किनकी-किनकी आवाज़ गूँजी पता नहीं चला लेकिन उसके बाद दर्शक दीर्घा में सुई गिरती तो शोर मचा देती। सभी पलकें गिराना भूल गए थे। सबका मुख इतना खुला था कि भान हो रहा हो ऐसे ही किसी के मुख में हनु सूक्ष्म रूप में टहल आये होंगे…।

थोड़ी देर में ही सभी पुस्तकों के आधे मूल्य की राशि पुनः लेखक के हिस्से में थीं। अध्यात्म के जुगनुओं ने सभागार से मंच तक कब्जा कर लिया था।


यह चयनित होना आदरणीय सुधीर सिंह जी मंच संचालक और आदरणीय गिरीश ओझा जी लेखक को समर्पित

Sunday, 17 March 2024

दुर्वह


 पहले सिर्फ झाड़ू-पोछा करती थी तो महीने में दो-चार दिन नागा कर लिया करती थी। अब अधिकतर घरों में खाना बनाने का भी हो गया है तो..” सहायिका ने कहा।

“दो-चार दिन कि छ-आठ दिन..!” रूमा ने व्यंग्य से कहा।

“इस बार एक मुश्त की छुट्टी छठ में चार-पाँच दिनों की…,” सहायिका दबे ज़ुबान में भी बात पूरी नहीं कर सकी।

“अरे तू छठ किसलिए करती है तुझे कौन सा बेटा है! एक बेटी ही तो..,” रूमा ने गुर्राते हुए कहा।

“जी मालकिन चाची! उसी बेटी के लिए छठ करती हूँ… बड़े जप-तप से माँगल बेटी है। बेटी को किसी चीज की कमी ना हो, अच्छी पढ़ाई कर सके, इसलिए आपलोगों के घरों में चाकरी-काम करती हूँ…!” सहायिका के स्वर में मान झलक रहा था।

“एक दिन मैं अपनी बेटी को लेकर काम पर आ गयी थी। मेरी बेटी के विद्यालय में अभिभावक-अध्यापक की गोष्ठी थी। मेरी बेटी विद्यालय की पोशाक में थी। मालकीन माँ ने उस दिन मुझसे काम नहीं लिया और समझाया, बेटी को अपने काम के घरों में लेकर मत आया करो…!” सहायिका ने पुनः कहा।

“बेटी दूसरे के घर चली जाएगी..,” रूमा की व्यंग्य भरी बातें सहायिका को नागफनी पर चढ़ा रही थी।

“तो क्या हो जाएगा.. वक्त पड़ने पर अपनी माँ की तरह काम आएगी। क्या आप जानती हैं हमारी सहायिका तीन बहन छ भाई है…! जब इसके पिता गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे तो उन्हें यही अपने पास रख लाखों खर्च कर इलाज़ करवायी है। कितना भी पौ फट जाये हमारी ही आँखें नहीं खुलती है!” सहायिका को उबारते हुए पुष्पा ने रूमा को चेताया।

Thursday, 29 February 2024

वामन का चाँद छूना : २९ फरवरी २०२४

“स्तब्ध हूँ! यह पोशाक विदेशी दुल्हन का होता है जो यह सिर्फ़ एक तस्वीर खिंचवाने के लिए शौक़ से पहन ली हैं!”

“तो क्या हो गया! हिर्स में पहन ली!”

“हुआ कुछ नहीं… अभी उनके माथे से सिन्दूर पोछाए हुआ ही कितना दिन है! क्या ज़रा भी मलाल झलकता है आपको? भगवान ना करे किसी पर ऐसा दिन आए लेकिन आ गया तो थोड़ा तो लोक लिहाज़ का ख़्याल कर आज़ाद होने के दिखावे से परहेज़ किया जाना चाहिए कि नहीं?”

“किस लोक लिहाज़ की चर्चा कर रही हैं! उसी लोक लिहाज़ की जिसके कारण आप अपने को ड्योढ़ी के अन्दर क़ैद कर ली हैं! व्रत त्योहार में भी पैर हाथ नहीं रंगती हैं!”

“मैं तो किसी आयोजन में नहीं जा पाती हूँ!  हित नात वाले लगातार फोन पर खोज-ख़बर लेते हैं…! मेरी देवरानी मुझसे बहुत छोटी है वो भी मुझसे ज़्यादा दयनीय स्थिति में समय गुज़ार रही है!”

“अपने हित नात वालों के लिए उनका हद तय कर दें! आप से उम्मीद की जाती है कि अपनी देवरानी के लिए आप बड़ी बहन बन दोनों के राह के काँटें हटा सकती हैं!”


Sunday, 4 February 2024

मानी पत्थर

 “दो-चार दिनों में अपार्टमेंट निर्माता से मिलने जाना है। वो बता देगा कि कब फ्लैट हमारे हाथों में सौंपेगा! आपलोग फ्लैट देख भी लीजिएगा और वहीं से हमलोग ननद के घर रात में रुककर, दूसरे दिन वापस आएँगे..!” देवरानी ने कहा।

“तुमलोग चली जाना, मैं नहीं जा सकूँगी।” जेठानी ने कहा।

“क्या आप हमारा घर देखना नहीं चाहेंगी?” देवर ने पूछा।

“देखूँगी न! अवश्य देखूँगी जब आपलोग उस घर में व्यवस्थित हो जाएँगे। आ जाऊँगी किसी दिन आपके घर से मिलने।” भाभी ने कहा।

“इस बार तुम्हारा चलना अलग बात होती…।” जेठानी के पति ने कहा।

“तब क्या अलग बात नहीं थी जब आपने फ्लैट खरीदा था। ख़रीदने के पहले कम से कम दस फ्लैट को जाँच-परखकर, मोल-भाव हुआ होगा। नहीं-नहीं पहले तो योजना बनी होगी; उसके पहले भी रक़म जमा की गयी होगी। किसी एक पड़ाव पर मेरे कानों तक बात पहुँची होती।” जेठानी ने कहा।

“लगभग बीस-पच्चीस साल पुरानी बातों का क्या बदला लेना चाह रही हो?” जेठानी के पति ने पूछा।

“बदला! किस-किस बात का बदला लूँ और क्या उस पल का बदला लिया जा सकता है? आपके संग आपसे मिले सारे रिश्तों ने मेरे सम्मुख केवल अपनी-अपनी माँग रखी। और मैं अधिकार का बिना कोंपल उगाये अपना संपूर्ण अस्तित्व कर्त्तव्यों के पीछे विलीन कर सारी उम्र ख़र्च कर गयी। आपने अपने मित्र और उनकी पत्नी के संग बड़े से फ्रेम में लगी अपनी जो तस्वीर को अलमीरा में डाल रखा है। आप दोनों मित्र एक दिन ही सेवा निवृत हुए थे। मैं अपने बुलावे का देर रात तक प्रतीक्षा करती रही…।” जेठानी ने कहा।

Wednesday, 24 January 2024

उलझे रहो

 ।। विचार -सार।। -रावत

लक्ष्य क्या है ? यदि उसमें शुभ संकल्पों की नींव न हो । पराजय फिर निश्चित है।

रावत-:- आदि शंकराचार्य की दार्शनिक शिक्षाओं में, यह कथन श्री राम की न केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक व्यक्ति के रूप में, बल्कि सर्वोच्च वास्तविकता के अवतार के रूप में गहन समझ को समाहित करता है। शंकराचार्य के अनुसार, श्री राम एक दिव्य मार्गदर्शक के रूप में सेवा करने के लिए मानव रूप में अवतरित हुए, जो पारलौकिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाला मार्ग बताते हैं। सर्वोच्च वास्तविकता के रूप में श्री राम का उल्लेख इस धारणा पर जोर देता है कि परमात्मा उच्च आध्यात्मिक समझ चाहने वाले व्यक्तियों के लिए मार्ग को रोशन करने के लिए मूर्त मानवीय अनुभव में प्रकट हो सकता है। इस संदर्भ में, श्री राम का जीवन और शिक्षाएं एक आध्यात्मिक रोडमैप बन जाती हैं, जो अस्तित्व की प्रकृति, आत्म-जागरूकता और परम सत्य की ओर यात्रा में गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं। आदि शंकराचार्य का दृष्टिकोण दिव्य ज्ञान की सार्वभौमिकता और मानव अनुभव के भीतर दिव्य को पहचानने में निहित परिवर्तनकारी क्षमता को रेखांकित करता है।

विलक्षण-:- अति उत्तम! जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ कि राम का नाम राजनीति का या धार्मिक विषय है ही नहीं।

शंकराचार्य जी ने यही तो समझाने का किया है, जिसे समझने में हिंदू जनमानस सदैव की भाँति आखिरकार असफल साबित हुआ है। हम वे हैं, जिन्होंने विश्व की ज्ञान दिया, और यह भी हम ही हैं कि मानसिक रूप से दिवालियेपन की ओर बढ़ रहे हैं। यदि इसे राम से जोड़कर देखें तो समझ आ जाएगा कि हमने राम को समझने में कहाँ गलती की है।

राम एक राजकुमार हैं, किंतु सामान्य बालक की भाँति वन में जाकर शिक्षा पूरी करते हैं। शस्त्र और शास्त्र का उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त करते हैं। इतने से ही नहीं, विश्वामित्र के साथ फिर वन चले जाते हैं। कुछ राक्षसों का वध करते हैं और फलस्वरुप उत्कृष्ट अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह सब क्या था? चाहते तो महल में रहकर भी शिक्षा पूरी कर सकते थे। विश्वामित्र साथ जाने से इंकार कर सकते थे, लेकिन नहीं। उन्हें पता है कि यह सब तो सोने को तपाकर कुंदन बनाने की प्रक्रिया है। यदि ऐसा न होता तो अच्छे धनुर्धर तो बन जाते, लेकिन जीवन के कष्टों को इतनी सरलता से न झेल पाते। रावण जैसे अति बलशाली को हराना असंभव था। संभवतः शिव धनुष को उठाने में भी असफल हो जाते।

विभा-:-विवेकशील होने के लिए सन्तुलित होना होता है अभी तो असन्तुलन का काल है… अहं ब्रह्माऽस्मि का काल…! वरना बिना दानव के देव कब थे..! वैसे भी ईश्वर बनना आसान है इन्सान बनने से…

Tuesday, 24 October 2023

घर्षण


"दो बार का मस्तिष्काघात और एक बार का हल्का पक्षाघात सह जाने वाला पति का शरीर गिरना सहन नहीं कर पाया। कलाई की हड्डी टूट गयी। सहानुभूति रखनेवालों का पत्नी के पर कुतरने का प्रयास जारी है।"
"मेरे पति मेरे लिए मित्र से बढ़कर थे। उनके मृत्यु के बाद उनके रिश्तेदारों ने मेरे नौकरी करने, बाहर जाने-आने पर रोक लगाने के लिए रुढ़िग्रस्त पाँच-दस कारणों का आधार बनाने लगे तो मेरे बेटों ने मेरा साथ दिया कि मैं अपने शर्तों पर जीना शुरू कर सकी।"
"वन में सीता का सती अनसूया से भेंट, सीता का अपहरण, अग्नि परीक्षा देने की बातें, वन में लव-कुश का जन्म पालन-पोषण, भूमि में समा जाने की बातें मिथक कथा में फैलायी नहीं गयी होती तो क्या स्त्रियों से इतने धैर्य की उम्मीद की जाती••!"
"मिथक कथानुसार सीता स्वयं रावण का नाश कर सकती थी।लेकिन उदहारण देना था, मुश्किलों में जीवन साथी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। हालात का निडरता के साथ सामना करना चाहिए। एकदम से किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए••!"
"कलयुग के पिता अपनी सुता के साथ खड़े हो रहे हैं। क्या राजा जनक को इतना सामर्थ्य नहीं था कि वे अपनी एक गर्भवती बेटी का साथ दे पाते••!"

Wednesday, 18 October 2023

उधेड़बुन : उपचारिका की डायरी : एकालाप शैली

26 जनवरी 2006

पद्मश्री थामते हुए रोयें गनगना नहीं रहे थे। रोयें फ्लोरेंस नाईटिंगेल पुरस्कार छूते हुए भी नहीं गनगनाये थे। चिकित्सा का लाभ उठाने के लिए सुनामी से प्रभावित जनजाति जिन्हें नेग्रिटो नस्लियों स्टॉक कहा जाता था को मनाने में छठी का दूध याद आना हो जाता था। लेकिन चुनौती के दाँत खट्टे कर ही डाली।

25 जून 2014

बता दूँ! नहीं बताती हूँ! झूठ कैसे बोलूँगी... बता ही देती हूँ! लेकिन बता देने के बाद जो परिणाम होगा उसकी जिम्मेदारी किसके कन्धे पर होगी। सेक्सटॉर्शन में फँसकर बुजुर्ग ने आत्महत्या करने का प्रयास किया है। दो दिन के उलझन के बाद आज बुजुर्ग के बेटे को बता ही दिया। उसने वादा किया है। शान्ति से सोच समझ कर समस्या का हल निकालने में मेरी मदद लेगा।

14 अगस्त 2016

आज न्यायालय से हमारी शादी का पंजीयन हो गया। रिश्तेदारों का मानना था कि धनी परिवार की लड़की के लिए उपचारिका का पेशा बिलकुल सही नहीं है। इसलिए मैंने शादी ही नहीं करने का निर्णय लिया था। लेकिन सौगन्ध थोड़े न खायी थी। सेक्सटॉर्शन से उबरे बुजुर्ग और उनके बेटे की ज़िद के आगे मेरा निर्णय टिक नहीं सका।

20 मार्च 2020

आज हमारे अस्पताल में एक आकस्मिक मीटिंग के लिए बुलाया गया था। मीटिंग में हमें बताया गया कि हमारा हॉस्पिटल कोविड के मरीजों को भर्ती करेगा और हमें खुद को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार करना होगा। हम घर परिवार से दूर होंगे। मेरी बेटी एक साल की रिया को छोड़कर कैसे जाऊँ? अस्पताल ने मेरा नाम पुन: राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए भेजा है। नहीं जाऊँ तो श्रम से की गयी सेवा के बदले जो सम्मान मिला है वह धूल धुसरित हो जायेगा!

Thursday, 5 October 2023

धर्म में शर्म नहीं!

मेरी परिचित कहती है, "स्नान नहीं करना, घड़ा, आचार नहीं छूना।"

"आज भी कुछ घरों के मंदिर में मिलता प्रवेश नहीं है, क्या पूर्वजों के बनाए नियम में दोष नहीं है!"

"आराम का संदेश, सभी नियमों में अहित समावेश नहीं है। ये जो हमलोगों को मिली नियति से शक्ति है, क्यों तुम और तुम्हारी सखी झिझकती है!"

"पैड प्रयोग करने की जागरूकता बढ़ी है। लेकिन कूड़ा निपटाने की समस्या ज्यादा सर चढ़ी है।"

"रुढ़ियों को तोड़ों! स्वास्थ्य को बचाना है, पढ़ो-लिखो आगे बढ़ते जाना है।"

"हमारे घरों की सहायिकाओं को स्काउट गाइड में प्रवेश दिलवाना है।"

"अवश्य! उत्तम प्रशिक्षण। ना इसमें ना कोई भेदभाव है ना जातिवाद होता है। क्या समाज को देना है, क्या जीवन से पाना है, तुम सभी का क्या लक्ष्य है?"

"पूछने वाला कोई गाँवों का हाल नहीं है। वहाँ वृद्धाश्रम का चाल नहीं है। मल पर पड़े तन्हा वृद्धों की सेवा करना, हमारा ध्येय है।"

"जब बचाने की बात हो तो वृक्ष छोड़ दिए जाने चाहिए, बीज को कभी भी नहीं छोड़े जाने चाहिए। क्योंकि बीजों से फिर नए वृक्ष हो ही जाते हैं।"



Tuesday, 26 September 2023

अभियंता की डायरी : सारथी की यात्रा

मई 1998

बतौर कार्यपालक अभियन्ता गोदाम का दायित्व भार संभालते हुए ही बात समझ में आ गयी थी कि छोटी मछली को लील लेने के लिए व्हेल के संग अजगर मौजूद है। किसी कम्पनी को काली सूची में डलवाने में प्राण खतरे में आ जाना स्वाभाविक था।

जुलाई 2013

ईमानदारी का सूरज भभक गया। दो-चार नहीं, पाँच-छ वरिष्ठ अभियंताओं को दरकिनार कर मुझे पदोन्नति देकर मुख्य कार्य भार दिया गया। जाति विशेष से आक्रांत क्षेत्र को सुरक्षित करने में प्राण जोखिम में पड़ना ही था। इस सरकारी जिम्मेदारी के कारण एक राष्ट्रीय संगठन-बहु-विषयक पेशेवर निकाय के सर्वोच्च पद के लिए पंजीयन नहीं करवा रहा हूँ।

अगस्त 2015

तीन सौ करोड़ में से चुनाव लड़ रहे नेताओं को सौ करोड़ का हिस्सा चाहिए था जो मेरे रहते सम्भव नहीं था तो रातोरात मेरा तबादला पूर्व पद से भी नीचे कर दिया गया। और इस तनाव का असर मुझे मेरे मस्तिष्क आघात के रूप में मिला। एक बार नहीं दो बार।

जुलाई 2017

राम-राम करते मेरी सरकारी नौकरी से बा-ईज्जत सेवानिवृत होकर प्राण सस्ते में सांसत से भी स्वतंत्र हो गया। अब पूरा समय राष्ट्रीय संगठन को दे पाऊँगा। कई बार प्रांत शाखा के उच्च पद हेतु अधिक मत से चयनित हूँ।

जून 2022

सभी ज़िद कर रहे हैं, राष्ट्रीय संगठन के सर्वोच्च पद के लिए चुनाव लड़ लूँ! लेकिन मैं जानता हूँ कि संगठन में हो चुके लगभग पैतीस-चालीस करोड़ के घपले का निपटारा मुझसे नहीं हो सकेगा। रेल के वातानुकूलित कुप्पे में चलना जब जेब को भारी लगे, हवा में उड़ने के सपने देखना मूर्खता है।

सितम्बर 2023

राष्ट्रीय संगठन की प्रान्त शाखा के उच्च पद {लगभग चौदह साल (कोरोना की वजह से अतिरिक्त साल का मौका मिल जाने की वजह से ) के बाद} से मुक्त हो गया। अब राष्ट्रीय संगठन के युवा सदस्यों को योद्धा बनाने में ज्यादा समय लगाऊँगा।

Monday, 4 September 2023

कोढ़ में खाज

"नमस्कार राष्ट्रीय संयोजक महोदय! 49897 यानी लगभग पचास हजार सदस्यों वाली आपकी संस्था अपनी 13 वीं वर्षगाँठ मना चुकी है। ५० हजार कलमकारों को एक मंच पर लाना। ७५००० किलोमीटर से अधिक की साहित्यिक यात्रा का किया जाना। उसके लिए और आज होने वाले 'एक शाम माँ के नाम' के ३०२५ वें कार्यक्रम की बधाई स्वीकार करें।"

"नमस्कार के संग आपका बहुत-बहुत धन्यवाद पत्रकार महोदय।"

 "राष्ट्रीय साहित्यिक कार्यक्रम में देखा यही गया है कि श्रोता कम होते हैं। वही व्यक्ति साहित्यिक कार्यक्रम में सम्मिलित होना चाहते हैं जिन्हें रचना पाठ करने के लिए अवसर मिल सके। मंचासीन हो जाएँ तो सोने पर सुहागा। इस कार्यक्रम की ऐसी कोई विशेष बात जिसे साहित्य और समाज हित/अहित की हो साझा करना उचित हो।"

"है न! एक प्रतिभागी का औडियो में जानकारी पूछा जाना!"

"कैसी जानकारी"

"उनका कहना था कि आप के द्वारा हमें किस रूप में आमंत्रित किया जा रहा है श्रोता के रूप में या स्पर्धा प्रतिभागी के रूप में। क्या हमलोग अब प्रतिद्वंद्वी प्रतिभागी बनने के योग्य हैं या आने वाली नयी पीढ़ी के बीच स्पर्धा होनी चाहिए!

मेरे पास एक और अति आवश्यक महत्त्वपूर्ण कार्य आ गया है। आपके बताये निर्णय पर मुझे भी चयन करना होगा कि मेरे लिए ज्यादा लाभकारी कौन सा है।"

"ओह्ह्ह,उन्हें चयन करना है कौन ज्यादा लाभकारी है! ऐसे-ऐसे व्यापारी! आयोजक से ऐसी बात कर लेना बौनेपन की निशानी है। ऐसे साहित्यिक दीमक ही बढ़ रहे हैं! अफसोस के साथ विदा होते हैं कि हमारे राज्य की यात्रा में आपको ऐसे अनुभव हुए।

छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों ...