Wednesday, 8 May 2024

शांति का शोर


“अब तक प्रकाशित ५० अंकों की चुनिंदा रचनाओं के संकलन को अनेक पाठकों ने पसंद किया है तथा इसकी मुद्रित प्रति को उपलब्ध कराने का अनुरोध भी किया है। इसलिए इसे वार्षिकी २०२४ के रूप में प्रकाशित किया गया है। बड़ी साइज के ८८ रंगीन पृष्ठों का यह आकर्षक संग्रहणीय अपनी लागत मूल्य पर १५०/-₹ रजिस्टर्ड पोस्ट व्यय सहित उपलब्ध है।”

“4 प्रति हेतु 600/-₹ भेज चुकी हूँ। मुझे लगता है इतने में तो पाँच प्रति हो जाने चाहिए…!”

“आपको १० प्रतियाँ भिजवा देंगे, आदरणीया..! मुझपर लक्ष्मी-सरस्वती की अपार कृपा है...”

“अच्छा है! कुछ पुस्तकालयों कुछ -पुरस्कारों में देना अच्छा लगेगा। आभार! वैसे लक्ष्मी-सरस्वती की अपार कृपा पाने वाले अनेक मेरी निगाहों के सामने हैं... जिनको उदहारण बनने में कोई रूचि नहीं है ...।”

व्हाट्सएप्प के संदेशों की बात यहीं समाप्त नहीं हुई! पलक झपकते फोन की घंटी टुनटुना उठी!

“जी प्रणाम! आदरणीय!” पचास अंक निकालने वाले निश्चितरूप से वरिष्ठ होंगे। विश्वास था कि फोन किसी महिला ने नहीं किया।

“…” समुन्दर के गहराई सी शांत स्वर में प्रश्न गूँजा।

“बहुत जल्द बाँट दिए जाएँगे! आप अपने सामर्थ्यवश जितनी पत्रिका भेज सकें। दूसरा रविवार १२ मई को मातृ दिवस पटना के कार्यक्रम में लगभग चालीस से पचास लोग होंगे। रविवार १४ जुलाई को अयोध्या की पद्य गोष्ठी में भी लगभग इतने ही प्रतिभागियों की उपस्थिति की संभावना…”

“…” यक़ीनन पूछते हुए मेघ-विद्युत सी मुस्कुराहट फैली हो।

“जून के पिता दिवस के अवसर पर हमारी अपनी पत्रिका का लोकार्पण होगा। संस्था के सदस्यों के सामने स्पर्द्धा का विकल्प नहीं रखना चाहेंगे।”

“…,”

“एक दिन अवसर मिला सबको 

अपने संगी चयन का—

उषा-प्रत्युषा ने सूरज को गले लगाया

चाँद, तारों का साथ माँग लिया 

नदियाँ सागर से जा मिली

खारे-खोटे की कि किसने परवाह

हवा, खुशबू के पीछे भाग गई 

बरखा ने बादल को चूम लिया

और अंबरारंभ उलझाया हुआ

और साहित्य?

मनुष्य को मौक़ा दिया सब पर इंद्रधनुष बना देने का!”


दस की जगह पच्चीस पत्रिका आ गयी…

Tuesday, 30 April 2024

लिट्टी-चोखा


आखिर कहाँ से आया 'लिट्टी-चोखा' और कैसे बन गया बिहार की पहचान....

लिट्टी चोखा का इतिहास रामायण में वर्णित है। ये संतो का भोजन होता था। जब राम और लक्ष्मण मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा हेतु गए थे तब भी उन्हें सुबह में सातु और रात्रि में लिट्टी चोखा मिलता था।

रही बात लिट्टी चोखा की तो ये विशुद्ध रूप से भोजपुरी भाषी भोजन है और भृगु क्षेत्र (बलिया) से लेकर व्याग्रहसर (बक्सर) तक प्रचलित थी। आज भी बक्सर में पंचकोशी मेला लगता है जिसमे 05 दिन लिट्टी ही बनती है। ये भगवान राम का अनुसरण है जो यज्ञ की रक्षा के समय किया गया था।

बूझलु, की ना..

हमारे देश के व्यजनों की खुशबू व चटकारे विश्व के हर कोने में प्रसिद्ध है। हजारों जायकेदार भारतीय व्यंजनों का मेन्यू दुनियाभर के हर महंगे होटल में बड़े शौक से पेश किए जाते हैं। ऐसे में लिट्टी-चोखा की लोकप्रियता से भला कौन किनारा कर सकता है। जी हाँ! चाहे वह कोई मजदूर हो या बड़े पोस्ट का अधिकारी, हर कोई लिट्टी-चोखा का लुत्फ उठाना चाहता है। वैसे तो लिट्टी-चोखा देश ही नहीं, बल्कि दुनिया विदेशों में भी पसंद किया जाता है। यह बिहार का लोकप्रिय व्यंजन है, लेकिन यह व्यंजन आपको दुनिया के हर हिस्से में मिल जाएगी। लिट्टी-चोखा एक ऐसा व्यंजन है, जो परंपरा, स्वाद और सांस्कृतिक विरासत की कहानी को दर्शाता है। इस व्यंजन को सफर का साथी भी कह सकते हैं। लोग लंबी यात्रा के दौरान लिट्टी जरूर ले जाते हैं, इसे पैक करना और खाना दोनों आसान रहता है। इसे चोखा के अलावा आचार या चटनी के साथ भी खा सकते हैं। कई लोग तो केवल लिट्टी खाना ही पसंद करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं, आखिर लिट्टी-चोखा बनाने की शुरुआत कैसे हुई? तो चलिए जानते हैं इसकी रोचक कहानी।

मगध काल में हुई लिट्टी-चोखा की शुरुआत

माना जाता है कि लिट्टी-चोखा बनाने की शुरुआत मगध काल में हुई। मगध बहुत बड़ा साम्राज्य था, चंद्रगुप्त मौर्य यहाँ के राजा थे, इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी । जिसे अब पटना के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि पुराने जमाने में सैनिक युद्ध के दौरान लिट्टी-चोखा खाते थे। यह जल्दी खराब नहीं होती थी। इसे बनाना और पैक करना काफी आसान था। इसलिए सैनिक भोजन के रूप में इसे अपने साथ ले जाते थे। 1857 के विद्रोह में भी लिट्टी-चोखा खाने का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई के सैनिक भी लिट्टी चोखा खाना पसंद करते थे। यह व्यंजन अपनी बनावट के कारण युद्ध भूमि में प्रचलित हुआ। सैनिकों को इसे खाने के बाद लड़ने की ताकत मिलती थी। 

मुगल काल से भी जुड़ा है लिट्टी-चोखा।

लिट्टी-चोखा का जिक्र मुगल काल में भी मिलता है। मुगल रसोइयों में नॉनवेज ज्यादा प्रचलित था। ऐसे में लिट्टी मांसाहारी व्यंजनों के साथ भी खाया जाता था। समय के साथ लिट्टी चोखा को लेकर नए-नए प्रयोग होते गए। आज लिट्टी चोखा के स्टॉल हर शहर में दिख जाते हैं। यह खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है, साथ ही सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है।

मुझे अपनी शादी के पहले लिट्टी बनने की जानकारी नहीं थी! हाँ! सत्तू भरी रोटी अक्सर मेरे घर में बनायी जाती थी। जब भी हल्की वर्षा होती, शाम में मेरे पापा सत्तू प्याज लेकर ही कार्यालय से घर वापिस आते। ताकि घर में सत्तू प्याज नहीं होने का कोई बहाना नहीं बनाया जा सके..।

शादी के बाद श्वसुर जी और बड़े देवर को लिट्टी लगाते देखा…! 

बड़े से कठवत में बहुत आटा साना गया। जब पहली बार बनते देखी तब दस लोग होंगे… लगभग अस्सी-पचासी लिट्टी बनाने योग्य सत्तू तैयार हुआ होगा। बारीक-बारीक प्याज, लहसुन, अदरक, हरी मिर्च काटी गयी, अजवाइन-मंगरैल, नीबू का रस, पुराने अचार का मसाला सत्तू में मिलाया गया। आटे का गोला पतला तैयार हुआ जिसमें सत्तू भरा गया…! सब चीज़ का अनुपात और चखकर सिसकारी भरते हुए श्वसुर जी के देखरेख में हुआ! जब तक सत्तू भरकर आटे का गोला तैयार हुआ तब तक देवर और श्वसुर जी चिपरी/गोइंठा का अलाव तैयार कर लिए और उसमें लिट्टी को सेंकना शुरू किए…! 

सेंके लिट्टी को पतले कपड़े में चाला गया जिससे राख निकल गया। चाले हुए लिट्टी को घी में डुबाया गया। तरमाल खाने को मिला तो अद्धभूत स्वाद था! स्त्री सशक्तीकरण का नमूना था सन् ८२-८८ में जब बरसात के गर्मी में चौके में बैठकर बिना पंखे के रोटियाँ ना सेकने का मन करे, लिट्टी लगाने के लिए पुरुषों को तैयार कर लिया जाये। ऐसे पुरुष जिन्हें जूते का फीता बँधवाना //न! न जूता ही रानी के हाथों पहनना, गुसलखाना में पानी रखवाना, दिनभर पलंग तोड़ना रईसी मर्द लगना होता हो…। उनसे कभी-कभी ताश (गोस्त का व्यंजन) मँगवा लिया जाता तो कभी मुर्ग़ा बनवा लिया जाता! वेबकूफ़ को सराह लो सौ कोस दौड़ा लो…!

हमारे भी बच्चे हुए! वे जब सहयोग करने योग्य हुए तो उन्हें बेहद मज़ा आता था! एक बार मेरी ननद का पूरा परिवार हमारे घर रात्रि भोजन पर आमंत्रित थे। ननद बोली कि भाभी के बनाए लिट्टी में ज़्यादा स्वाद है क्योंकि वो मुलायम (मैं बड़े मुँह वाले बर्तन में पानी खौलाती थी और उसपर पतला कपड़ा बाँध देती थी। उस पर भाप से लिट्टी पकाती और घी में जीरा का तड़का लगाकर लिट्टी को तल लेती थी) बनाती हैं…! अच्छा बनाना आना नहीं चाहिए…! मेरी माँ शौक लिए मोक्ष पा गयीं कि उनकी बेटी कभी शौक़ से चौका में जाती…! वो अक्सर कहा करती थीं कि “ना नीमन गीत गैईबू त बबुनी दरबार ना बुला के जैईबू!”

उन्हें कहाँ पता था कि केवल सुर साध लेने से दरबार से बुलावा नहीं आ जाता है। जब तक दरबार से बुलाने की कीमत चुकानी ना आती हो। क़ीमत चुकाने में अनाड़ी रह गये तो फिसड्डी रह जाना तय हुआ!

सन् ९४ में पटना के पटेल नगर में बतौर किरायेदार रहने लगे। मकान मालिक दम्पति से पारिवारिक रिश्ता बन जाता था किराएदारों का! उस मंडली में हम भी शामिल हो गये! उनलोगों को भी लिट्टी बेहद पसंद था। उस मण्डली में एक बाबू मोशाय थे जिन्हें दाल में डूबाकर लिट्टी खाना पसंदीदा था! मकान मालिक के बेटे को मुर्ग चाहिए होता। अपने शौक़ अपने-अपने चौके से पूरे होते! जीभ दागने के लिए को सबको मिल जाता। पूरी मण्डली का लिट्टी-चोखा एक जगह बनता! बड़ा मज़ा आता, हम बाज़ार से आटा सत्तू, सत्तू में पड़ने वाला सारा सामान ख़रीद कर लाते, घर के बगल में गेंहूँ पीसने वाला चक्की था, भुजा वाला ताज़ा पीसा सत्तू देता। सब्जी वाला बाक़ी सामान घर में पहुँचा जाता। अरे! तब हमारी मण्डली पाव -आधा किलो -किलो से सामान नहीं ख़रीदती थी।मटर -साग -गोभी -सब्ज़ियों की टोकरी का मोल लगाते! उस्ताद मकान मालकीन थी तो हम शागिर्द पक्के वाले हो गये! जाड़े में काश्मीरी शाल वाले का रिक्शा हमारे घर से आगे बढ़ता ही नहीं। बासी लिट्टी नाश्ते के संग हमें उदारमना भी बना जाती! चोखा हमें धोखा करना नहीं सिखलाया!


Wednesday, 17 April 2024

छतरी का चलनी…

 हाइकु लिखने वालों के लिए ०४ दिसम्बर राष्ट्रीय हाइकु दिवस के रूप में महत्त्वपूर्ण है तो १७ अप्रैल अन्तरराष्ट्रीय हाइकु दिवस के रूप में यादगार है…

सुरकानन—

तितली पपड़ियाँ

नख में चढ़े


छतरी का चलनी…

“शहर के किसी कोने में कोई आयोजन हो आप बतौर अतिथि नज़र आ ही जाती हैं और पत्रकार होने नाते हमारी भेंट हो जाना स्वाभाविक है! पहले पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित थीं अभी साल-दर-साल नारी शक्ति पुरस्कार, मानव सेवा पुरस्कार, बालिका प्रोत्साहन पुरस्कार इत्यादि आपकी झोली में गौरवान्वित हो रहे हैं! हमारी ओर से बधाई स्वीकार करें महोदया!”

“हमारी संस्था और हम सभी के श्रम का फल मिल रहा है!”

“आपकी संस्था के अन्दर की बातें बाहर फैलने भर की देर है!”

“कैसी बातें?”

“संस्था के अन्दर में जो विद्यालय चलता है उसमें रात्रि कक्षा चलना दिखाया जाता है लेकिन कभी-कभी महीने में दो-तीन दिन अध्यापकों को सुबह में बुलाकर शाम तक रखा जाता है।आपके संस्था में और बाहर के दो चेहरे हैं! कर्मचारियों और बच्चिओं पर तानाशाही वाला माहौल है। वाणी में कठोरता से : अटकती हैं बोलने में! बहुत - बहुत अहंकारी है! हवा में उड़ती रहती है।

 उन्नति के कार्यक्रम में नौ-दस लाख का बिल दिखलाया गया।और इस बिल का भुगतान तीन-चार जगहों से करवाया गया! यानी मुश्किल से लगभग तीन-चार लाख का खर्चा हुआ मिला लगभग तीस-चालीस लाख मिला!”

“प्रवाद है सब! परखने वाली दुनिया में समझने वाले कम मिलते हैं!”

“हँसना और रोना समानांतर में असरदार नहीं होते!”

Wednesday, 3 April 2024

नेति नेति —अन्त नहीं है, अन्त नहीं है!

नेति नेति {न इति न इति} एक संस्कृत वाक्य है जिसका अर्थ है 'यह नहीं, यह नहीं' या 'यही नहीं, वही नहीं' या 'अन्त नहीं है, अन्त नहीं है' या "न यह, न वह"

“मुझे किसी दिन सुबह में बेहद ज़रूरी रहता है तुम्हारी सहायता की और जल्दी आने के लिए कहती हूँ तो दस बहाने बनाती हो! आज इतनी सुबह कैसे काम करने आ गयी?”

“अरे! अभनी एक काम नहीं हुआ न। बहुते बेल बजाने, किवाड़ थपथपाने के बाद भी डाकदर साब दरवाजा नहीं खोले। गाढ़ी नींदवा में होंगे।”

“क्या उनके साथ और कोई नहीं रहता है?”

“उनकी पत्नी दूसरे शहर नौकरी करती हैं अउरी बचवा सब हास्टल में रहता है। छुटटी-छपाटी में आवेगा सब।”

“तो तुम अकेले रहने वाले मर्द के घर में काम करने के लिए कैसे तैयार हुई?”

“डाकदर साब बड़े भले मानुष हैं। दरवाजा खोलने के बाद पलट के नहीं देखते हैं। कुछ नहीं बोलते-बताते हैं। मैं अपने मन से काम कर देती हूँ! काम करना ही क्या रहता है… बस रोटी भुजिईया बनाना रहता है रोज के रोज।”

“यह तो तुम जानों…! ऊँच-नीच होने वाले इस ज़माने में किस पर कितना विश्वास करना है!”

“पाँचों उँगली एक बराबर त नहीं ही होता है न?”

“कानाफूसी की चिंगारी लुपलुपाते भी…, सदा यह याद रखना कि तुम अपने पति से अनुमति लेकर सहायिका का काम करने नहीं निकली हो! ना तो तुम अग्नि परीक्षा में बचने वाली और ना तुम्हारे लिए धरती फटने वाली!”

Friday, 29 March 2024

अनुभव के क्षण : हाइकु —


मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच {म ग स म -गैर सरकारी संगठन /अन्तरराष्ट्रीय संस्था के} द्वारा आयोजित अखिल भारतीय ग्रामीण साहित्य महोत्सव (५ मार्च से १३ मार्च २०२४) में १२-१३ मार्च को शामिल होने का मौक़ा मिला! मेरे एक नाम में रूप अनेक थे 

—देश-विदेश की लगभग १०४५ संस्थाओं में से तृतीय स्थान प्राप्त करने वाली लेख्य-मंजूषा की अध्यक्ष (भीड़ में तन्हा : कहे के त सब केहू आपन आपन कहावे वाला के बा, सुखवा त सब केहू बाँटे दुखवा बटावे वाला के बा...) सम्मान ग्रहण कर्त्ता

—मगसम:१७९९९/२०२१, पटना की संयोजक

—लेख्य-मंजूषा संस्था प्रायोजक थी तो उसकी प्रतिनिधित्वकर्त्ता

—लघुकथा-हाइकु की अध्येता

“जैसा हम जानते हैं कि हाइकु तीन पंक्ति और ५-७-५ वर्ण की रचना,”

“जापानी कविता है..”

“जापानी और कविता इन दोनों होने वाली बातों से मेरी सहमति नहीं है…! हम यह क्यों ना माने कि वेद में ५ वर्णी और ७ वर्णी ऋचाएँ होती हैं! बौद्ध धर्म के संग वेद भी भ्रमण के दौरान जापान गया हो और सन् १९१६ में रवीन्द्रनाथ टैगोर के संग घर वापसी हुई हो! समय के साथ रूप बदलना स्वाभाविक है और आज सन् २०२४ में भी प्रवासी कविता क्यों कहलाए! 

—हाइकु पर हाइगा बनता है जिसमें कल्पना की कोई गुंजाइश नहीं और बिना कल्पना कविता कैसी…!

उदाहरणार्थ प्रस्तुत है—


Monday, 25 March 2024

शिकस्त की शिकस्तगी


“नभ की उदासी काले मेघ में झलकता है ताई जी! आपको मनु की सूरत देखकर उसके दर्द का पता नहीं चल रहा है?”

“तुम ऐसा कैसे कह सकते हो, मैं माँ होकर अपने बेटे का दर्द नहीं देख पा रही हूँ! हनुमान जी की तरह मेरा कलेजा फटे तब न तुमलोगों को विश्वास होगा…!”

“माँ! फिर आप रंगोत्सव की तैयारी क्यों नहीं करने दे रही हैं?”

“तुम्हारे दादा को गुजरे महीना नहीं लगा और तुम्हारे पिता का श्राद्धकर्म तीन दिन में कर दिया गया तब न, अभी पंद्रह दिन…,”

“दादा की अर्थी बारात की तरह श्मशान तक गयी। सभी चर्चाकर रहे थे कि ऐसी मौत ख़ुशियाँ देती हैं। और मेरे पिता की आत्महत्या पर भी चर्चा चल रही थी कि धरती का बोझ मिटा…! घर-परिवार से समाज तक सभी शराब के नशे में उनके अवगुणों के प्रदर्शन से त्रस्त थे।सरकारी शराबबन्दी बस कागज़ तक क़ैद है।”

“बेटा? लोक-लिहाज़…,”

“माँ! महान बनने के चक्कर में स्त्रियाँ स्वयं की बलि चढ़ाती रहती हैं!”

“अच्छा! अच्छा। जाओ चाची से कहना रात के भोजन में कढ़ी-बड़ी और चावल बनवा ले और बिना नमक वाली पाँच बड़ी बना लेगी होलिका-दहन में डलवाने के लिए।”

होली की शुभकामनाएँ

रंगों की झड़ी–
खिड़की से झलके या ड्योढ़ी के उस पार
टेसू झकोरा


Friday, 22 March 2024

बिहारी की कढ़ी-बड़ी


 ‘कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी’ के तर्ज़ पर बिहार के किसी-किसी इलाक़े {मेरे मायके में नहीं बनता है लेकिन ससुराल में बनाया जाता रहा है} में दीवाली की शाम और होली के एक दिन पहले होलिका जलाने की शाम में चावल और बड़ी-कढ़ी बनाने का रिवाज़ है। सभी के शरीर से उतरे उबटन के संग बिना नमक डाले पाँच बड़ी जलते होलिका में डाली भी जाती है। यूँ तो बड़ी-कढ़ी गर्मी-बरसात भर भी बनती रहती है, लेकिन सावन में कढ़ी का सेवन करना वर्जित माना जाता है।

कुछ वर्षों पहले एक होलिका जलने वाली शाम के नाश्ते में बड़ी ही बना देने के लिए घर में जितना बेसन था सबको घोलकर मेरी बड़ी देवरानी छानने लगी और मेरे बेटे तथा अपने बेटे को ज़िद कर नाश्ता करने के लिए बैठा दी।

  (मुझे एक बेटा और देवरानी को दो बच्चे, उसका बेटा, मेरे बेटे से डेढ़ साल बड़ा तो बेटी लगभग साढ़े तेरह महीने छोटी। तीनों बच्चे एक संग पले थे। दोनों बेटों में गहरी दोस्ती रही। हमारा संयुक्त परिवार था तब सास-ससुर भी थे…। होली-छठ में सबका जुटान होना सुनिश्चित था।) 

बड़ी देवरानी बड़ी छानती जा रही थी और भेजती जा रही थी… बड़ी का घोल समाप्त हो गया तो वो हाथ धोकर चौके से बाहर आ गयी और देखा कि दोनों बेटे ख़ाली तश्तरी लेकर बड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं…! बड़ी की जगह बड़ी देवरानी को देखकर दोनों के बेटे हँस पड़े।

ससुर जी, मेरे पति, दोनों देवर, देवर की बेटी, सासु जी, छोटी देवरानी, उसका बेटा और मैं तो बड़ी चखे भी नहीं हैं…

“ऐसा कैसे हो सकता है?” देवरानी लगभग चीख ही पड़ी। वो बेहद स्तब्ध थी!

“अगली बार से हमें ज़िद करके कोई ऐसी चीज खाने के लिए मजबूर नहीं कीजिएगा चाची-माँ जो हमें पसंद ना हो! हम बड़ों की बात टालकर अवज्ञा नहीं कर पाते हैं और मेरी माँ कहती हैं कि ना कहना अनाज का भी अपमान होता है! आख़िर ज़िद करने वाले बड़ों को सिखलाया कैसे जाये।”

“कढ़ी में आयरन की भरपूर मात्रा होती है.. इसके सेवन से शरीर में हीमोग्लोबिन को बढ़ाने में मदद मिलती है और शरीर भी स्वस्थ रहता है.. कढ़ी बहुत लाभदायक होती है.. इसका सेवन त्वचा संबंधित समस्याओं से निजात दिलाने में मदद करता है…,” मेरी बात पूरी भी नहीं हो सकी,

“बस! बस बस! माँ! बेसन लाने किसी को भेजो! सभी प्रतीक्षा में हैं! और आप कहती हैं ‘अप रूपी भोजन, पर रूपी शृंगार’ हमें उसका हलवा बेहद पसंद है…!” 

“धत्त तेरे की। दोनों बाबूलोग मेरे उम्मीद पर पानी फेर दिए। मैं चुपके से आज कढ़ी-बड़ी बनाना सीख लेती लेकिन…,” छोटी देवरानी ने कहा।

“हा! हा! छोटी मम्मी आपका तो अभिमन्यु सा हाल हो गया…,” बड़ी देवरानी की बेटी ने कहा।

“दीदी! आप हमें कढ़ी-बड़ी बनाना बता दीजिए! मेरी बनायी कढ़ी फट जाती है तो बड़ी कड़ी रह जाती है!” छोटी देवरानी ने कहा।

“खट्टी कढ़ी पसन्द आती है देवर जी को। दही को खट्टा बनाने के लिए जमे हुए दही को कुछ घंटों के लिए कमरे के तापमान पर रख देना चाहिए। कढ़ी बनाने के लिए कमरे के तापमान पर दही का उपयोग करना चाहिए। बस उसे 3-4 घंटे पहले फ्रिज से निकाल लो ताकि यह ठंडा न हो… यदि आप ठंडे दही का उपयोग करते हैं, तो गर्म करने पर वह फट जाएगा और दानेदार हो जाएगा।

बड़ी कड़ी ना हो उसके लिए बेसन ताज़ा हो  और खूब फेंटा गया हो तथा घोल ना बहुत पतला हो और ना बहुत गाढ़ा हो। घोल पूरी तरह से फेटना हो गया है या नहीं इसको जाँचने के लिए किसी गिलास या कटोरी में पानी लेकर उसमें एक बड़ी खोटने पर पता चल जाता है। अगर फेटना हो गया है तो बड़ी पानी के ऊपरी सतह पर आ जाएगी और अगर फेटना नहीं हुआ है तो पानी के निचली सतह पर रह जाएगा । घोल में नमक बड़ी छानते समय मिलाना चाहिए।

एक टोटका तुम्हें बताऊँ ‘बेसन में पानी डालने के बाद जब उँगलियों को डालकर दाहिने तरफ चलाओ तो फिर उसे वापिस उलटा बायीं ओर ना करना।”

“सब डायरी में लिख ही लेती हूँ, चक्रव्यूह भेदन के समय भूल ना जाऊँ…” खिलखिलाते हुए छोटी देवरानी ने कहा।

लिख लो बड़ी बनाने के लिए : सब जुटें तो मन से बनाना यूँ ही अच्छा बनेगा…

सामग्री

1 कप बेसन

1/4 चम्मच हल्दी

1/8 चम्मच हींग

चुटकी भर खाने वाला सोडा

स्वादानुसार नमक

आवश्यकतानुसार पानी

आवश्यकतानुसार तलने के लिए तेल


कढ़ी के लिए:

1 कप दही

1/2 कप बेसन

1/2 चम्मच हल्दी

1 चम्मच लाल मिर्च पाउडर

आवश्यकतानुसार पानी

2 चम्मच तेल

स्वादानुसार नमक

1/2 चम्मच सरसों के दाने

1/2 चम्मच जीरा

दो-तेजपत्ता या 10-12 करी पत्ते

1/2 चम्मच लाल मिर्च पाउडर

1 सूखी लाल मिर्च

-तले बड़ियों को एक बर्त्तन में रखे पानी में डालकर 5 मिनट भिगोकर पानी से बाहर निकाल देती रहना।

-कढ़ी को लगातार चलाती रहना… (उबाल आ जाने से रिश्ते फट जाते हैं…) जिससे तुम्हारे श्रम में बचत होगी..”

“दादा अक्सर कहते रहते हैं ‘गिथिन के बड़ी’ वो क्या है?” 

“उसके बारे में फिर कभी…”

Wednesday, 20 March 2024

आसमान में सुराख


“यह समीक्षाओं की छ खण्ड वाली पुस्तकें हैं जिनका प्रकाशन बेहद कम मूल्य में किया गया है!” वरिष्ठ अतिथिगण लोकार्पित पुस्तकों के संग तस्वीर उतरवा रहे थे और मंच संचालक अबीर से लेखक के चेहरे पर इंद्रधनुष बना रहे थे…! मौक़ा था राष्ट्रीय ग्रामीण साहित्य महोत्सव में प्रतिभागी लेखक के पुस्तक लोकार्पण का…।

“लेखक महोदय अंजनेय भक्त हैं! अधिकांश समय मन्दिर में गुज़ारते हैं और मन्दिर के चढ़ावे में जो राशि मिलती है उसको ऐसी पुस्तकों को प्रकाशित करवाने हेतु प्रकाशक को सौंप देते हैं…?” मंच संचालक के इतना कहते ही पूरे सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट से विस्फारित आँखें वापिस लौटने लगीं!

“इन पुस्तकों को क्या कीजिएगा?” दर्शक दीर्घा से किसी ने प्रश्न किया!

“बाँट दो।” लेखक ने कहा।

“क्या?” किनकी-किनकी आवाज़ गूँजी पता नहीं चला लेकिन उसके बाद दर्शक दीर्घा में सुई गिरती तो शोर मचा देती। सभी पलकें गिराना भूल गए थे। सबका मुख इतना खुला था कि भान हो रहा हो ऐसे ही किसी के मुख में हनु सूक्ष्म रूप में टहल आये होंगे…।

थोड़ी देर में ही सभी पुस्तकों के आधे मूल्य की राशि पुनः लेखक के हिस्से में थीं। अध्यात्म के जुगनुओं ने सभागार से मंच तक कब्जा कर लिया था।


यह चयनित होना आदरणीय सुधीर सिंह जी मंच संचालक और आदरणीय गिरीश ओझा जी लेखक को समर्पित

Sunday, 17 March 2024

दुर्वह


 पहले सिर्फ झाड़ू-पोछा करती थी तो महीने में दो-चार दिन नागा कर लिया करती थी। अब अधिकतर घरों में खाना बनाने का भी हो गया है तो..” सहायिका ने कहा।

“दो-चार दिन कि छ-आठ दिन..!” रूमा ने व्यंग्य से कहा।

“इस बार एक मुश्त की छुट्टी छठ में चार-पाँच दिनों की…,” सहायिका दबे ज़ुबान में भी बात पूरी नहीं कर सकी।

“अरे तू छठ किसलिए करती है तुझे कौन सा बेटा है! एक बेटी ही तो..,” रूमा ने गुर्राते हुए कहा।

“जी मालकिन चाची! उसी बेटी के लिए छठ करती हूँ… बड़े जप-तप से माँगल बेटी है। बेटी को किसी चीज की कमी ना हो, अच्छी पढ़ाई कर सके, इसलिए आपलोगों के घरों में चाकरी-काम करती हूँ…!” सहायिका के स्वर में मान झलक रहा था।

“एक दिन मैं अपनी बेटी को लेकर काम पर आ गयी थी। मेरी बेटी के विद्यालय में अभिभावक-अध्यापक की गोष्ठी थी। मेरी बेटी विद्यालय की पोशाक में थी। मालकीन माँ ने उस दिन मुझसे काम नहीं लिया और समझाया, बेटी को अपने काम के घरों में लेकर मत आया करो…!” सहायिका ने पुनः कहा।

“बेटी दूसरे के घर चली जाएगी..,” रूमा की व्यंग्य भरी बातें सहायिका को नागफनी पर चढ़ा रही थी।

“तो क्या हो जाएगा.. वक्त पड़ने पर अपनी माँ की तरह काम आएगी। क्या आप जानती हैं हमारी सहायिका तीन बहन छ भाई है…! जब इसके पिता गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे तो उन्हें यही अपने पास रख लाखों खर्च कर इलाज़ करवायी है। कितना भी पौ फट जाये हमारी ही आँखें नहीं खुलती है!” सहायिका को उबारते हुए पुष्पा ने रूमा को चेताया।

Thursday, 29 February 2024

वामन का चाँद छूना : २९ फरवरी २०२४

“स्तब्ध हूँ! यह पोशाक विदेशी दुल्हन का होता है जो यह सिर्फ़ एक तस्वीर खिंचवाने के लिए शौक़ से पहन ली हैं!”

“तो क्या हो गया! हिर्स में पहन ली!”

“हुआ कुछ नहीं… अभी उनके माथे से सिन्दूर पोछाए हुआ ही कितना दिन है! क्या ज़रा भी मलाल झलकता है आपको? भगवान ना करे किसी पर ऐसा दिन आए लेकिन आ गया तो थोड़ा तो लोक लिहाज़ का ख़्याल कर आज़ाद होने के दिखावे से परहेज़ किया जाना चाहिए कि नहीं?”

“किस लोक लिहाज़ की चर्चा कर रही हैं! उसी लोक लिहाज़ की जिसके कारण आप अपने को ड्योढ़ी के अन्दर क़ैद कर ली हैं! व्रत त्योहार में भी पैर हाथ नहीं रंगती हैं!”

“मैं तो किसी आयोजन में नहीं जा पाती हूँ!  हित नात वाले लगातार फोन पर खोज-ख़बर लेते हैं…! मेरी देवरानी मुझसे बहुत छोटी है वो भी मुझसे ज़्यादा दयनीय स्थिति में समय गुज़ार रही है!”

“अपने हित नात वालों के लिए उनका हद तय कर दें! आप से उम्मीद की जाती है कि अपनी देवरानी के लिए आप बड़ी बहन बन दोनों के राह के काँटें हटा सकती हैं!”


Sunday, 4 February 2024

मानी पत्थर

 “दो-चार दिनों में अपार्टमेंट निर्माता से मिलने जाना है। वो बता देगा कि कब फ्लैट हमारे हाथों में सौंपेगा! आपलोग फ्लैट देख भी लीजिएगा और वहीं से हमलोग ननद के घर रात में रुककर, दूसरे दिन वापस आएँगे..!” देवरानी ने कहा।

“तुमलोग चली जाना, मैं नहीं जा सकूँगी।” जेठानी ने कहा।

“क्या आप हमारा घर देखना नहीं चाहेंगी?” देवर ने पूछा।

“देखूँगी न! अवश्य देखूँगी जब आपलोग उस घर में व्यवस्थित हो जाएँगे। आ जाऊँगी किसी दिन आपके घर से मिलने।” भाभी ने कहा।

“इस बार तुम्हारा चलना अलग बात होती…।” जेठानी के पति ने कहा।

“तब क्या अलग बात नहीं थी जब आपने फ्लैट खरीदा था। ख़रीदने के पहले कम से कम दस फ्लैट को जाँच-परखकर, मोल-भाव हुआ होगा। नहीं-नहीं पहले तो योजना बनी होगी; उसके पहले भी रक़म जमा की गयी होगी। किसी एक पड़ाव पर मेरे कानों तक बात पहुँची होती।” जेठानी ने कहा।

“लगभग बीस-पच्चीस साल पुरानी बातों का क्या बदला लेना चाह रही हो?” जेठानी के पति ने पूछा।

“बदला! किस-किस बात का बदला लूँ और क्या उस पल का बदला लिया जा सकता है? आपके संग आपसे मिले सारे रिश्तों ने मेरे सम्मुख केवल अपनी-अपनी माँग रखी। और मैं अधिकार का बिना कोंपल उगाये अपना संपूर्ण अस्तित्व कर्त्तव्यों के पीछे विलीन कर सारी उम्र ख़र्च कर गयी। आपने अपने मित्र और उनकी पत्नी के संग बड़े से फ्रेम में लगी अपनी जो तस्वीर को अलमीरा में डाल रखा है। आप दोनों मित्र एक दिन ही सेवा निवृत हुए थे। मैं अपने बुलावे का देर रात तक प्रतीक्षा करती रही…।” जेठानी ने कहा।

छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों ...