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देवनागरी में लिखें

Friday, 8 February 2013

Ego है तो Go ....

बेटे के facebook के profile में 1500 friend हैं ....

उससे पुछी :-
 इतने को Add क्यूँ करते हो .... ?
 कैसे Manage करते हो .... ?
इतने सारे Friend हैं .... ?

तो वो बोला .... :-
जो मुझे जानते हैं ....
या
जानना चाहते हैं ....
मैं जिसे जानता हूँ ....
या
जानना चाहता हूँ ....
सब से जुड़ता जाता हूँ ....
घर - परिवार - रिश्तेदार हैं ....
School - College था ....
Office - Institution है ....
देश - विदेश है ....
Train - Aeroplane में मिलना हो जाता है ....
वे जुड़ जाते हैं ....
कभी-कभी तो ऐसा होता है , कि दो आपस के दुश्मन मेरे Profile में भी होगें ....
दोनों मेरे अच्छे दोस्त भी हैं ....

Q.तुम्हें फर्क नहीं पड़ता .... ?

Ans.क्यूँ ....?
मुझे फर्क पड़ना चाहिए .... ?

Q.कभी कभी  उलझन नहीं होती .... ?

Ans.एक , दूसरे के प्रति क्या सोचते हैं ....
वो दोनों अपने निजी जिंदगी क्या करते हैं , उससे मुझे क्या मतलब ....
दोनों मेरे अपने हैं .... दोनों अगर मुझे ये कहें उसका साथ छोड़ दो तो मुझे तो दोनों को अपनी दोस्ती से बाहर का रास्ता दिखलाना होगा .... और जहां तक सही और गलत का सवाल है , तो ..... वे दोनों एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं ये उनका निजी मामला है  .... मैं तो ये देखता हूँ कि वे दोनों मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं  .... मेरे जिंदगी में कौन रहेगा या कौन नहीं रहेगा या किसकि कितनी महत्व हैं या रहनी चाहिये ये तो मेरा निजी मामला है .... किसी के साथ काम करने से वो दोस्त नहीं हो जाता और कोई विदेश में है , तो उसका महत्व कम नहीं हो जाता .... किसी को profile में Add करता हूँ और कोई ऐसा मेरा बहुत करीबी जो मुझे पहले से जानता है , उस आने वाले के कारण मुझे Unfriend कर देता भी है , तो I Do't care .... वो  उसकी मर्ज़ी होगी ....
उसे मेरी दोस्ती ज्यादा महत्वपूर्ण है या उसका Ego ....
Ego है तो Go ....
Ego आंख की किरकिरी की तरह है .... बिना उसे साफ किये आप साफ साफ नहीं देख सकते ....
( दो ही चीजें अनन्त हैं – ब्रह्माण्ड और मनुष्य की मूर्खता ....
 पहले के बारे में मैं पक्की तरह से नहीं कह सकता .... ~ अलबर्ट आइन्स्टीन ~ )

अधिकतर लोगों को एहसास ही नहीं होता है कि जब वे किसी दुसरे को दोषी ठहराते हैं , तो वे खुद को कितनी बड़ी  गलफहमी में जकड़ते हुये अपनी शक्तियों को खो देते हैं ..... !!


 

16 comments:

  1. सटीक बात....
    आजकल का युवावर्ग साफ़ सुथरी सोच रखता है न दी???
    अच्छा लगता है!!

    सादर
    अनु

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  2. sahi mey.....kuch mamlo main shayad aajkal yeh spasht sooch hi sahi hai....

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  3. बड़ी अच्छी सोच है .....
    शुभकामनायें!

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  4. हर उम्र के अपने विचार होते हैं,परिपक्वता उम्र के अनुसार बदलती है - सब नज़रिया सही है

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  5. Ego आंख की किरकिरी की तरह है .... बिना उसे साफ किये आप साफ साफ नहीं देख सकते ....

    सार्थक और स्पष्ट ...

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  6. बेटे का फेसबुक अकाउंट को बहाना बनाकर बहुत कुछ कह डाला - अच्छा लगा

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  7. बहाना ही सही लेकिन बात सबसे कह तो दी,,,जानकर अच्छा लगा,,,

    RECENT POST: रिश्वत लिए वगैर...

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  8. बात तो सही है और विचारणीय भी.....

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  9. Ego hai to Go...Very True!!!
    Agar kisi naye riste k judne se purana apne aap chala jaye to yeh purane ki apni soch aur samajh hai. Mere khayal se sabhi rishto ka apna ek mahatva hota hai. Naye rishte banane se purane rishte tut te nahi, agar esa hota to kisi ghar main n Koi Bahu aaye n hi Damaad. ..

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  10. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल रविवार 10-फरवरी-13 को चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है.

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  11. सारगर्भित बात कही है ... बढ़िया प्रस्तुति

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  12. बहुत प्रैक्टिकल बात कही है विभा जी...अच्छी प्रस्तुति!

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  13. आजकल के येही विचार है बस B पर्क्टिकल रहना ही चाहते हैं
    मेरी नई रचना
    प्रेमविरह
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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  14. आज के युवा की समझ, अच्छा है, ईगो तो गो... विचारपूर्ण लेखन, शुभकामनाएँ.

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  15. बेटे और फेस बुक को माध्यम बना बड़ा ही सार गर्भित बातें कहीं आपने।

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