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देवनागरी में लिखें

Tuesday, 30 April 2019

"मृगतृष्णा"



"अरे भाई मंगरु! सुनने में आया है कि तूने अपनी फसल लगी खेत गिरवी रख.. गिरवी रखी कि बेच ही दी ? ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी..? एक बार तुमने मुझसे बात करनी भी उचित नहीं समझी?"

         "थोड़ी राहत तो दे मेरे दोस्त सोहन ! एक ही सांस में कितनी सवाल कर गया.. वक़्त ने इतना भी समय नहीं दिया या यूँ कहें मौका ही नहीं दिया कि तुम्हारे पास आकर सलाह कर सकूँ... आनन-फानन में सब करना पड़ा । बेटा को दुबई भेजने के लिए दलाल मिला। दलाल लाने वाले मेरे सगे थे । वे ही खेत के ग्राहक भी लाये..। कहीं भी शक के अंदेशा की गुंजाइश ही नहीं थी..!"
     "सुन मेरे दोस्त! बहुत पुरानी बात है... एक वैद्य, अपने सहयोगी के संग एक गाँव से होकर गुजर रहा था। गाँव में चारों ओर हरियाली फैली हुई थी.. करेले की लत्तर करैले से भरी, नींबू का पेड़ नींबू से भरा.. देखकर दोनों बहुत खुश हुए.. वैद्य को अपने लिए निवास स्थल की जरूरत थी वो अपने सहयोगी से बोला कि "यहीं इसी गाँव में हम ठहर जाते हैं।"
             "मुझे नहीं लगता कि यहाँ के लोगों को किसी वैद्य की जरूरत होती होगी, यहाँ स्वस्थ्य रहने का समुचित साधन मौजूद है।"
       "मत भूलो! किसी भी सिक्के के दो पहलू होते हैं। जहाँ दिन होता है वहीं रात भी होती है। जितने स्वास्थ्यप्रद चीजें होती हैं उनके अंदर हानिकारक चीजें भी मौजूद हैं।" कहानी सुनाकर सोहन ने मंगरु से कहा,"मेरी बात तुम्हारे समझ में कुछ आई क्या?"
                                                "ओह्ह! तुम्हारी बातों से सहमत हूँ। अब क्या करूँ!"
       "दुबई हमारे लिए विदेश होने के कारण लालच में फँसने का जाल और जो वो तुम्हारे सगे हैं , तुम्हें ज्यादा पैसे के लालच में फँसा मृगतृष्णा में उलझा डाला।"

Saturday, 27 April 2019

"मतदान जन की शान"



तन कहीं मन कहीं आत्मा कहीं कर्मा कहीं
जीवन उन्नयन का लक्ष्य जन्मा वहीं
जनतांत्रिक परंपराओं का बना मसाला
नैतिकताओं का ढ़कोसला जनसेवा में घोटाला
रीत पुरानी जुबान फिसले मैं-मैं की शैली
हित निराली जनता की थाती बंट जाती रैली
छाती पर मूंग दला बरगद के खोखर पीपल अनमेल
कैसे , क्या, कब के फेर में पड़े जनता चुने अकाशबेल
तानाशाही प्रवृतियां पल्लिवत बने विष बेल
लोकतंत्र का महापर्व अधिकार भी कर्तव्य भी मतदान
घनघोर निराशा के भंवर में फंसे जन की शान
किसी दल में नाव जो बिना पतवार के बह रही हो
किसी दल में  जातिवादी , पल में तोला  पल में माशा सह रही हो
हर घपला जनादेश का 'मति भ्रम' सत्ता के नशे में चूर
जन सदमे की सूरत में उन्हें नहीं चाहिए नेता क्रूर

Friday, 26 April 2019

मनु-देव


"यह क्या है दादी.., देवी सातों बहिनी भाई भैरव के साथ नीम के छाँव तले और महात्मा गाँधी जी मंदिर में..। एक ही स्थान पर... ऐसा क्यों?" दादी गाँधी जी की मूर्ति के आगे भी पुड़ी-गुड़-चना चढ़ा रही थी जिसे देखकर कौतुहलवश पुष्प ने पूछा..।
"देवी-स्थान को मंदिर के अंदर कोई नहीं कर सकता है बच्चे! शापित है यह स्थान... जिसने कभी भी मंदिर बनवाने का शुरू किया , वह जिंदा नहीं रह सका... और गाँधी बाबा देव-पुरुष रहे...! आजादी दिलवाने में सहयोगी रहे, इसलिए उनको मंदिर में स्थापित किया गया... उस समय तो पुष्प मुस्कुराता चुप्प रह गया.. क्योंकि गाँव के अनपढ़ सरल-सहज इंसानों को क्या समझाता... बच्चे की बात समझता भी कौन... लेकिन आज करीब पचास सालों के बाद उसी स्थिति में जनता को पाकर पुरानी बातें याद कर रहा है... और समझ रहा है , "क्या फर्क पड़ रहा है, निर्भया के माता-पिता मतदान नहीं करने वाले हैं..!"

Friday, 19 April 2019

समाधान


चित्र प्रदर्शनी के दर्शक-दीर्घा में आगुन्तकों की नजर एक विशेष चित्र पर अटक जाती और वह वाहः कर उठते हैं... अद्वितीय चित्र, चित्रकार को खोजने पर सभी को विवश कर रहा था... चित्रकार श्यामा और उसका भाई सतीश विह्वल थे..., शीशे में अपनी शक्ल देख बिल्ली एक तस्वीर बनाती है जो शेरनी की हो जाती है... अलौकिक तस्वीर जीवंत कहानी होती है...
"भैया आपसे एक बात कहनी है..,"
"हाँ! हाँ... कहो! छोटी बहन को बड़े भाई से कुछ कहने में हिचक क्यों होने लगा... बेटियाँ पराई होती हैं, मैं नहीं मानता..।"
"शादी के बहुत वर्षों के बाद कुछ कहना थोड़ा अटपटा लग सकता है... आप मेरे घर आया कीजिये...!"
"अरे! ऐसी क्या बात हो गई.. ? बेहिचक स्पष्ट बात बताओ..!"
"कुछ खास नहीं... बस.. आप मेरे घर आया कीजिये!"
"यह कौन सी बड़ी बात है.. मैं तो संकोचवश नहीं आ पाता था...।
भाई का बहन के शहर में अक्सर आना-जाना होता ही था.. जहाँ पहले अन्य रिश्तेदारों के घर ठहरता वहाँ अब बहन के घर ठहरने लगा... भाई व्यापारी और साहित्यकार था... लेन-देन और साहित्यिक गोष्ठियों में अपने बहनोई को भी शामिल रखता... अपने ही घर में दाई की हैसियत से रहने वाली बहन की स्थिति बदलती गई...

Wednesday, 17 April 2019

आप बदलो-जग बदलेगा



 अस्सी-पचासी वर्ष का रामधनी जब-जब गाँव के युवकों को असमाजिक कार्य करते हुए देखता है तो उसे भीतर से बहुत दुःख होता है कि कभी यही गाँव नैतिकता के सिर मौर के रूप में जाना जाता था और आज...। उसे समझ में नहीं आता है कि वह क्या करे? इस उम्र में जहाँ हाथ-पैर साथ नहीं दे रहे...। जिन्हें यानी राजनीतिक दलों के नेताओं को इनका नेतृत्व करना चाहिए वो भी तो...।
        वो स्मरण करता है कि प्रत्येक राजनीतिक दल जब चुनाव आता है तो तरह-तरह के झूठे वायदे करते हैं... युवकों को सब्ज-बाग दिखलाते हैं कि उनकी पार्टी सत्ता में आयेगी तो हर हाथ को काम तथा हर खेत को पानी मिलेगा... गरीबी का नामोंनिशान नहीं रहेगा... किन्तु जैसे ही उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो सिवा अपने घर-पेट भरने के किसी की भी स्मृति नहीं आती...।
    कुछ सोच-विचारकर वह गाँव के हर घर के विषय में सोचता हुआ और उसके समझ में जो लोग वास्तव में बुद्धिजीवी हैं उन्हें इकट्ठा करता है और कहता है,"अपने गाँव के युवकों की स्थिति को देख रहे हो?"
  "हमलोग क्या कर सकते हैं?"
"आप ही लोग तो कर सकते हैं... , अब समय आ गया है कि बुद्धिजीवियों को पुनः राजनीति में आना चाहिए। *मतदान करने की प्रतिशत ज्यादा से ज्यादा हो।"*
  "इस दलदल में कौन जाएगा ?"
"इसी सोच ने तो इस गाँव क्या इस देश की यह हालत कर दी है , आपलोग आगे बढिये... इस दलदल को साफ कीजिए... यह सही है इसमें देर लगेगी किन्तु साफ अवश्य हो जाएगी... नहीं तो आपलोग सोचें आपके जो बच्चे बड़े हो रहे हैं... उनका क्या होगा?"
"बच्चे बड़े हो रहे हैं... उनका क्या होगा?" यह वाक्य कानों में पड़ते सब भीतर तक हिल जाते हैं... और उन्हें लगने लगता है... हाँ
! रामधनी बाबा की बातों में दम है... गाँव और देश के उज्ज्वल भविष्य हेतु उन्हें जो भी संघर्ष करना होगा, वे लोग जरूर करेंगे।
एक संकल्प के साथ बुद्धिजीवी चले जाते हैं किन्तु रामधनी के आँखों मे चमक के साथ आने वाली युवा पीढ़ी के चेहरे खिले हुए दिखने लगते हैं।

Saturday, 13 April 2019

समय का न्याय


वक़्त करवट बदलता जरूर ही है … तालियों की गड़गड़ाहट और वन्स मोर-वन्स मोर का शोर साबित कर रहा था कि अन्य प्रतिभागियों-संगियों की तरह उसकी भी रचना और प्रस्तुतितीकरण से दर्शक दीर्घा में बैठे साहित्य प्रेमी आनन्दित हो रहे थे … सत्तरवेँ स्थापना दिवस के अवसर पर कंपनी द्वारा आयोजित काव्योत्सव में सभी झूम रहे थे और मैं अमलतास की सौंध लिए अतीत के गलियारे में टहल रही थी … 
“मेरी संस्था, देश के कई राज्यों में अपना नाम कमा रही है अपने कामों की वजह से लेकिन मेरी हार्दिक इच्छा है कि आपके शहर में भी उसको लोग जान जाएं और वहाँ पहुँचें बनाने के लिए आप मेरी मदद कर सकते हैं और पूरी उम्मीद है कि आप मेरी बातों का मान रखेंगी ..। 
“जी! कोशिश करता हूँ …, देखती हूँ क्या कर रहा हूँ ..!” 
लगातार प्रयास से तारीख पड़ते गए और टलते गए … इस क्रम में दो-तीन साल के बाद वह शुभ दिन आया जब उनकी संस्था का कार्यक्रम मेरे शहर में होने वाला था … काव्योत्सव के लिए सूची बनी … मंच संचालन के के लिए दो नाम मेरे द्वारा प्रस्तावित थे उन्हें विश्वास भी था लेकिन कार्यक्रम के दो दिन पहले उनका शर्त आया कि “मंच संचालन के लिए गठबंधन शुल्क जमा करवा दो ..।” 
“क्यों? यह तो पहले से तय नहीं था ..
“आप समझ नहीं रहे हैं! जो सम्मान दिया जा रहा है या जिसे मंच संचालन दिया गया है, वे शुल्क जमा कर चुके होंगे …।” 
“मैं जो समझ रहा हूँ वह तुम्हें समझा दूँ कि हमेशा जयचंदों की वजह से मूल्यों की हार होती है …। खैर! कोई बात नहीं ..।” 
तय तिथि पर सफल कार्यक्रम के बाद निश्चिनता की लंबी सांस लेते हुए उनका पहला सवाल था कि “वह कार्यक्रम में आई! मंच संचालन नहीं मिल रहा है ..!” अपने शब्दों को जितना विषैला बना सकते थे उससे ज्यादा विष उनके भैंगे आँखों में था … हमारे बीच थंठों का वन पसर गया … स्वर्ण की लंका राख होने से जब रावण ही सीख नहीं पाए पाए .. सामान्य मनु ज्ञान नहीं ले पाते हैं तो आश्चर्य नहीं होता है …

Friday, 12 April 2019

माँ



सन् 1972 की बात है मेरे पापा का तबादला सहरसा से सिवान हुआ था... सिवान से नजदीक गाँव में हमारा घर था.. तब गाँव में रहने से गाँव के घर के रहन-सहन का पता चला... पहली रोटी गाय को दी जाती तो एक रोटी कुत्ते को डाली जाती... दो रोटी जोड़े बैल को भी दी जाती... जब दादा जी भोजन करने बैठते तो एक बिल्ली उनके समीप आकर बैठ जाती उसके लिए दूध रोटी दादा के भोजन संग रखा जाता.. दादा खुद भी खाना खाते और बिल्ली के लिए भी दूध में भीगी रोटी का टुकड़ा डालते रहते... गाँव में कहावत है बिल्ली मनाती रहती है कि घर का मालिक अंधा हो जाये इसलिए बिल्ली पाली-पोसी नहीं जाती जबकि हमारे दादा जी के घर का नियम विपरीत दिख रहा था... वो बिल्ली और किसी के पास ना तो जाती और ना परेशान करती.. बल्कि दुबकी-सहमी रहती.. हमलोग ही उसको तंग करते रहते... कुछ महीनों के बाद एक दिन वह बिल्ली छज्जे पर रखे समानों में बैठी नजर आई, आदतन ज्यों उसके समीप जाने के लिए हम अपना पैर बढ़ाये वह गुर्रा उठी मानों शेरनी हो... जबतक वह हमपर झपटती तबतक हम पीछे खींच लिए गए.. उसका यह बदला रूप हमें भयभीत कर दिया.. बाद में हमें पता चला कि उस समय वह अपने बच्चे को जन्म दी है और उसे लगा कि उसके बच्चे को खतरा है इसलिए वो खूँखार हो उठी... बच्चे पर खतरा महसूस कर बिल्ली शेरनी बन जाती है...

Friday, 5 April 2019

"बदल जाना जाँ" और "गतिशील पल"



शिशिर की सफेद धूप स्याह निशा में बदल चुकी थी... घर के किसी कोने में रौशनी करने से सब चूक रहे थे... अस्पताल में सबकी मुट्ठी गर्म कर घर तो आ गए थे... घर में फैले शीत-सन्नाटा को दूर कैसे किया जाए सभी उलझन में थे...

"इतनी मुर्दनी क्यों छाई है? चलो समीर अपनी माँ और अपनी चाची से बात करो और सबके लिए भोजन की व्यवस्था करो...।"

"पर दादी...?" समीर अपनी दादी की बातों पर आश्चर्य चकित होता है...

"पर क्या समीर...! तुमलोग नई सदी में जी रहे हो... दुनिया बिना शादी के संग रहने के रिश्ते को स्वीकार कर रही है... समलैंगिक संबंधों को स्वीकार कर रही है... तो हम अपने घर में हुए मानव जीव को स्वीकार नहीं कर सकते...?"

"दुनिया क्या कहेगी?और उनकी दुनिया में पता चला...," समीर के दादा जी की गरजती आवाज आज फुसफुसाहट में बदली हुई थी

"टी.वी. सीरियल और फिल्मों को बेचकर धन बटोरने के लिए झूठी कहानियाँ फैलाई गई है... अगर सच बात होती तो गौरी प्रसाद समाज के मुख्य धारा से कैसे जुड़ी रहती? उन्हें क्यों नहीं...,"

"तुमसे बहस में कौन जीत सकता है...!"

*"प्राचीन तम* को हमें दूर करना ही होगा... थर्ड जेंडर भी तभी मुख्य धारा में जुड़े रह सकते हैं... उनकी जिंदगी बदल सकती है..."

निशीथ काल मिट रहा था और नई सुबह का कलरव सबको उत्साहित कर रहा था...

"गतिशील पल"

ट्रेन में दो-तीन किन्नरों ने प्रवेश किया और यात्रियों से पैसे वसूलने लगे। माँगते-माँगते वो एक बर्थ के पास आकर सब रुक गये अपने-अपने भाव मुद्राओं में ताली बजाने लगे। उस बर्थ पर पति-पत्नी और लगभग बारह/तेरह वर्ष का बच्चा भी बैठा हुआ था। किन्नरों को ताली बजाते देखकर बच्चे में भी हलचल होने लगी मानों वह भी किन्नरों की तरह ताली पीटना और लटके-झटके दिखलाना चाह रहा हो ,लेकिन किसी दबाव में (मानों उसकी माँ द्वारा बराबर दी जाने वाली हिदायतें याद हो रही हो) वह खुद पर नियंत्रण रखकर शांत रखने की कोशिश भी कर रहा हो.., लेकिन एक किन्नर को संदेह हो गया कि वह बच्चा हमारे जेंडर का है। उसने अपने अन्य साथियों से भी कहा और वो सब ताली बजा-बजा कमर लचकाने लगे। एक किन्नर जो उनके दल का मुखिया था ने उस दम्पति से कहा, "ये बच्चा हमारे बिरादरी का हमारी नई पीढ़ी है , इसे हमें दे दो।"
"माँ ने कहा,"इसे जन्म मैंने दिया है, लालन-पालन मैं कर रही हूँ, तुमलोगों को क्यों दे दूँ?"
"यही परम्परा है.. इसलिए...।"
"मैं नहीं मानती ऐसी किसी परम्परा को.. अपनी जान दे-दूँगी ,मगर अपना बच्चा किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी.. नहीं की नहीं दूँगी...।"
सब नोक-झोंक सुनकर बच्चा घबराकर रोने लगा और अपनी माँ के पीठ से चिपक गया,"मैं अपनी माँ को छोड़कर किसी के साथ भी नहीं जाऊंगा...।"
किन्नर का दिल बच्चे एवं माँ के मध्य वात्सल्य भाव देखकर पिघल गया। माँ उन्हें सौ रुपये का नोट देना चाहा मगर वेलोग नहीं लिया.. और जाते-जाते कहते गए,"माँ इसे खूब पढ़ाना.. अब तो सरकार हमलोगों को भी नौकरी देने लगी है...।"
"हाँ! हाँ! इसे पढ़ा रही हूँ । कुशाग्र है पढ़ाई में... मेरे परिचित में कई ऐसे हैं जो बड़े ऑफिसर बन चुके हैं...।"
वे खुश होते हुए बोले,"जुग-जुग जिए तेरा लाल... काश ऐसे जन्मे सभी मानव जीव के माँ-बाप तुमलोगों जैसे पढ़े-लिखे होते...।"

Thursday, 4 April 2019

सत्तामतान्ध को सुनाई नहीं देता


सड़क पर निकलो तो पता चलता है आज भी बहुत सी स्त्रियाँ किस हाल में जी रही हैं... ना कहने पर जला दी जाती हैं... नभ क्या साझा करेंगी जब कह नहीं पाती "जमीं हमारी है।"

कॉंग्रेस का मेनिफेस्टो और पाखी पत्रिका का मुख्यावरण कोहराम मचवा दिया... कितनी लेखनी उबल पड़ी , साधारण सस्ता रास्ता प्रचार का... बदनाम हुए तो क्या हुआ... "कमी हमारी है।"

मतदान जरूर करें... ऐसी पार्टी को जो आधी आबादी को पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी सब स्थलो पर देने में चूका ना हो...


Tuesday, 2 April 2019

मापदंड



"आज वह आई ए. एस. बन गयी है। अब तो उसकी अपनी भी एक स्वतंत्र पहचान बन गई है... और नामी गिरामी पिता की बेटी तो पहले से ही है...  समझ में नहीं आ रहा है कि शादी क्यों नहीं कर लेती है!" सुरूचि ने कहा.. उसकी आवाज में चिंता और अफसोस घुलनशील था।
"अच्छी-खासी नौकरी हो गयी है... अब तो और उसे पैसों की कमी नहीं...।" सुरूचि की सखी रोमा ने कहा।"
"हद है! क्या पैसा ही सबकुछ है...? मैं शादी की बात कर रही हूँ.., हवाई-जहाज खरीदने की नहीं..।
      "शादी की जरूरत नहीं होगी... सब पूरा हो जाता होगा..! उसे किसी सहारे की क्या ज़रूरत है ?" कुटिल मुस्कान चेहरे पर बिखरते हुए रोमा ने बुदबुदाया।
"ज़रूरत तो स्त्री हो या पुरुष दोनों को होती है.. दोनों एक दुसरे के पूरक हैं... सृष्टि तो दोनों के मिलने से ही चलेगी न?" सुरुचि ने और अधिक चिन्तित स्वर में कहा।
"ज़रा अपनी सोच में बदलाव लाओ!"
        "हद है! तुम अपने दोचित्ते सोच पर लगाम लगाओ...!"
"अरे! इसमें मेरे दोचित्ते सोच की बात कहाँ से आ गई?"
"कल की ही बात है..., जब मैं बोली कि किरण को सुरेश, तुम्हारे पति की रखैल बोला जा रहा है तो तुम कैसे तमक कर बोली थी...कि यह सब बेबुनियाद बात है... तुम  औरत और मर्द के लिए दो अलग-अलग दृष्टियाँ रखती हो.."
"मैं भी अक्सर समझाते रहती हूँ कि नारी को हमेशा नारी के पक्ष में खड़ा रहना चाहिए पर यह गिरगिट समझे तो न.. शायद आज यह संकल्प ले...!" कमरे में आती रोमा की सास ने कहा।
"नहीं! नारी को नारी या पुरुष को पुरुष के पक्ष में खड़े होने की बात नहीं होनी चाहिए, घर और संसार प्रेम पूर्वक चलाने की बात होनी चाहिए। पक्षपात नहीं... सदैव न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।"
"तुम सही बोल रही हो! इन्हीं गलत सोचों ने तो पुरुष सत्ता को मजबूत कर रखी है..। और मम्मी आपने कहा था कि पापा के जाने से सारा घर बर्बाद हो गया... वो थे तो किसी की मजाल नहीं थी कि कोई इस घर की और टेढ़ी नजर कर के देखे... ।" रोमा की बात सुनकर उसकी सास फफक पड़ी...।