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देवनागरी में लिखें

Monday, 13 November 2017

"मसक गया"


"बहुत देर हो गई दी आज ... रात के दस बज गए... 
ये लोग दिन में कार्यक्रम क्यों नहीं रखते हैं? 
रात में ही रखना जरूरी हो तो परिवार संग आने की अनुमति देनी चाहिए... है न दी...
वैसे विमर्श में सभी की बातें बहुत जोश दिलाने वाली थी"
"बातों में मशगूल हो हम गलत रास्ते पर आ गए बहना... ज्यादा देर होने से घबराहट और अंधेरा होने से शायद हम भटक गये... आधा घन्टा बर्बाद हो गया और देरी भी हो गई..."
दो क्लब के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम जिसमें विषय था कि "आज की सामाजिक दृष्टिकोण के कारण एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण वक्तव्य सामने आया है कि क्या पुरुष की दृष्टि में नारी का महत्व उसके शारीरिक आकर्षण और पहरावे के कारण है जिसकी कल्पना और कामना वह अपने लिये करता है ? क्या आधुनिक नारी केवल शारीरिकक सुन्दरता का प्रतीक है" से शामिल हो जोश से भरी ऑटो की तलाश कर रही बहनें देर होने से चिंताग्रस्त थी... तभी एक का फोन घनघनाया
हैलो!"
"इतनी रात तक कहाँ बौउआ रही हो?"
"बैठ गए हैं ऑटो में बस पहुंचने वाले ही हैं"
"बहुत पंख निकल गया है ... बहुत हो गई मटरगश्ती... 
कल से बाहर निकलना एकदम बन्द तुम्हारा..."
"पूछ! नहीं लौटूँ जेल, चली जाऊँ दीदी के घर..."

Saturday, 28 October 2017

समाज के कोढ़(02)


रविवार 04 नवम्बर 2017 (देवदीवाली)

अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच का दो दिवसीय 29 वां लघुकथा सम्मेलन होने जा रहा है ... ज्यों लघुकथा सम्मेलन का दिन करीब आता जा रहा है , त्यों त्यों एक नई लघुकथा जन्म ले रही है

एक महोदय ने आयोजनकर्त्ताओं में से किसी एक को फोन किया

-हैलो!"
-मैं xyz बोल रहा हूँ।"
-जी पहचान रहा हूँ बोला जाए कैसे हैं?"
-मैं तो ठीक हूँ... सुनिए न ! लघुकथा सम्मेलन में सम्मान देने की भी बात होगी ?"
-जी बिल्कुल होगी"
-लिस्ट तैयार हो गया क्या?"
-हाँ ! हाँ... लिस्ट बिलकुल तैयार है"
-आप बता सकते हैं क्या कि उस लिस्ट में मेरा नाम है कि नहीं
-क्या गज़ब की बात करते हैं!? आपने लघुकथा कब लिखी!? मेरी जानकारी में तो आप अबतक एक भी लघुकथा लिखने का प्रयास भी नहीं किये हैं..."
-उससे क्या होता है... आपलोगों से सवाल करने कौन आएगा..."
-हमारा ज़मीर..."
-अजी समय से लाभ उठाना चाहिए... जितना खर्च करने के लिए बोलिये , मैं तैयार हूँ..."
-लानत है जी ऐसे पैसों पर... पैसों से लेखन करवाये 2000 लोग भी जमा हो तो उसमें आपका नाम नहीं आएगा"
-आप भी कैसी बात कर रहे हैं.... सरकारी सम्मान पाए लोगों में भी हमारे जैसे लोग आराम से मिलेंगे..."

Friday, 27 October 2017

"समाज का कोढ़"


"सुना है लघुकथा सम्मेलन होने जा रहा है..."
"आपने सही सुना है"
"आपकी संस्था लघुकथाकारों को सम्मानित भी कर रही है... कितना खर्च आता होगा... ? मेरी भी इच्छा है कुछ लोगों को सम्मान पत्र दिलवाने का ?"
"मेरा जितना सामर्थ्य है उतना रकम मैं आयोजनकर्ता को दे देता हूँ । उसके आगे का सारा निर्णय आयोजन कर्ता करते हैं ।"
"ऐसा कीजिये न कि इस बार मुझे सम्मान पत्र दिलवा दीजिये"
"अरे ऐसा कैसे हो सकता है? आपने लघुकथा क्षेत्र में क्या काम किया है?"
"लेखन से प्रसिद्धि पाया हूँ... दूरदर्शन रेडियो में पाठ किया हूँ... पेपर में छपता हूँ... अन्य राज्यों में सम्मान पत्र पा चुका हूँ...।"
"लघुकथा के उत्थान व प्रचार-प्रसार के लिए क्या इतना ही काफी है, केवल अपना स्वार्थ साध लेना? पहचान और पैसे के बल पर न? हड्डी पर झपटे को जाल में फंसा लेना... किसी के मजबूरियों का फायदा उठाना आपको खूब आता है... कोई बता रहा था कि आप अपनी लघुकथा लिखवाने के लिए भी पैसे खर्च करते हैं क्यों कि किसी को भेजी गई लघुकथा आधी है या पूरी, आप समझ नहीं पाते हैं..."

"बिक रहा है कुछ तो खरीदने में हर्ज ही क्या है... जिसे आप हड्डी कह रहे हैं , उसे मैं सहयोग समझता हूँ…"

Thursday, 26 October 2017

"साजिश"



"देखो! देखो... कोई दरवाजे का ग्रिल काट रहा है... कोई तो उसे रोको ! अंदर आकर वो मुझे भी मार डालेगा..."
"आपको ऐसा क्यूँ लग रहा है ? मुझे तो कोई दिखलाई नहीं दे रहा है..."
"हाँ नाना जी , नानी जी सही बोल रही हैं! हमें कोई नहीं दिखलाई दे रहा है..."
"देखो ! देखो... बिस्तर पर आकर वो बैठ रहा है..."
                      बड़ा बेटा विदेश बस गया था और छोटा बेटा घर जमाई बन गया था... बेटी संग रहती थी लेकिन अपने बेटे के नौकरी पर जाने की इच्छा जब से वो बताई थी तभी से ऐसी बातें करने लगे थे बद्री प्रसाद..."
आज ही उनका नाती उनकी बेटी को लेने आया तो उनका कुछ ज्यादा ही बड़बड़ाना शुरू हुआ
   "देखो!देखो! कोई आया"  

Sunday, 15 October 2017

"समझ"


-एक्सपायरिंग डेट हो गई हैं आप अम्मा जी"
-चल इसी बात पर कुछ चटपटा बना खिला" खिलखिलाते हुए पचासी साल की सास और अड़तीस-चालीस साल की बहू चुहल कर रही थी
-आज मुझे *एक दीया शहीदों के नाम* का जलाने जाना है... काश ! आप भी..."
-पोते की शादी चैन से देख लेने दे"
-यानि अभी और भी पंद्रह-बीस साल..."
-और नहीं तो क्या... क्या कभी सबके श्राप फलित होते देखी है..."
-आपके पहले मैं या मेरे पहले आप टिकट कटवाएँगे सासु जी..."
-संग-संग चलेंगे... समय के साथ खाद-पानी-हवा का असर होता है" दोनों की उन्मुक्त हँसी गूंज गई...




Thursday, 12 October 2017

स्वार्थ में रिश्ते


पिछले कई दिनों से शहर के अलग अलग जगहों पर स्वच्छता अभियान चल रहा था… आज सुबह भी मंत्री जी अपने टीम के साथ, वार्ड पार्षद के साथ भी कुछ लोग आने ही वाले थे, अखबार मीडिया की टीम , युवाओं की टोली और अनेक संगठन-संस्था के सदस्य , स्थानीय लोग अभियान स्थल पर पहुंचे और स्थल से कचरा ही गायब.. खलबली-भदगड़ मच गई
-हद है! कैसे कचरा उठ सकता है... नगर निगम वालों को कुछ तो सोचना चाहिये था... अब मंत्री जी आएंगे तो क्या होगा?
-मंत्री जी के आगमन की बात सुन, घबराहट में ऐसा हो गया होगा
-अरे फोन करो... फोन करो...
ट्रिन ट्रिन
-हेलो!
-इतनी सुबह सवेरे ?
-आपने बिना मंत्री जी के आये कचरा कैसे उठवा लिया?
-हमें भी तो जबाब देना पड़ता है!
-भेजवाईये आयोजन-स्थल पर कचरा।।
-ऐसा कैसे हो सकता है? तिहरा मेहनताना देना होगा...
-क्यों?
-कचरा उठाया मजदूर , फिर लाकर गिरायेगा , फिर उठाएगा
-वो सब हमलोग बाद में मिल बैठ सलटा लेंगे... आखिर हमलोग मित्र हैं... दांत नहीं पीसना मजबूरी थी
-आपकी खुशी में ही हमारी खुशी है...

Monday, 9 October 2017

बैसाखी


संगनी क्लब व सामयिक परिवेश क्लब के अनेक कार्यक्रमों में रत्ना पुरकायस्था(दूरदर्शन में उप निदेशक) जी से कई बार भेंट हुई... उनकी मोहक मुस्कान और दूरदर्शन आने का निमंत्रण(स्वाभाविक हर मिलने वालों से वे कहती हैं) मेरे दूरदर्शन जाने का राह खोल दिया । समीर जी से उनका फोन नम्बर ली , ले तो उनसे भी सकती थी लेकिन समीर जी सामयिक परिवेश क्लब के आयोजक थे तो उनसे ही मांगना सहज लगा।
उनसे मिलने जाने के पहले लेख्य-मंजूषा के सदस्यों से पूछी कि कोई चलना चाहेगा... एक से दो भले... बुचिया #ज्योति_स्पर्श  जी संग चलने के लिए तैयार हुईं.... हमें #अनेक_कामों के लिए एक संग निकलना ही था तो मैं उन्हें ही बोली कि रत्ना जी को फोन कर समय ले लें....
सोमवार 9 सितम्बर2017 दोपहर साढ़े बारह बजे के बाद का समय मिला... मैं और बुचिया बड़े उत्साहित रत्ना जी से मिले... पहले से कुछ लोग बैठे... हमारे रहते अनेक लोग आए-गए... सभी लोगों से बातें करने का जो स्वाभाविक(कोई अभिनय नहीं) ढ़ंग था रत्ना जी का बेहद चुम्बकीय था... बच्चों की तरह निर्मल मन ..भावुकता से भरी छलकने को तैयार आँखें... #हम_बहुत_ही_खुश_थे
मैं गई थी लेख्य-मंजूषा के सदस्यों का कार्यक्रम हो इसकी मंशा लेकर लेकिन बातों के क्रम में #हाइकु की चर्चा निकली तो वे बोली कि मैं सोच रही हूँ कि #महिला_हाइकुकार का कार्यक्रम करवाया जाए..… या तो लेख्य-मंजूषा के सदस्य हो जाएं तो ठीक नहीं तो पटना में रहने वाली हाइकुकार का नाम और फोन नम्बर मुझे व्हाट्सएप पर भेज दीजियेगा...
उसी दौरान किसी अन्य से बात करने के क्रम में उनके पति का पर्यटन विभाग में काम करने की चर्चा चली...
(दूरदर्शन जाने के लिए घर से निकलते समय मेरे पति महोदय का सवाल था #तुम्हें_दूरदर्शन_में_ऐसा_कौन_मिल_गया_या_गई_हैं_जिनसे तुम दूरदर्शन पहुंच जाओगी
-रत्ना जी
-रत्ना पुरकायस्था जी ?
-हाँ!
-उनके पति पर्यटन विभाग में काम करते हैं!
-मुझे जानकारी नहीं है और अभी लौट कर आते हैं तो बात करते हैं ... पहले ही बहुत देर हो चुकी हुँ ... आपकी बातें सुनने लगी तो आज का मौका निकल जायेगा...
ये जा... वो जा.. मैं अति उत्साहित निकल भागी)
#मैं:-आपके पति पर्यटन विभाग में काम करते हैं ? मेरे पति बता रहे थे
-आपके पति ? क्या नाम है उनका ? क्या काम करते हैं ?
-जी । डॉ. अरुण कुमार श्रीवास्तव । चीफ इंजीनियर...
-वही जो मोकामा में कहीं...
-दो साल पहले थे बरौनी थर्मल के G.M. 31 जुलाई 2017 को पटना हेडक्वाटर से सेवा निवृत हो चुके हैं
रत्ना जी बच्चों की तरह खिलखिला पड़ीं
-अरे😂🤣 ! वे तो मेरे पति के बहुत ही अच्छे मित्र हैं । मैं भी मिली हुई हूँ । हमारे घर भी कई बार आये हैं । उनका बहुत सम्मान करते हैं मेरे पति । जबभी उनकी चर्चा करते हैं उनके व्यक्तित्व की बहुत प्रशंसा करते हैं । पर्यटन विभाग का कार्यालय पहले कंकड़बाग में था । श्रीवास्तव जी के ही सलाह और समझाने पर IEI भवन में स्थापित हुआ। etc अनेक बातें वे करती रहीं
और #मेरा_फ्यूज_उड़_चुका_था...

Tuesday, 26 September 2017

भ्रम टूटा


20 सितम्बर को दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन में बैठे साढ़े ग्यारह-बारह बजे तक फोन से बात कर सोई तो सुबह चंडीगढ़ में आँख खुली... सधारणत: ऐसा मेरे साथ होता नहीं है .... मेरी नींद इतनी गाढ़ी कभी नहीं हुई कि समान चोरी हो जाये... फोन चोरी होने से सबसे सम्पर्क खत्म हो गया.... 

"रणनीतिज्ञ"


"सक्सेना मैम... मैम... सक्सेना मैम..."
आश्चर्य हुआ उसे कि देश से इतनी दूर जर्सी के सड़क पर उसे कौन आवाज दे सकता है फिर भी मुड़कर देखी तो एक नौजवान दौड़ता हुआ उसकी ओर आता दिखा
और करीब आकर उसके चरण-स्पर्श कर बोला "आप मुझे पहचान नहीं सकीं न ?"
"नहीं! नहीं पहचान सकी... आप कौन हैं और मुझे कैसे पहचानते हैं ?"
"दो साल मुझे विद्यालय में आये हो गये थे... सभी सेक्शन की शिक्षिकाएं मुझसे त्रस्त हो गई थीं... मैं बेहद उधमी बच्चा था... आख़िरकार मुझे सुधारने के लिए आपके सेक्शन में भेजा गया... आपने मुझे एक महीना उधम मचाने दिया बिना रोक-टोक के... एक महीना कुर्सी से बाँध कर रखा ,कक्षा शुरू होने से लेकर कक्षा अंत होने तक... पूरे एक महीने के बाद जो आज़ादी मिली तो उधम-उत्पात खो गये थे...
"ओह्ह्ह! कौशल?" चहक उठी सक्सेना मैम...

Saturday, 12 August 2017

जिन्दगी के विभिन्न रंग (शेड)


"इतनी सब्जियाँ ! क्या सिंह साहब की पत्नी बाहर से लौट आईं ? प्रात: के सैर और योगासन के बाद पार्क में बैठे वर्मा जी अचम्भित थे... सिंह साहब भांति-भांति के सब्जियाँ खरीद कर झोला भर उठा रहे थे... सुबह के समय पार्क के बाहर सब्जी-जूस बेचने वालों की भीड़ जमा होती थी...
"अरे वर्मा जी, सिंह साहब की पत्नी को गुजरे वर्षों हो गए!" शर्मा जी बोले
"तो क्या सिंह साहब खुद से खाना पकाते हैं?"
"नहीं न! दाई(मेड) रखते हैं ।"
"ओह अच्छा!"
"दाई को २० हज़ार रुपया देता हूँ वर्मा जी! इस उम्र में दूसरी शादी करता तो दस तरह की किच-किच होता... पत्नी होती भी तो उसके साथ भी कई समस्याएँ होती...! मन का पकाने के लिए बोलता तो दस बहाने होते...
मेड रखता हूँ आज़ाद पक्षी की तरह जीवन जी रहा हूँ...!" सिंह साहब की ख़ुशी छिपाए नहीं छिप रही थी...
"भाभी जी नमस्कार... घर आए कई लोग बोल जाते हैं...!" शर्मा जी फुसफुसाए...


Wednesday, 9 August 2017

दूत मिलता है... तलाश हमें करनी होगी...


1994 के 29 अगस्त को हमलोग पटना शिफ्ट कर गये थे... हमारे घर से थोड़ी दूरी पर परिचित बे-औलाद वृद्ध दम्पत्ति रहते थे... वे लोग बहुत खुश हुए हमारे पटना आने से... यूँ तो उनके साथ पति-पत्नी दोनों के भतीजे का परिवार रहता था... दोनों के भतीजे के परिवार में ये सोच था , मैं क्यूँ किसी तरह की मदद करूँ वो करे... एक दाई रही सदा... लेकिन पैसों के मामले में मेरे पति पर ही विश्वास रहा... वृद्ध की मौत सन् 1994 में और वृद्धा की जिन्दगी सन् 2003 तक ही रही... नौ साल प्रतिदिन का बाहर से ख्याल हमलोग रखे... बैंक से पैसा निकाल कर ला देना... जब जरूरत पड़े डॉक्टर लाना... अस्पताल ले जाना... पेस मेकर लगवाना...
       लगभग पंद्रह दिनों पहले... दोपहर का समय था... मेरे पति ऑफिस में थे... मैं घर में अकेली थी... मुझे बुखार 102 था... पड़ोसन मिलने आईं... हम बात कर रहे थे लेकिन मेरा बुखार बढ़ रहा था... दवा लेने के बाद भी 105 हो गया... घबरा कर मेरी पड़ोसन की बेटी मेरे पति को फोन कर दी... आस-पास की तीन-चार पड़ोसन आ गईं... मेरे पति को ऑफिस से घर पहुँचने में समय लगता वे मेरे बड़े भाई को फोन कर दिए... बड़े भाई-बड़ी भाभी पहुँच गये... पानी की पट्टी और सर धोने से बुखार थोड़ी देर में उतर गया...

हमारा हश्र कैसा हो... ये तो विधाता रचता ही होगा लेकिन कुछ सहायता तो हमारी सोच... हमारे कर्म भी करते हैं...
आशा साहनी की स्थिति को समझने की कोशिश में हूँ क्यूँ कि कल मेरी स्थिति शायद... *शायद* वही हो
ना हो इसलिए पूरे शहर में होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों में जाती हूँ... रोज़ दो-चार से फ़ोन पर बात करती हूँ... फ़ेसबूक पर सक्रिय रहती हूँ... अकेलापन या भीड़ हम तो चुन ही सकते हैं...
जबसे ख़बर मिली है तभी से सोच रही हूँ...
मान लेते हैं पूत कपूत है
पहले पति के मौत के बाद दूसरी शादी... तब तो पुत्र पर निर्भरता ख़त्म... दूसरे पति की भी मौत तीन-चार साल पहले... तो अकेले क्यूँ रही...

                                             ये बताने की जरूरत इसलिए पड़ी कि आशा साहनी अकेले यूँ क्यूँ मरी... समझ नहीं पा रही हूँ ...
-विश्वास की कमी उनमें थी ?
-कोई क्यूँ नहीं रहा(बेटा ही क्यूँ) दो-दो मकान होते हुए...


Sunday, 16 July 2017

अपना-पराया



सीलन लग बर्बाद ना हो जाएँ यादगार लम्हें... बरसात खत्म होने को ही है... चलो आज सफाई कर ही दी जाए... बुदबुदाती विभा अलमीरा से एलबम निकाल पलंग पर फैला दी... पास ही खड़ा बेटा एलबम से एक तस्वीर दिखाता पूछा,- "माँ! सुनील मामा के संग किनकी तस्वीर है "
"कहाँ हो? अजी सुनती हो... तुम्हारे ललन भैया का फोन आया आज... "
"यही हूँ... क्या बात हुई ललन भैया से... उन्हें अपने घर बुला लेते..."
"उनका बेटा बरौनी थर्मल में ट्रेनिंग करना चाहता है..."
"वाह! अच्छी बात... फोर्थ इयर शुरू हो गया भतीजे के इंजीनियरिंग का... क्या बोले आप?"
"बोल दिया हूँ पता कर सूचित करूँगा एक दो दिन में जब फिर उनका फोन आयेगा तो..."
"कोशिश कर ट्रेनिंग शुरू करवा ही देना है..."
"रहेगा कहाँ एक महीने तक...? चार सप्ताह की ट्रेनिंग होगी...!"
"मेरे साथ... हमारे घर में..."
"हमारे साथ कैसे रहेगा?...तुम्हारा सगा भतीजा होता तो और बात होती... "
सगा... हथौड़े की ठक-ठक से अतीत के पत्थर खिसकने लगे...
"मैं यहाँ ? कैसे आ गया ? अस्पताल के कमरे में खुद को पाकर सुनील का सवाल गूँजा।
"मैं ले आया। तुझे कुछ याद भी है ! तू कल शाम से अब तक बेहोश था। क्या रे हम अब इतने पराये हो गये ? चाचा/तुम्हारे पिता के बदली होकर दूसरे शहर जाने से... हम पड़ोसी भी नहीं रहे... !
"अरे! ऐसी कोई बात नहीं ललन... चल... मेरे हॉस्टल चलकर बात करते हैं..."
"हॉस्टल! तेरे हॉस्टल कहाँ... तुम्हारा सारा सामान हमारे घर में शिफ्ट हो गया है..."
"अरे! तुमलोग पहले भी बोले थे... लेकिन तू जानता है! अभी मेरी पढ़ाई पूरी करनी बाकी है तीन साल की जिसके कारण पिता के संग ना जाकर हॉस्टल में रहने का निर्णय हुआ था... फिर नौकरी की तलाश... ?"
"सब जानता हूँ... बचपन से पड़ोसी रहे हैं... हमारे बीच कुछ दुराव-छिपाव नहीं रहा है... तू जान ले जब तक तू इस शहर में है, हमारे घर में रहेगा पूरे हक़ और सम्मान से... "


Saturday, 8 July 2017

"सकूँ"



सुबह से निकली गोधुलि लौट रही थी... थकान से जी हलकान हो रहा था... ज्यों ज्यों घर क़रीब आता जा रहा था त्यों त्यों रात्रि भोजन याद आ रहा था साथ ही पकाना याद आ रहा था व साथ याद आ रहा था कि घर में सब्ज़ी के नाम पर ऐसा कुछ नहीं है जो पका सके... शुक्रवार की रात से सोमवार की सुबह तक की चिंता ने विभा को सब्ज़ी के दुकान पर ला खड़ा किया... सब्जी और खरीदार से दुकान भरा पड़ा था... अतीत की बातें थी "सब्जी का मौसम होना"... कई महिलाएँ सब्ज़ी ले रही थी और बातों में मशगुल भी...
एक स्त्री बोली,-"इतना सब लेने के बाद भी, चिंता यह है कि अभी घर जाकर क्या पकाएँगे..."
दूसरी बोली,-सुबह तो कई सब्जियां बना लो... शाम में तो एक मन तो कुछ पकाने का नहीं करता है दूजे ये चिंता पकाए क्या!"
तीसरी बोली,-"बिलकुल सच कहा आपने! मेहनत कर कुछ पकाओ भी तो खाने वाले यही कहते हैं, 'हुँन्हहहह! यही पकाया...
मिला जुला एक अट्टहास गूँजा और विभा टेंशन से टशन में हुई...

Saturday, 1 July 2017

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस

#हिंदी_ब्लॉगिंग

ब्लॉग से सफर हुआ था ..... जारी भी है...

सुखद अनुभति ..... शब्दों की कमी

 चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग बैठ रहे हैं, लोग खड़े हैं और अंदर




 चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग खड़े हैं और अंदरचित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, मुस्कुराते लोग

http://antrashabdshakti.com/?p=2421 पहले अंक का हिस्सा बनना सुखद अनुभूति होती है








Wednesday, 28 June 2017

सूझ-बूझ


कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.

"इतने सारे बिस्कुट के पैकेट! क्या करेगा मानव ?" विभा अपनी पड़ोसन रोमा से पूछ बैठी ।

"क्या बताऊँ विभा! अचानक से खर्च बढ़ा दिया है, बिस्कुट के संग दूध , रोटी , मांस खिलाता है । मेरा बेटा नालायक समझता ही नहीं , महंगाई इसे क्या समझ में आयेगा! सड़क से उठाकर लाया है, एक पिल्ले को ।"

"क्या ! सच!"

"हाँ आंटी! कल मैं जब स्कूल से लौट रहा था तो एक पिल्ला लहूलुहान सड़क पर मिला, उसे मैं अपने घर नहीं लाता तो कहाँ ले जाता ? ना जाने किस निर्दई ने अपनी गलती को सुधारना भी नहीं चाहा । माँ मेरी बहुत नाराज़ है , लेकिन यूँ इस हालत में इसे सड़क पर कैसे छोड़ सकता था मैं ?"

                     शाम के समय, विभा अपने घर के बाहर टहल रही थी तो पड़ोसन का कुत्ता उसकी साड़ी को अपने मुँह में दबाये बार-बार कहीं चलने का इशारा कर रहा था... वर्षों से विभा इस कुत्ते से चिढ़ती आई थी क्यूंकि उसे कुत्ता पसंद नहीं था और हमेशा उसके दरवाजे पर मिलता उसे खुद के घर आने-जाने में परेशानी होती... अपार्टमेंट का घर सबके दरवाजे सटे-सटे... जब विभा कुत्ते के पीछे-पीछे तो देखी रोमा बेहोश पड़ी थी इसलिए कुत्ता विभा को खींच कर वहाँ ले आया था... डॉक्टर को आने के लिए फोन कर, पानी का छींटा डाल रीमा को होश में लाने की कोशिश करती विभा को अतीत की बातें याद आने लगी

"कर्ज चुका रहे हो" कुत्ते के सर को सहलाते विभा बोल उठी।"





Friday, 19 May 2017

"सीख"



“गुरु जी एक लघुकथा लिखने का विचार आया है”
“तो लिख डालो, किस उलझन में हो! आधार बिंदु क्या है लेखन का?”
“एक लड़का और एक लड़की बचपन से पड़ोस में रहते हैं... दोनों के बीच भाई बहन का रिश्ता रहता है... लड़की लड़के को भैया कहती है... केवल भैया कहती ही नहीं राखी भी बाँधती है... जब दोनों युवा होते हैं ,तो शादी कर लेते हैं...
“ये क्या लिखना चाहती हो... ऐसा कहीं होता है?”
“सत्य घटना है! सच्चाई है मेरी बातों में!”
“भाड़ में जाए ऐसी सच्चाई ... सत्य घटना है तो न्यूज़ पेपर की खबर बन छपने दो ... सत्य कथा लिखने का आधार बने .... तुम लघुकथा लिख रही हो .... समाज को एक संदेश देने का काम है लघुकथा लेखन ... सत्य हो या ना हो यथार्थ हो .... क्या तुम ऐसी बात लिख ये संदेश देना चाहती हो कि बचपन से राखी बाँधने का कोई मूल्य नहीं .... जब जो चाहे रिश्ते का रूप बदल दे सकता है! सत्य तो आज समाज में ये भी है कि सगा भाई-बाप .......... तो क्या लिखने के लिए यही बचा है .... धत्त ”
“तो क्या करूँ गुरु जी .... बातें झूठ लिखें”
“झूठ लिखने की सलाह तुम्हें कौन दे रहा है... अंत ऐसा कर सकती हो “जब दोनों शादी का निर्णय किये तो दोनों परिवारों में बहुत हंगामा हुआ .... विद्रोह होने से रंजिशें बढने लगी ... परिवार के खिलाफ जाकर दोनों ने शादी नहीं की .. आजीवन एक दुसरे के नहीं हुए तो किसी और के भी नहीं हुए ....

><><
@हर विधा का अपना अपना अनुशासन होता है
या तो अनुशासन मानों या विधा में लेखन ना करो
चयन करना रचनाकार का काम है

Thursday, 18 May 2017

"बदली नहीं क़िस्मत"

"बदली नहीं क़िस्मत"

"छोटका बाबूजी फिर से अकेले हो गए... दूसरी छोटी माँ भी हमारा साथ छोड़ गईं मुनिया" बड़े भैया से फ़ोन पर सूचना सुन सोच में गुम हो गई मुनिया
"काहे ? काहे दूसर बीयाह करवा देनी औरी हमनी के बानी सन ई ख़बर ना लड़की वालन के औरी बीयाह के ख़बर हमनी के ना भइल । काहे काहे! " दादी को झझकोरते हुए पूछा... पागल हो रहा था मुनिया का चचेरा भाई कौशल ।
मुनिया के छोटे बाबूजी(मुनिया के पिता के बड़े भाई जिन्हें मुनिया व मुनिया के सभी भाई छोटे बाबूजी कहते थे) दूसरी शादी कर लिए थे । चार बेटा दो बेटी के पिता थे.. सभी बच्चे बड़े हो चुके थे... एक बेटा व एक बेटी की शादी हो चुकी थी... दूसरे बेटे की शादी हो सकती थी... बेटी को एक बेटा भी था...
"हमार बबुआ के देह - नेह के करित... ? तू लोगन के आपन आपन गृहस्थी हो जाई अवरी तू लोग ओईमें रच बस ज ई ब लोगिन... केकरा फ़ुर्सत होई जे आपन बाबूजी के ख़्याल रख सकी..."
"ठीक बा! जब हमनी के बारे में ना बतावल ग इल त हमनी क नइखि सन"
"ए ई सन भी होखेला का... तब बतावल उचित ना लागल... अब सब कोई मिल-जुल के रहअ लोगिन..."
जब तक दूसरी छोटी माँ रही कोई मेल मिलाप नहीं हो सका... चौथा बेटा तो पागल हो कई बार मनोचिकित्सालय गया .... मुनिया के छोटे बाबूजी का अंत बेटों के संग ही हुआ...

Tuesday, 9 May 2017

“नया सवेरा”





रुग्न अवस्था में पड़ा पति अपनी पत्नी की ओर देखकर रोने लगा, “करमजली! तू करमजली नहीं... करमजले वो सारे लोग हैं जो तुझे इस नाम से बुलाते है...”
“आप भी तो इसी नाम से...”!
“पति फफक पड़ा... हाँ मैं भी... मुझे क्षमा कर दो”
“आप मेरे पति हैं... मैं आपको क्षमा... क्या अनर्थ करते हैं...”
“नहीं सौभाग्यवंती...”
“मैं सौभाग्यवंती...! पत्नी को बहुत आश्चर्य हुआ...”
“आज सोच रहा हूँ... जब मैं तुम्हें मारा-पीटा करता था, तो तुम्हें कैसा लगता रहा होगा...” कहकर पति फिर रोने लगा
 समय इतना बदलता है... पति के कलाई और उँगलियों पर दवाई मलती करमजली सोच रही थी... अब हमेशा दर्द और झुनझुनी से उसके पति बहुत परेशान रहते हैं... एक समय ऐसा था कि उनके झापड़ से लोग डरते थे... चटाक हुआ कि नीला-लाल हुआ वो जगह... अपने टूटी कान की बाली व कान से बहते पानी और फूटते फूटती बची आँखें कहाँ भूल पाई है आज तक करमजली फिर भी बोली “आप चुप हो जाएँ...”
“मुझे क्षमा कर दो...”
पत्नी चुप रही कुछ बोल नहीं पाई
“जानती हो... हमारे घर वाले ही हमारे रिश्ते के दुश्मन निकले... लगाई-बुझाई करके तुझे पिटवाते रहे... अब जब बीमार पड़ा हूँ तो सब किनारा कर गये... एक तू ही है जो मेरे साथ...
“मेरा आपका तो जन्म-जन्म का साथ है...’
पति फिर रोने लगा... मुझे क्षमा कर दो...”
“देखिये जब आँख खुले तब सबेरा... आप सारी बातें भूल जाइए...”
“और तुम...”?
“मैं भी भूलने की कोशिश करूँगी... भूल जाने में ही सारा सुख है...”
पत्नी की ओर देख पति सोचने लगा कि अपनी समझदार पत्नी को अब तक मैं पहचान नहीं सका... 
आज आँख खुली... इतनी देर से

Sunday, 7 May 2017

“भूमिका”




“आज तो तुम बहुत खुश होगी... माँ-बाबूजी गाँव लौट रहे हैं!
“पर क्यों”?
“गुनाह करके मासूमियत से पूछ रही.. क्यों”?
“गुनाह”?
“हाँ! आज तुमने भोलू के गाल पर चाँटा जड़ दिया क्यों”?
“भोलू मेरा भी बेटा है... उसका भला-बुरा देखना मेरा काम है... वह बतमीजी कर रहा था...”
“तो क्या हुआ? हमारा इकलौता बेटा है... माँ-बाबूजी तुम्हारे इस चाँटे को अपने गाल पर महसूस किया है... बाबूजी का कहना है, बहू के ऐसे चाँटे खाने से अच्छा है हमलोग गाँव में रहें... तुम भी शायद यही चाहती हो न”
“क्या बात कर रहे हैं... मैं ऐसा क्यों चाहूँगी”?
“ताकि तुमको उनकी सेवा न करनी पड़े...”
“यह आपकी गलत सोच है... कल यदि गोलू बिगड़ गया तो सारा दोष मुझ पर आ जायेगा... 
(चोर वाली कहानी याद है न जो जेल में अपनी माँ से मिलने की इच्छा रखता है) ... 
बन गया बेटा लायक तो सारा श्रेय आपलोग ले जायेंगे... मुझे श्रेय की नहीं, बेटे के भविष्य की चिंता है... 
इकलौते बेटों का भविष्य मैंने अन्य कई घरों में देखा है...”
“तो...!”
“देखिये! आप माँ-बाबूजी को समझाइए... मैं आखिर उसकी माँ हूँ...”
           मैं उसकी माँ हूँ... यह संवाद भोलू की दादी के कानों में पड़ा तो उन्हें अतीत के दिन याद हो आये जब वह भोलू के पिता के संग अपने अन्य बच्चों की गलतियों पर उनको एक चाँटा तो क्या डंडो से पीटने में गुरेज नहीं करती थी... वह सामने आयी और बोली “यह माँ है... इसकी यही भूमिका है... हमलोग दादा-दादी हैं हमलोगों की अपनी भूमिका है... जब बहू भी दादी बनेगी तो इसे भी ऐसे ही बुरा लगेगा जैसे हमलोगों को लगा है...
” इसके बाद सास ने बहू को गले से लगा लिया!


काश अंत सच होता


Friday, 28 April 2017

उपचार...



Image result for मानसिक विकृति


रक्षा-बंधन के दिन रीमा राखी और मिठाई का डिब्बा लेकर सबेरे ही सबेरे केदार बाबु के घर पहुँच गई... राखी और मिठाई का डिब्बा एक मेज पर रखकर , केदार बाबु का चरण-स्पर्श किया । इतने में दुसरे कमरे से निकलकर उनकी पत्नी आई तो रीमा ने उनका भी चरण-स्पर्श किया।
"मैंने आपको पहचाना नहीं" केदार बाबु की पत्नी ने कहा।
"भैया ने आपको मेरे बारे में कुछ नहीं बतलाया ! क्यों भैया आपने ऐसा क्यों किया ? मैं इनकी छोटी बहन हूँ... आप मेरी भाभी हैं"।
"क्यों जी ! आपकी कोई कोई छोटी बहन भी है ! आपने कभी मुझे बतलाया नहीं "
ये सब सुनकर केदार बाबु स्तब्ध रह गये । उनकी दशा यूँ हुई मानो काटो तो खून नहीं...
"भाभी पहले मैं भैया को राखी बाँध लूँ । फिर बैठ कर आराम से बातें करेंगे"।
केदार बाबु के पास कोई चारा नहीं था ,उन्होंने अपने सिर पर रुमाल रखा और अपनी दाहिनी कलाई रीमा के सामने बढ़ा दी
                      राखी बाँधकर रीमा ने मिठाई का एक टुकड़ा केदार बाबु के मुँह में डाल दिया और कहा "भैया! मेरी उम्र भी आपको लग जाए"
इतना सुनकर शर्म और अपमान से घूंटते हुए केदार बाबु के आँखों से आँसू निकल आये
यह देखकर केदार बाबु की पत्नी ने कहा "अरे! आपदोनों भाई-बहन में इतना प्रेम है और मुझे पता तक नहीं "!
"भाभी हमदोनों तो एक ही विद्यालय में पढ़ाते हैं और मध्यांतर(टिफिन) में अक्सर एक साथ खाना खाते हैं "
"मगर ये तो कभी भी मध्यांतर भोजन डिब्बा तो ले ही नहीं जाते हैं "केदार बाबु की पत्नी ने कहा
"मैं जो लाती हूँ! फिर ये क्यों लाते..."
उधर केदार बाबु के आँखों से आँसू थम ही नहीं रहे थे और ये वे मन में सोच रहे थे कि "मैं लोगों से आज तक रीमा और अपने बारे में प्रेमालाप की झूठी बातें फैलता रहा वो अपने मन में बोल रहे थे कि "धिक्कार है मुझ पर !
रीमा सोच रही थी दो सहेलियों से मिला सुझाव

पहली सहेली  "मुँह पर चप्पल मारो"
दूसरी सहेली "घर जाकर राखी बाँध आओ"

तब तक केदार बाबु की पत्नी चाय नाश्ता का इंतजाम कर लाते हुए बोली " रोते हुए ही रहोगे कि बहन को कुछ नेग-वेग भी दोगे!


Wednesday, 12 April 2017

कृष्ण सुदामा



अपने घनिष्ट मित्र नंदनी के पार्थिव शरीर, अग्नि को सौंप कर सतीश अपने भावों को यादों का खाद पानी दे सींच रहा
उसकी बिटिया की शादी अचानक से तैय हो गई जल्दबाज़ी में लाखों का इंतज़ाम करना था ... समय ने उसे आखिर सीखा ही दिया कि 
लेखन के राजा/रानी को लक्ष्मी का साथ नहीं मिलता ना ही सगे रिश्तेदार क़रीब आना चाहते हैं
दिन क़रीब आता जा रहा था और चिंता बढ़ती जा रही थी। .... एक दिन वो अपने कमरे में बैठा था कि नंदनी उससे मिलने आई उदासी में घिरे मित्र को देख। .... चिंता का कारण जान गई । ... बिना रक़म भरे हस्ताक्षर कर चेक थमाते हुए बोली कि बैंक में रखा रक़म मिट्टी ही है। जब दोस्त के काम ना आए जितना है, सब निकाल लेना और बिटिया की शादी धूम-धाम से कर , अपनी मुस्कुराहट वापस ले आना। 
बिटिया की शादी के कई महीनों के बाद। ... सतीष जब रक़म वापस करने लगा तो नंदनी बोली
क्या रक़म तुम्हारे हाथों में दी थी?
ना हाथ में दी थी ना हाथ में लूँगी!
जहाँ से लिए थे वहीं रख आओ। .... फिर किसी के काम आ जाएँगे"

Sunday, 9 April 2017

हौसला




Related image


टूटता तारा-
आस पाए युगल
जकड़े हाथ।

><><

हाँ तो क्यूँ कहा जाता उन्हें चोर
हाथ सफाई दिखलाये जादूगर
कर जाता समान इधर का उधर
लालच पैसे का करता मन मैली
देते लेते शब्दों की सुंदरतम थैली
दौड़ उम्दा सृजनता के चक्कर
दो-दो पंक्तियाँ ले यहाँ-वहाँ से
लो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा
छपास रचना का खजाना जोड़ा
नकल करने में अक्ल से वंचित
सारा ध्यान तो रहा करने में चोरी
जमीं खिसक गई नभ छूना बलज़ोरी

><><

अरे सबसे मिट्टी की तुलना क्यूँ 
वो भी केवल कच्ची मिट्टी से
रिश्ता मिट्टी का क्यूँ होता है 
कुछ हुआ नहीं कि गलने लगता है
पंगा लोगे तो दंगा सहना ही होगा
विमर्श में विवाद उत्पन्न करने का शौक़ 
व्यंग बोलने वाले शौक़ीन 


Friday, 31 March 2017

मिश्रण



चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग खड़े हैं


Hello...aap kya sahrsa se padhi hain kabhi?
पहचान ली क्या ?

Hum mala sinha hain
Section a me the girls high school me
Saharsa me
Tum kya wahi vibha ho
बिलकुल

Jo new colony me rehti thi
Are bah delho tumko khoj liyena
बेहद ख़ुशी हुई
पटना में कहाँ रहती हो ?

Tum apna numbr vejo
स्कूल में ही रमेश नाम कॉलेज खुला न बाद में ?

Borig canal road mai rahte hai
वाह्ह्ह्
मैं अभी बैंगलोर में हूँ बेटा बहू के पास 19 को वापस आयेंगे हमलोग रुकुनपुरा में रहते हैं
मुझे कैसे पहचानी तुम ?

Arey wah
Hum bhi bangalore me hain
Apni beti damaad ke pass aaye hsin
आज ?

Bellandur me
Nahi dedh mahine se hain
कितने बच्चे हैं

2
वाह

Ek beti aur ek beta
बेटा कहाँ है ?

Dono ki shaadi ho gayi hai
वाह्ह्ह्

Beta Delhi me hain Indian Navy me
30 दिसंबर 1972 में हम अलग हुए थे ...आज हम मिले .. फेसबुक से हम मिल गये .... शादी के बाद बेटियों का सरनेम नहीं बदलना चाहिए .... पता नहीं कब कहाँ पुरानी पहचान की जरूरत पड़ जाए ..... माला के लिए मुझे खोजना आसान इसलिए हुआ .... 

यूँ ही

क्षितिज पर
फैली सिंदूरी नदी
श्यामल साँझ में
दस्तक देती तन्हाई
लिखती प्रेमपाती
मनुहार अस्तित्व वेदना
तितली पीछा छोड़
आ भी जाओ कन्हाई

मुक्तक

नभ चेतना भू शून्यों को भर जाती
तंभावती जल मेघ की दरखास्ती
बंद रहे राहों के दरीचों का स्पंदन
प्रस्फुरण प्रेम की डोर की अतिपाती




Wednesday, 29 March 2017

हाइकु






झरता पत्ता-
क़ब्रों के बीच में मैं
निशब्द खड़ी

जीवन का अंत
या
जीवन का आरंभ
सबकी सोच अपनी अपनी
मापदंड होंगे न अपने अपने


अदाह्य दीप
फैलाये चिंगारियाँ-
दल जुगनू Related image








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मेला में स्त्रियाँ -
गूँजती तितलियाँ
छोर से पोर ।









चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, बाहर और प्रकृति चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, वृक्ष और बाहरजोड़े में बैठा
तीरवर्ती बुजुर्ग -
डूबता सूर्य ।


डूबता सूर्य -
सज गया सिंदूर
नाक से भाल ।


Saturday, 25 March 2017

स्तब्धता



झरता पत्ता-

क़ब्रों के बीच में मैं
निशब्द खड़ी

जीवन का अंत
या
जीवन का आरंभ
सबकी सोच अपनी अपनी
मापदंड होंगे न अपने अपने


अदाह्य दीप


फैलाये चिंगारियाँ-
दल जुगनू Related image








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मेला में स्त्रियाँ -
गूँजती तितलियाँ
छोर से पोर ।









चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, बाहर और प्रकृति


डूबता सूर्य -
सज गया सिंदूर
नाक से भाल ।



Saturday, 18 March 2017

यूँ ही


ना लिखने से बेहतर है
थोड़ा थोड़ा लिखना

01.
डूबता सूर्य-
नाक से माँग सजी
सिंदूर लगा।
02.
इंद्रधनुष -
शादी में कुम्हारन
बर्तन लाई।

<><>



वय आहुति पकी वंश फसल गांठ में ज्ञान
जीवन संध्या स्नेह की प्रतिमूर्ति चाहे सम्मान
एक जगह रोपी गई दूजे जगह गई उगाई
बिजड़े जैसी बेटियाँ आई छोड़ पल्लू माई
किसी हिस्से फूल किसी हिस्से मिले शूल
छादन बनती विरोहण झेलती सहती धूल
डरे ना दीप हवा जो चले हथेलियों की छाया
डरे ना धी पिता कर माया जो आतंक साया
ससुरैतिन जलती, धुनी जाती जीना बवाल
दामाद क्यों नहीं जलाया जाता ससुराल
बेटी बॉस रहे बहु दास दुनीति बसे ख्याल


<><>
कर्म
जी डूबे
शिखी नर्म
यादें तवाफ़
नवजात कर
कोंपल छुई-मुई
<><>
क्यूँ !
छली
जी उठे
साँसें सार
मन रेशम
जीवन्तता नार
एहसास कोमल