Friday, 10 July 2020

परबचन गीत




नोखी रीत समझ में बात है आयी,
त्ममुग्धता समझ में घात है आयी।

मे राह लो परंजय उँगली थमाया
क्यों झट गर्दन दबोचने नहीं दिया
चीखतें छल की दिवस-रात है आयी
त्ममुग्धता समझ में घात है आयी।

न्हें जो मिला मुखौटा चढ़ाए निभाया
हाँ दिखा सौ मन विकार स्व हिया।
शिकायतें उनके हिस्से मात है आयी
त्ममुग्धता समझ में घात है आयी।

रम में जीने वालों को मोथा बनाया
गरुरी कफ़न याद नहीं रख किया 
बेपरवाही की नींद में मौत है आयी
त्ममुग्धता समझ में घात है आयी
नोखी रीत समझ में बात है आयी।

Tuesday, 30 June 2020

जीत

Hindi women story | maa baap aur beti | माँ बाप और बेटी
"अब हमें अपने घर वापस चलना चााहिये। कोरोना के भय से कब तक हम यहाँ विदेश में पड़े रहेंगे ?"  एकांश की माँ ऐश ने कहा
"ऐसी परिस्थिति में हमारा यहाँ रहना ज्यादा उचित है श्रीमती जी। बेहद नाजुक और भयावह परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है !" एकांश के पिता एकनाथ ने कहा।
चानक से आर्थिक मंदी का सामना करने वाली अनेकों कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों की छंटनी कर दिया। एकांश की नौकरी भी उसी क्रम में छूट गई। एक तरफ विदेशी जमीं , मकान का लोन तो दूसरी तरफ़ उसी का आर्थिक सम्बल लिए बुजुर्ग माता-पिता, पत्नी एकता और 5 साल की बेटी ईशा थी। मल्टीनेशनल कम्पनी में उच्च पदासीन एकांश अन्य कई कम्पनियों में साक्षात्कार दे रहा था। लेकिन सफलता हासिल नहीं होने के कारण उसमें चिडचिडापन आता जा रहा था
कांश पर आर्थिक भार कम करने के लिए उसकी माँ ऐश अपने पति से देश वापस लौटने की चर्चा छेड़ती है...,-"हम घर जाकर गाँव की जमीन बेचकर एकांश की मदद कर सकते हैं।"
"जमीन-गहना बेचकर मदद करना आखिरी आधार होगा। यहाँ एक महाविद्यालय में मुझे हिन्दी प्रख्याता की नौकरी मिल गई है।" एकनाथ ने कहा।
"आपका कोचिंग बंद करवाकर आराम करने के लिए मैं अपने साथ लेकर आया था
 मुझे आत्मग्लानी हो रही है।" एकांश ने कहा।
"हो सकता है कुछ महीने या या एक-दो साल मुझे यह नौकरी करनी पड़े जैसे तुम्हें तुम्हारी पसंद की नौकरी लग जायेगी ,मैं पुन: आराम करने लग जाऊँगा। असमय लाठी का सहारा लेना वक्त को बर्दाश्त नहीं हो पाया..।" एकनाथ ने ठहाका लगाते हुए कहा।
"सुनो जी! मैं भी घर में बने खाने का ऑर्डर लेना चाहती हूँ। वर्षो पहले तुमने मुझसे वादा लिया था अपनी कसम देकर कि मैं कभी नहीं कमाऊँगी।" ऐश ने कहा।
"आकस्मिक युद्ध में तुम भी योद्धा होने का सुख उठा ही लो! तुम्हें अपनी कसम से मुक्त करता हूँ।" एकनाथ ने कहा।
"चलिए माँ बाज़ार से खरीदकर लानेवाली सामग्री की सूचि बनाते हैं.. मैं भी आपकी सहायिका बनना चाहती हूँ। बहती गंगा में आचमन कर ही लूँएकता ने कहा।

धरा धारा माँ पाषाण दिखती है।
सबक जीवन का सिखलाती है।
बचपन के ज़माने को जाने ना दें,
उसकी दुआ ही दंश से लड़ती है।


Monday, 15 June 2020

खरा-खोटा होना

सजी हथेली का रंग फीका पड़ता,सजा देती पोर पे सदा चढ़ा रहता,दृष्टान्त/उद्धरण ताप से गुजरा होता
हबूब श्रीवास्तव :- अक्सर, हम अपने दृष्टिकोण से किसी और के जीवन को समझने की कोशिश करते हैं। इस बात को आसानी से भूल जाते हैं कि हमें उनके दृष्टिकोण से उनके जीवन को समझने की कोशिश करनी थी। एक आत्महत्या एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति जीवन को छोड़ देने के अलावा कोई अन्य विकल्प सोचने और समझने की शक्ति खो चुका होता है। जीवंत रूप में, जीवन से भरपूर और अपने सपनों का पीछा करने में बेहद सफल, सुशांत की मानसिक सेहत एक रसातल में धंस गई होगी। कोई भी इस अवसाद का शिकार हो सकता है - इसका सफलता/असफलता और पैसे का अभाव/प्रचुरता से  कोई संबंध नहीं है।
मुझे बताएं कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं, मैं शायद समझूंगा कि आप कैसा महसूस करते हैं। जितना आप सोचते हैं, उससे कहीं अधिक।  #RIPSushantSinghRajput #MentalHealth #AchhaAaadmiTha

विभा :– किसी के आत्महत्या कर लेने के बाद किसी दृष्टिकोण का कोई मतलब नहीं रह जाता है.. जीवन बचा ही नहीं तो जीवनी क्या और क्यों समझना। वैसे जीवित व्यक्ति अपने ही दृष्टिकोण से सोचता-समझता और समझाने की कोशिश करता है..। समय बीतने के पहले याद दिलाते रहने की बात है कि हर वक़्त याद रखना चाहिए कि कोई है जिसे तुम्हारी जरूरत है और जिनसे तुम अपनी सारी बातें साझा कर सकते हो... तथा सबसे बड़ी बात, शरीर पर तुम्हारा कोई हक़ नहीं जिसे तुम खत्म कर दो.. किसी ने उसे अपने खून से निर्मित किया है..।

abc :– *Copied*

सुशांत,

सिर्फ तुम्हारे पैरों तले स्टूल नहीं खिसकी है, पूरे बिहारियों के पैरों तले जमीन खिसकी है. हमारा सैकड़ों बरसों का गुमान एक झटके में बिखर गया. बिहारी इस तरह मरा नहीं करते. This is not fair, man..!!

जीवनभर सँघर्ष की भट्टी में तपकर बनता है कोई बिहारी. आखिरी सांस तक हार नहीं मानकर बनता है कोई बिहारी. कोई बिहारी इसलिए बिहारी नहीं है कि वो बिहार से है, कोई बिहारी इसलिए बिहारी है कि वो ढीठ है. ऐसा नहीं है "ऐ बिहारी बावले लौंडे, ऐ बिहारी ..." सुनकर उसका खून नहीं खौलता लेकिन वो अनसुना करता है. मुस्कुरा देता है. पैदा होने से लेकर आजतक उसने ऐसी विपरीत परिस्थितियों में खुद को संभाला है कि इन सब बातों को वो दिल से ही नहीं लगाता. ऐसा नहीं है वो कमज़ोर है, कोई बिहारी जब हथौड़ी-छेनी उठा लेता है तो पहाड़ का घमंड तोड़कर ही रुकता है. वह कड़ी धूप में रिक्शा खींच लेता है, ईंटें ढो लेता है, रेहड़ियां लगा लेता है लेकिन हार नहीं मानता. विपरीत परिस्थितियों में भी डटा रहता है.
सरकारें आयी, सरकारी गयी. हमारे संघर्ष कम नहीं हुए. संघर्ष को हमने अपने हाथों की रेखा मान ली. घर, घर से पटना, पटना से दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, बिहारी जहां भी गया उसने अपने को उस माहौल में ढाल लिया. कोरोना जैसी वैश्विक विपरीत परिस्थितियां आयी. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, गुजरात ने पहचानने से इनकार कर दिया. बिहारी ने गहरी सांस ली. झोला समेटा और पैदल निकल पड़ा. 1200-1300 किलोमीटर दूर अपने घर के लिए. आग बरसाता मौसम, डंडे बरसाते पुलिसवाले. सबको झेलकर बिहारी घर आ गया. ऐसे राज्य में जहां की प्रति व्यक्ति आय न्यूनतम है. जहां उसे करने को कोई काम मिलेगा कि नहीं इसका भी कुछ पता नहीं था. लेकिन वह डटा रहा, अड़ा रहा.
सुशांत तुम शायद कोसी क्षेत्र से थे ना.? वहां के बच्चे-बच्चे भी बाढ़ की भयानक त्रासदी को चुल्लू में भरकर पी जाते हैं. इससे भी बड़ी त्रासदी थी क्या तुम्हारे जीवन में कि ऐसा कदम उठाना पड़ा. तुम आदर्श थे यार हमारे. हम बिहारियों के. तुम्हारी लाइफ, तुम्हारा संघर्ष, तुम्हारी सफलता सबको हमने सर-आंखों से लगाया था. सुशांत, अपने जीवन की सुंदर कहानी का तुमने अपने हाथों दुखांत कर लिया है. कुछ नहीं कहूंगा. इरफ़ान साहब की रुखसती का ग़म था, तुम्हारे इस तरह जाने का गुस्सा है. और हो भी क्यों ना,
सिर्फ तुम्हारे पैरों तले स्टूल नहीं खिसकी है, पूरे बिहारियों के पैरों तले जमीन खिसकी है. हमारा सैकड़ों बरसों का गुमान एक झटके में बिखर गया है. बिहारी इस तरह मरा नहीं करते सुशांत. This is not fair, man..!!😢😢

विभा :– 🤔कौन था यह ? पूरे बिहारियों के पैरों तले की जमीन क्यों खिसकी है ?

abc : – पटना निवासी 1986 का बॉर्न

विभा :– पटना में लाखों की संख्या में आबादी है..

abc :– ये मुम्बई में रहता था काकी... : फेमस हीरो था...

 विभा :–  लाखों मजदूर अभी वापसी किये हैं मुंबई से.. पहले भी बहुत बार बिहारी दुत्कारे गए मुंबई के वासियों के कारण.. किनकी–किनकी कहानी लिखी गई ?  किसने फेमस बनाया ?

Friday, 12 June 2020

मदांधता


abc: बता दीजिये ना🙏🏻 ये तो जो मुझे कागज़ पर लिखा मिला मैंने उसे टाइप कर दिया। हाँ कुछ जगह मेरे कारण स्पेलिंग मिस्टेक जरूर हुआ है..
xyz: शुरू में ही विधाओं को विद्याओं किया हुआ है... पूरा शाम तक बताते हैं..
abc : इंतज़ार करेंगे🙏🏻: ये तो मेरी गलती है😂
 xyz : गलती कम हड़बड़ी ज्यादा है..
abc : 108 वर्ड प्रति मिनट😱😱, स्पीड बढ़ते जा रहा है और साथ में अशुद्धियाँ😂
xyz : अशुद्धियों को प्रमाण पत्र ज्यादा मिलता है 😜🙊
abc : सर्टिफिकेट हमको कोई नहीं देता है😉😔😱😂, हम अपना दायरा बढ़ने ही नहीं दिए हैं। क्योंकि मुझसे रोज़ लिखना संभव ही नहीं है। रोज़ लिखेंगे तो रचना का स्तर इतना खराब हो जाता है कि क्या बताएं... और अंड-बंड साहित्यक समूह जो ऑनलाइन चलती है उन्हें तो सिर्फ रचना से मतलब होता है। क्वालिटी से नहीं
xyz: रचना के स्तर से आज किसे मतलब है.. ना संस्था को और ना लेखक को ।श्रोता-पाठक अपना सर धुनें उससे क्या फर्क पड़ रहा है...?
abc : इसलिए भर-भर के रचना लिखें जा रहे हैं और एकदम फ्री में सर्टिफिकेट बंटा जा रहा है, ओह्ह ! और pqr जी😂.. उनकी रचना में मुझे कोई ओर-छोर ही नहीं समझ में आता रहता है😂
xyz : सब एक से एक महारथी हैं.. किसी की छोटी रचना नहीं होती... लम्बी करने के चक्कर में , 'ओर व छोर' से सेतु गायब हो जाता...!
abc : शुरुआत करती हैं ब्रह्मांड से.. बीच में कोरोना-फरोना... अंत अपने घर-आँगन के बगीचे पर..
मतलब की पढ़ने वाला कपार फोड़ ले😂😂
xyz : jkl से पूछे कि किस विधा में लेखन है तो उनका जबाब आया कि विधा तो पाठक तय करेगा🤦🏻‍♀️उसके बाद से मैं शॉक्ड हूँ...,🙊
abc: जवाब तो उचित था उनका😂😂 आजकल पाठक सब इतना होशियार हो चुका है कि वह तय करता है कि लेखक क्या लिखता है😂😂😂 : हम लेखकों का क्या बस कुछ भी कचरा लिख दो😂 पाठक तो हैं ही तय करने के लिए😂😂
xyz : अपनी गप्प ले जाएंगे ब्लॉग पर...
abc: कांड हो जाएगा😂😂 हम लोग तो कर्म करने निकले थे, वहाँ कांड हो जाएगा😂😂
xyz: शेर डरता नहीं.. वैसे नाम बदला रहेगा
abc: वह तो मुझे अंदाज़ा था🙂 : ये pqr जी और fgh जी मुझसे समीक्षा की माँग की थी😂 उनके अनुसार उनके कविताओं पर😂😂
xyz : पूछ लो ptm झेल लेंगी न : ऐसा ना हो कि दिल का दौरा ना पड़ जाए
abc : Ptm - parents teacher meeting ?🤔हम बोल दिए एकदम मस्त लिख रही हैं आपलोग😂
xyz : 🤦🏻‍♀️ पोस्टमार्टम.. ओह्ह!: यह चाणक्य नीति नहीं है
abc : 😂 ये मजेदार था.. : मुझे पता है 🙂 : लेकिन उन्हें समझाना ? उन्हें अपना तौहीन लगता है : और वैसे भी मैं क्या बताऊँ? उनकी रचनाओं पर! जिन्हें वह सब कविताएं कहती हैं😂हर पंक्ति दूसरे पंक्ति से भिन्न....
xyz : मुझे अनुभव है ! एक किस्सा सुनो ... "एक बूँद को घमंड हो गया कि समुन्द्र का उछाल उसकी ही वजह से है... एक बार ऊँची लहर के कारण , वो बूँद किसी जूते में जाकर अटक गयी...,"

Friday, 5 June 2020

विश्व पर्यावरण दिवस पर बुध्दि की सफाई

"माँ! फोन पर आप किनसे बात कर रही थीं?
"सोशल मीडिया से बने रिश्तों में से बेहद प्यारी बहना है।"
"क्या जान सकता हूँ कि आपदोनों ने क्या बातें कीं?"
"अभी तो चहुओर एक ही शोर है, 'गर्भवती हथनी की हत्या'।"
"मुझे ऐसा क्यों लग रहा कि आप हथनी के मारे जाने से व्यथित तो हैं । लेकिन जानबूझकर किये गए कृत्य पर विश्वास नहीं कर पा रही हैं? आपकी लेखनी भी क्यों मौन है..?"
"अति भावुकता में , हड़बड़ी/जल्दबाजी में अब लेखन नहीं करना चाहती।"
"सही कर रही हैं.. किसी घटना पर अति संवेदनशील होकर दिमाग का लॉकडाऊन कर लेखन समाज को गुमराह करने जैसा अपराध ना हो वही बढ़िया होगा। केरल में पटाखों से भरा अनानास खाने के कारण जान गंवाने वाली गर्भवती हथिनी के लिए दो बातें स्पष्ट हुई हैं..

–केरल का शहर 'मलप्पुरम' नहीं होकर शहर पलक्कड़ है।

–कुछ लोगों ने पटाखों से भरा अनानास खिला नहीं दिया.. बल्कि लोग घातक जानवरों से अपने बचाव के लिए वैसा रखते हैं । जिसे इंटरनेशनल बिजनेस टाइम्स के साथ एक साक्षात्कार में, एक भारतीय वन सेवा अधिकारी ने साझा किया, "किसी ने भी हाथी को अनानास खिलाया नहीं होगा। जानवर ने पाया होगा कि वह कहीं पड़ा हुआ है और उसने खुद ही इसका सेवन किया है और लोगों द्वारा जाने क्या-क्या झूठ बोला जा रहा है" यह कहते हुए कि पटाखों से भरे अनानास का उपयोग फसलों को नष्ट करने वाले जंगली सूअरों को पकड़ने के लिए एक घोंघे के रूप में किया जाता है।"

"जानते हो किस्से, कथा ,कहानियों को पढ़ने के संग रोज़मर्रा के वारदातों को सुनने-देखने के अनुभव से मुझे भीड़ का हिस्सा बनने से खुद को रोकने का नज़रिया तुमसे ही मिल रहा है।

"बीते कल में मेरी उँगली तुम्हारे हाथों में थी.. आज तुम्हारी उँगली...,"

Thursday, 4 June 2020

पेट_पूजा_के_आगे_ना_कोई_पुण्य_दूजा'


यादों में यात्रा करती हूँ तो सन् उन्नीस सौ तिहत्तर तक सहरसा में सहेलियों (तब सहेला का ज़माना नहीं था) के साथ पहाड़ी नदी के समान उछलते कूदते उन्नीस सौ चौहत्तर में मझवलिया उसके बाद सीवान। उन्नीस सौ बयासी में रक्सौल (बीरगंज-काठमांडू-पोखरा) वहाँ से उन्नीस सौ अठासी में मुजफ्फरपुर स्थापित हो गए... लेकिन तबतक केवल पेट भर जाने को जाना था। 
भोजन के नाम पर नॉनवेज और भात से परिचय था। बिहार से बिहार में घूमने से मछली से मीट तक की पहचान थी। उन्नीस सौ नवासी-नब्बे का कोई दिन होगा जब दिल्ली यात्रा में भोजन में मिला भात के संग मूंग-राजमा। पहली बार में ही स्वाद बदलकर विकल्प लगा, मीट-मछली ना मिले तो पेट भरा जा सकता है !
 नहीं जी! आत्मा तृप्त हो सकती है। मेरी बातों पर यकीन ना हो तो बना कर देख लें।
 उस समय होटल वालों में किसने कैसे बनाया होगा वो तो मुझे पता नहीं चला। लोबिया , छोला, अंडा, राजमा, अकेले बनते हैं तो चिकने घड़े हो जाते हैं...! अपने अंदाज और प्रयास से जो मैंने बनाना सीखा :– सामग्री
तस्वीर में दिखता कटोरा से चार व्यक्ति के अनुसार*
आधा कटोरा हरी साबुत मूंग और एक कटोरा राजमा 
दो बड़ा कटा हुआ प्याज
दो कटा टमाटर
1 बड़ा लहसुन
2 इंच का टुकड़ा अदरक
1 चम्मच हरा धनिया
1 चम्मच गरम मसाला
1 चम्मच किचन किंग
1 बड़ा चम्मच (रिफाइंड व सरसों तेल) मक्खन और क्रीम (हमेशा बनानी हो तो घी से भी काम चला लेते हैं)
1/2 चम्मच हरी मिर्च
दो तेजपत्ता 1 चम्मच जीरा
1 चम्मच नमक
हल्दी

*विधि*

 साबुत मूंग और राजमा अलग-अलग बर्त्तन में भिगोकर रखें रात भर । अगर दिन में बनानी हो। सुबह धोकर साफ कर लें।

–एक कुकर में राजमा में पानी और आधा नमक डालकर उबाल लें। अच्छे से गल जाए.. थोड़ा कसर रह भी जाएगा तो मूंग के संग मिल जाएगा पकने का मौका
–लहसुन को छील कर सूखे में हल्का भून लेते हैं, अदरक, हरी मिर्च, एक प्याज संग अलग से पीस लेते हैं
एक प्याज अलग बारीक काट कर रखते हैं

–दूसरे कुकर को अच्छा से गर्म कर रिफाइंड/सरसों तेल *(मैं दोनों का प्रयोग करती हूँ बिहारी हूँ सरसों तेल से पीछा नहीं छुड़ा सकती। सरसों मसाले में भिंडी , बैगन मछली छोड़िए बाकी बातें फिर कभी)*  में तेजपत्ता, जीरा, नमक डालकर प्याज के संग पीसे अदरक लहसुन वाले मिश्रण को भून लेते हैं । जब तेल छोड़ने लगता है तो दूसरा वाला प्याज टमाटर , गर्म मसाला, किचनकिंग डाल भून लेते हैं। मूंग और राजमा को मिलाकर ग्रेवी लायक पानी डाल कर सीटी पकड़ने तक पका लेते हैं ताकि मूंग खड़ा भी दिखता रहे और गला भी रहे। कुक्कर ढक्कन खुलने पर मक्खन क्रीम घी जो उचित लगे डाल गरम-गरम चावल पराठा संग खाइएगा और मेरी बुचिया को धन्यवाद कहिएगा

संग में कटे प्याज में नींबू मिलाकर भी रखा जा सकता है।

आत्मा ना भरे और पेट भर जाने के बाद मूंग राजमा बच जाए ... तो भेल-पापड़ डाल कर चाट बना कर कुशल गृहणी होने का दावा पेश करें। वैसे अच्छे महाराज कुक पुरुष ही होते हैं..। देश-विदेश घूमने के बाद महिला कुक नहीं दिखी जो।

Wednesday, 3 June 2020

कौशल



"अरे! रामरतन! बहुत दिनों के बाद दिखलाई दिए। कैसे हो और कहाँ रहे?"रोमा ने पूछा।
"मैडम जी पिंजड़े में ही था !" रामरतन ने कहा
"यह क्या है तुम्हारे पास सदा साथ देने वाला तुम्हारा सब्जियों वाला ठेला कहाँ गया? हमें बहुत सहूलियत रहती थी..।" रोमा सवालों के मशीनगन दाग रही थी।
  करीब पंद्रह-सोलह साल से रोमा अपने पति रोनित के संग उस अपार्टमेंट में रह रही थी । बिना नागा रामरतन को सब्जियों का ठेला लगाते देखा था। ऋतु बदलते रंग में, अचानक किसी अतिथि के आने से , अपने अस्वस्थ्यता में सब्जियाँ खरीदने जाने में उन्हें कभी परेशानी नहीं उठानी पड़ी। रामरतन को शहर से बाहर जाना होता तो भी वो सब्जियों से भरा ठेला उस अपार्टमेंट में गार्ड के हवाले कर जाता।
"वो क्या है मैडम जी सब्जियाँ बेचना सही नहीं रह गया था। कहीं मजूरी मिल नहीं रही थी। फाके के नौबत आ गए। मेरी पत्नी सिलाई का रोजगार करती थी। कुछ कपड़े घर में पड़े थे
कुछ पैसे गुल्लक में थे। उससे दोहरे कपड़े का फेसमासक व एक-एक सेनेटाइजर , थर्मोमीटर और साबुन कुछ जुगाड़ कर...।"
"सब्जियाँ तो बेची ही जायेगी और दूसरे ठेले वाले..,"
"शाबास रामरतन! तुम जो कर रहे हो बहुत अच्छा काम कर रहे... हम ऐसा काम करें जो दूसरे उसका नकल करें! और सुनो रोमा बाज पक्षियों संग नहीं उड़ता।" रोमा को अधूरी बात में टोकते हुए रोनित ने कहा।

××××××××

चिंता केवल अपनी करनी है ... अपने बचाव के लिए केवल अपने हाथों को साफ किया जा सकता है... सुरक्षा के लिए अपनी गाड़ी का प्रयोग करना है.. जो आबादी है और जिनके पास गाड़ी है और जिन्हें कार्य–स्थल जाना है ये तो भीड़ होना/ जाम होना स्वाभाविक है...

Tuesday, 2 June 2020

मातृभक्ति



"जानती हो तान्या! आज माँ किसी से फोन पर बात कर रही थी। किसी के बारे में उनको बता रही थी कि वो पोलो खेल रहे थे।" बेटा तनय चुहलबाजी में पारंगत होते हुए कहा।

"ओह्ह! उनसे आगे बात जाएगी कि कोई हॉकी खेल रहा था।" भला तान्या क्यों पीछे रहती खिलखिलाने में।

"अरे ,हाँ! वो भी आइस हॉकी।" तनय फिर चुहल करने में एक डग और आगे बात बढ़ाई।

असल बात यह थी कि 'मेमोरियल डे' के दिन अमेरिका के राष्ट्रपति गोल्फ खेलने निकले थे जो बच्चों की माँ ने चर्चा किया किसी से। मई के आखिरी सोमवार (25 मई 2020) को अमेरिका में 'मेमोरियल डे' मनाया जाता है। अमेरिका में इस महामारी के कारण जान गंवाने वालों का आंकड़ा एक लाख हो जाने पर राष्ट्रपति ने पिछले सप्ताह गुरुवार को देश के राष्ट्रीय झंडे को आधा झुकाने का आदेश भी दिया।

"चलो छोड़ो! अपनी माँ का ज्यादा मजाक नहीं उड़ाओ। वो गुल्ली डंडा भी बोल सकती थी।" बच्चों के पिता दो डेग आगे साबित हुए बात कहने में।

"हा!हा! रुकिए! रुकिए.. हम मज़ाक कर रहे थे । आप तो शेर को गीदड़ों के संग एक रेस में एक साथ दौड़ा दिए।" दोनों बच्चे माँ की तरफ हो गए।

Thursday, 28 May 2020

नई भोर


प्रदर्शी का जन सैलाब उमड़ता देखकर और विक्री से उफनती तिजोरी से आयोजनकर्ता बेहद खुश थे। जब बेहद आनन्दित क्षण सम्भाला नहीं गया तो उन्होंने अपने मातहतों से कहा,-"इस साल तुम्हारा बोनस दोगुना होगा।"

उनकी बात सुनते ही मातहतों में खुसर-फुसर शुरू हो गई.. –"वैश्विक युद्ध और लॉकडाउन की परिस्थितियों में एक साथ मिलकर चित्रकार, कशीदाकार, करघा कर्मकार सभी ने हालातानुसार 'भावनात्मक समानुभूति' से कपड़ों पर काम किया और उन वस्त्रों को देखकर हमें कितनी डांट खानी पड़ी थी।"

"कोई बात नहीं इनाम भी तो हमें ही मिल रहा है।"



वन विहार–
पक्षी उकेरा वस्त्र
प्रदर्शनी में।


Saturday, 23 May 2020

चीनी कानाफूसी




"अरे वाहः! फुटबॉल खेलने वाला पार्क खुल गया।" चौंकते हुए मैं बोली। शाम का समय था और चारों जन, मैं, मेरे पति और बेटे-बहू के साथ टहलने निकले थे। पचासी दिनों से पसरा सन्नाटा फुटबॉल पर पड़ते थाप से टूट गया था।
"हाँ माँ! बच्चों और बड़ों को खेलता देखकर अच्छा लग रहा है। कल हमलोग पहाड़ों की तरफ लॉन्ग ड्राइव पर घूमने निकलेंगे।" चहकते हुए मेरी बहू ने कहा।
"हमलोग भारत वापस जा सकते हैं, आज डर कुछ कम हुआ।" मैं बोली।
"वन सेकेंड! अभी ऐसे हालात नहीं हो गए। पार्क में लगे सूचना पट्ट को गौर से देखकर धैर्य से पढ़ लो। 'केवल परिवार सदस्यों के संग खेलें।' दूसरों के नजदीक ना जायें।" मेरे पति महोदय ने कहा।
"पापा ठीक कह रहे हैं। ग्रीन जोन जिस इलाके को कहा जा है, जहाँ शराब की दुकान खोली जा रही है , जिधर पार्क खोली जा रही या वहाँ के 'अस्पतालों में हरियाली की कमी हो गई है।" मेरे बेटे ने कहा।
"कुछ देर पहले ही तुम कह रहे थे कि सन् 2009 में जो स्वाइन फ्लू फैला था उसमें ज्यादा मौत हुई थी.. , ज्यादा हाहाकार मज़ा था। लेकिन मुझे कोई ऐसा वाक्या क्यों नहीं याद आता कि ऐसी लॉकडाउन की स्थिति बनी हो...!"
"तुम बिलकुल ठीक कह रही । कोरोना से होने वाली मौत का दर भी एक-दो प्रतिशत ही है। और वो मरने वाले भी पहले से किसी गम्भीर बीमारी से ग्रसित रहे हों।"
"कल की ही बात है 'हाइकु चर्चा' में डॉ. जगदीश व्योम जी ने एक गहरी बात कही,-
"आजकल वही सबसे अधिक परेशान हैं , जो अधिक संवेदनशील हैं ।"
"हाँ! तो 'अति सर्वत्र वर्जयेत्'। किसी पहले ने कहा कि 'राम आम खाता है' तो किसी अन्य तक बात पहुँची कि, -'आम राम को खाता है'।"



जीवन में जिंदा होना थोड़ा सा मुश्किल है,
हर रोज तो बेख़ुदी ही ज़मीर का कातिल है।



Wednesday, 20 May 2020

अजब-गजब पल


भले घर की लड़कियाँ
ये सब काम नहीं करती
ज़माना सही नहीं है
जब अभिभावकों के
हद के बाहर का हो
पलड़े का वजन


हड़काये रहा
जैसे कहानी को
लघुकथा नहीं बना पाती
हर कथन को
हाइकु नहीं कहती
बाल काटते
डूबी नहीं रहना उसी में
कॉल पर कार्टून नहीं
दिखना चाहिए


हज़ामत बनाते डरना नहीं


परबचन गीत

अ नोखी रीत समझ में बात है आयी, आ त्ममुग्धता  समझ में घात है आयी। थ मे राह लो परंजय उँगली थमाया क्यों झट गर्दन दबोचने नहीं दिया ...