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देवनागरी में लिखें

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Tuesday, 16 January 2018

मुक्तक


01.
हद की सीमांत ना करो सवाल उठ जाएगा
गिले शिकवे लाँछनों के अट्टाल उठ जाएगा
लहरों से औकात तौलती स्त्री सम्भाल पर को
मौकापरस्त शिकारियों में बवाल उठ जाएगा
02.
रंगरेज के डिब्बे लुढ़के बिखरे रह गए रंग
सतरंगी भुवन बने धनक सब रह गए दंग
नभ-गर्जन भूडोल उजड़े अनेकानेक नीड़
सपने टूटे प्रेमबंध छूटे बजने से रह गए चंग
03.
मनोरथ पार लगाती लिख डालो मेरे ढ़ंग को ऊर्ध्वा कहती
बवाली तो मैं कहलाती लिख डालो मेरे रंग को हवा कहती
अंतांत रार कर्णधार एकाधिकार का शोर घमासान रहा मचा
गोदी पड़ी जीत सिखाती लिख डालो मेरे खंग को दूर्वा कहती
(खंग=कमजोर शरीर)

Sunday, 14 January 2018

समय की कोमलता


"पुराना कम्बल ही हमें देने लाती न बिटिया!"
"क्यों! ऐसा आप क्यों बोल रही हैं? दान भी दें और कुछ साल ढ़ंग का हो भी नहीं तो वैसे का क्या फायदा"
"ये हमारे पास कल रहेगा कि नहीं तुम क्या जानो!"
"क्क्क्या ?
"तुमलोगों के जाते हमसे छीन लिया जायेगा और बेच दिया जायेगा!..."
"कौन करता है ऐसा?"
"इसी आश्रम का केयर-टेकर"
"क्या आप मेरे मोबाइल के सामने इसी बात को दोहरा सकती हैं ?"
"कल से फिर... ?!"
वृद्धाश्रम में वृद्धाओं और संगठित महिला दल से वार्तालाप चल ही रही थी कि वृद्धाश्रम के केयर टेकर को कैद में लेकर युवाओं का दल अंदर आ गया... संगठित महिला दल की एक सदस्या मोबाईल से लाइव टेलीकास्ट कर रही थी... 

Monday, 1 January 2018

"सुविधा सुमार"



“देखो भाया! आप बिहारी , मैं गुजराती ... उसपर से पक्का बनिया…। पड़ोसी हैं वो अलग बात है... , लेकिन लेना-देना हमारा व्यापार है… मैंने आपकी साल भर से बंद पड़ी स्कूटी ठीक करवा देने में मदद की… बरोबर… है न?”

“बिल्कुल ठीक कहा आपने । आप बड़ा काम करवा दिए…”

“अब हिसाब बराबर करने का है”

“ले आइये ढ़ेर सारा मिठाई… मिठाई से कर्जा थोड़ा उतर जाए…”

“अरे नहीं न । मिठाई तो अलग चीज है, वो तो पड़ोसी और अतिथि के नाते खाऊँगा ही…”

“अरे! फिर?”

“मुझे साहित्य का भूख है… अपनी आँखें इतनी खराब हो गई है कि खुद से पढ़ नहीं पाता कुछ और यहाँ दूसरे हैं नहीं जिनसे चर्चा कर सकूँ। आज विभा जी ने पढ़ कर सुनाई तो बहुत आनंद आया । अब तो आप जब तक यहाँ हैं , हमारी तो रोज यहाँ ही बैठक जमेगी ।”

“मुझे भी अच्छा लगेगा आदरणीय । गुजराती होते हुए भी आपको हिन्दी साहित्य में रुचि है । आप हाइकु जानते हैं । हाइकु सुनने वाले हिन्दी में ही कम मिलते हैं ।”

“एक बात कहूँ आप बुरा नहीं मानेगीं न?”

“बिल्कुल नहीं ! बोलिये…”

“आप अभी चार पृष्ठ पढ़ कर सुनाई हैं , उनमें से एक शब्द खटक गया “ईमानदारी”… ईमानदारी हिन्दी शब्द तो नहीं … “अब चलता है” मत बोल दीजियेगा… ”

“लोगों को मिक्सचर पसंद आने लगा है।”

Friday, 29 December 2017

जिंदगी है यूँ ही मरीचिका


बहुत पुरानी बात है करीब सन् 1972-1973 की
मैं एक साल विद्यालय नहीं जा पाई थी... गाँव में रहना पड़ा था... सुविधा नहीं था... प्रतिदिन विद्यालय जाने के लिए... दिनभर छत के बरामदा में बैठी, नाद से बंधे गाय बैल को खाते जुगाली करते देखती थी...
अभी बैंगलोर में ,वही याद आ रहा है... नाद से बंधी हूँ और खाना जुगाली करना जारी है...
#सोच_रही_हूँ_ना_जाने_कब_तक_यहाँ_हूँ_समय_का_सदुपयोग_करूं_स्कूटर_चलाना_सीख_लूँ...

डर गया सो....
सच पूछो तो कल जब स्कूटी पकड़ी तो अजीब सा डर समाया कि ना बाबा ना इस उम्र में अगर हड्डी टूटी तो जुड़ेगी भी नहीं...
बहुत भारी लगी स्कूटी पीछे से भगनी जबकि पकड़ी हुई थीं...
भगनी बोलीं चलिये मामी मैं भी अभी सीख ही रही हूँ... आपकी सहायता करती हूँ...
कल(28-12-2017) पहली बार उनके सपोर्ट पर पकड़ ही ली हेंडिल..
आज(29-12-2017) जब स्कूटी छुई तो लगा अरे मैँ लिए दिए धड़ाम होने वाली हूँ कोई पकड़ने वाला भी नहीं था
आज दिन भर हर थोड़ी देर पर पकड़ी घिसकाई...
अब डर नहीं है कि गिर जाएगी स्कूटी...
यूँ जाड़ों में धड़कन बढ़ाना ठीक नहीं... लेकिन सीखने की उम्र भी तो तय नहीं....


सत्यता से आँखें क्या चुराना
कल की कल देंखेगे फसाना
छीजे तन मन स्व बोझ बनता
चिंता फिक्र को लगाओ ठिकाना

Wednesday, 27 December 2017

वक्त को अजगर ना बनने दो




विभा :- "पत्रिका के लिए ,अपनी रचना मणि को भेज दीं क्या आप ?"
श्रेया :- "रंग वाली क्या दी? रंग पर अभी लिख ही नहीं पाई न दी कोई..."
विभा :- "अरे आपको लिखने में इतना क्या सोचना... !"
श्रेया :- "अरे नहीं दी ऐसा भी कुछ नहीं... बस ऐंवेंई जब कलम चलती तो लिख जाती कुछ भी... खैर! मैं आजकल में लिखने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करुंगी
विभा :- "ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्जे हुई न श्रेय वाली बात!"
श्रेया ❤️ :- "जै हुई न हमारी दीदिया वाली बात!"
विभा :- "हम प्रतियोगिता में भी अलग अलग नहीं हो सकते चाह कर भी!"
"श्रेय+ज्योत्स्ना"
श्रेया:- "चाहना ही काहे ऐसा? आप पिछले कई दिनों से हमारी ज्योत्सना दीदिया वाली बात नहीं कर रही थी न तो श्रेया को चांदनी मतलब ऊर्जा नहीं मिल पा रही थी न... पक्का पक्का कोशिश करुंगी दी..
आपने क्या लिखा दी ? और हायकु का क्या हुआ दी ?"
विभा :- "जनवरी से पेज बनाउंगी... दिसम्बर में बहुत तनाव रहा कई सवालों को लेकर
श्रेया :- "हम्म्म समझ सकती ! अभी पिछले बहुत से दिन हमारे भी तनाव भरे ही गुजरे परिवार व स्व स्वास्थ्य को लेकर...!"
विभा :- स्वास्थ्य के बारे में तो जानती हूँ हमेशा बात होती रहती है! परिवार ?"
श्रेया :- "अले दी पूछिए मत! जेठानी साहिबा ने बहुत ही परेशान कर रखा है
आए दिन का टेंशन... शराफत का नाजायज फायदा...!"
विभा :- "ओह्ह! आप जब जानती मानती हैं ,
शराफत का नाजायज फायदा तो बंद करने की कोशिश करनी होगी...!"
श्रेया :- "या कहें जीवन के रंग...!
अब तो यही लगता दीदू बहुत ज्यादा हो चुका...!"
विभा :- "बहुत होने के पहले नहीं रोका जाता तो कुछ नहीं बचता... !"
श्रेया :- "पर लगता बहुत ज्यादा तो हो चुका दी... पर फिर भी देखते हैं... अब क्या किया जा सकता...
वो तो नहा धोकर पीछे पड़ गई हैं मेरे... !"
विभा :- "क्यों सहा... मिला क्या ?
श्रेया :- "वही तो दी... हासिल कुछ नहीं!"
विभा :- "विरोध में जरूरी नहीं कि बदतमीजी किया जाए ,
लेकिन विरोध होना चाहिए अपने को सामान्य रख कर भी...!"
श्रेया :- "यानि इज्ज़त से मनाही?"
विभा :- "बिल्कुल... और नहीं तो क्या... "
श्रेया :-"अभी तो बीमारी का ही बोला..."
विभा :- "आत्म सम्मान सबसे पहले जरूरी... वैसे वो क्या चाहती हैं ?"
श्रेया :- "दाई नौकर की तरह समझना... गाहे-बेगाहे अपनी बेटी के ससुराल खुद ना जाकर , काम करने के लिए मुझे ही भेजने के लिए भी जिद करना..."
विभा :- "किसी का हक़ नहीं कि आपकी खुशियाँ छीने... अगर आपको पसंद नहीं तो अब , जब वे बुलाएँ तो आप तब बोलिए... देखते हैं... देखेंगे... इनसे पूछते हैं... खुद जाने का निर्णय आप कर सकती हैं... ऐसा ऊँगली क्यूँ पकड़ाईं आप ? दोषी आप भी हैं... !"


Friday, 24 November 2017

"इंसाफ"


"-अरे! ये क्या? आज का भोजन किसने तैयार किया है?" रात्रि भोजन के समय सभी खाने पर ज्यूँ ही एकत्रित हुए... थाली पर नजर पड़ते ही पिताजी चिल्ला उठे...
"-जरूर ई खाना मेरी पत्नी का बनाया हुआ है" सबसे छोटे बेटे की क्रोधित आवाज गूंजी...
"-सब जानते हैं उसे खाना बनाने में मन नहीं लगता है , फिर उसे क्यों बनाने दिया गया?" बड़े बेटे की दुखित आवाज गूंजी...
"-तो क्या केवल मेरी पत्नी ही चूल्हे में जलती रहे?" मझले बेटे की तीखी आवाज आई...
"-घर में कलह बढ़ता जा रहा था... दिन के भोजन बनाने के समय छोटी बहू नहाने-धोने व कमरे की सफाई की व्यस्तता का दिखावा करते हुए चौके की तरफ मुँह नहीं करती है... शाम में बाहर घूमने निकल गई या केवल सब्जी बनाने में हाँथ बंटा जिम्मेदारी समझ ली... परिवार नहीं टूटे अतः सुबह शाम खाना बनाने का बंटवारा मैं कर दी"
"लो बहुत होशियारी की हो तो खाओ आज मजेदार लज्जतदार खाना... दो रोटी के बराबर एक , तीन रोटी के बराबर एक , चार रोटी के बराबर एक रोटी"
"ना निमन गीत गायब ना दरबार बुला के जाएब" मझले बेटे-बहू की एक साथ व्यंग्यात्मक आवाज गूंजी
"छोटी बहू के साथ किसी का सम्पर्क नहीं होगा और वो केवल अपना खाना तब तक अलग बनाएगी जब तक सबके लिए पतली रोटी बनाना शुरू नहीं कर देती है..." पिताजी की रोबदार आवाज गूंज गई...

Monday, 13 November 2017

"मसक गया"


"बहुत देर हो गई दी आज ... रात के दस बज गए... 
ये लोग दिन में कार्यक्रम क्यों नहीं रखते हैं? 
रात में ही रखना जरूरी हो तो परिवार संग आने की अनुमति देनी चाहिए... है न दी...
वैसे विमर्श में सभी की बातें बहुत जोश दिलाने वाली थी"
"बातों में मशगूल हो हम गलत रास्ते पर आ गए बहना... ज्यादा देर होने से घबराहट और अंधेरा होने से शायद हम भटक गये... आधा घन्टा बर्बाद हो गया और देरी भी हो गई..."
दो क्लब के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम जिसमें विषय था कि "आज की सामाजिक दृष्टिकोण के कारण एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण वक्तव्य सामने आया है कि क्या पुरुष की दृष्टि में नारी का महत्व उसके शारीरिक आकर्षण और पहरावे के कारण है जिसकी कल्पना और कामना वह अपने लिये करता है ? क्या आधुनिक नारी केवल शारीरिकक सुन्दरता का प्रतीक है" से शामिल हो जोश से भरी ऑटो की तलाश कर रही बहनें देर होने से चिंताग्रस्त थी... तभी एक का फोन घनघनाया
हैलो!"
"इतनी रात तक कहाँ बौउआ रही हो?"
"बैठ गए हैं ऑटो में बस पहुंचने वाले ही हैं"
"बहुत पंख निकल गया है ... बहुत हो गई मटरगश्ती... 
कल से बाहर निकलना एकदम बन्द तुम्हारा..."
"पूछ! नहीं लौटूँ जेल, चली जाऊँ दीदी के घर..."