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देवनागरी में लिखें

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Monday, 22 July 2019

गिले-शिकवे



"मेरा तो समय ही नहीं बचता है..! बेटी यहीं डॉक्टर है, गाहे-बगाहे अक्सर आ जाती है.. उसके बच्चे हैं..! कभी बैंगलोर चली जाती हूँ..!आप सामाजिक कार्यों के लिए कैसे समय निकाल लेती हैं? ओह्ह अकेले रहती हैं न..! आप अपने बेटे बहू के पास कब जा रही हैं ?" पुरानी परिचित समाजिक मिलन समारोह में सबकी उपस्थिति का फायदा उठा रही थीं प्रचार-प्रसार कर सकें कि वो बहुत सुखी हैं।

"और आपका सामाजिक दायित्व वहन का क्या... मुझपर तरस नहीं खाइये... अकेले रहने के कारण नहीं, समाजिक ऋण उतारने के लिए, मनुष्य होने के कारण.. पशु तो हूँ नहीं..!"

खुद के बच्चों के परवरिश-नौकरी-शादी के बाद उनके बच्चों को संभालने का भी खुद का दायित्व समझ व्यस्त रहना कोई ना तो अनुचित है और ना यह अधिकार मिल जाता है कि किसी दूसरे को कमतर समझें...

किट्टी-पार्टी, भजन मंडली, आभूषणों को खरीद-बिक्री में, ब्यूटीपार्लरों में उमड़ती भीड़ क्या ख़लीहरों की नहीं होती....,

"आप तो घर में ही नहीं रहतीं, कब आपसे मिलने कोई आये..?" हँसते हुए व्यंग्यात्मक लहजा किसी तरफ से उछला।

"शादी से लेकर पैंतीस साल ड्योढ़ी के अंदर चौके से शयनकक्ष तक ही गुजरा है... कब किसने कितना खोज-खबर ली , दोहरा सकती हूँ किसी बच्ची के द्वारा दोहराई गई कविता की तरह..., मोबाइल सबके हाथों में है... आने की सूचना देकर जरूर आएं.. तब ना मिलूं तो जरूर सामाजिक स्थलों पर उलाहना दें...।"




Wednesday, 17 July 2019

दृढ़ता


जितना दिखता है उतना ही सच नहीं होता है



"सोमवार 16 जुलाई 2019 आकांक्षा सेवा का वार्षिकोत्सव आ रहा है दीदी आपको सबके साथ आना है! उस दिन के लिए अपना, लेख्य-मंजूषा तथा अन्य संस्थाओं का समय बचा कर रखियेगा..," मनोज जी (आकांक्षा सेवा संस्थान के सहयोगी) 16 जुलाई से पाँच-छ: दिन पहले बोले मुझसे बोले।
14-15 जुलाई को भेंट हुई जब तो बोले ,–"एक दो दिन बाद देखता हूँ ..."
–"क्यों भाई ? एक दो दिन के बाद क्यों देखोगे?"
"है कुछ बात ऐसी!"
"चलो ठीक है..,"
16 जुलाई को सुबह में मनोज भाई फोन किये कि "ममता शर्मा जी (आकांक्षा सेवा संस्थान की संस्थापिका) को बुखार हो गया है अतः वे बोल रही हैं कि एक दो दिन के बाद वार्षिकोत्सव मनाया जाएगा...,"
"जो बीड़ा उठाया है समाज का बुखार उतारने का वो खुद के लिये साधारण बुखार का बहाना कैसे बना सकता है या समाज सेवा का बुखार उतर गया ?"
"ना दीदी! ना! हरारत बरसात का असर है... एक भोरे से रात तक खड़े रहना , सब काम करना..,"
"सुनो! ज्यादा पैरवी नहीं करो...! जोखिम काम का बीड़ा उठाई हैं तो इतना करना ही पड़ेगा... और अभी बिना सहयोगी का कर रही हैं तो झेलना ही पड़ेगा.. स्व को त्याग कर ही समाज और साहित्य के लिए कार्य किया जा सकता है.. अस्वस्थ्यता को क्रॉसिन या कोई अन्य दवा से दूर करें और थोड़ी देर के लिए ही आएं.. मैं कुछ लोगों को लेकर आ रही हूँ..  'बस बच्चों के संग वृक्षारोपण करेंगे...'  वार्षिकोत्सव आज है तो आज ही मनेगा...! कल से चतुर्थ में प्रवेश कर जाएगा और हम पंचम शोर शराबे के साथ समारोह करेंगे...!"
"जी दीदी! ठीक है आइये...!"



.

Tuesday, 16 July 2019

//भटकते कदम//


"क्या आपलोग भी इसी समुदाय से हैं ?" पाँच सौ मीटर का झंडा लेकर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का किन्नरों के प्राइड परेड में शामिल एर्मिना , अदालिया , इलिना व गुनीत से विशालकाय मानव ने सवाल किया.. सामने से आते एकबारगी से पूछे गए सवाल से पहले तो सब सकपका गई फिर सम्भलकर एक साथ बोल पड़ी, -"नहीं हम समर्थन में शामिल हुए हैं!"
"वो अच्छा! आपलोगों को क्या लगता है इनलोगों को समाज के मुख्य-धारा में जुड़ जाना चाहिए? फिर इनसे मिलने वाली दुआओं व शुभकामनाओं का क्या होगा...!" पूछने वाले विशालकाय मानव का लहजा व्यंग्यात्मक हो गया।
"बिलकुल जुड़ जाना चाहिए... तभी कुछ भ्रांतियाँ नष्ट होंगी।" अदालिया ने कहा।
"कानून बन चुका है,ऐसे बच्चे घर-परिवार से दूर नहीं किए जाएंगे।" एर्मिना ने कहा।
"समाज भी साथ दे इसलिये तो यह आयोजन किया गया है,"इलिना का कहना था।
"हर घर-परिवार-समाज में विभीषण होता है! करोड़ों के उगाही का खपत कहाँ होगा..?" विशालकाय मानव के साथी ने कहा।

"क्या आपलोग भी इसी समुदाय से हैं ?" पाँच सौ मीटर का झंडा लेकर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का किन्नरों के प्राइड परेड में शामिल एर्मिना , अदालिया , इलिना व गुनीत से विशालकाय मानव ने सवाल किया.. सामने से आते एकबारगी से पूछे गए सवाल से पहले तो सब सकपका गई फिर सम्भलकर एक साथ बोल पड़ी, -"नहीं हम समर्थन में शामिल हुए हैं!"
"वो अच्छा! आपलोगों को क्या लगता है इनलोगों को समाज के मुख्य-धारा में जुड़ जाना चाहिए? फिर इनसे मिलने वाली दुआओं व शुभकामनाओं का क्या होगा...!" पूछने वाले विशालकाय मानव का लहजा व्यंग्यात्मक हो गया।
"बिलकुल जुड़ जाना चाहिए... तभी कुछ भ्रांतियाँ नष्ट होंगी।" अदालिया ने कहा।
"कानून बन चुका है,ऐसे बच्चे घर-परिवार से दूर नहीं किए जाएंगे।" एर्मिना ने कहा।
"समाज भी साथ दे इसलिये तो यह आयोजन किया गया है,"इलिना का कहना था।
"हर घर-परिवार-समाज में विभीषण होता है! करोड़ों के उगाही का खपत कहाँ होगा..?" विशालकाय मानव के साथी ने कहा।

Saturday, 13 July 2019

जिंदगी यूँ सँवरता गया।


आसपास की महिलाओं में प्रथम स्थान माँ का ही आता है उनसे समझ और धैर्य लिया तो जीवन सँवरता गया.. बाद में उनसे ही मिलता जुलता रूप हमारे बड़े भैया का रहा जो राह दिखलाने में सारथी बने , जिंदगी जब भी उलझने लगी समझ और धैर्य पतवार बने.. आगे बढ़ने पर बेटा ऊँगली थाम लिया.. फेसबुक-ब्लॉग पर लाया तो उसके ही दोस्त की माँ श्रीमती रश्मि प्रभा संगी बनी.. लेखनी थमाई... हौसला दी जमीं दिया.. अकेले चले थे कांरवा बनता गया... जिंदगी रोज आजमाती है.. कभी बोलती बंद करती है तो कभी दिमाग कुंद करती है .. कभी घुटने टेकने पर विवश करती है.. पर जिंदगी को हराती हूँ सदा.. कभी प्रेम, मौत और ईश पर बात नहीं करती हूँ क्योंकि उसे ना देखा और ना कभी आजमाया.. हाइकु की शोधार्थी हूँ... कल्पनाएं वर्जित है... जिंदगी के हकीकत की अभ्यर्थी हूँ..
छोटी-छोटी खुशी से बड़ी खुशियाँ मिलती है.. 


Thursday, 11 July 2019

"का बरसा जब कृषि सुखाने"




"रमुआ! रे रमुआ!" बाहर से ही शोर मचाते रतनप्रसाद घर में प्रवेश किये।
"क्या हुआ ? इतना गुस्सा में क्यों फनफना रहे हैं?" पत्नी रत्ना का सवाल धीमी आवाज में पूछे गये को अनसुना करते हुए फिर जोर से चिल्लाए..
"रे रमुआ! जिंदा भी है कि कहीं मर-मरा गया...,"
"जी मालिक आ गया बताइये क्या काम करना है?"
"चल, छोटी-छोटी कांटी और हथौड़ी लेकर बाहर चल..!"
"मुझे भी तो बताने का कष्ट करें कि क्या बात हुई है जिसके कारण आप इतने गुस्से में हैं...," रत्ना ने पूछा।
"अभी मैं अपने उच्च पदाधिकारी के साथ आ रहा था तो बहू के कमरे की खिड़की से पर्दा उड़ रहा था और बहू बिना सर पर आँचल रखे पलंग पर बैठी नजर आ रही थी। पदाधिकारी महोदय ने कहा भी प्रसाद जी वो आपकी बहू है ? खिड़की के पर्दे पर कांटी ठोकवा देता हूँ ! तुम कितने साल घूँघट में रही हो...।"
"आपके अक्ल पर पर्दा पड़ गया है... कल आपका वृद्धाश्रम जाना आज ही तय कर रहे हैं और आपकी खुद की बेटी अभी जो उड़ाने भर रही है ब्याहनी बाकी है! दुनिया में शोर है ज़माना बदल गया है... इक्कीसवीं सदी की महिलाएं फौज में और फ्लाइट उड़ा रही है... यहाँ उड़ते पर्दे में कांटी ठोका जा रहा है.. !! अक्सर देखा गया है जब मिसालें बनने का मौका मिलता है तो लोग अँधेरा चयन करते हैं मशालें बुझाकर.., कर्म खोटा चाहिए भजनानन्द..!"
स्तब्धता में रतनप्रसाद धम्म से कुर्सी पर गिर पड़े।

Tuesday, 9 July 2019

"हमराही"


"सुबह-सुबह मैराथन में हिस्सा लेने जा रही हैं क्या?" तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरती हुई विमला को देखकर उसकी पड़ोसन कमला ने चुटकी ली! अन्य किसी दिन सा विमला ने चुटकी का जबाब चुटकी से नहीं देते हुए अखबार बाँटने वाले से सभी प्रसिद्ध अखबार खरीद अपने घर में घुस गई। कल उसकी संस्था में आई नामचीन क्लब की सदस्याओं द्वारा अनेक प्रस्तावित बातों की खबरें जानने की उत्सुक सारे अखबारों को बार-बार पढ़ रही थी... खबरें विस्तार से तो थीं लेकिन ना तो उसका नाम और ना तो उसकी संस्था के नाम का जिक्र भी था...
    क्रोध के तिलमिलाहट में क्लब के अध्यक्ष को फोन किया, हेलो की आवाज सुनते फट पड़ी मानों बरसात में बादल फटा हो और सैलाब लाया,-"आपने मेरे साथ धोखाधड़ी किया, आपलोगों के वश में नहीं था कि स्लम के बच्चों को जुटाकर विद्यालय खोल सकें और उन बच्चों की देख-भाल कर सकें तो मेरे संस्थान को सहायता करने के नाम पर , संस्थान को गोद लेने का नाटक कर लिया और मेरे संस्थान के नाम का जिक्र भी नहीं किया कहीं भी...! मूसलाधार बारिश में पौधे सींचती हैं आपलोग..., इस कार्य के नाम पर जो फंड का जुगाड़ होगा उससे आपलोग मौज-मस्ती ऐश करेंगी...! संस्थान के विद्यार्थियों को स्लम के बच्चे- स्लम के बच्चे का प्रचार कर आपलोग महादेवी बन रही हैं...,"
"अरे! अरे! पहले मेरी बात तो सुन लीजिए थोड़ी धैर्य से..,"
"नहीं सुनना आपकी बात, अब क्या होगा सुनकर आपकी खोखली बातों को।"
"हमारा क्लब इस तरह के बीस-इक्कीस विद्यालयों को गोद लिया है ,जिनके विद्यार्थियों को हमारी ओर से सहायता की जाएगी। अधिक से अधिक विद्यार्थियों में उत्साह पैदा होगा ,विद्यालय आने और विद्यालय में टिके रहने के लिए तो सभी विद्यालय का अलग-अलग नामों का जिक्र ना तो उचित है और ना तो संभव... हमारा आपका उद्देश्य एक है, हमारी मंजिल एक है .. हाथों में हाथ ले मजबूत जंजीर बन,संग-संग चलने में समाज को लाभ ज्यादा है! हम मुट्ठी बने रहें!" पूरी तरह संतुष्टि नहीं मिलने पर भी सोचने का समय लेते हुए विमला ने फोन कट किया।

Friday, 5 July 2019

उलझन

गरिमा पाठक(रांची)
*गरिमा पाठक* :–शुभ प्रभात दोस्तों
हर दिन एक नये दिवस का इन्तज़ार

सबको   ही ...।
अपने अपने वक्त का इन्तज़ार है
हम जिन्दगी में हर वक्त यही तो सीखते रहते हैं
और जिन्दगी भर नहीं सीख पाते।
जन्म लेने के  पहले से लेकर
मृत्यु तक यही  तो किया है।

पहले जन्म लेने का इन्तज़ार
फिर बडे होने का ……...
बुढे होने का ……….
और  अन्ततः मृत्यु का इन्तज़ार..।

जन्म के समय हम कमजोर थे
और अन्त भी ऐसा ही होता  है
मन और तन दोनों ही
कमजोर होने लगता है।
तब सहारे की जरूरत होती है ।
हम  बुद्धिमान जीव सारा जीवन ही
बस इन्तज़ार में ही गवां देते है..।

सुबह में शाम का ……..
शाम को रात का…….
और  फिर से सुबह होने का ..।
बस यही तो चलता है सारा जीवन ।

क्या यही जीवन है ।
क्या हमने बस मरने केलिए जन्म लिया है??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- मरने का ना इंतजार है और सोचने का कि क्यों जन्म लिया है... अभी सुबह से रात तक यह सोचने में निकल जाता है कि समाज से जो ऋण लिया है उसका तो सूद ही नहीं चुके मूल कैसे चुका पाऊँगी... यही इसी पल तो है जिंदगी चूक हो रही है बड़ी-बड़ी..,

*गरिमा पाठक*:–विभा रानी श्रीवास्तव धन्यवाद मै तो सवालों के जवाब की तलाश में हूँ सिर्फ  आपने ही मुझे जवाब दिया...।वाह आह और बेहतरीन शब्दों से दिल खुश होता है लेकिन मन तो अशांत ही रह जाता है..।हम जब अशांत हो और जवाब नहीं समझ आऐ तो अपने बडो से या दोस्तों से समझने की कोशिश करते है मै भी वही टर रही हूँ ।आपके जवाब ने मुझे थोड़ी शान्ति दी है ...और अभी भी तलाश जारी है ..।
धन्यवाद दीदी
.आपको नमन...

मै क्यो आई हूँ दूनियाँ में ??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- माता-पिता के खुशी के पल प्रतिरूप होता है कोई बच्चा
परवरिश-संस्कार और वातावरण के आधार पर बच्चा अपना विचार बनाता बिगाड़ता रहता है
अपना कर्म अपने विचार पर तय करता है
आप क्यों आईं इस दुनिया में आपके अपने किये कर्म बतायेंगे आपको भी आपके समाज को भी

स्वार्थ में केवल स्व के लिए जी रही हैं और अपने खोल में लिपटी हैं या...,

*गरिमा पाठक* :–विभा रानी श्रीवास्तव ओह बहुत अच्छी बात कहा आपने ..।धन्यवाद

*विभा रानी श्रीवास्तव* :– 🤔आपके सवाल समाप्त हो गए...  लेकिन मेरा जबाब अकुलाहट में है लिख लूँ बात पूरी हो जानी चाहिए

हर पुरुष राम कृष्ण बुद्ध गाँधी मोदी नेहरू नहीं होता , अंगुलीमाल का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है
प्रत्येक स्त्री सीता अनसुइया मीरा राधा सरोजनी लक्ष्मी, लक्ष्मी बाई नहीं होती

विभा गरिमा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं अभी तो चल रही हैं...! सदा चलती रहेंगी।