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देवनागरी में लिखें

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Friday, 15 June 2018

"वक्त का गणित"


चित्र में ये शामिल हो सकता है: वृक्ष, आकाश और बाहर

कलाकारी करते समय कूँची थोड़ा आडा-तिरछा कमर की और जरा सा दूसरे जगह भी अपना रंग दिखा दी... हाथी पर चढ़े, टिकने में टक टाका टक अव्यवस्थित ऐसे कलश को देख मटका आँख मटका दिया...
       कलश को बहुत गुस्सा आया उसके नथुने फड़कने लगे... अपने गुस्से को जाहिर करने के पहले उसने दूसरे से मशवरा करना उचित समझा और सखा दीप से सलाह मांगी,
    "ऐसे हालात में मुझे क्या करना चाहिए?"
दीप ने कहा कि "क्या कुम्हार तुम्हें याद है... ?"
    थोड़ी ही देर में पाँच सुहागिनें मटका में जल भरने आईं और जल भर ज्यों टिकाने लगीं , मटका का राम-नाम सत्य हो गया...

Tuesday, 12 June 2018

"सम्मोहन"


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं

सरंचना पुस्तक पढ़ने में मैं व्यस्त थी कि मोबाइल टुनटुनाया
"हेल्लो"
"क्या आप पटना से विभा जी बोल रही हैं...?"
"जी हाँ! आप कौन और कहाँ से बोल रही हैं... ? क्यों कि यह नम्बर अनजाना है मेरे लिए...!"
"मैं हाजीपुर से मीता बोल रही हूँ।"
"जी बोलिये किस बात के लिए फोन की हैं... मुझे कैसे जानती हैं यानी मेरा नम्बर आपके पास कैसे आया ?"
"एक विज्ञापन के बारे में मेरी साधना आंटी से मुझे पता चला, उसी में आपका नम्बर दिया हुआ था... फेक तो नहीं यही कन्फर्म करने के लिए मैं कॉल कर बैठी!" बेहद प्यारी मधुर आवाज और खनकती हँसी के साथ मीता बात कर रही थी...
"मुझसे बात हो रही है तो फेक नहीं , यह तो कन्फर्म हो गया... अब आप अपने बारे में बताइये... मुझे कॉल करने जा रही हैं कय्या आप अपने अभिभावक को बताई हैं... आपकी उम्र क्या है?"
"मेरी उम्र 22 साल है ! फेक का कन्फर्म करना था अतः मम्मी पापा को नहीं बता पाई हूँ...।"
"आपकी उम्र 22 साल है तो
-आपकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई होगी
-पढ़ाई पूरी नहीं हुई होगी तो शादी भी नहीं हुई होगी
-शादी नहीं हुई होगी तो अपने माँ बाप की बड़ी जिम्मेदारी हैं आप..."

"जी!जी! आप बिलकुल सही समझ रही हैं!"

- विज्ञापन देखी होंगी तो उसमें 30-40 उम्र सीमा तय है ,उसपर आपकी नजर जरूर पड़ी होगी... उस स्थिति में आपका फोन करना, आपको ही शक के दायरे में ला खड़ा किया... एक औरत होने के नाते हर लड़की के बारे में सोचना मैं अपना दायित्व बना ली हूँ... कोई बच्ची मकड़जाल में फँस ना जाये... इसलिए आपको भी कहती हूँ पहले पढ़ाई पूरी कीजिये... माँ बाप जो तय करें उसमें उनका सहयोग करें... "

"आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आप मुझे सही मार्गदर्शन दीं... आपकी बात सदा याद रखूँगी"

समाज की जो स्थिति हैं आपको दिख रही होगी... ऐसे में बिना अभिभावक की अनुमति लिए , किसी अनजाने नम्बर पर फोन करना... गम्भीरता से सोचने का समय निकालियेगा ,अगर सच में मैं फेक होती तो...?"

Tuesday, 5 June 2018

◆अपनी_बारी_खुशियों_से_यारी◆

05-06-2018

आज सुबह चार बजे आँख खुली तो कच्ची नींद जगी हूँ , ऐसा नहीं लगा... एक पल सोचने में लगा दिमागी अलार्म बजा क्यों... उठकर मोबाइल सर्च की तो पता चला देर रात सूचना आई थी संगनी क्लब में जाना है... पर्यावरण रैली में शामिल होने... साढ़े छ में पहुँचना है... रात में सोते समय दिमागी अलार्म अपना सेट हुआ... साढ़े छ में पहुँचने का मतलब पौने छ में घर छोड़ देना... दो ऑटो बदलना ,नियत स्थान पहुँचने के लिए... घर के काम क्यू में... सिंक भरा रात के झूठे बर्त्तन से, आम-लीची के दिनों में कूड़ा ,अपार्टमेंट में कूड़ा उठाने आनेवाला शहंशाह (कोई नियमित समय नहीं) सुबह का नाश्ता (गृहणी को घर से बाहर अगर जाना हो तो अतिथि भी आयेंगे) आज दही-चूड़ा से तो बिल्कुल नहीं चलेगा... कुछ स्पेशल बना देना... वो तो चना मूंग फूला/अंकुरित रहता है... आलू उबला रहता है... खीरा-आम का दिन तो फल की चिंता नहीं और तैयार चटनी आचार थोड़ा खटमिठी , तड़का , खीर ... आटा गूंधो... सारे काम निपटाते समय सोच रही थी दो बातें...
जब पापा चार बजे उठते थे तो मैं झल्ला जाती थी "ना चैन से सोते हैं ना सोने देते हैं , चार बजे से उठकर सारे घर को उठा देते हैं..." चापाकल का शोर ही इतना कर्कश लगता था...
 
जब महबूब चार बजे उठकर तैयार होता था कोचिंग और विद्यालय के लिए... "कब बड़ा हो जाएगा कब नौकरी में आ जायेगा तो तान कर लम्बी नींद खिचुंगी"...

Saturday, 26 May 2018

"उड़ान"





तालियों की गड़गड़ाहट से सारा हॉल गुंजायमान हो रहा था... आज के समारोह में पढ़ी गई सारी लघुकथाओं में  सर्वोत्तम लघुकथा श्रीमती रंजना जी की घोषित की जाती है... मुख्य-अतिथि श्री महेंद्र मिश्र(वरिष्ट साहित्यकार नेपाल) जी के घोषणा के खुशियों की लाली से रंजना सिंह रक्तिम कपोल लिए , दोनों हाथ जोड़े , मंच से नीचे आकर लेख्य-मंजूषा संस्था (पटना) के अभिभावक डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी के चरण-स्पर्श कर, अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव के गले लग फफक पड़ी... विभा उनकी तरहखुशी से छलक आये आँसू को पोछते हुए एक कलम दवात का सेट पकड़ाते हुए बोली कि "याद है रंजना! कभी तुमने पूछा था , संस्था से जुड़ कर मैं क्या करूँगी दीदी...
"संस्था को श्रोता भी तो चाहिए न बहना..." दोनों एक संग खिलखिला पड़ीं...


Monday, 14 May 2018

एक तीर कई निशाने


"यह क्क्य्या नाटक लगा रखी हो... सुबह से बक-बक सुन पक्क गया मैं... जिन्हें अपने पति की सलामती चाहिये वे पेड़ के नजदीक जाती हैं... ई अकेली सुकुमारी हैं..." ड्राइंगरूम में रखे गमले को किक मारते हुए शुभम पत्नी मीना पर दांत पिसता हुआ झपट्टा और उसके बालों को पकड़ फर्श पर पटकने की कोशिश की... ।
    मीना सुबह से बरगद की टहनी ला देने के लिए अनुरोध पर अनुरोध कर रही थी... पिछले साल जो टहनी लगाई थी वह पेड़ होकर, उसके बाहर जाने की वजह से सूख गई थी... वट-सावित्री बरगद की पूजा कर मनाया जाता है... फर्श पर गिरती मीना के हांथ में बेना आ गया... बेना से ही अपने पति की धुनाई कर दी... घर में काम करती सहायिका मुस्कुरा बुदबुदाई "बहुते ठीक की मलकिनी जी... कुछ दिनों पहले मुझ पर हाथ डालने का भी बदला सध गया..."।
     शुभम सहायिका द्वारा यह शुभ समाचार घर-घर फैलने के डर से ज्यादा आतंकित नजर आ रहा था....

वट सावित्री-
सिर पै ठकाठक
बेना लागल
😜🤣

Saturday, 12 May 2018

माँ-सास... बहुत बारीक सा अंतर



"सयंम समझ संस्कार समय पर साथ नहीं हो!"
"तो... ?"
"मत गलथेथरी करो कि माँ का सम्मान बरक़रार है"
"कैसे...?"
"हर स्त्री को उचित मान देकर"

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लफ्ज़ और इश्क का हिस्सा
सास तथा बहू का किस्सा

"विभा जी आपको अपने सास बनने के अनुभव को लिखना चाहिए... जिसे पढ़कर मुझ जैसी चिंताग्रस्त कई माँ निश्चिंत होगी तो कई सास शायद अपने में सुधार कर ले..."
    मौका था माया का अपने जन्मदिन पर अपनी माँ के पास जाना... मैं भी संग गई थी... वापसी के दिन उसकी माँ कुछ उदास लगी तो मैं बोली कि "माया की खुशियों का ख्याल रखने की जिम्मेदारी अब मेरी है... मेरे बेटे से भी कोई गलती होती है तो मैं माया के संग ही खड़ी मिलूंगी..." मेरे इतना कहते माया की माँ की आँखों से गंगा-जमुना...
  कहीं बहू सास की मनपसंद नहीं तो कहीं सास बहू के स्तर की नहीं... समाज में फैले इस रूप को कई बार अनुभव में देखने को मिला... खाई को पाटने की कोशिश दोनों पाटों को थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ पहल कर करनी चाहिए... लेकिन अहम इतना , "क्यों" पर अटकी रह जाती हैं दोनों की दोनों...
    माया रोये जा रही थी... सब हक्का-बक्का... हुआ क्या... उससे पूछने की कोशिश में लगे कि किसकी किस बात से वो इतनी आहत हुई... हम सब (मैं , मेरे पति , मेरा बेटा) एक दूसरे से सवाल कर रहे थे किसने क्या कहा... थोड़ी देर के बाद उसने कहा कि, "मैं जब भी किचन में जाती हूँ हाथ धोकर जाती हूँ... माँ मुझे कुछ करने नहीं दे रही हैं , तो मुझे रोना आ गया"
मैं :- पर काम क्यों करना चाह रही हो? क्यों सोचती हो कि तुम्हारी जिम्मेदारी अभी से है चौका संभालना... तुम वर्किंग-वूमेन हो । जहां रहती हो भागमभाग की जिंदगी गुजारती हो । यहाँ आठ दिन के लिए आई हो... आराम करो और सबके साथ समय अच्छे से गुजारो... तुम्हें हिचक ना हो इसके लिए ही तो खाना बनाना सिखाई सहायिका को..." जहाँ तक हाथ धोकर चौके में जाने की बात है... "सफाई के मामले में मुझे थोड़ा पागल समझते हैं लोग..."
    चौके से उठा धुंआ और दीप से उठे धुएं के कालिख में कितना अंतर... एक से दाग तो एक से नजर ना लगे के बचाव से सुंदरी का श्रृंगार... शक और गलतफहमी का धुंआ दिल में कालिख लगाए उसके पहले चिंगारी को खत्म कर देने की कोशिश सास-बहू को मिलकर करनी चाहिए... राख में भी दबी ना रह जाये चिंगारी... इसमें अहम भूमिका होती है सास के पति व बेटे और बहू के पति व ससुर की... नट की धार है... चलना कठिन नहीं तो आसान भी नहीं... 
  एक बार कल की सुबह मेरी वापसी थी बैंगलोर से पटना... मेरी यात्रा अकेले की थी... जब तक मैं रही अपने सुविधानुसार माया-महबूब घर में मेरे साथ रहे... आज की शाम माया ऑफिस से वापिस आकर अपने कमरे में सीधे चली गई... बहुत देर हो गई वो कमरे से बाहर ही नहीं आई... और इंतजार कर मैं उसके कमरे में झांकी तो वह  पीठ ऊपर किये लेटी हुई थी, चेहरा नहीं दिखा, अंदाज़ा लगा ली मैं कि वह सो रही होगी... दिनभर व्यस्त रही होगी तो थक गई होगी... व्यस्तता के कारण ही तो आज एक बार भी फोन नहीं की नहीं तो नाश्ता कर लीं , खाना क्या बनाईं , ज्यादा काम मत कीजियेगा , कहीं घूम आइयेगा , आज ऑर्डर कर दी हूँ लंच आपका , आज शाम में घूमने चलेंगे रात में डिनर कर वापस होंगे ... दिनभर में कई फोन करती। आज भी ऑफिस जाते बोल कर गई थी , शाम में जल्दी आएंगे मूवी देखेंगे , बाहर से ही डिनर कर वापस होंगे... कल माँ चली जायेगी... मगर अब तो रात बहुत हो गई उठाना चाहिए सोच उसके पास जाकर उसके पीठ पर ज्यूँ हाथ रखी वो तो रो रही थी... मैं स्तब्ध... हुआ क्या ? बहुत पूछने पर किस्सा कुछ यूँ सामने आया...
महबूब जिस कम्पनी में काम करता था उसी कम्पनी में माया के लिए नौकरी की बात चली... इंटरव्यू हुआ सलेक्शन हुआ जॉइनिंग लेटर/ऑफर लेटर आया... माया जिस कम्पनी में पहले से काम कर रही थी उस कम्पनी में बता दी कि वो रिजाइन कर रही है... इतनी प्रक्रिया के बाद खुशी-खुशी अपने ससुर को बताने के लिए फोन की कि अब वह सुकूँ वाले पल जियेगी क्यों कि दोनों के दो कम्पनी में काम करने से यह ज्यादा परेशानी होती थी कि एक की छुट्टी तो दूसरे का ऑफिस खुला... दोनों के ऑफिस जाने का समय अलग-अलग । ससुर जी समझा दिए कि एक ऑफिस में काम करने से दोनों के निजी रिश्ते प्रभावित तो होंगे ही... प्रभावित ऑफिस के कार्यों से भी होगा... समझाने के साथ आदेश भी था कि एक ऑफिस में काम मत करो...
मैं :- तुम पापा की बातों से सहमत हो?
माया :- हाँ! माँ ! महबूब भी यह सही समझ रहे हैं...
मैं :- क्या तुम्हारे पहले वाले ऑफिस में तुम्हारा रिजाइन करना स्वीकृत कर लिया है ?
माया :- अभी नहीं माँ... कर तो लेगा ही न
मैं :- नहीं करेगा! जिस कर्मचारी को पूरा खर्च कर विदेश भेज ट्रेनिंग करवाया है उस कर्मचारी को बिना मूल-सूद वसूल किये ,कभी नहीं , किसी कीमत पर भी नहीं दूसरे कम्पनी को फायदा पहुंचाने देगा...
माया :- मैं तो इस बिंदु पर सोच ही नहीं सकी ... यू आर ग्रेट माँ
मैं :- आज का जो कीमती दिन तुम गंवा दी क्या उसे वापस कर सकती हो....

माँ सी शक्ल पाई हूँ
उनकी खूबसूरती नहीं पा सकी
हर ठिठके पल में उनको याद की
वैसे हर पल में सोचती कि वे होती तो क्या करतीं
और नकल करने से निवारण होता गया
कुछ अगर कमियां रही तो
नकल तो नकल है...

रानी बेटी माया को बताई लिखने जा रही हूँ तो


मातृदिवस की बधाई

Friday, 27 April 2018

"लेखनी की आत्महत्या"




           बिहार दिवस का उल्लास चहुँ ओर बिखरा पड़ा नजर आ रहा... मैं किसी कार्य से गाँधी मैदान से गुजरते हुए कहीं जा रही थी कि मेरी दृष्टि तरुण वर्मा पर पड़ी जो एक राजनीतिक दल की सभा में भाषण सा दे रहा था। पार्टी का पट्टा भी गले में डाल रखा... तरुण वर्मा को देखकर मैं चौंक उठी... और सोचने लगी यह तो उच्चकोटी का साहित्यकार बनने का सपने सजाता... लेखनी से समाज का दिशा दशा बदल देने का डंका पीटने वाला आज और लगभग हाल के दिनों में ज्यादा राजनीतिक दल की सभा में...

स्तब्ध-आश्चर्य में डूबी मैंने यह निर्णय लिया कि इससे इस परिवर्त्तन के विषय में जानना चाहिए... मुझे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी... मुझे देखकर वह स्वत: ही मेरी ओर बढ़ आया।

     औपचारिक दुआ-सलाम के बाद मैंने पूछ लिया , "तुम तो साहित्य-सेवी हो फिर यह यह राजनीति?"

   उसने हँसते हुए कहा, "दीदी माँ! बिना राजनीति में पैठ रखे मेरी पुस्तक को पुरस्कार और मुझे सम्मान कैसे मिलेगा ?"

        मैंने पूछा "तो तुम पुरस्कार हेतु ये सब...?
   बन्धु! राजनीति में जरूरत और ख्वाहिश पासिंग बॉल है...

पढ़ा लिखा इंसान राजनीति करें तो देश के हालात के स्वरूप में बदलाव निश्चित है...
दवा बनाने वाला इलाज़ करने वाला नहीं होता... कानून बनाने वाला वकालत नहीं करता...

    तो साहित्य और राजनीति दो अलग अलग क्षेत्र हैं तो उनके दायित्व और अधिकार भी अलग अलग है..."

मेरी बातों को अधूरी छोड़कर वह पुनः राजनीतिज्ञों की भीड़ में खो गया... साँझ में डूबता रवि ना जाने कहीं उदय हो रहा होगा भी या नहीं...

   अगर स्वार्थ हित साधने हेतु साहित्यकार राजनीतिक बनेगा तो समाज देश का दिशा दशा क्या बदल पायेगा... मैं अपनी मंजिल की ओर बढ़ती चिंतनमग्न थी...