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देवनागरी में लिखें

Tuesday, 20 November 2018

"घटाटोप खामोशी"


दरवाजे की घँटी बजी ,मेरे पति दरवाजा खोल आगंतुक को ड्राइंगरूम में बैठा ही रहे थे कि मैं भी वहाँ पहुँच गई... दो मेहमान थे जिनमें एक से मैं परिचित... मैं वहाँ से हटने वाली ही थी कि अपरिचित ने कहा, "मुझे पहचानी आँटी?" और मेरे नजदीक आकर चरण-स्पर्श कर लिया.. आदतन आशीष देकर हट जाना चाहती थी... लेकिन बैठ गई...
"यह वही हैं! जो तीन साल पहले, जब गिरने से तुम्हारे पैर में चोट लगी थी तो सड़क से उठाकर घर तक अपने गाड़ी से पहुँचा गए थे। तबादला हो-होकर कई ब्रांच सैरकर वापस आ गए!" मेरे पति की आवाज थी।
"ये! ऐसा कैसे हो सकता है?"मैं स्तब्ध थी
"आप आँटी मुझे भूल गईं क्या?" वह भी आश्चर्य चकित था।
”आपकी आँटी भूली नहीं हैं... तीन साल से कर्ज उतार रही हैं... मेरा, अपना खाता तो खुलवाई ही उस बैंक में जिसमें आपलोग काम करते हैं! कई स्कीम में भी पैसा डलवाती रहती हैं... आपके साथ आये इन महोदय को वो समझ रही हैं जो इन्हें यकीन दिला चुके हैं कि ये ही सड़क से उठाकर घर पहुँचाये थे...।"
पिन भी गिरता तो शोर मचता......

Tuesday, 13 November 2018

आस्था निजी भावना


समय बदला , बदले समय के साथ बहुत कुछ बदल गया... बदलते समय के साथ, नहीं बदला है तो कुछ लोगों की ओछी मानसिकता... पर्व-त्योहार के समय कुछ ना कुछ बकवास सुनने के लिए मिल ही जाता है...
अतित की बातें हैं, घर की कोई #एक बुजुर्ग महिला छठ करती थी, जब तक उनका शरीर चलता रहता था। जब वे पूरी तरह से निर्बल हो जाती थी तो उनके बाद उस घर की जो बड़ी महिला होती थी, वह व्रत करना शुरू करती थी...

"बुजुर्ग महिला इसलिए छठ करती होगी कि वह सूर्य से गर्भवती हो जाये... ? सनकी को सवालों से घेर लेती... लेकिन... समय के साथ मैं बदल गई हूँ..."

हाँ। तब व्रती महिला सिला कपड़ा नहीं पहनती थी... गांठ लगा कर पेटीकोट का कपड़ा(लूंगी की तरह) और ब्लाउज का कपड़ा भी गांठ(कंचुकी) लगाकर...
हो सकता है , दो कारण होता होगा (मेरी सोच) रूढ़िवादी और अशुद्ध होने की भावना...
#रूढ़िवादी:- एक उम्र होने के बाद महिलाएँ सिला हुआ ब्लाउज पेटीकोट नहीं पहनती थी... तर्क के आगे उनकी सोच तब नहीं थी...
सिले कपड़े को अशुद्ध मानते थे। कारण बस यह है कि पहले के समय में सिले कपड़े नहीं होते थे...।

"तलवार उतना ही भाँजो ,जितना से दूसरे की नाक ना कटे"