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देवनागरी में लिखें

Monday, 31 December 2018

आगुन्तक का सदा स्वागत


नव वर्ष की मंगलकामना

मत सोचा करो, कल की चिंता में मत घुला करो
वरना हृदयाघात पर अपने हाथ मत मला करो
सोलह-अठारह गुजर गया फँस उन्नीस-बीस के चाल में
उंगलियाँ ठहर गई बेकल उलझी-उलझी खिचड़ी बाल में

Saturday, 29 December 2018

"मूल्यांकन"


किश्त-मुश्त के फेर में जनाब
बही जोह हो रहा हिसाब
क्या-क्या बदल जायेगा
बदलते तिथि दिन माह के साथ
उलझे जीवन को सुलझाते
सब तो यही कहते वाह के साथ
अंत के गर्भ में आरंभ है
मोह तृष्णा नाश स्तंभ है
कल इतिहास कल रहस्य में
धन्यमन्य जुदा पारिहास्य में
जुड़ाव प्राप्य के रंग-मध्य
भ्रान्‍तचित्‍त मांगे सायुज्य

Monday, 24 December 2018

"क्रिसमस का तौहफा"



"हैलो"
    "मम्मा आपसे एक बात करनी है...!"
"हाँ! बोलो... तुम्हारी आज छुट्टी है क्या?"
       "हाँ माँ! यहाँ इस समय दस दिनों की छुट्टी होती है... आप चाची के पास ही होंगी... फोन का स्पीकर ऑन कीजिये न...!"
"फोन का स्पीकर ऑन कर दी हूँ.. बोलो क्या बोलना है...!"
   "मिंटू भैया को जन्मदिन की हार्दिक बधाई कहना था माँ! लो माँ बारह बज गए 25 दिसम्बर शुरू हो गया.. और दूसरी बात थी कि आपका-पापा का चाची और मिंटू भैया का वीजा हो गया है... आप चारों एक संग हमारे पास आ रहे हैं...।"
"क्या कह रहे हो बेटा! ऐसा कैसे हो सकता...? दुनिया क्या कहेगी...? साल भी नहीं लगा तुम्हारे चाचा को गुजरे...!"
   "दुनिया को कहने के लिए तो विदेश आना होगा चाची...! आप सुनने दुनिया के पास थोड़ी न फिर जा रही हैं... सदा के लिए आपदोनों हमारे संग रहेगी..। यह आपकी बहू का सुझाव और जिद है...!"
   "बहू को अंदाजा भी नहीं, आग के शोलों पर चलना क्या होता है...! एक अविकसित व्यस्क बेटे के साथ एक गैर चाची को अपनाना...! सोच को सादर नमन करती हूँ..!"
       "चाची! गैर और अपने की परिभाषा को हम परिभाषित करने लगेंगे तो पापा और चाचा के बचपन से लेकर अबतक के इतिहास में जाकर तौलना होगा कि कब , किस मित्र का कहाँ-कहाँ पलड़ा भारी रहा होगा... अच्छा चाची एक बात बताइये... आपकी जगह मेरी माँ होती और मेरी जगह आपके बेटे-बहू के ये विचार होते तो क्या स्थिति होती?"
"पड़ोस की हर बहू 'सांता क्लॉज' नहीं हो सकती बेटा...!"

Saturday, 22 December 2018

"मिथ्यात्व"



"क्या सुधीर तुम खुद अपनी शादी कब करोगे?" छठवीं बहन की शादी का निमंत्रण कार्ड देने आए सुधीर से संजय ने सवाल किया...।
      आठ साल पहले संजय और सुधीर एक साथ नौकरी जॉइन किया था... लगभग हम उम्र थे... संजय की शादी का दस साल गुजर चुका था तथा उसका बेटा पाँच साल का था...
   "बस इनके बाद एक और दीदी की शादी बाकी है... उनकी शादी के बाद खुद की ही शादी होनी है मित्र...। मेरी जो पत्नी आये वो मेरे घर में कोई सवाल ना करे... शांति से जीवन गुजरे।"
        "बेटे के चाह में सात बेटियों का जन्म देना.. कहाँ की बुद्धिमानी थी, आपके माता-पिता की?" संजय की पत्नी ने सवाल किया।
      "हमें सवाल करने का हक़ नहीं है नीता... वो समय ऐसा था कि सबकी सोच थी, जिनके बेटे होंगे उनका वंश चलेगा, तर्पण बेटा ही करेगा...,"
    "सुधीर जी तर्पण ही तो कर रहे हैं... आठ बच्चों को जन्म देकर परलोक सिधार गए खुद... सात बेटियों का बोझ लटका गए सबसे छोटे बेटे पर... कुछ धन भी तो नहीं छोड़े... उनकी नाक ऊँची रह गई... ऐसा सपूत पाकर...।"

Tuesday, 18 December 2018

–"आज का हामिद"–


तब हामिद क्या करता, कल्पना करना मुश्किल लगा तो सोच रही हूँ...
                ––"आज का हामिद"––
#गाँधीमैदान में ट्रेड फेयर लगा था। स्कूल के कुछ मित्रों ने वहाँ चलने की योजना बनायी। सभी बच्चे बड़े घरानों से थे लेकिन कौशल एक मजदूर का बेटा था। वो उनके साथ नहीं जाना चाहता था मगर मित्रों के भावनात्मक दबाव में आकर उनके साथ चल पड़ा।
गाँधीमैदान पहुँचकर सभी मित्र मेला घूमने लगे। एक जगह सभी चाट खाने रुके मगर गौरव ने बहाना बनाया,"यार! मेरे पेट में कुछ गड़बड़ है.. तुमलोग खा लो..।" गौरव मित्रों के साथ मेला घूमता रहा। उसके मित्र कुछ-कुछ खरीदते जा रहे थे किन्तु गौरव कई चीजें खरीदना चाहकर भी जेब में पड़े सौ रुपये के कारण मन मसोस कर रह जाता। वह सोचता क्या खरीदूँ? उसे अपने कोर्स में पढ़ी प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' याद हो आयी। उसे लगा वह गौरव नहीं हमीद है। गौरव अपनी दादी के लिए चिमटा नहीं चश्मा खरीदना चाहता था ताकि दादी अपने कार्य ठीक से कर सकें। कम दिखने की वजह से कभी रोटी जल जाती तो कभी सब्जी में नमक कम या ज्यादा हो जाता। उसके मित्र एक बड़े दूकान में कुछ ख़रीदने के लिए रुके तो वह सामने चश्मे की दूकान पर रुका,"भैया! मेरी दादी को ठीक दिखलाई नहीं देता है उनके लिए एक चश्मा चाहिए।"
"अरे! उसके लिए तो अपनी दादी को किसी डॉक्टर के पास लेकर जाओ.. डॉक्टर चेककर नम्बर लिख देगा। उस पुर्जी को लेकर नाला रोड में किसी चश्मे की दूकान से खरीदना होगा। यहाँ तो गोगल यानी धूप से बचने के चश्मे मिलते हैं।"
"नजर वाला चश्मा कितना में मिलेगा?"
"पाँच छ: सौ तो लग ही जायेगा।"
"ओह्ह! पर मैं तो बहुत ही गरीब...,"
"तुम अपनी दादी की आँखें पी.एम.सी.एच. में दिखला लो, सबसे अच्छा होगा... कुछ स्वेच्छित संस्थाएं उसमें गरीबों हेतु कैम्प लगाती हैं। आजकल राणा प्रताप भवन में कैम्प लगा हुआ है.. वहाँ अपनी दादी को ले जाओ, मुफ्त में चश्मा मिल जाएगा।" गौरव बहुत खुश हुआ।
"चलो मैं भी एक आइसक्रीम खा ही लेता हूँ...।" बीस रुपया आइसक्रीम वाले को देकर अस्सी रुपये बचाकर घर लौट आया।
"दादी!कल हमलोग राणा प्रताप भवन चलेंगे।"
"क्यों?'
"तुम्हारी आँखें दिखलाकर चश्मा लाने...।"
"अरे बेटूवा! काम तो चल ही रहा है...।"
"नहीं दादी! हमेशा अंधेरे में रहना ठीक नहीं है.. जीवन का सही आनन्द उजाले में ही है...।"

गतिशील पल में पुकारे जायें' 'मानव-जीव'


ट्रेन में दो-तीन किन्नरों ने प्रवेश किया और यात्रियों से पैसे वसूलने लगे। माँगते-माँगते वो एक बर्थ के पास आकर सब रुक गये अपने-अपने भाव मुद्राओं में ताली बजाने लगे। उस बर्थ पर पति-पत्नी और लगभग बारह/तेरह वर्ष का बच्चा भी बैठा हुआ था। किन्नरों को ताली बजाते देखकर बच्चे में भी हलचल होने लगी मानों वह भी किन्नरों की तरह ताली पीटना और लटके-झटके दिखलाना चाह रहा हो ,लेकिन किसी दबाव में (मानों उसकी माँ द्वारा बराबर दी जाने वाली हिदायतें याद हो रही हो) वह खुद पर नियंत्रण रखकर शांत रखने की कोशिश भी कर रहा हो.., लेकिन एक किन्नर को संदेह हो गया कि वह बच्चा हमारे जेंडर का है। उसने अपने अन्य साथियों से भी कहा और वो सब ताली बजा-बजा कमर लचकाने लगे। एक किन्नर जो उनके दल का मुखिया था ने उस दम्पति से कहा, "ये बच्चा हमारे बिरादरी का हमारी नई पीढ़ी है , इसे हमें दे दो।"
"माँ ने कहा,"इसे जन्म मैंने दिया है, लालन-पालन मैं कर रही हूँ, तुमलोगों को क्यों दे दूँ?"
"यही परम्परा है.. इसलिए...।"
"मैं नहीं मानती ऐसी किसी परम्परा को.. अपनी जान दे-दूँगी ,मगर अपना बच्चा किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी.. नहीं की नहीं दूँगी...।"
सब नोक-झोंक सुनकर बच्चा घबराकर रोने लगा और अपनी माँ के पीठ से चिपक गया,"मैं अपनी माँ को छोड़कर किसी के साथ भी नहीं जाऊंगा...।"
किन्नर का दिल बच्चे एवं माँ के मध्य वात्सल्य भाव देखकर पिघल गया। माँ उन्हें सौ रुपये का नोट देना चाहा मगर वेलोग नहीं लिया.. और जाते-जाते कहते गए,"माँ इसे खूब पढ़ाना.. अब तो सरकार हमलोगों को भी नौकरी देने लगी है...।"
"हाँ! हाँ! इसे पढ़ा रही हूँ । कुशाग्र है पढ़ाई में... मेरे परिचित में कई ऐसे हैं जो बड़े ऑफिसर बन चुके हैं...।"
वे खुश होते हुए बोले,"जुग-जुग जिए तेरा लाल... काश ऐसे जन्मे सभी मानव जीव के माँ-बाप तुमलोगों जैसे पढ़े-लिखे होते...।"

Sunday, 16 December 2018

बदल जाना जाँ



शिशिर की सफेद धूप स्याह निशा में बदल चुकी थी... घर के किसी कोने में रौशनी करने से सब चूक रहे थे... अस्पताल में सबकी मुट्ठी गर्म कर घर तो आ गए थे... घर में फैले शीत-सन्नाटा को दूर कैसे किया जाए सभी उलझन में थे...
"इतनी मुर्दनी क्यों छाई है? चलो समीर अपनी माँ और अपनी चाची से बात करो और सबके लिए भोजन की व्यवस्था करो...।"
"पर दादी...?" समीर अपनी दादी की बातों पर आश्चर्य चकित होता है...
"पर क्या समीर...! तुमलोग नई सदी में जी रहे हो... दुनिया बिना शादी के संग रहने के रिश्ते को स्वीकार कर रही है... समलैंगिक संबंधों को स्वीकार कर रही है... तो हम अपने घर में हुए मानव जीव को स्वीकार नहीं कर सकते...?"
"दुनिया क्या कहेगी?और उनकी दुनिया में पता चला...," समीर के दादा जी की गरजती आवाज आज फुसफुसाहट में बदली हुई थी
"टी.वी. सीरियल और फिल्मों को बेचकर धन बटोरने के लिए झूठी कहानियाँ फैलाई गई है... अगर सच बात होती तो गौरी प्रसाद समाज के मुख्य धारा से कैसे जुड़ी रहती? उन्हें क्यों नहीं...,"
"तुमसे बहस में कौन जीत सकता है...!"
"प्राचीन तम को हमें दूर करना ही होगा... थर्ड जेंडर भी तभी मुख्य धारा में जुड़े रह सकते हैं... उनकी जिंदगी बदल सकती है..."
निशीथ काल मिट रहा था और नई सुबह का कलरव सबको उत्साहित कर रहा था...

Thursday, 13 December 2018

"आधे में अधूरा-पहला प्यार"


एक लंबे अर्से के बाद उषा और निशा का मिलन हुआ… नदियों का आपस में मिलना आसान है , लेकिन अलग-अलग शहरों में ब्याही एक गाँव की बेटियों का मिलना कहाँ हो पाता है.… अपने मायके से बुलावे और ससुराल से भेजे जाने के बीच तारतम्य बैठाने में समय गुजरता जाता है… मिलते ही उषा निशा के हाल-चाल पूछने के क्रम में वैवाहिक जीवन कैसा चल रहा है ? जानने की जिज्ञासा प्रकट करती है. निशा बताती है कि उसका वैवाहिक जीवन बेहद सुकून भरा है… पति , सास-ससुर सभी बेहद प्यार और सम्मान देते हैं
“और भानु”
“दिल में खुदा नाम कहाँ मिटता है!”
“अपने पति को कभी बताया?”
“मीरा की तरह जहर का प्याला पीने की साहस नहीं जुटा पाई!”
“भानु की तुलना कृष्ण से?”
“ना! ना! तुलना नहीं। ईश और मनु में क्या और कैसी तुलना! भानु को कहाँ जानकारी है मेरेे मनोभावों की।”
निशा ने जब से होश संभाला था ,तब से ही अपनी माँ की बातों से उसे पता चला था कि उसकी शादी , मामी के भतीजे भानु से होगी और तब से भानु नाम उसने दिमाग में बैठा लिया था और भानु की प्रतीक्षा करने लगी थी। लेकिन भानु और निशा का मिलना कभी हुआ है...?

Saturday, 8 December 2018

"जीवंतता"




       #स्व लेखन की पुस्तक के लोकार्पण होने पर मेरी प्रसन्नता इंद्रधनुषी हो रही थी..। सोच बनी कि घनिष्ठ मित्रों को भी एक-एक प्रति भेंट करनी चाहिए। मित्रों की सूची बनाने के क्रम में बिगत सात वर्षों से फेसबुक पर बनी मित्र महिमा जो स्थानीय ही रहती थी, मिलकर उसे पुस्तक भेंट करने के विचार से उससे मिलने चली गयी।
   उससे बातचीत करने पर पता चला यह वही है जो कक्षा अष्टम में मेरे साथ ही पढ़ती थी और अब वह एक विद्यालय में शिक्षिका है। उसे पुस्तक भेंट करते हुए मुझे जितनी प्रसन्नता हुई, उससे कई गुणा ज्यादा वह प्रसन्न हुई। किन्तु बातचीत में मुझे लगा कि वह स्वस्थ्य नहीं है। मैंने पूछ ही लिया, "क्या बात है, तुम स्वस्थ्य नहीं लग रही हो ?"
    "हाँ! अरे कोई विशेष बात नहीं है, बस साल भर से कैंसर से युद्ध चल रहा है...।"
   "क्या? कैंसर से?" मुझे बहुत डर लगा... और भावुकता में आँखें बरसने लगी। फिर भी मैंने उसे ढाढ़स बँधाते हुए कहा, "चिंता की कोई बात नहीं तुम जल्दी ठीक हो जाओगी...।"
  "देखो संगी! कैंसर सेल्स के जाल से घिर चुकी हूँ...! जान चुकी हूँ कि मेरे पास छ:-सात माह से ज्यादा समय नहीं है...। परन्तु मुझे कोई चिंता नहीं है।"
     उसका साहस देखकर मैं स्तब्ध रह गई। मुझे परेशान देखकर वह बोली, "सुनो संगी! मैंने जो कुछ सोच रखा है , वो सारे कार्य मैं इन छ: माह में पूरा कर दूँगी...। कितने महान लोग विवेकानंद , भारतेंदु आदि जैसे पैंतीस साल में ही अपने-अपने काम से नाम कर चले गये... मैं भी अपने काम से अपना पहचान लिख जाना चाहती हूँ...।"
"जिन्दगी लम्बी नहीं बड़ी चाहिए" की सोच मेरी आँखें गीली कर रही थी...।


Wednesday, 5 December 2018

कशमकश


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 8 लोग, Poonam Deva, Seema Rani, Rajendra Mishra, Rabbani Ali, Ranjana Singh और Shaista Anjum सहित à¤šà¤¿à¤¤à¥à¤° में ये शामिल हो सकता है: 13 लोग, Poonam Deva, वीणाश्री हेम्ब्रम, अभिलाष दत्ता, Premlata Singh, Seema Rani, Sushma Singh और Meera Prakash सहित, मुस्कुराते लोग, लोग खड़े हैं और अंदर

जो अपने वश में नहीं उसपर क्यों अफसोस करना, विपरीत परिस्थिति में धैर्य रखने के सिवा कुछ नहीं किया जा सकता...
कल(04-12-2018) सुबह छोटे लाल जी मुझे फोन कर बोले कि "फूल लाने की व्यवस्था इसबार आप करा लेंगी क्या...?"
"क्यों क्या हुआ?"
"मैं कल रात में लाने गया था तो मिला नहीं , घर लौट कर आया तो गर्भवती बेटी की तबीयत खराब लगी , डॉक्टर के पास लेकर गया तो डॉक्टर बोली गर्भस्थ जीव पेट में मैला कर दिया है उसे तुरन्त निकालना होगा... अभी सुबह में ऑपरेशन से बेटा हुआ है.."
"व्यवस्था करा लेना तो आसान है, परन्तु अब इस समय करने के लिए किसे बोला जाए यह मुश्किल..." कल संस्था का वार्षिकोत्सव था । घर से निकलने का समय आया तो मेरा छोटा भाई फोन पर बोला "चार दिसम्बर ह! शुभकामनाएं देबे खातिर फोन कईनी हा!"
"काहे ? तू अ ईब अ ना का अ ?"
"अईति त जरूरए! लेकिन उ का अ ह कि काल्हे सीढ़ी से गिर गईला से कमर में चोट बा, उ तनी बी.पी. हाई बा अउरी चेस्ट पेन बा... सब टेस्ट करा के अभिये लौट रहल बानी.."
दो मिनट सोचने में लग गया कि क्या करूँ... भाई को देखने जाऊँ कि गेंदा माला लेने जाऊँ... आयोजन स्थल जाना ज्यादा जरूरी था क्यों कि मंच संचालन भी देखना था... मंच संचालन करने वाले नहीं आ पा रहे थे।
अभिलाष(संस्था का सबसे कम उम्र का सदस्य) दत्त(उप सचिव) की पहली पुस्तक का लोकार्पण था.... बेहद उत्साहित था... मेरे नहीं जाने से रंग में भंग...
भाई के पास अपने पति को भी नहीं भेज सकती थी , क्योंकि इन्हें MI की चल रही परीक्षा केंद्र पर शीघ्र पहुँचना था...
मैं संस्था आयोजन स्थल ही जाने का निर्णय ली... एक क्षण मिलता है जब हम दोराहे पर खड़े होते हैं...
 कल भाई के पास नहीं जा पाने का दर्द और उसके मन में गलती से भी उपजा भाव कि दीदी आज नहीं आ पाई का भरपाई आज उसे डॉक्टर से दिखाया जाना दूर नहीं कर पायेगा न...