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देवनागरी में लिखें

Tuesday, 21 May 2019

"मुक्ति"



"यह क्या है! बाहर के लोग क्या कहेंगे भाभी?" विधवा भाभी को बड़ी बिंदी लगाती देखकर ननद ने सवाल किया।
"मकड़जाल से निकल चुकी हूँ। हौसले को याद दिलाने में चूक ना जाऊँ... इसलिए...,"
"आप शायद भूल रही हैं कि बड़े भैया (धीमे से:आपके पति -परमेश्वर) को आपका बिंदी लगाना पसंद नहीं था!"
"कैसे भूल सकती हूँ कहीं भी किसी मौके पर अपने रुमाल से मेरे माथे का बिंदी पोछ देना और गंवार कहकर बुलाना... उन्हें तो मेरा सांस लेना पसंद नहीं था (धीमे से:चलचित्र युगपुरुष का नाना पाटेकर)।"
"ना कोइ रोके, ना कोई टोके!" दही-चीनी से मुँह मीठा कराती... बहू के भाल पर उग आए पसीने को अपने आँचल में सोखती सास ने कहा ,-"माँ का आँचल मकड़जाल को नष्ट कर देता है!"

Friday, 17 May 2019

मतदान स्व विवेक से करें


"चाय बना दो!"
"बस जरा दूध ले आऊँ..।"
गिरते भागते दूध लाई चाय बना कर दी... साबूत मूंग बनाने चली तो टमाटर लहसुन नहीं था... फिर घर-बाजार-घर तक का दौड़ लगाई..।
"समाज से फुर्सत मिले तो घर देख लेना..!"
मतदान के लिए समाज का आवाह्न करने प्रातःकाल से फेरी लगा घर वापस आई थी। ताने का तीखा छौंक लगना स्वाभाविक था।
{"देश चला रहा है बिजनेसमैन और नाम हो रहा है मोदी-मोदी।" ठेले पर आलू प्याज बेचने वाला जब किसी से बोल रहा था, थोड़ी देर पहले तो #फेसबुक_लाइव नहीं कर पाने का अफसोस हो गया था। #इसी_तबके_के_लोगों_द्वारा_अब_तक_उलटफेर_होता_आया_है_बिहार_की_राजनीति_में...}
 "आज तो देश का सवाल है, देश तब समाज तब घर...।"
"बुजुर्ग कह गए हैं कि घर में दीया जलाकर तब मंदिर में दीया जलाया जाता है!"
"इसलिए न नेताओं की तिजोरी भरती चली जाती है और...!"

Friday, 10 May 2019

गुलमोहर


01.गुलमोहर-
छज्जे में सज गया
मधु के छत्ते।
02.गुलमोहर-
बच्चें पेंच भिड़ाये
खेलमखेल/कूदमकूद।


बच्चों का बड़ा होना
अब खलने लगा है
मन उबने लगा है
शतरंज खेलना और पेंच लगाना
गुलमोहर के गुल Image result for गुलमोहर फुल परागसे
नाजुक शाखाओं का
जरा तेज हवा चली कि विछोह निश्चित
महबूब को मानों खजाना मिल जाता था
"माँ-माँ आओ न पेंच लड़ाते हैं
देखते हैं कितनी बाज़ी कौन जीत लेता है"
"तुम अभी जितना हारोगे
उतना जीतने के लिए ललकोगे"


बड़ी बारीकी से,
बड़ी कुशलता से,
कलम के लिए,
लगाए जाते हैं चीरे।
उगाए जाते हैं नए पौध,
धैर्य रहा सदा विषय शोध,
सहजता असर करता धीरे।
भगवान के समता में बागवान,
चीरे से नवजीवन का सच्चा ज्ञान,
बन बागवान होड़ भगवान से लगाती।
नहीं बदलना ना अतुराना,
पा जाएँ सभी लक्ष्य ठिकाना,
सम तुला स्नेह शासन माँ तौल अपनाती।
सूरज से रौशनी चाँद पा जाता
तभी तो धवल विभा चमकती।

Friday, 3 May 2019

"चुनावी फानी"




   सेना से निर्वासित सैनिक निर्दलीय चुनाव के लिए खुद को तैयार कर रहा था..
       विपक्षी दल के लोग बैठे हुए आपस में विचार-विमर्श कर रहे थे कि सत्ता पक्ष के प्रमुख के समक्ष किस व्यक्ति को टिकट दिया जाये जो उसे टक्कर देने के साथ-साथ पराजित भी कर सके।
"अरे! भाई अवसर का लाभ उठाइए! आजकल सत्ता पक्ष सेना द्वारा पड़ोसी देश पर हुई विजय को अपने पक्ष में भुना रहा है तो क्यों न हम अभी पिछले दिनों वीडियो वायरल प्रकरण में सेना से निकाले गये सैनिक को टिकट दे दिया जाए।"
चर्चित नेता के विचार पर सभी उपस्थित नेता-कार्यकर्ता उछल पड़े.., "अब तो हमारी पार्टी की जीत पक्की समझो.., अब तो सेना में हो रही धाँधलियों की पोल खुलकर रहेगा.. जनता की संवेदना , वेदना पर भड़कती है..., वह निश्चित रूप से जीत जाएगा।" नेता जनता की सहानुभूति के प्रति आश्वस्त था।
विपक्षी दल में सैनिक को टिकट देने में सबकी सहमति बन गयी। अतः सैनिक अपना नामांकन प्रमुख विपक्षी दल की ओर से दाखिल कर दिया...। यह बात सभी प्रकार के मीडिया द्वारा काफी उछाली जाने लगी। चुनाव-आयोग कानूनी तौर पर तथा देशहित में यह तय किया कि ऐसे लोगों का चुनाव लड़ना तथा सेना की कमियों संबंधी बातें जनता तक पहुँचने से पड़ोसी दुश्मन देश को जहाँ शह मिलेगी वहीं आमजन के मध्य सेना अधिकारियों के प्रति सम्मान भी प्रभावित होगा। देश की प्रतिष्ठा को देखते हुए सैनिक का निर्वासन स्थगित करते हुए, चुनाव के लिए नामांकन रद्द कर दिया गया।
चुनाव-आयोग की इस कार्यवाही से जहाँ विपक्षी दल के हौसले पस्त हो मायूसी छा गया वहीं सत्तादल के प्रमुख को अपने समक्ष पड़ी सजी-सँवरी कुर्सी दिखने लगी।

Thursday, 2 May 2019

"ओजोन के शत्रु"


"क्या आंटी जी! हमारे चढ़ने से आपको तकलीफ़ हो गई.. ? मेरी बिटिया मेरे गोद में है फिर भी आपको दुबकना पड़ा?" ऑटो में चढ़ी चौथी सवारी ने पहले से बैठी महिला से कहा... । चार सवारी बैठी हो और एक किशोरावय बच्ची खड़ी हो तो हवा की गुंजाइश नहीं बचती है।
"क्यों ? मुझे क्यों परेशानी होगी आपकी बच्ची से क्या मैं बांझ दिखाई दे रही हूँ... मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं साथ नहीं होते तो क्या मैं दूसरों के बच्चों से चिढ़ने लगूँ?"
"आंटी जी आप भले ना चिढ़ रही हों परन्तु आपके उम्र के लोग चिढ़ते हैं.. किराए के मकान की तलाश में जाती हूँ तो कहते हैं लोग "कितने बच्चें हैं बताओ?"
"क्यों क्या उन्हें खेवा-खर्ची देनी होती है?"
"वही तो जो जन्म दिया है भरण-पोषण तो वही करेगा न? कुछ लोग होते हैं जिन्हें शोर नहीं पसंद होता है... अब बेटे के इंतजार में चार बेटियाँ हो गई तो क्या उन्हें सड़क पर छोड़ जाएं?"
"पानी खर्च ज्यादा तो बिजली की खपत ज्यादा... महंगाई सुरसा मुख की तरह... दूसरों की बात छोड़ो आज के ज़माने में चार बच्चों की परवरिश क्या आसान है ?" तीसरी सवारी का सवाल था।
"हमारा वंश तो बेटे से ही चलेगा..," मेरी सास सदा कहती रही।"
"उनसे पूछना उनसे पहले की सातवीं पीढ़ी में से किसी का नाम...!"

Wednesday, 1 May 2019

"सूखी नदी"



"बाबा! आप पीछे के सीट पर बैठ जाइए.. आबादी बढ़ गई सड़के सकरी गली की चौड़ी हो नहीं रही है, आगे पुल पर भीड़ में आपको चोट लग जायेगी ।" अपने बगल में बैठाए वृद्ध से ई-रिक्शा चालक ने कहा,जब पीछे से एक सवारी उतर गई। ई-रिक्शा चालक के हिस्से के पीछे में एक महिला और एक किशोर बैठे थे उसके आगे हिस्से में एक युवा सवारी बैठा था एक स्थान खाली था (चार सवारी के बैठने का स्थान होता ही है)
 खाली स्थान पर ज्यों ही वृद्ध बैठने लगे किशोर झटके से उस स्थान पर बैठ गया।
"अरे! क्या हुआ? स्थान क्यों बदल लिए?" दंग हो वृद्ध ने पूछा।
"उल्टा लग रहा था..!"
"पैदा तो इंसान उल्टा ही होता है.. पाँच-दस मिनट में हम इस ऑटो को छोड़ देंगे जैसे ही हमारी मंजिल आएगी... ना तो तुम और ना तो मैं स्थाई रूप से इस पर बैठे रहने वाले हैं.. लेकिन जिस तरह से तुम चौड़े स्थान को झपटने में उतावलपन दिखलाये हो उससे संस्कारों के प्रति सचेत नहीं दिख रहे हो.. देख लो जिस पुल पर से ऑटो गुजर रहा है उसके नीचे धूल उड़ रही है।" वृद्ध के आवाज में चिंता झलक रही थी...।

Tuesday, 30 April 2019

"मृगतृष्णा"



"अरे भाई मंगरु! सुनने में आया है कि तूने अपनी फसल लगी खेत गिरवी रख.. गिरवी रखी कि बेच ही दी ? ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी..? एक बार तुमने मुझसे बात करनी भी उचित नहीं समझी?"

         "थोड़ी राहत तो दे मेरे दोस्त सोहन ! एक ही सांस में कितनी सवाल कर गया.. वक़्त ने इतना भी समय नहीं दिया या यूँ कहें मौका ही नहीं दिया कि तुम्हारे पास आकर सलाह कर सकूँ... आनन-फानन में सब करना पड़ा । बेटा को दुबई भेजने के लिए दलाल मिला। दलाल लाने वाले मेरे सगे थे । वे ही खेत के ग्राहक भी लाये..। कहीं भी शक के अंदेशा की गुंजाइश ही नहीं थी..!"
     "सुन मेरे दोस्त! बहुत पुरानी बात है... एक वैद्य, अपने सहयोगी के संग एक गाँव से होकर गुजर रहा था। गाँव में चारों ओर हरियाली फैली हुई थी.. करेले की लत्तर करैले से भरी, नींबू का पेड़ नींबू से भरा.. देखकर दोनों बहुत खुश हुए.. वैद्य को अपने लिए निवास स्थल की जरूरत थी वो अपने सहयोगी से बोला कि "यहीं इसी गाँव में हम ठहर जाते हैं।"
             "मुझे नहीं लगता कि यहाँ के लोगों को किसी वैद्य की जरूरत होती होगी, यहाँ स्वस्थ्य रहने का समुचित साधन मौजूद है।"
       "मत भूलो! किसी भी सिक्के के दो पहलू होते हैं। जहाँ दिन होता है वहीं रात भी होती है। जितने स्वास्थ्यप्रद चीजें होती हैं उनके अंदर हानिकारक चीजें भी मौजूद हैं।" कहानी सुनाकर सोहन ने मंगरु से कहा,"मेरी बात तुम्हारे समझ में कुछ आई क्या?"
                                                "ओह्ह! तुम्हारी बातों से सहमत हूँ। अब क्या करूँ!"
       "दुबई हमारे लिए विदेश होने के कारण लालच में फँसने का जाल और जो वो तुम्हारे सगे हैं , तुम्हें ज्यादा पैसे के लालच में फँसा मृगतृष्णा में उलझा डाला।"

Saturday, 27 April 2019

"मतदान जन की शान"



तन कहीं मन कहीं आत्मा कहीं कर्मा कहीं
जीवन उन्नयन का लक्ष्य जन्मा वहीं
जनतांत्रिक परंपराओं का बना मसाला
नैतिकताओं का ढ़कोसला जनसेवा में घोटाला
रीत पुरानी जुबान फिसले मैं-मैं की शैली
हित निराली जनता की थाती बंट जाती रैली
छाती पर मूंग दला बरगद के खोखर पीपल अनमेल
कैसे , क्या, कब के फेर में पड़े जनता चुने अकाशबेल
तानाशाही प्रवृतियां पल्लिवत बने विष बेल
लोकतंत्र का महापर्व अधिकार भी कर्तव्य भी मतदान
घनघोर निराशा के भंवर में फंसे जन की शान
किसी दल में नाव जो बिना पतवार के बह रही हो
किसी दल में  जातिवादी , पल में तोला  पल में माशा सह रही हो
हर घपला जनादेश का 'मति भ्रम' सत्ता के नशे में चूर
जन सदमे की सूरत में उन्हें नहीं चाहिए नेता क्रूर

Friday, 26 April 2019

मनु-देव


"यह क्या है दादी.., देवी सातों बहिनी भाई भैरव के साथ नीम के छाँव तले और महात्मा गाँधी जी मंदिर में..। एक ही स्थान पर... ऐसा क्यों?" दादी गाँधी जी की मूर्ति के आगे भी पुड़ी-गुड़-चना चढ़ा रही थी जिसे देखकर कौतुहलवश पुष्प ने पूछा..।
"देवी-स्थान को मंदिर के अंदर कोई नहीं कर सकता है बच्चे! शापित है यह स्थान... जिसने कभी भी मंदिर बनवाने का शुरू किया , वह जिंदा नहीं रह सका... और गाँधी बाबा देव-पुरुष रहे...! आजादी दिलवाने में सहयोगी रहे, इसलिए उनको मंदिर में स्थापित किया गया... उस समय तो पुष्प मुस्कुराता चुप्प रह गया.. क्योंकि गाँव के अनपढ़ सरल-सहज इंसानों को क्या समझाता... बच्चे की बात समझता भी कौन... लेकिन आज करीब पचास सालों के बाद उसी स्थिति में जनता को पाकर पुरानी बातें याद कर रहा है... और समझ रहा है , "क्या फर्क पड़ रहा है, निर्भया के माता-पिता मतदान नहीं करने वाले हैं..!"

Thursday, 18 April 2019

समाधान


चित्र प्रदर्शनी के दर्शक-दीर्घा में आगुन्तकों की नजर एक विशेष चित्र पर अटक जाती और वह वाहः कर उठते हैं... अद्वितीय चित्र, चित्रकार को खोजने पर सभी को विवश कर रहा था... चित्रकार श्यामा और उसका भाई सतीश विह्वल थे..., शीशे में अपनी शक्ल देख बिल्ली एक तस्वीर बनाती है जो शेरनी की हो जाती है... अलौकिक तस्वीर जीवंत कहानी होती है...
"भैया आपसे एक बात कहनी है..,"
"हाँ! हाँ... कहो! छोटी बहन को बड़े भाई से कुछ कहने में हिचक क्यों होने लगा... बेटियाँ पराई होती हैं, मैं नहीं मानता..।"
"शादी के बहुत वर्षों के बाद कुछ कहना थोड़ा अटपटा लग सकता है... आप मेरे घर आया कीजिये...!"
"अरे! ऐसी क्या बात हो गई.. ? बेहिचक स्पष्ट बात बताओ..!"
"कुछ खास नहीं... बस.. आप मेरे घर आया कीजिये!"
"यह कौन सी बड़ी बात है.. मैं तो संकोचवश नहीं आ पाता था...।
भाई का बहन के शहर में अक्सर आना-जाना होता ही था.. जहाँ पहले अन्य रिश्तेदारों के घर ठहरता वहाँ अब बहन के घर ठहरने लगा... भाई व्यापारी और साहित्यकार था... लेन-देन और साहित्यिक गोष्ठियों में अपने बहनोई को भी शामिल रखता... अपने ही घर में दाई की हैसियत से रहने वाली बहन की स्थिति बदलती गई...

Tuesday, 16 April 2019

आप बदलो-जग बदलेगा



 अस्सी-पचासी वर्ष का रामधनी जब-जब गाँव के युवकों को असमाजिक कार्य करते हुए देखता है तो उसे भीतर से बहुत दुःख होता है कि कभी यही गाँव नैतिकता के सिर मौर के रूप में जाना जाता था और आज...। उसे समझ में नहीं आता है कि वह क्या करे? इस उम्र में जहाँ हाथ-पैर साथ नहीं दे रहे...। जिन्हें यानी राजनीतिक दलों के नेताओं को इनका नेतृत्व करना चाहिए वो भी तो...।
        वो स्मरण करता है कि प्रत्येक राजनीतिक दल जब चुनाव आता है तो तरह-तरह के झूठे वायदे करते हैं... युवकों को सब्ज-बाग दिखलाते हैं कि उनकी पार्टी सत्ता में आयेगी तो हर हाथ को काम तथा हर खेत को पानी मिलेगा... गरीबी का नामोंनिशान नहीं रहेगा... किन्तु जैसे ही उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो सिवा अपने घर-पेट भरने के किसी की भी स्मृति नहीं आती...।
    कुछ सोच-विचारकर वह गाँव के हर घर के विषय में सोचता हुआ और उसके समझ में जो लोग वास्तव में बुद्धिजीवी हैं उन्हें इकट्ठा करता है और कहता है,"अपने गाँव के युवकों की स्थिति को देख रहे हो?"
  "हमलोग क्या कर सकते हैं?"
"आप ही लोग तो कर सकते हैं... , अब समय आ गया है कि बुद्धिजीवियों को पुनः राजनीति में आना चाहिए। *मतदान करने की प्रतिशत ज्यादा से ज्यादा हो।"*
  "इस दलदल में कौन जाएगा ?"
"इसी सोच ने तो इस गाँव क्या इस देश की यह हालत कर दी है , आपलोग आगे बढिये... इस दलदल को साफ कीजिए... यह सही है इसमें देर लगेगी किन्तु साफ अवश्य हो जाएगी... नहीं तो आपलोग सोचें आपके जो बच्चे बड़े हो रहे हैं... उनका क्या होगा?"
"बच्चे बड़े हो रहे हैं... उनका क्या होगा?" यह वाक्य कानों में पड़ते सब भीतर तक हिल जाते हैं... और उन्हें लगने लगता है... हाँ
! रामधनी बाबा की बातों में दम है... गाँव और देश के उज्ज्वल भविष्य हेतु उन्हें जो भी संघर्ष करना होगा, वे लोग जरूर करेंगे।
एक संकल्प के साथ बुद्धिजीवी चले जाते हैं किन्तु रामधनी के आँखों मे चमक के साथ आने वाली युवा पीढ़ी के चेहरे खिले हुए दिखने लगते हैं।

Saturday, 13 April 2019

समय का न्याय


वक़्त करवट बदलता जरूर ही है … तालियों की गड़गड़ाहट और वन्स मोर-वन्स मोर का शोर साबित कर रहा था कि अन्य प्रतिभागियों-संगियों की तरह उसकी भी रचना और प्रस्तुतितीकरण से दर्शक दीर्घा में बैठे साहित्य प्रेमी आनन्दित हो रहे थे … सत्तरवेँ स्थापना दिवस के अवसर पर कंपनी द्वारा आयोजित काव्योत्सव में सभी झूम रहे थे और मैं अमलतास की सौंध लिए अतीत के गलियारे में टहल रही थी … 
“मेरी संस्था, देश के कई राज्यों में अपना नाम कमा रही है अपने कामों की वजह से लेकिन मेरी हार्दिक इच्छा है कि आपके शहर में भी उसको लोग जान जाएं और वहाँ पहुँचें बनाने के लिए आप मेरी मदद कर सकते हैं और पूरी उम्मीद है कि आप मेरी बातों का मान रखेंगी ..। 
“जी! कोशिश करता हूँ …, देखती हूँ क्या कर रहा हूँ ..!” 
लगातार प्रयास से तारीख पड़ते गए और टलते गए … इस क्रम में दो-तीन साल के बाद वह शुभ दिन आया जब उनकी संस्था का कार्यक्रम मेरे शहर में होने वाला था … काव्योत्सव के लिए सूची बनी … मंच संचालन के के लिए दो नाम मेरे द्वारा प्रस्तावित थे उन्हें विश्वास भी था लेकिन कार्यक्रम के दो दिन पहले उनका शर्त आया कि “मंच संचालन के लिए गठबंधन शुल्क जमा करवा दो ..।” 
“क्यों? यह तो पहले से तय नहीं था ..
“आप समझ नहीं रहे हैं! जो सम्मान दिया जा रहा है या जिसे मंच संचालन दिया गया है, वे शुल्क जमा कर चुके होंगे …।” 
“मैं जो समझ रहा हूँ वह तुम्हें समझा दूँ कि हमेशा जयचंदों की वजह से मूल्यों की हार होती है …। खैर! कोई बात नहीं ..।” 
तय तिथि पर सफल कार्यक्रम के बाद निश्चिनता की लंबी सांस लेते हुए उनका पहला सवाल था कि “वह कार्यक्रम में आई! मंच संचालन नहीं मिल रहा है ..!” अपने शब्दों को जितना विषैला बना सकते थे उससे ज्यादा विष उनके भैंगे आँखों में था … हमारे बीच थंठों का वन पसर गया … स्वर्ण की लंका राख होने से जब रावण ही सीख नहीं पाए पाए .. सामान्य मनु ज्ञान नहीं ले पाते हैं तो आश्चर्य नहीं होता है …

Thursday, 11 April 2019

माँ



सन् 1972 की बात है मेरे पापा का तबादला सहरसा से सिवान हुआ था... सिवान से नजदीक गाँव में हमारा घर था.. तब गाँव में रहने से गाँव के घर के रहन-सहन का पता चला... पहली रोटी गाय को दी जाती तो एक रोटी कुत्ते को डाली जाती... दो रोटी जोड़े बैल को भी दी जाती... जब दादा जी भोजन करने बैठते तो एक बिल्ली उनके समीप आकर बैठ जाती उसके लिए दूध रोटी दादा के भोजन संग रखा जाता.. दादा खुद भी खाना खाते और बिल्ली के लिए भी दूध में भीगी रोटी का टुकड़ा डालते रहते... गाँव में कहावत है बिल्ली मनाती रहती है कि घर का मालिक अंधा हो जाये इसलिए बिल्ली पाली-पोसी नहीं जाती जबकि हमारे दादा जी के घर का नियम विपरीत दिख रहा था... वो बिल्ली और किसी के पास ना तो जाती और ना परेशान करती.. बल्कि दुबकी-सहमी रहती.. हमलोग ही उसको तंग करते रहते... कुछ महीनों के बाद एक दिन वह बिल्ली छज्जे पर रखे समानों में बैठी नजर आई, आदतन ज्यों उसके समीप जाने के लिए हम अपना पैर बढ़ाये वह गुर्रा उठी मानों शेरनी हो... जबतक वह हमपर झपटती तबतक हम पीछे खींच लिए गए.. उसका यह बदला रूप हमें भयभीत कर दिया.. बाद में हमें पता चला कि उस समय वह अपने बच्चे को जन्म दी है और उसे लगा कि उसके बच्चे को खतरा है इसलिए वो खूँखार हो उठी... बच्चे पर खतरा महसूस कर बिल्ली शेरनी बन जाती है...

Friday, 5 April 2019

"बदल जाना जाँ" और "गतिशील पल"



शिशिर की सफेद धूप स्याह निशा में बदल चुकी थी... घर के किसी कोने में रौशनी करने से सब चूक रहे थे... अस्पताल में सबकी मुट्ठी गर्म कर घर तो आ गए थे... घर में फैले शीत-सन्नाटा को दूर कैसे किया जाए सभी उलझन में थे...

"इतनी मुर्दनी क्यों छाई है? चलो समीर अपनी माँ और अपनी चाची से बात करो और सबके लिए भोजन की व्यवस्था करो...।"

"पर दादी...?" समीर अपनी दादी की बातों पर आश्चर्य चकित होता है...

"पर क्या समीर...! तुमलोग नई सदी में जी रहे हो... दुनिया बिना शादी के संग रहने के रिश्ते को स्वीकार कर रही है... समलैंगिक संबंधों को स्वीकार कर रही है... तो हम अपने घर में हुए मानव जीव को स्वीकार नहीं कर सकते...?"

"दुनिया क्या कहेगी?और उनकी दुनिया में पता चला...," समीर के दादा जी की गरजती आवाज आज फुसफुसाहट में बदली हुई थी

"टी.वी. सीरियल और फिल्मों को बेचकर धन बटोरने के लिए झूठी कहानियाँ फैलाई गई है... अगर सच बात होती तो गौरी प्रसाद समाज के मुख्य धारा से कैसे जुड़ी रहती? उन्हें क्यों नहीं...,"

"तुमसे बहस में कौन जीत सकता है...!"

*"प्राचीन तम* को हमें दूर करना ही होगा... थर्ड जेंडर भी तभी मुख्य धारा में जुड़े रह सकते हैं... उनकी जिंदगी बदल सकती है..."

निशीथ काल मिट रहा था और नई सुबह का कलरव सबको उत्साहित कर रहा था...

"गतिशील पल"

ट्रेन में दो-तीन किन्नरों ने प्रवेश किया और यात्रियों से पैसे वसूलने लगे। माँगते-माँगते वो एक बर्थ के पास आकर सब रुक गये अपने-अपने भाव मुद्राओं में ताली बजाने लगे। उस बर्थ पर पति-पत्नी और लगभग बारह/तेरह वर्ष का बच्चा भी बैठा हुआ था। किन्नरों को ताली बजाते देखकर बच्चे में भी हलचल होने लगी मानों वह भी किन्नरों की तरह ताली पीटना और लटके-झटके दिखलाना चाह रहा हो ,लेकिन किसी दबाव में (मानों उसकी माँ द्वारा बराबर दी जाने वाली हिदायतें याद हो रही हो) वह खुद पर नियंत्रण रखकर शांत रखने की कोशिश भी कर रहा हो.., लेकिन एक किन्नर को संदेह हो गया कि वह बच्चा हमारे जेंडर का है। उसने अपने अन्य साथियों से भी कहा और वो सब ताली बजा-बजा कमर लचकाने लगे। एक किन्नर जो उनके दल का मुखिया था ने उस दम्पति से कहा, "ये बच्चा हमारे बिरादरी का हमारी नई पीढ़ी है , इसे हमें दे दो।"
"माँ ने कहा,"इसे जन्म मैंने दिया है, लालन-पालन मैं कर रही हूँ, तुमलोगों को क्यों दे दूँ?"
"यही परम्परा है.. इसलिए...।"
"मैं नहीं मानती ऐसी किसी परम्परा को.. अपनी जान दे-दूँगी ,मगर अपना बच्चा किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी.. नहीं की नहीं दूँगी...।"
सब नोक-झोंक सुनकर बच्चा घबराकर रोने लगा और अपनी माँ के पीठ से चिपक गया,"मैं अपनी माँ को छोड़कर किसी के साथ भी नहीं जाऊंगा...।"
किन्नर का दिल बच्चे एवं माँ के मध्य वात्सल्य भाव देखकर पिघल गया। माँ उन्हें सौ रुपये का नोट देना चाहा मगर वेलोग नहीं लिया.. और जाते-जाते कहते गए,"माँ इसे खूब पढ़ाना.. अब तो सरकार हमलोगों को भी नौकरी देने लगी है...।"
"हाँ! हाँ! इसे पढ़ा रही हूँ । कुशाग्र है पढ़ाई में... मेरे परिचित में कई ऐसे हैं जो बड़े ऑफिसर बन चुके हैं...।"
वे खुश होते हुए बोले,"जुग-जुग जिए तेरा लाल... काश ऐसे जन्मे सभी मानव जीव के माँ-बाप तुमलोगों जैसे पढ़े-लिखे होते...।"

Thursday, 4 April 2019

सत्तामतान्ध को सुनाई नहीं देता


सड़क पर निकलो तो पता चलता है आज भी बहुत सी स्त्रियाँ किस हाल में जी रही हैं... ना कहने पर जला दी जाती हैं... नभ क्या साझा करेंगी जब कह नहीं पाती "जमीं हमारी है।"

कॉंग्रेस का मेनिफेस्टो और पाखी पत्रिका का मुख्यावरण कोहराम मचवा दिया... कितनी लेखनी उबल पड़ी , साधारण सस्ता रास्ता प्रचार का... बदनाम हुए तो क्या हुआ... "कमी हमारी है।"

मतदान जरूर करें... ऐसी पार्टी को जो आधी आबादी को पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी सब स्थलो पर देने में चूका ना हो...


Monday, 1 April 2019

मापदंड



"आज वह आई ए. एस. बन गयी है। अब तो उसकी अपनी भी एक स्वतंत्र पहचान बन गई है... और नामी गिरामी पिता की बेटी तो पहले से ही है...  समझ में नहीं आ रहा है कि शादी क्यों नहीं कर लेती है!" सुरूचि ने कहा.. उसकी आवाज में चिंता और अफसोस घुलनशील था।
"अच्छी-खासी नौकरी हो गयी है... अब तो और उसे पैसों की कमी नहीं...।" सुरूचि की सखी रोमा ने कहा।"
"हद है! क्या पैसा ही सबकुछ है...? मैं शादी की बात कर रही हूँ.., हवाई-जहाज खरीदने की नहीं..।
      "शादी की जरूरत नहीं होगी... सब पूरा हो जाता होगा..! उसे किसी सहारे की क्या ज़रूरत है ?" कुटिल मुस्कान चेहरे पर बिखरते हुए रोमा ने बुदबुदाया।
"ज़रूरत तो स्त्री हो या पुरुष दोनों को होती है.. दोनों एक दुसरे के पूरक हैं... सृष्टि तो दोनों के मिलने से ही चलेगी न?" सुरुचि ने और अधिक चिन्तित स्वर में कहा।
"ज़रा अपनी सोच में बदलाव लाओ!"
        "हद है! तुम अपने दोचित्ते सोच पर लगाम लगाओ...!"
"अरे! इसमें मेरे दोचित्ते सोच की बात कहाँ से आ गई?"
"कल की ही बात है..., जब मैं बोली कि किरण को सुरेश, तुम्हारे पति की रखैल बोला जा रहा है तो तुम कैसे तमक कर बोली थी...कि यह सब बेबुनियाद बात है... तुम  औरत और मर्द के लिए दो अलग-अलग दृष्टियाँ रखती हो.."
"मैं भी अक्सर समझाते रहती हूँ कि नारी को हमेशा नारी के पक्ष में खड़ा रहना चाहिए पर यह गिरगिट समझे तो न.. शायद आज यह संकल्प ले...!" कमरे में आती रोमा की सास ने कहा।
"नहीं! नारी को नारी या पुरुष को पुरुष के पक्ष में खड़े होने की बात नहीं होनी चाहिए, घर और संसार प्रेम पूर्वक चलाने की बात होनी चाहिए। पक्षपात नहीं... सदैव न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।"
"तुम सही बोल रही हो! इन्हीं गलत सोचों ने तो पुरुष सत्ता को मजबूत कर रखी है..। और मम्मी आपने कहा था कि पापा के जाने से सारा घर बर्बाद हो गया... वो थे तो किसी की मजाल नहीं थी कि कोई इस घर की और टेढ़ी नजर कर के देखे... ।" रोमा की बात सुनकर उसकी सास फफक पड़ी...।


Wednesday, 20 March 2019

ज्ञानी


"होली हो गई आपलोगों की?" ननद की आवाज थी
"भाभी कहाँ हैं?" यूँ तो छोटे देवर की आवाज बेहद धीमी थी परंतु शांति में सुई के गिरने की आवाज पकड़ने वाली बहू सचेत थी
"वाशरूम में..," ननद भी इशारे से भी समझा दी।
ज्यों ही वो वाशरूम निकलकर बाहर आने लगी देवर रंग वाली छोटी बाल्टी उसपर उड़ेलना चाहा और उनकी मदद के लिए पति महोदय भी बाल्टी थाम लिए... लेकिन सचेत होने के कारण बहू दोनों हाथ से बाल्टी ईको ऊपर से ही थाम ली...
"अरे!अरे! संभालना.. जरा संभल कर बहू.. गर्भवती हो और दिन पूरे हो गए हैं... रंग डाल ही लेने दो उन्हें तुम्हारे ऊपर.. कहीं पैर ना फिसल जाए कोई ऊंच-नीच ना हो जाये..," सास चीख पड़ीं।
"क्यों माँ तुम्हें भाभी की चिंता कब से होने लगी..? पूरे नौ महीने उन्हें ना तो एक दिन आराम का मिला और ना चैन-सकूँ का..!"
"यह तुम अभी नहीं समझोगी, अभी तो तुम्हारी शादी भी नहीं हुई है। गर्भवती को क्या फायदा क्या नुकसान बड़ी-बूढ़ी ही समझा सकती हैं।"
सास-ननद की बातों तरफ देवर पति को उलझे देख बाल्टी पर पकड़ कमजोर पाई और सारा रंग देवर के ऊपर उड़ेल कर बोली... "किसी को कोई चिंता करने की बात नहीं है... स्त्रियाँ सशक्त हो चली हैं...।" सभी के ठहाके से रंगीन होली हो ली।


Thursday, 7 March 2019

बदल गया जमाना स्त्रियाँ माँगती क्यों हैं...!

अलाव में तप के
शीत में शिला होके
बौछार से थेथर
स्त्री शिव,  विष पी के

जिंदगी चुनती है आज वो अपनी मर्जी से... जीती है अपने शर्तों पर.. नहीं चाहिए किसी और की मेहरबानी...  सेव से बात हुई.. सेव समान आधा समझ गई.. पूरक है... समानता का अधिकार धोखा है.. जिसने भी विमर्श शुरू किया उसने भी कमतर आंका... 

"लॉलीपॉप है महिला दिवस की बातें"
इंसान बनके जिन्हें जीना नहीं आ गया..

 फ्रिज और दिवार के बीच दुबकी रक्तरंजित रुमाल संग टूटी चूड़ियाँ बिखरी पड़ी है।
मंच पर बेमोल हँसी, कर्मठ, कर्त्तव्यपरायण, सुंदरता आज़ादी की निखरी पड़ी हैं
सियासतदानों का बेमेल हिसाब के खिलाफ जाना विस्फारित आँखें ओखरी पड़ी है

Saturday, 2 March 2019

"बंदर बाँट"



"रे शाम्भा! पहना बाबू को बढ़ियाँ पोशाक.. इसे छोड़ने जाना है...।"
"तौबा!तौबा! क्या कहते हैं हुजूर.. , ना आपने हित साधने हेतु कोई शर्त रखी और ना उधर से कोई माफीनामा आया... तौबा!तौबा.. इसके बल पर हम बहुत कुछ मनवा सकते हैं... अभी आधे हिस्से के आधार पर कई हिस्से पा लेना है... तौबा! तौबा.. हमारी तो नाक ही कट कर रह जायेगी, अगर ऐसे इस नामुराद को वापस कर दिया गया.., तौबा! तौबा.. किसी साथी को ही..."
"मौके की नज़ाकत को तुम नहीं समझ रहे हो नामुराद... हम इसको दामाद की तरह वापस नहीं जाने दिए तो हम मिट जाएंगे... दुश्मन का हम कितना नष्ट कर सकते हैं ? उसके देश का एक चौथाई हिस्सा... उतने में ही हम नेस्तनाबूद हो जाएंगे... जिस देश के हम गुलाम रहें... आजादी के बाद भी उसीके मुंहताज हैं.. उसकी मध्यस्थता मान हम अपने वजूद को तो बचा लें..
"लेकिन..,"
"लेकिन वेकिन कुछ नहीं.. छोड़ना है तो छोड़ना है.. समझ! समझायेंगे स्थिति.. चींटी भी हाथी की हवा निकाल सकती है...।"

Thursday, 28 February 2019

थोड़ी इमोशनल फूल हूँ


मिटा ले सकते हो चिह्न नक्शे से कतलाम तक पहुँचा दो
चूहे बिल्ली का खेल चलते रहना अभिराम तक पहुँचा दो
मुझसे कायर तब कहना जब लाशों में अपनो को खोजना
हिरोशिमा के अपरिपक्कवता  को फरजाम तक पहुँचा दो

लो!
खब्ती
दोचित्ती
अंत अरि
जय जवान
ज्यों पीली पत्तियाँ
छीन ली गई धरी।{01.}
ओ!
घाल
जवाल
नटसाल
अरि तंद्राल
भू-पुत्र कराल
गुरू जय जवान। {02.}

Friday, 8 February 2019

"संधि"


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 10 लोग

ज्योत्स्ना :- "मेरी एक परिचित हैं... उनके पति को गुजरे कुछ ही महीने हुए हैं। उनके खुद की शादी की घोषणा करते खलबली मच गई है... उनके बच्चें शादी योग्य हैं। उनकी शादी का ना सोच खुद की शादी...! बच्चों की शादी में कई बाधाएं बढ़ जाने की आशंका...!"
         विधु :- "मेरे हिसाब से शादी करने में कोई बुराई नहीं अगर दोनों दिल से राजी हों तो... बच्चों की शादी के बाद उसे भी साथी की जरूरत रहेगी ही..!"
           ज्योत्स्ना :- "दिल से राजी वाला इतनी जल्दी मिल कैसे गया ? सवाल यह उठ रहा है..! सोच-सोच कर उनके अपने परेशान हैं... पति-सेवा कर रही थी तो लगता था, सारी दुनिया को भूला कर बैठी है! पति के रहते कोई आया कैसे उनके जीवन में...?"
          विधु :- "क्या कह सकते हैं... पर अगर उसने अपने पति के रहते उसकी सेवा में दिन-रात एक कर दिया था तो भी लोग बातें बनाने से बाज नहीं आ रहे। लोगों का तो काम ही है बात बनाना हर इंसान को अपनी खुशी के बारे में सोचने का पूरा हक है अपने परिवार के साथ-साथ..।"
        दक्ष :- "लेकिन अभी पति का देहांत हुआ है तो इमोशंस में कोई हो भी गया हो..!"
ज्योत्स्ना :- "बाद में भटकने लगे तो वह ना घर की रहेगी ना घाट की?"
     दक्ष :- "औरतें जब बहादुर होती हैं तो खूब बहादुर होती हैं लेकिन कमजोर पड़ जाएं तो बहुत कमजोर भी पड़ जाती हैं। उनके अपनों की चिंता भी जायज है। और आजकल जगह-जगह धोखे दिख भी रहे हैं..।"
         विधु :- "चिंता करना जायज है.. अगर बेवजह बातें बना रहे या सब अच्छा होते हुये भी रोड़े अटका रहे तो वो गलत... अगर ये पुरानी सोच के कारण है तो गलत... लेकिन अगर बंदा ही गलत तो उनकी चिंता जायज है। पर दीदिया ने चिंता नहीं सोच बताया है..।"
         दक्ष :- "दीदी अब क्या पता..? लेकिन अचानक कोई कैसे मिल सकता है और शादी की इतनी जल्दी क्या है ? पहले अपने बच्चों की शादी करनी चाहिए.. तब तक तो जो मिला है, उसका साथ दे सकता है..!"
       ज्योत्स्ना :- "शायद पति बहुत समय से पीड़ित बिछावन पर पड़ा होगा कोई मददगार हो जिनमें नजदीकी बढ़ गया हो... बच्चों की शादी के बाद ही अपनी जिंदगी में अलग से आगे बढ़े.. क्योंकि सबके चेहरे पर कई चेहरे जड़े दिख रहे... हमारा समाज आगे नहीं बढ़ पाया है आज भी...!"

दिखावे में सब सिमट रहा।
प्रेम बस तन से लिपट रहा।
प्रस्ताव सदा संग सहने की,
सूप चलनी से निपट रहा।

Tuesday, 5 February 2019

खतरे के खिलाड़ी



"अरे! तुम इस समय?" अपने घर में आई कमला को देखकर चौंकने का अभिनय करने में सफल रहा हरेंद्र। होली की शाम थी वह घर में अकेला था।
"क्यों? तुमने ही तो कहा था.. होली के दिन मेरे घर अबीर खेलने आना..! चलो अब अबीर मुझे लगा दो... घर में मुझे सब ढूँढ रहे होंगे..!"
"वो तो मैं आजमाया था कि तुम मुझसे कितना प्रेम करती हो...! तुम तो अव्वल नम्बर से पास हो गई..।"
"आजमाने में रिश्ते बना नहीं करते... आज के दिन अकेली लड़की का घर से दूर जाना कई खतरे राह में प्रतीक्षित होते हैं..। वक़्त बदला है समस्याएं नहीं बदली...!"
"मान लेता हूँ... मेरा दबाव गलत था... अबीर तुम्हें शादी के बाद ही समाज के सामने लगाउँगा..! चलो तुम्हें सुरक्षित घर छोड़कर आता हूँ..।"

Monday, 21 January 2019

उलझन में लिपटा जीवन



अनेकानेक दलों के मैनिफेस्टो को वह अबतक आकंलन-निरीक्षण-परीक्षण करता रहा था... आजतक कोई सरकार उसे ऐसी नहीं दिखी जो जारी किए अपने मैनिफेस्टो को पूरा लागू करने में सक्षम रही हो।
फिर चुनावी मौसम गरमाया हुआ था.. उसके गाँव की याद सभी दलों को बारी-बारी से आना स्वाभविक ही था...
सबसे उलझता रहता, "तुम्हारे दल के मैनिफेस्टो में बेरोजगारी हटाना था, बेरोजगार को आलसी बनाया जा रहा है, राम मंदिर बनाना , धारा 370 हटाना था..!"
"तुम्हारे दल ने जनसंख्या नहीं रोकी, गरीबी पर चुनाव लड़ती रही गरीबी खत्म नहीं की.. किसान खत्म होने के कगार पर हैं...।"
"तुम्हारी पार्टी समाजवाद नहीं ला सकी..।
 "तुम्हारे लोग बहुजन के मुद्दे को हल नहीं कर पाए।  राज्यो में समानता और सबको रोजगार नहीं दे पाए..।"
"किसी भी कंपनी के प्रोडक्ट अपने मानदण्ड पर खरे न उतरे तो कंपनी का लाइसेंस रद्द हो जाना चाहिए जब ऐसा हो सकता है... तो कोई पार्टी चुनावी मेनिफेस्टो पर खरी न उतरे उसकी मान्यता रद्द हो जानी चाहिए.. ऐसी पार्टी के लिए तो ताली बजनी ही नहीं चाहिए जहाँ से गाली की धारा बहती हो... ये क्या चमड़े की जुबान फिसलती ही रहती ।"  80-85 साल का समाज सेवक सत्तू पिसान की गठरी बाँधें.. गाँव वालों को जगाने के लिए पहरु बना हुआ है।

हो सके तो किसी का दर्द बाँट लो

गरिमा सक्सेना(फेसबुक से मिली एक प्यारी बिटिया) से जानकारी मिली कि बैंगलोर में केवल महिलाओं का एक साहित्यिक समूह 'प्रेरणा मंच' है उसकी एडमिन का व्हाट्सएप्प नम्बर मुझे वो दी... मैं एडमिन से व्हाट्सएप्प पर बात की और एडमिन मुझे 'प्रेरणा-मंच' व्हाट्सएप्प समूह से जोड़ दी... जब मैं वहाँ अपना परिचय दी तो मुझे वहाँ राही राजेन्द्र जी मिले... राही राजेन्द्र जी के घर पर 13 जनवरी को एक बैठक रखा गया तो वहाँ दुर्गेश मिश्रा जी मिले... दुर्गेश जी से परिचय के दौरान पता चला कि उनको एक लड़का था जो कुछ महीनों पहले एक दुर्घटना में उनसे बिछुड़ गया...
 दुर्गेश जी का इकलौता बेटा चल बसा है... सुनकर धक्क सा रह गया मेरा मन... वे बेहद दुखी थे... स्वाभाविक था.. : सब लोगों ने कहा कि आप आये तो अपनी पत्नी को साथ क्यों नहीं लाये ?
"वो कहीं जाने की स्थिति में नहीं है... कहीं जाना नहीं चाहती है.."
मुझे भी लगा कि जिसका जवान बेटा साथ छोड़ गया हो उसको कहीं जाने का मन क्यों करेगा... जब गोष्ठी खत्म हुई और मैं वापस आने के लिए ओला बुक करने लगी तो दुर्गेश जी बोले कि"दीदी! आप मेरे साथ चलिए.. कुछ देर और का आपका साथ मिलेगा.."
: मैं तैयार हो गई और हम साथ चले.. रास्ते में बातों के क्रम में पता चला उन्हें एक बेटी भी है.. थोड़ी दूर आने पर वे बोले कि दीदी आप मेरे घर चलिए वहीं से ओला बुक कर दूँगा... जो प्रतीक्षा करनी होगी उतनी देर मेरे घर पर ही बैठ लीजियेगा.. मैं तैयार हो गई.. रात का समय ना जाने ओला वाला कितनी देर में आये
: उनके घर गई... पहुँचते ओला बुक कर दी.. पहली मुलाकात थी उनकी पत्नी और बेटी से बस हैलो हाय हुआ और ओला आ गया... निकलने लगी तो उनकी पत्नी बोली ,"आप फिर आइयेगा फिर कब आइयेगा... ?"
दुर्गेश जी भी बोले, "दीदी आपको फिर आना होगा, जल्द आइयेगा..!"
मैं रास्ते भर और रात भर सोचती रही , ऐसा क्या था जो पहली मुलाकात में वे लोग चाहते थे कि मैं आऊँ?
सुबह-सुबह राही राजेन्द्र जी का फोन आया,"कैसी हैं दी? रात में ठीक से पहुँच गई थीं?"
"हाँ.. सब ठीक रहा.. दुर्गेश जी अपने घर ले गए वहीं से ओला बुक हुआ और मैं आराम से घर वापस आ गई। सुनिए न भाई, दुर्गेश जी और उनकी पत्नी मुझे अपने घर फिर बुलाएं.. क्या आप और भाभी भी मेरे साथ चलिएगा.. अकेले जाऊँगी तो क्या बात होगी.. कितनी देर बात होगी...? जवाहर जी को भी बोल दीजियेगा वे भी अपनी पत्नी के साथ चलेंगे..।"
"ठीक है दी! जवाहर जी को भी बोल देते हैं.. हम चारों व्यक्ति चलते हैं।"
"ठीक है जवाहर जी को भी बोल दीजियेगा... उसके पहले दुर्गेश जी से फोनकर दिन और समय तय कर लीजियेगा... एयरफोर्स में काम करते हैं तो रविवार को छूट्टी होती है या कोई और दिन पता कर लीजियेगा..!"
"ठीक है दीदी... फोन से बात कर बताते हैं...।" कुछ ही देर के बाद राही जी का फोन आया,"सुनिए न दीदी! दुर्गेश जी से बात हुई लेकिन वे बहुत उत्साहित नहीं लगे। बोले कि आप आइये बात-चीत होगी, लेकिन गोष्ठी नहीं होगी... हमें जाना चाहिए कि नहीं?"
"क्यों नहीं जाना चाहिए..! वे काव्य पाठ में रुचि नहीं रख रहे होंगे कि आस-पास के लोगों की चिंता कर रहे होंगे कि,'क्या कहेंगे लोग'..।"
"जी इसलिए उन्होंने केवल मिलने के बुलाया है... क्या जाना ही चाहिए?"
"प्रयागराज का संगम हमें सिखलाता है दूसरों के लिए अपने अस्तित्व को खो देना...!"
"ठीक है दीदी! मैं जरूर जाऊँगा लेकिन जवाहर जी को बोल दिये हैं... आप उन्हें भी लेने के लिए बोल दी थीं...!"
"कोई बात नहीं बोल दिया गया है तो मना तो किया नहीं जा सकता है... और किसी को नहीं बोला जाएगा... लेकिन प्रतीक्षा रहेगी कि वे रविवार के पहले , हमलोगों के आने के लिए स्वयं से वे सुनिश्चित करते हैं कि नहीं...!"
दो दिन बाद राही जी का फोन आया कि दीदी वे रास दादा को भी आने के लिए बोले हैं... रास दादा जा रहे हैं तो हमलोग भी चलेंगे...! है न दीदी...?"
"जरूर चलेंगे...!"
शनिवार को दुर्गेश जी के ही फेसबुक के पोस्ट पर दुर्गेश जी मेरे टिप्पणी के जबाब में टिप्पणी कर दिए कि "कल आ रही हैं दीदी?"
 कल यानी रविवार 20 जनवरी को सुबह से सारे कार्यों से निवृत्त होकर ओला बुक करना शुरू किए... 12:20 ओला बुक हो गया... 13 मिनट में आएगा... मेरी प्रतीक्षा शुरू हुई 13 मिनट 10 मिनट में बदला और रेकॉर्ड पर अटके सुई की तरह अटक गया... डेढ़ बजे दस मिनट अट्ठाइस मिनट में जब बदल गया और मैं प्रतीक्षा में ऊब चली थी क्यों कि डेढ़ से दो के बीच मुझे दुर्गेश जी के घर पर पहुँच जाना था... दुर्गेश जी और जवाहर जी का फोन भी लगातार आ रहा था कि मैं घर से निकली या नहीं निकली... दुर्गेश जी का कहना था कि देर भी हो तो थोड़ी देर के लिए भी अवश्य आऊँ...। खैर! मैं निर्णय ली कि अब ओला की प्रतीक्षा नहीं करनी है किसी से लिफ्ट ले मुझे शहर के मुख्य सड़क तक जाना होगा और वहाँ से ओला बुक करना होगा...

अपने पति महोदय को सूचित की और सन्न निकल भागी क्यों कि उनके जबाब मुझे मालूम थे
–क्यों जाना है इतनी परेशानियाँ उठाकर
–जाना ही क्यों जरूरी है... इत्यादि
बाहर आकर कुछ देर इंतजार के बाद एक ऑटो मिला, हो सकता है किसी ने रिजर्व कर लाया हो वह वापस हो रहा था उससे मुझे सड़क तक आये... ओला बुक किये एक नौजवान की मदद से और दुर्गेश जी के घर लगभग तीन बजे पहुँच गई... ढ़ाई-पौने तीन बजे के लगभग रास दादा-उनकी पत्नी, राही राजेन्द्र-उनकी पत्नी और जवाहर जी पहुँच चुके थे.. जवाहर जी की पत्नी को अनजानों से मिलने में कोई रुचि नहीं..
मुख्यतः रास दादा राजनीतिक बातें करते रहे, कुछ गुनगुनाते रहे.. कुछ देर में बिना पत्नी को लिए कन्हैया प्रसाद जी भी आ गए... उनकी पत्नी भी काव्य वालों के बीच नहीं जाती हैं...
रास दादा के गुनगुनाये दो पंक्ति मुझे बेहद पसंद आई तो पूरी रचना सुनाने का आग्रह कर बैठी... फिर खुद दुर्गेश जी चार पंक्ति–चार पंक्ति कह माहौल बदल डाला... सबकी कविताओं की धारा बह निकली.. राही जी की पत्नी एक भजन सुनाई... जब मैं सुर पकड़ती कि अब वापस हुआ जाए तो दुर्गेश जी की पत्नी मुझे पकड़ लेती,"दीदी थोड़ी देर और!" रास दादा बोलते कि आप अब तक कुछ सुनाई ही नहीं चार पंक्ति सुना दीजिये... तबतक किसी और की रचना फड़फड़ाने लगती.. कुछ समय बढ़ जाता... अंततः जब शाम के छः बजे गए तो मुझे कहना पड़ा कि अब मैं सबका धन्यवाद करती हूँ और अपनी कुछ बात कहती हूँ...
"मैं राम-रहीम, शिव कृष्ण को नहीं मानती हूँ लेकिन एक शक्ति को जरूर मानती हूँ जो हमारी साँसों की डोर को नचाता रहता है... सब कहते हैं कि उसकी मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलता , बात सही भी है हम किसी को जीवित कहाँ कर पाते हैं... तो अगर उसने कोई ऐसा गम दिया है जिससे हमारी साँसों की डोर वह काट नहीं सका है तो हमें इतनी और शक्ति दिया है कि उसके दिए और भारी चोट को हम बर्दाश्त कर सकें... *दिया उसने, लिया उसने* पता नहीं साँसों का डोर कब कट जाए... ऐसा नहीं होकर ऐसा होता मानों जन्में बच्चे की नाल कटती हो... बहुत छोटी जिंदगी है... सबका जाना तय है... तो क्यों न हम मुस्कुराते हुए काट लें... आज हम सारे बिहारी एक जगह जमा हैं लेकिन बिहार में कभी नहीं मिले... आज आने में रुकावटें आ रही थी लेकिन उसने मेरा मनोबल बढ़ाये रखा कि आऊँ और आपको बता दूँ कि मेरे भाई के जाने के बाद उनके गम में मेरी माँ चली गई... मेरी माँ के लिए एक बेटा गया महत्वपूर्ण रहा, चार बच्चे उनके प्यार के लिए तरसता उनमें एकबाल पुत्र महत्त्वपूर्ण नहीं रहा... ऐसा ना हो कि गए पुत्र के गम में आप दोनों पति पत्नी इतने डूब जायें कि समाज को एक और विभा मिले प्यार और सहारे के लिए छछनती... बिन माँ की बेटी का जीवन... जेठ की दोपहरी में रेत पर नंगे पाँव चलना और सर पर दहकता सूर्य ढ़ोना...

Wednesday, 16 January 2019

"जद्दोजहद"




"दी! दीदी! सामने देखिए वह वही हैं न , जिन्हें समाज की धारा में लाने के लिए हम इनके आशियाने के अंदर गए थे... गोष्ठी में कभी आना होता था तो पहले अपने घर वालों से आपसे फोन पर बात करवाती थीं , घर वाले सुनिश्चित हो पाते थे तब गोष्ठियों में आ पाती थीं...!"
"अरे कहाँ? ना! ना! कोई दूसरी होगी.. तुम्हें कोई गलतफहमी हो रही हैं!"
"बिलकुल नहीं। मुझे कोई गलतफहमी नहीं हो रही है.., उड़ती चिड़िया के पर गिनती हूँ.. रात्रि, थोड़ी दूरी और थोड़ा अंधेरा होने से आपको ठीक से पहचान में नहीं आ रही होगी..!"
"नहीं ना रे! ना दूरी है और ना अंधेरा... चकाचौंध पैदा करने वाली चेहरे की सजावट और ग्लैमरस पोशाक से धोखा खाने पर विवश हो रही हूँ... समीप जाकर पूछ लूँ, राजनीत गलियारे में आने वाली दो परती चेहरे का राज..., कैसे उड़ान भरी होगी वो इतनी ऊँची...!"
"ना ,दीदी! ना! बेहद कठिनाई से आपके सहारे देहरी लाँघी है..., शिखर से तो अभी जलधारा निकली है!"
"शिखर से गिरी जलधारा जलजला न बन जाये उसके लिए उसका तट तय करना होता है...!"

Friday, 11 January 2019

"संतोष नहीं तो सुख नहीं'







#पटना_वाला_प्यार पुस्तक का लेखक ,"जीवन में कुछ फैसले इंसान खुद नहीं ले पाता है। उसे एक पुश की जरूरत होती है। कुछ यही हुआ इस बार के 'विश्व पुस्तक मेला,दिल्लीमें। मेरी पहली किताब को दिल्ली पुस्तक मेला में जगह मिला। सपना सच होने जैसा था। फिर मेरे प्रकाशक Samdarshi Prakashan के संपादक योगेश समदर्शी जी ने बताया वह मेरी किताब का लोकार्पण दिल्ली पुस्तक मेला में करवा रहे हैं। तो यकीन मानिए मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। एकबार तो मन हुआ चला जाऊँ कैसे भी...!
पर बॉस से छुट्टी मांगने की हिम्मत नहीं हुई। फ्लाइट का टिकट भी देखा। फिर छोड़ दिया, सोचा डेढ़ घण्टे के कार्यक्रम के लिए कौन इतना खर्च करे? मैं भूल गया था, इतना बड़ा मौका मैं कैसे हाथ से निकलने दे रहा हूँ...।
   लोकार्पण वाले दिन दिल्ली से बड़ी दी Anupama Das का फ़ोन आया उसने समझाया इतना बड़ा मौका कैसे निकलने दे रहे हो। तुरंत निकलो एयरपोर्ट के लिए। मैं एयरपोर्ट के लिए निकला भी , लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। अब अफ़सोस के अलावा और कुछ नहीं बचा था...।"
"5 मिनट से ज्यादा समय नहीं मिलता.. तस्वीर खिंचवाने के संग शायद मंच से कुछ बोलने के लिए... उसके लिए इतना अफसोस..!🤔 4 दिसम्बर 2018 को दिग्गज समीक्षकों के समीक्षा के संग
माता-पिता, चाचा-चाची अपने पराए की उपस्थिति में लोकार्पण... किया-धरा सब पानी में...?
*पंजे से उचक कर नभ पर इंद्रधनुष खींचने की कोशिश जारी रखो.."*
"लेकिन सही में जाने की इच्छा थी। हम मैनेज नहीं कर सके।
4 दिसंबर का किया धरा सब पानी मे कैसे? वह दिन जीवन का सबसे बड़ा दिन था। मृगतृष्णा.."
"बिलकुल 'मृगतृष्णा'
–प्रकाशक मंगनी में पुस्तक नहीं छापते..
–पुस्तक मेला में भी वे स्व के प्रचार के लिए स्टॉल लगाते हैं
–इतना ही था तो सम्मानित करने के लिए बुला लेते लेखक को...
–दिल्ली या दिल्ली के आस-पास हो लेखक तो चला जाये... पटना से दिल्ली जाने में जो खर्च है... पटना से दिल्ली जाने में सामान्यतया दस हजार का खर्च दान कर दो न ठंढ़ में कम्बल खरीद कर...!" 

Tuesday, 8 January 2019

"परीक्षा"



"माँ! माँ आज मैं बेहद खुश हूँ... आप पूछेंगी ही क्या कारण है... पहले ही बता दूँ कि हमारी सारी चिंताएं-परेशानियाँ खत्म होने वाली है... मैं जिस कम्पनी में काम करती हूँ उसी कम्पनी में साकेत की नौकरी पक्की हो गई... अगले महीने से जॉइन कर लेंगे... पाँच साल से मची अफरा-तफरी खत्म होगी और वे हीन भावना से बाहर आ जायेंगे...।" खुशी से उफनती मोहनी की आवाज फोन के स्पीकर से निकलकर ससुर मोहन के कानों में चुभ रही थी..
वे उफन पड़े,"मैं पहले भी मना कर चुका हूँ कि पति-पत्नी का एक ही ऑफिस या कम्पनी में काम करना उचित नहीं है... दोनों के आपसी रिश्ते पर असर पड़ेगा...।"
"जानती हूँ! आपको कभी पसंद नहीं था कि साकेत और मोहनी एक कम्पनी में काम करे.. जब साकेत एक बड़ी कम्पनी में काम करता था और उस कम्पनी ने मोहनी को रखना चाहा था तो आपने विरोध किया था... समय का पहिया बहुत तेज़ी से बदला... साकेत को विदेश का प्रलोभन हुआ, अपनी कम्पनी खोलने का चक्कर... विदेश में अडिग होना , असफलता चखना, अवसाद में घिरना... वो तो शुक्रिया ईश का, मोहनी ड्योढ़ी के खूंटे से बंधी नहीं रही थी... कश्ती भंवर से निकाल रही है... इस बार आप बिलकुल विरोध नहीं करेंगे...।" मोहनी के सास की बातों पर मोहर लगना ही था।

Thursday, 3 January 2019

हिन्द , हम व हिन्दी..



"हेल्लो मैम! वन मिनट...,"
"जी हाँ! कहिए..,"
"क्या आप ऑथर हैं?"
"नहीं ! नहीं तो..! क्यों क्या हुआ?"
"पापा के पास आपकी लिखी बुक मैंने पढ़ा है...!"
"देख लो बेटा ... इसे कहते हैं बड़प्पन... आठ पुस्तक का संपादन कर भी अपने को लेखक मानने से इंकार करती... सीखने की भूख अभी बाकी है... शीर्ष का मंजिल अभी बाकी है...!"
"मेरे गुरू अस्सी पुस्तक लिख चुके..., उनसे पूछा गया उनकी द बेस्ट कृति कौन सी है ? तो उन्होंने कहा ,"अभी लिखना बाकी है!"
"आप पहली ऑथर हैं जिनसे मैं मिला हूँ... आज तक बहुत सी पुस्तक पढ़ा लेकिन कभी किसी ऑथर से मिला नहीं था...!" झुककर चरणस्पर्श कर लिया
"मुझे आपकी ब्लेसिंग चाहिए, मैं भी बुक लिखना चाहता हूँ!"
"बेहद खुशी की बात... आपको कामयाबी मिले... अच्छी शुरुआत हो...!"
"कैसे बुक छपेगी... माने कैसे छपती है...?"
"आपके लेखन पर निर्भर करता है... उत्तम लेखन हुआ तो प्रकाशक खुद से छाप देंगे... वैसे कहना मुश्किल है कि ऐसा हो ही चाहेगा... आप अच्छा लेखन कर भी लेंगे तो जल्दी कोई प्रकाशक मिल जाएगा... आप अपनी पूँजी लगाकर छपवा सकते हैं...,"
"क्या मेरी उम्र यानी क्या लोग उनतीस-तीस साल के लेखक के लेखन को महत्त्व देंगे या मैं कुछ साल रूक जाऊँ?
"लेखन का उम्र से क्या ताल्लुक? चेतन भगत की पहली पुस्तक किस उम्र में आई ?
"जी! जी! यह तो आपने ठीक कहा...!"
"आप किस विषय पर पुस्तक लिखना चाहते हैं?"
"स्प्रिचुअल! कैसे लिखूँ ? शुरुआत कैसे करूँ ? अंत कैसे करूँ ? बहुत उलझनें हैं..! थॉट को कैसे..,"
"आप श्री गणेश तो करें... लिखते जाएं... एक दिन का तो काम है नहीं... लिखने के क्रम में लगे कि इसे शुरू में होना चाहिए तो कट-पेस्ट शुरू में कर लीजिए... लगे कि मध्य या अंत में होना चाहिए तो उस क्रम में सजा लीजियेगा.. लेकिन पहले यथाशीघ्र शुरू कीजिए...।"
"क्या पाठक को मेरी उम्र देखते हुए मेरे ज्ञान की बातों पर विश्वास होगा?"
"क्यों नहीं होगा...? पहले भी कह चुकी हूँ अनुभव का उम्र से कोई ताल्लुक नहीं... मैं आपसे उम्र में बहुत बड़ी हूँ... लेकिन हमारा माहौल अलग है... मैं पूर्णतया साधारण गृहणी हूँ... चौके से चौखट तक की दिनचर्या है मेरी... आपका दिनभर में ना जाने कितने लोगों से मिलना-जुलना होता है... किस भाषा में लेखन करना है आपको ?"
"जी! इंग्लिश!"
"क्यों लिखना चाहते हैं ? लेखन किसके लिए करना चाहते हैं?"
"अपने नॉलेज को दूसरे तक पहुँचाने की चाह है... लेखन से ही तो बाँट सकूँगा...।"
"बिलकुल सही... अपनी भाषा में क्यों नहीं लिख रहे ?.. ताकि जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते उनतक भी आपकी बातें पहुँच सके... ऐसे तबके के लोगों के पास ही भ्रांतियाँ ज्यादा है... ,"
"इंग्लिश बुक ज्यादा लोगों को प्रभावित करती है...। ज्यादा बिकेगी..।"
"मृगतृष्णा में नहीं भटकें... अनुवाद कई भाषाओं में हो सकती है...। आप बस लेखन शुरू करें...।"
"मुझे आपसे मदद की बहुत जरूरत पड़ेगी क्या जब चाहूँ आपसे बात कर सकता हूँ..?"
"निसंकोच जब इच्छा हो बात कर लें... मैं आपको अंग्रेजी में मदद नहीं कर पाऊँगी ज्यादा... हम हिन्दी में विमर्श कर सकते हैं , आप उसे अंग्रेजी में अनुवाद कर लीजियेगा..।"
"जी!जी! मैम! हम मातृभाषा में ही सोचते भी हैं न...!"