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देवनागरी में लिखें

Sunday, 15 September 2019

जीवनोदक





"प्रतीक्षारत साँसें कितनी विकट होती है... आस पूरी होगी या अकाल मौत मिलती है..?" मंच पर काव्य-पाठ जारी था और श्रवण करने वाले रोमांचित हो रहे थे... हिन्दी दिवस के पूर्व दिवस (शुक्रवार13 सितम्बर 2019)  एम.ओ.पी. महिला वैष्णव महाविद्यालय का सभागार परिसर , विभिन्न महाविद्यालयों से आमंत्रित छात्र-छत्राओं से भरा हुआ था, हालांकि उस दिन का निर्धारित कार्यक्रम समाप्त हो चुका तो सारे अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार मध्याह्न भोजन के लिए जा चुके थे...नई कलम को कितनी अहमियत मिलनी चाहिए सदा चिंतनीय विषय रहना चाहिए... 5 छात्र-छात्राओं का पंजीयन कार्यक्रम के दिन हुआ था और वे समर्थ युवा रचनाकार आठ बजे से आकर अपनी बारी की प्रतीक्षा में तपस्यारत थे.. आदरणीय डॉ. सुधा त्रिवेदी जी उन युवा रचनाकारों की सूचना कई बार घोषित कीं और सराहनीय और अनुकरणीय बात थी कि दिन के दो बजे उनको पाठ का मौका देना..। प्रमाणपत्र बाद में बनवा देंगी सांत्वना बार-बार दे रही थीं.. उनके प्रति मेरी श्रद्धा प्रतिपल बढ़ती जा रही थी।

Saturday, 14 September 2019

"साहित्य का बढ़ता चीर"




छोटी कलम को आज से चार साल पहले एक संस्था की जानकारी नहीं थी... हालांकि इक्कीस साल से उसी शहर की निवासी थी। आज पच्चीस साल हो जाने पर गली-गली में बस रहे छोटे-बड़े-बहुत बड़े कई संस्थानों को जानने की कोशिश में थी कि शोर से उलझन में हो गई... 
"यह क्या साहित्य का विस्तार है... साहित्य तो लहूलुहान होने के स्थिति में है.. नाकाम इश्क की शायरी में बातें (शेर का बहर पूछ लो तो बगले झांकने लगते/लगती हैं,) चुटकुले, एक्टिंग, स्टोरी टेलिंग, गीत गाना, रैप.. कोई बताए रैप कौन सा साहित्य है? अरे हाँ मज़ेदार बात तो यह है कि ऐसे ओपन माइक्स में शामिल होने के लिए पैसे भी देने पड़ते हैं जो कि पुरी तरह मामले को व्यवसायिक बनाता है।" बड़ी कलम की संस्थाओं के मंच की आवाज गूँज रही थी।
"ठहरें! ठहरें! जरा ठहरें! क्या यहाँ कॉफी हाउस में , नुक्कड़ के चाय की दुकान पर जैसे साहित्य उफनता था और लहरें समेटने के लिए विद्यालय-महाविद्यालय के छात्र व राहगीर वशीभूत होकर वृत में जुट जाते थे वही हालात हैं क्या आज के... बड़े-बड़े महारथियों के जुटान में आलेख पढ़ने के एक-दो हजार से नाम पंजीयन करवाएं.. काव्य-पाठ के लिए चार सौ से आपको शामिल कर आप पर एहसान की जाएगी...!" opne mike(mic) पूरे विवाद करने का अवसर पा गया था..
"वरिष्ठ साहित्यकारों की देख-रेख में सीखना, गुण-दोष जान समझ , अनुशासन में बंध आगे बढ़ना और अत्यधिक श्रम से प्रसिद्धि हासिल करना ही श्रेयस्कर होगा।" छोटी कलम दोनों को सांत्वना दे रही थी।
"जाओ! जाओ! यहाँ गुटबंदी कुनबे के साम्राज्य में कोई एक गुरू मिल गया तो सबके खुन्नस की शिकार हो जाओगी!" बड़ी कलम की संस्थाओं के मंच और opne mike(mic) की आवाज संग-संग गूँज गई।
"इनलोगों ने चींटी से कुछ नहीं सीखा!" मुस्कुरा रही थी छोटी कलम

Thursday, 12 September 2019

मुक्तक

ढूँढ़ रही आजू-बाजू दे साथ सदा रहमान
क्रांति की परिभाषा रहे पहले सा सम्मान
सबके कथन से नहीं हो रही सहमती मेरी
आस रहे तमिल-हिन्दी एक-दूजे का मान 
संगी ज्योति उर्जा व ज्ञान का भंडार है
श्रेष्ठ जीवन का लक्ष्य उत्तम संस्कार है
वो हमारी नहीं, हम हिन्दी की मांग हैं
भाषा-उठान आंचलिक का अंकवार है

Saturday, 7 September 2019

जय हिन्द-सलाम भारत के वीरों

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, स्क्रीन
ग्यारह रुपये जब मिलते थे
जाते हुए अतिथि की दबी मुट्ठी से
आई किसी भउजी के खोइछा से
कई मनसूबे तैयार होते थे
हमारे ज़माने में
छोटी खुशियों की कीमत
बड़ी होती थी

चन्द्रयान के सफर में लगा
ग्यारह साल सुन-पढ़
कुछ वैसा ही कौतूहल जगा
इस ग्यारह साल में कितने
सपने बुने उलझे टूटे होंगे
फिर दूने जोश से
उठ खड़े हुए होंगे


वैसे जमाना बहुत पहले जैसा रहा नहीं...
मेरे भैया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन
–जा ये चंदा ले आवs खबरिया
–चंदा मामा दूर के, पुए पकाए गुड़ के

Thursday, 5 September 2019

"नैध्रुवा"



           "अरे! जरा सम्भलकर..., तुम्हें चोट लग जायेगी। इस अंधरे में क्या कर रही हो और तुम्हारे हाथ में क्या है?" बाहर दौड़ती-कूदती नव्या से उसकी मौसी ने पूछा।
                      "क्या मौसी? आप भी न! इतने एलईडी टॉर्च/छोटे-छोटे बल्ब की रौशनी में आपको अंधेरा नजर आ रहा है!"अपने हाथ में पकड़े जाल को बटोरती रीना बेहद खुश थी।
"वाहः! तुमने सच कहा इस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया.., यूँ यह भी कह सकती हो कि अमावस्या की रात है और हम नभ में तारों के बीच सैर कर रहे हैं। इतनी संख्या में जुगनू देश के किसी और कोने में नहीं पाए जाते होंगे जितने यहाँ किशनगंज में देखने को मिल रहे हैं। लेकिन तुम इनका करोगी क्या ?"
"नर्या भाई को दूँगी.. जब से माँ-पापा उसे पुनर्वासाश्रम से गोद लेकर आये हैं, वह किसी से कोई बात ही नहीं कर रहा है मौसी।" जुगनू से भरा जाल थमाने के लिए ज्यों नव्या नर्या के कंधे पर हथेली टिकाती है, वह सहमकर चिहुँक जाता है।
"उसे थोड़ा समय दो..., वह पहले जिस घर में गया था वहाँ नरपिचासों के बीच फँस गया था..। बंद दीवारों के पीछे शोषण केवल कन्याओं का नहीं होता है। उसे जुगनुओं की जरूरत नहीं है, उसे उगते सूरज की जरूरत है..!"

"नैध्रुवा" = पूर्णता के निकट
नर्या = वीर/मजबूत


Wednesday, 4 September 2019

"बदलते पल का न्याय"


"ये यहाँ? ये यहाँ क्या कर रहे हैं?" पार्किन्सन ग्रसित मरीज को व्हीलचेयर पर ठीक से बैठाते हुए नर्स से सवाल करती महिला बेहद क्रोधित नजर आ रही थी.. जबतक नर्स कुछ जबाब देती वह महिला प्रबंधक के कमरे की ओर बढ़ती नजर आई..
"मैं बाहर क्या देखकर आ रही हूँ.. यहाँ वे क्या कर रहे हैं?" महिला प्रबंधक से सवाल करने में भी उस आगंतुक महिला का स्वर तीखा ही था।
"तुम क्या देखकर आई हो, किनके बारे में पूछ रही हो थोड़ा धैर्य से धीमी आवाज में भी पूछ सकती हो न संगी!"
"संगी! मैं संगी! और मुझे ही इतनी बड़ी बात का पता नहीं, तुम मुझसे बातें छिपाने लगी हो?"
"इसमें छिपाने जैसी कोई बात नहीं, उनके यहाँ भर्ती होने के बाद तुमसे आज भेंट हुई हैं। उनकी स्थिति बहुत खराब थी, जब वे यहाँ लाये गए तो समय नहीं निकाल पाई तुम्हें फोन कर पाऊँ…,"
"यहाँ उन्हें भर्ती ही क्यों की ? ये वही हैं न, लगभग अठारह-उन्नीस साल पहले तुम्हें तुम्हारे विकलांग बेटे के साथ अपने घर से भादो की बरसती अंधियारी रात में निकल जाने को कहा था..., डॉक्टरों की गलती से तुम्हारे बेटे के शरीर को नुकसान पहुँचा था, तथा डॉक्टरों के कथनानुसार आयु लगभग बीस-बाइस साल ही था, जो अठारह साल..," आगंतुक संगी की बातों को सुनकर प्रबंधक संगी अतीत की काली रात के भंवर में डूबने लगती है...
"तुम्हें इस मिट्टी के लोदे और मुझ में से किसी एक को चयन करना होगा, अभी और इसी वक्त। इस अंधेरी रात में हम इसे दूर कहीं छोड़ आ सकते हैं , इसे देखकर मुझे घृणा होने लगती है..,"
"पिता होकर आप ऐसी बातें कैसे कर सकते हैं..! माता पार्वती के जिद पर पिता महादेव हाथी का सर पुत्र गणेश को लगाकर जीवित करते हैं और आज भूलोक में प्रथम पूज्य माने-जाने जाते हैं गणेश.. आज हम गणपति स्थापना भी हम कर चुके हैं..,"
"मैं तुमसे कोई दलील नहीं सुनना चाहता हूँ , मुझे तुम्हारा निर्णय जानना है...,"
"तब मैं आज केवल माँ हूँ..,"
"मैडम! गणपति स्थापना की तैयारी हो चुकी है, सभी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं..," परिचारिका की आवाज पर प्रबंधक संगी की तन्द्रा भंग होती है।
"हम बेसहारों के लिए ही न यह अस्पताल संग आश्रय बनवाये हैं संगी...! क्या प्रकृति प्रदत्त वस्तुएं दोस्त-दुश्मन का भेद करती हैं..! चलो न देखो इस बार हम फिटकरी के गणपति की स्थापना करने जा रहे हैं।"

Monday, 2 September 2019

"विधा : पत्र"


प्रियांशी माया
सस्नेहाशीष संग अक्षय शुभकामनाएं

आज माता-पिता-पुत्र एक साथ भूमिलोक में विराज रहे हैं यानी हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी पूजन एक साथ भूलोकवासी कर रहे हैं... हरतालिका तीज जहाँ बिहार और उत्तर प्रदेश के स्त्रियों का पर्व है तो गणेश चतुर्थी महाराष्ट्र कर्नाटक... यह तब की बातें हैं जब सोशल मीडिया का ज़माना नहीं था... अभी तो देश के किसी कोने में जाओ प्रत्येक पर्व की खुशियाँ मिलेगी ही मिलेगी...
 तुम्हें पता ही है हम अभी अपने सगे परिजनों के बीच नहीं हैं... इस कॉलनी में हम अभी जम गए हैं रम नहीं पाये हैं... अगल-बगल के पड़ोसी से बातें हो जाती है.. उनसे ही पता चला कि गणेश-चतुर्थी एक जगह मनाई जाएगी... सभी सहयोग राशि जमा करेंगे परन्तु तुम्हारे पापा किसी कन्या के शादी में पच्चीस-पचास हजार दान कर देंगे लेकिन पूजा-पंडित को तो पाँच रूपया ना दें.. (बिहार का अनुभव या यहाँ भी गाँव का अनुभव -चंदा वसूलकर शोर शराबा दारू नाच लाउडस्पीकर पर भद्दे गाने...) आदतन नहीं देना था और ना दिए...
देश हित के लिए छोटा परिवार सुखी परिवार... बुजुर्ग रहे नहीं और बच्चे विदेश बस जाए.. बुढ़ापे में घर आने की किसी की प्रतीक्षा ना हो.. पर्व के नाम पर रंग रोशन ना हो.. नीरसता किस कदर हावी होता है यह बस अनुभव से समझा जा सकता है।
सामने बच्चे-बड़े उत्सव मना रहे हैं और हम शीशमहल के अंदर से झाँक रहे हैं... आधुनिकता के नाम पर भगवान नहीं मानते.. , मंदी को देखते हुए सब चीजों पर बंदी लगा बैठे हैं.. पर्यावरण का सोच कर बहुत अच्छा कर रहे हैं पर गतिमान जीवन के लिए क्या सोच रहे हैं.....,
बाकी फिर कभी विस्तार से... अपना ख्याल रखना..



तुम्हारी
माँ


Saturday, 31 August 2019

"शमा"


"जब आने वाले पूछते थे - तबीयत खराब है क्या? आप कहते- नहीं। दरख्त अब बीज बन रहा है। एक कविता भी लिखी आपने- कल तक जो एक दरख्त था, महक, फूल और फलों वाला, आज का एक जिक्र है वह, जिंदा जिक्र है, दरख्त जब बीज बन गया है, हवा के साथ उड़ गया है, किस तरफ अब पता नहीं। उसका अहसास है मेरे साथ।
  आज फिर वो दरख्त अब बीज बन रहा है। मुझे भी उस एहसास को संजोते रहना है..., 'वन ट्रैक माइंड' वाले इंसान...," अवसर था अमृता प्रीतम के जन्मशताब्दी समारोह का एकांत दिल की बातें कहने का अवसर दे डाला।
        इमरोज को हद से ज्यादा चाहने लगी थी रौशनी.. रौशनी को लगा कि अभी उसका दायित्व है इमरोज के साथ रहना और अपना कर्तव्य निभाना... इमरोज इसकी अनुमति दे नहीं रहे थे..।
"पागल मत बनो... सरहद रक्षार्थ दिल में लगी गोली सा होता है इश्क...,"

Tuesday, 27 August 2019

"खौफ"


"ओह! मुझसे अनजाने में हुई भूल, बहुत विकराल हो गई दीदी, मैं बहुत बहुत शर्मिन्दा हूँ। आप से, और सब से भी, मैं बेटे की कसम खा कर बोल रही हूँ, मैं जानबूझ ऐसी भयानक भूल कभी नहीं करती..। मेरी अज्ञानतावश की गई भूल पर दी आपको विश्वास है कि नहीं ?" प्रतिमा ने शीतल से रोते हुए कहा।
 लेखक के नाम के बिना व्हाट्सएप्प पर घूमती कहानी को अपने नाम से छपवा ली थी प्रतिमा ने। सोशल मीडिया के कारण भेद खुल गया था और असली लेखक व संपादक की नाराजगी की शिकार बन रही थी प्रतिमा।

   "बेटे की कसम खाने से बचिए।  मेरे अविश्वास का कोई कारण नहीं है। आप मुझे नहीं समझ सकी हैं! किसी को गलत मानना या उसे सजा देने की अधिकारी मैं खुद को कभी नहीं समझती हूँ, लेकिन अभी जो गलती हुई है उसका क्षमा मांगना ही उपाय है। अगर वे लोग पुलिस केस कर दिए तो परिवार की प्रतिष्ठा का क्या होगा यह सोचिए।" शीतल ने कहा जो कहानी भेजने में मध्यस्थता की थी। सम्पादक शीतल को ही जान रहे थे और उन्हें लिखित में क्षमा चाहिए थी.. जो भेजी गई।
 "जी! लेखक ने मेरा क्षमा वाला टिप्पणी सही में डिलीट कर दिया है.. जब मैं फेसबुक पर.. असली गुनहगार तो  मैं, उनकी हूँ, उनसे क्षमादान मिल गया, फिर संपादक तो मुझे जीते जी मरने जैसी सजा देने में आमादा हैं!"

 "जो हो गया उसे भूल जाइए.. आप अपनी गलती की कीमत चुका चुकी हैं... नई शुरुआत कीजिये.. इंसा और ईश के न्याय में कितना फर्क होता है... उसकी प्रतीक्षा कीजिये!"

Saturday, 24 August 2019

"मोक्ष"


"कितनी शान्ति दिख रही है दादी के चेहरे पर...?" दादी को चीर निंद्रा में देख मनु ने अपने चचेरे भाई रवि से कहा।
"हाँ! भैया हाँ! कल रात ही उनके मायके से चाचा लेकर आये.. और अभी भोरे-भोरे ई..,"
          कई दिनों से मनु की दादी जिनकी उम्र लगभग सौ साल से ऊपर की हो गई थी और उन्हें अब केवल अपने बचपन की कुछ बातें याद रह गई थी ने रट लगा रखी थी कि उन्हें खेतों में अपने पिता-भाई के लिए खाना भेजना है... अच्छी बारिश होने के कारण आज-कल खेतों में बिजड़ा डाला जा रहा है। अतः घर आकर खाने की फुर्सत नहीं मिलती किसी को.. सात बहनों और चार भाइयों में सबसे बड़ी होने के नाते घर-चौके की जिम्मेदारी उन पर रही होगी...।
    उनको लगातार रटते हुए देखकर मनु के पिता अपने ममेरे भाई के लड़के को खबर करते हैं कि एक बार आकर अपनी बुआ दादी को लेकर जाएं क्यों कि यहाँ से किसी के साथ जाने के लिए तैयार नहीं हो रही हैं। भाई का पोता आता है और अपनी बुआ दादी को अपने गाँव ले जाकर घुमाकर वापस फिर पहुँचा देता है..., साथ-साथ मनु के पिता रहते हैं..।

Friday, 23 August 2019

यक्ष प्रश्न

*मुरलीधर द्वापर में बड़े-बड़े लीला करने वाले।*
*कमलनाथ हर क्षण कृष्णा का साथ देने वाले।*
*सास-ननद का रूप बदल जाओ या सम्बोधन,*
*निर्गुण तुम्हें ढूंढ रहे अज्ञानी सर्वेश्वर बनने वाले।*

बीते कल गुरुवार 22 अगस्त 2019 देर रात जगी रही कि रात बारह बजे के बाद 23 अगस्त होगा और मुझे कुछ अच्छा लिखना है... (समय व्यतित करने के लिए व्हाट्सएप्प समूह/फेसबुक उत्तम सहारा) लेकिन

[22/08, 11:37 pm] गोपी उवाच :- अभी-अभी मेरी देवरानी का फोन आया , बातों-बातों में वो बता रही थी कि वो राखी में ननद के घर पर थी। कुछ दिनों के बाद भगनी का जन्मदिन था तो ठहर गई थी। उसी बीच किसी दिन शाम के नाश्ते में समोसा आया तो समोसा के साथ सबलोग कच्चा प्याज खाते हैं यह सोचकर देवरानी बारीक छोटा-छोटा प्याज काट कर ले आई.. ननद बोली कि ऐसे थोड़े काटा जाता है मैं फिर से काट कर लाती हूँ पतला ही लम्बाई में.. देवरानी बोली भी कि कट गया है तो ऐसे ही खा लेंगे लोग तो क्या हो जाएगा.. ? तो ननद दाँत पिसते हुए बोली कि आपलोगों को खाना ही बनाने में मन नहीं लगता है और ना घर ठीक रखने में.. देवरानी दुखी हुई कि एक तो ननद छोटी दूसरे उनके घर पर मेहमान थी..
[22/08, 11:42 pm] राधा रानी : ये सास ननद लोग ऐसा क्यों करते हैं समझ नीं आता🤦‍♀🤦‍♀
[22/08, 11:43 pm] गोपी : अरे! इतनी रात तक जगी हो 🤣
[22/08, 11:46 pm] राधा रानी: जी
कल सास-ससुर आ रहे हैं..
[22/08, 11:48 pm] राधा रानी : अभी सामान प्रोपर वे में सेट भी नहीं हुआ..। सोचा था दो छुट्टी में इनके साथ मिलकर मार्केट का सामान और इलेक्ट्रिसिटी वाले के काम और दूसरे कुछ काम निपट जायेंगे..।
[22/08, 11:49 pm] गोपी : "इतनी रात इसी चिंता में जगी हैं क्या... सो जाइये... समय पर सब होता रहेगा..,"
[22/08, 11:50 pm] गोपी : ना कोई अतिथि आ रहे और ना उम्र रहा ये सब सोचने के लिए
[22/08, 11:52 pm] राधा रानी : अरे दीदिया आप नहीं जानती
हर चीज को देखकर कुछ न कुछ बोलना ही होगा... पुराने जमाने वाले सास ससुर न🙊🙊
आजकल वाले सास ससुर तो कुछ न कहते उलटा लाड लड़ाते बहुओं से😊😊
[22/08, 11:55 pm] राधा रानी : एक बार प्रोपर वे में सैट हो जाते न फिर आते तो टेंशन न होती... खैर आने दीजिए घर है उनका बहुओं का तो काम ही है सुनना... दो कान इसिलिए दिये न भगवान ने🤣🤣
[22/08, 11:55 pm] गोपी : केवल पुराने ज़माने के सास-ससुर की बात नहीं है बहुये भी उसी तरह की हैं चिंता करने वाली बातें दिल पर लेने वाली... अरे बेटे के माँ-बाप हैं । बहू को इंसान नहीं समझना है , ना समझें लेकिन  बहू तो खुद को इंसान समझ ले.. ना तो वह रोबट है और ना फरिश्ता
[22/08, 11:57 pm] गोपी : साधु के तोता बन अपनी तबीयत खराब ना कर लेना.. दो कान हैं तो दो कान का पूरे अच्छे से इस्तेमाल हो.. 😜🤭
[22/08, 11:58 pm] राधा रानी: "आपकी अंतिम पंक्ति को काश वो ही लोग समझ लेते तो कितना अच्छा होता... खैर हमही खुदको समझायेंगे ये लाईन बल्कि घोटकर पीने की चेष्टा करेंगे"😄
[22/08, 11:59 pm] राधा रानी : 🤣🤣🤣🤣कोशिश तो यही रहेगी पर फितरत किधर बदलती पर कोशिश शिद्दत से जारी है फितरत बदलने की.. शुभ रात्रि..!"
मैं रात भर सोचती रही कि सच में कब से रात्रि शुभ होने लगेगी...

Monday, 19 August 2019

अनाधिकार सीख

आप हजार से लाख लेकर पाठ करने वाले/वाली मंचीय कवि-कवयित्री हैं तो मैं आपको कुछ कह सकूँ इस के काबिल नहीं क्यों कि आपके वश में साहित्य सेवा तो है नहीं क्यों कि मलाई(क्रीम जो छाली से बनती है) पर पलने वालो/वालियों के पास एक-दो रचना बेची जाने योग्य ही होती है... और आयोजनकर्त्ता के पास एक-दो-तीन को बुलाने की ही हैसियत होती है आपके नाम पर उन्हें दान भी मिला होता है.. आपके नाम पर मतवाली भीड़ जुटी है... अपना-अपना दाना-पानी लेकर.. गुलशन नन्दा/रानू/अनेकानेक उपन्यासकार जयंती दिवस/मोक्ष दिवस शुरू नहीं हुआ अभी तक... अतः आप चेत नहीं सकते..

लेकिन
–आप अगर साहित्य-सेवा में रत हैं और आपको दस-बीस के संख्या के साथ सुनने वाली भीड़ जो बिना सुनाये जाएगी तो आयोजनकर्त्ताओं को चार बातें आयोजन स्थल पर ही सुनाएगी के साथ बुलाया गया है तो समय का ख्याल रखते हुए विषयों के विभिन्नताओं का भी ख्याल रखें...
–मंच संचालक महोदय यह ख्याल रखें कि वक्ता और श्रोता की भीड़ केवल आपको सुनने नहीं आई है और ना आज ही यह मौका है कि आप ग़ालिब से गुलज़ार के रचनाओं को तो सुनाए ही अंत में मैं भी महत्त्वपूर्ण साबित करें अपनी लम्बी रचना के साथ.. जबकि आप अन्य रचनाकारों को जगाते रहे हैं कि समय कम है और सुनाने वाले ज्यादा अतः छोटी रचना सुनायें... छोटी रचना सुनायें..

Sunday, 18 August 2019

अनुत्तीर्ण

प्रतीक्षारत रहती है
जीवित आँखें
मन सकूँ पाए
मन प्रतीक्षारत रहता है
क्षुधा तृप्त रहे
क्षुधा से सिंधु पनाह मांगे।
तथाकथित अपनों के भरोसे
शव प्रतीक्षारत रहे..
संवेदनशील पशु भी होते हैं
आहत कर देने वाले मनु को
आहत होने वाले मनु का
कसूरवार बनना
 क्यों चयन करना पड़ता है..!
विदाई में
हमें संग यही ले जाना है
और
यही दे जाना है..
सफर अनजाना है
 फिर भी अहम है
सब बटोर लेना है

Wednesday, 14 August 2019

रक्षाबंधन


थक गई गौरेया कहते-सुनते।
खिन्न है गुहार लगाते-लगाते।
थोड़ी सी जगह उसकी भी हो।
फुदकना हो सके चहकना हो।
विद्रोही हो रही नोक गड़ा रही।
धर्य रखने वालों की,
 गर्दन अकड़े धर सिकुड़े,
किसी को फर्क नहीं पड़ता है।
तब चिंतनीय विचारणीय फिजूल है।
मत उम्मीद करो
उदासी आंगन ड्योढ़ी की दूर होगी।

         "अरे!इस राग भैरवी का स्पष्ट कारण भी कुछ होगा?" सखी रंभा के काव्य को सुनकर मेनका का सवाल गूँज उठा जो थोड़ी देर पहले ही आकर भी शांति बनाए हुए थी।
"पिछले राखी के दो दिन पहले मेरे पति देव अपनी बहन के घर वापस लौटे... स्वाभाविक है बहन को अच्छा नहीं लगा होगा मुझे बोली भी तो मैं बोली ,"भाई आपके थे, आप रोक क्यों नहीं ली? ऐसा तो था नहीं कि राखी मुझसे बंधवानी थी!"
"अगले साल आप लेकर आइयेगा!"
"ठीक है।"
 "एक ही शहर में या यूँ कहो पड़ोस में मेरे भी दो भाई रहते हैं।यह जानकर कि इसबार मैं राखी में बाहर जा रही हूँ बहुत उदास हुए और पूछने भी लगे कि "ऐसी क्या बात हो गई कि राखी के ठीक दो दिन पहले हमें छोड़ कर जा रही हो?
 खैर! हमलोग रक्षाबंधन के तीन दिन पहले हजारों किलोमीटर दूर अपने बेटे के घर में आ गए, उसी शहर में ननद का भी घर है। रक्षाबंधन के दो दिन पहले मेरी ननद फोन कर बोली कि हमलोग पहाड़ों पर घूमने जा रहे हैं , सुबह ग्यारह बजे जाना है आपलोग एक दिन पहले ही शाम में आ जाइये कि सुबह राखी बाँधना जल्दी हो जाये (दोनों के घर की दूरी 2 ढ़ाई घण्टे का है)... औपचारिक रिश्ता..., मैं आने से इंकार कर दी।"
"यानी स्वाभिमान पर ज्यादा चोट हो तो अभिमानी बना देता है!" मेनका का स्वर दुख प्रकट कर रहा था।
"आप आने से इंकार की तो हम अपना पहाड़ों के सैर को स्थगित कर आपको लेने आये हैं! बिन भाभी कैसे फैले घर में उजियारा...!" दोनों सखियों को अचंभित करता ना जाने कब से आई ननद का स्वर खुशियाँ बिखेर गया।

Sunday, 11 August 2019

अनुत्तरित


दिवसाद्यन्त सवाल बेधता है
चुप्पी उकबुलाहट सालता है
तू तड़ाक तड़ाग करता नहीं
कोई निदान नहीं मिलता है
मिट्टी ज्यादा सहती है या चाक?
भट्टी में कलश को
होना चाहिए दर्प ज्यादा
रंग दिए जाने का प्रकल्प ज्यादा
नासूर मत पलने तो गहरा इतना
तम गहन होता दर्द सहरा इतना

परस्पर प्यार इश्क मोहब्बत विश्वास
सबमें का कोई-न-कोई आधा वर्ण
एहसास कराता है मुकम्मल नहीं है

क्या पहचान लेना इतना आसान है
हर पल तो सब बदल जाता है
बदल जाती है इच्छाएं परिस्थति बदलते
तब तक साथ कौन निभाता है
जब तक स्वार्थ नहीं सधता है
बस सोच में अटकता है

Wednesday, 7 August 2019

"भूल सुधार"



 दिल्ली निवासी कद्दावर नेता को शेख उल आलम(श्रीनगर) एयरपोर्ट पर पत्रकारों की मंडली घेरकर खड़ी थी.. किसी पत्रकार ने पूछा,-"आप यहाँ जमीन खरीदने आये थे क्या मामला (डील) तय हो गया?"
"जो पड़ोसी होने वाला था वह क्या सोच रहा यह भी तो पता कर लूँ.. इस इरादे से उससे बात करने गया...,"
"फिर क्या हुआ?" सबकी उत्सुकता चरम सीमा पर, सब चौकन्ने हो गए।
"बात-चीत के क्रम में, अपना शहर तो रास नहीं आया... उस समाज के लिए कभी कुछ किया नहीं... जो अपनों के बीच नहीं रहना चाहता, वह अजनबियों के बीच रहेगा..  उनके मुख से सुन और भाषा-बोली, खान-पान, चरित्र- व्यक्तित्व से डरे-सहमे के बगल में रहने का इरादा बदल दिया।" हवाई जहाज के उड़ने की घोषणा हो रही थी नेता जी के घर वापसी  के लिए और सामने न्यूज चैनल पर जन-जन प्रिय प्रत्येक दिलवासी नेत्री के मोक्ष की खबरें आ रही थी..


Thursday, 1 August 2019

सजग हम


"आयाम" – साहित्य का स्त्री स्वर
आयाम = अधिकतम सीमा/विस्तीर्णता

"लेख्य-मंजूषा"~लेख्य=लेखन योग्य
ऐसी पेटी जिसमें अनर्थक कुछ भी नहीं

लगभग 145-146 प्रेमचंद की कहानियों में से कुछ न कुछ कहानियाँ सबके_जीवन को प्रभावित करती रही है... हर मौके पर, दैनिक कार्यकलापों पर उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत कर दी जाती है.. बड़े घर की बेटी सच लिख दे–समुन्दर में आग लग जाये

ना यह मुश्किल है ना मुश्किल वह है।
त्यागना अहम-वहम व होना प्रसह है।
गर्दन अपनी सर अपना पूरा हर सपना,
जीना चाहूँ मरने के बाद कर्म का गह है।

प्रसह= नीलकंठ
गह = हथियार

कल 31 जुलाई 2019 कथा-सम्राट प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर साहित्य का स्त्री स्वर 'आयाम' द्वारा 'लेख्य-मंजूषा' के सहयोग से पद्मश्री डॉ. उषा किरण खान की अध्यक्षता में हुए एक महती आयोजन में लखनऊ से आईं हिंदी की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार और कथाकार रजनी गुप्त ने अपनी कहानी 'पगडंडियों पर साथ साथ' का पाठ किया। शहरी, विशेषकर कामकाजी स्त्रियों की स्वातंत्र्यचेतना, उनके सपनों और संघर्षों को बेहतरीन अभिव्यक्ति देने वाली रजनी गुप्त का शुमार स्त्री विमर्श की प्रमुख लेखिकाओं में होता है। कहानी-पाठ के बाद उस पर चर्चा का लंबा सिलसिला चला जिसमें पटना के कई प्रमुख लेखकों और लेखिकाओं ने अपने विचार व्यक्त किए।

पहली बार बिहार आई सम्पादक उपन्यासकार कथाकार रजनी गुप्त जी (गोमतीनगर/लखनऊ) का हार्दिक स्वागत और अभिनंदन !

साहित्य और समाज हित में जो उचित हो, हमारा वो कर्म हो
आवाज दो–हम एक हैं

बलात्कार के खिलाफ कड़ी सजा की मांग करने भी हम कल शाम में जुटे
समाज कब बदलेगा समझ के बाहर

Wednesday, 31 July 2019

बेबसी

01.
चढ़ता वेग ऊँची पेंग ढ़लता पेग सब सावन में सपना।
टिटिहारोर कजरी प्रघोर छागल शोर सावन में सपना।
व्हाट्सएप्प सन्देश वीडियो चैट छीने जुगल किलोल,
वो झुंझलाहट कब हटेगा मेघ है अब सावन में सपना।
02.
सावन-भादो के आते ही
याद आती है
मायके की
माँ के संग-संग ही रहती
भाई-बहनों की
हरी चूड़ियों की
मेहंदी की
सजी हथेलियों में
कुछ दिनों की कहानी
सजाने वाले की कोर
सजी रहती बारहमासी रवानी
राखी की सतरंगी कनक_भवानी
बेहद खूबसूरत लगती है दुनिया
बात बस महसूस करने की
परन्तु महसूस करने नहीं देती
रोग की परेशानी आर वाली
लाइलाज रोग भ्रष्टाचार बलात्कार
तिरस्कार तमोविकार भोगाधिकार

Friday, 26 July 2019

*"किस विधि मिलना होय"*

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, पाठप्रकाशक का कहना है 
किताब नहीं है बे, ज़हर है 

सत्य कथन ... इस पुस्तक की सारी कथाएं जहर है स्त्रीत्व के लिए

लेखिका : न्यास योग ऊर्जा उपचारक डॉ. रीता सिंह/सहायक प्राध्यापिका
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा
   
          समय रहते समयानुसार ही उतारते चलना, खुद के सेहत और लंबी उम्र के लिए जरूरत है ,चाहे बोझ किसी भी तरह का हो.. बोझ के घर्षण से दाग व दर्द ही मिलता है... रचनाकार से दो-चार बार आमने-सामने का मिलन था हमारा... उनकी आध्यात्मिक और संत वाणी सुनकर वो सदा सम्मानित लगी... स्नेहमयी तो कुछ ज्यादा...  आध्यात्मिक यानी आत्म-उत्कर्ष , जीवन सिद्धि का मार्ग.. रामायण-गीता-महाभारत के अजीबोगरीब    किस्से, जिसके उदाहरण हिस्से से वे कल्पना और सपना में जीते हैं, मुझे ऐसा लगता है।
                   जब रचनाकार ने अपनी पुस्तक "किस विधि मिलना होय" की चर्चा की तो मुझे लगा कि पूरी तरह आध्यात्मिक पुस्तक होगी तो मेरी रुचि की नहीं होगी... क्यों कि मुझे रामायण-महाभारत-गीता से उदाहरण लेकर बात करने वाले आज की दुनिया की समस्याओं को समझने की कोशिश में नहीं लगे, महसूस होते हैं...। परन्तु जब लेखिका ने पुस्तक मुझे दिया तो पढ़ने के लिए उत्सुकतावश पन्ने पलट लिए... पन्ना पलटते मैं भौचक्की रह गई और पढ़ती रही और स्तब्ध होती रही। एक चीज जो बहुत ज्यादा आकर्षित किया वह था डॉ. उषा किरण खान जी की लिखी भूमिका... क्या लेखन है? अरे! जब आप पुस्तक पढ़ेंगे/पढेंगी तभी समझ में आ सकेगा...!
   मैं ईश विषय से भागने वाली, प्रेम विषय पर पुस्तक पढ़ रही थी..। इस विषय से भी भागती हूँ कुछ भी बोलना और लिखना अपने वश में नहीं समझती हूँ...। जितने भी सफल प्रेम के उदाहरणों को दिया जाता है वे सब जुदाई की अति सफल कहानी है.. यानी जो सच्चा प्रेम करता है वह शादी नहीं कर सकता है... प्रेम कहानी पुरातन युग से चलती जा रही है... जटिलता और जुझारूपन लिए।
      बहुत पुरानी कहावत है "पाँच डेग पर पानी बदले पाँच कोस पर वाणी" इतने बदलाव में रहने के लिए समझ और समझौते की बेहद जरूरत पड़ती है। पहले जब शादी तय होती थी तो एक गाँव का दोनों परिवार नहीं होता था... विभिन्न परिवेश - विभिन्न संस्कृति.. कितना निभाये! कितना ना निभाये...!! एक तरफ कुंआ तो दूजी ओर खाई... कभी रिश्ते में तो कभी जिंदगी में... यही तो लेखिका ने पुस्तक के सारी कहानियों में बताने की कोशिश की है... प्रत्येक कथा में व्याप्त व्यथा पाठक/समाज के समक्ष एक सवाल छोड़ता है... पाठक के लिए कठिन है जबाब देना... अगर जबाब होता ही तो लेखिका जबाब के साथ कथा लेखन करती...
     जब मेरी शादी 1982 में हुई थी तो मेरे करीबी रिश्तेदार के पास काफी किस्से थे देवर-भाभी के बीच पनपे प्यार के... मुझे वो अविश्वसनीय सत्यकथाएं सुनने में बहुत अटपटा लगता था । तब सीता-लक्ष्मण मेरे दिमाग में स्थायी रूप से निवास कर रहे थे... इतने वर्षों के बाद उसी विषय पर आधारित इस पुस्तक की पहली कथा पढ़कर समाज के यथार्थ पर विश्वास हो आया... (नवेली विधवा प्रेमिका/पृष्ठ संख्या 11)...
    बहन की जचगी के लिए आई और बहनोई से प्रेम कर शादी कर ली... मेरे अनुभव में भी दो कहानी है... एक कहानी के पात्र पर तो कभी सवाल नहीं की क्यों कि अन्य कोई पात्र मेरे करीब नहीं था... पत्नी घर त्याग दी थी... सौत बनी बहन के साथ रहना स्वीकार नहीं की... लेकिन दूसरी कहानी के पात्र जब हमारे सामने आए तो वे दिन रात दिखते थे और पत्नी से जो बेटी थी वह शादी के योग्य थी और साली पत्नी बनी से एक बेटा था जो उम्र में बहुत छोटा था... प्रतिदिन गाड़ी निकलता पत्नी दोनों बच्चों संग पीछे की सीट पर और साली बनी पत्नी आगे की सीट पर... बहुत खुश दिखाने की कोशिश करते... मेरी मकानमालकिन अक्सर मुझसे पूछती कि तीनों की रात में कैसे सामंजस्य बैठता होगा... कौन कितनी खुश रहती होगी... । लेकिन लेखिका के कथा में छोटी सौत बनी बहन को दूध में पड़े मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया गया है (फोन की घंटी/पृष्ठ संख्या 47) एक छेद पर कशीदाकारी की जा सकती है, लंबे चीर लगे को दो टुकड़ा करना मजबूरी हो जाती...
पूरी किताब पढ़ते समय किसी कथा पर खुद कुछ ना कर पाने की बेबसी पर खुद से नफरत होने लगेगा... किसी कथा से रोंगटे खड़े हो जाएंगे.. कभी घृणा होगी समाज में ऐसे भी परिवार है जहाँ हम जी रहे हैं पिता शादी कर लाता है और बेटा अपने दोस्तों के साथ सौतेली माँ को... (किस प्रेम की करे उपासना/ पृष्ठ संख्या 55)...
बच्ची की माँ से शादी करता है धन का लालच दिखाकर लेकिन बच्ची जब बड़ी होती है तो उसे पिता का नाम नहीं देता है उस बच्ची को प्रेमिका बनाने के लिए धन का आदि बनाता है... बच्ची के असली पिता से ही बचाव का गुहार लगाती है..(सन्तोष/पृष्ठ संख्या 63) हल्की दरार को समय पर पाट लिया जाए तो सैलाब आने से रोका जा सकता है...
     डॉ. रूही चाहती है कि बच्चे जागरूक बने। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों से ऊपर उठें और राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी निभाएं। काउंसिलिंग के लिए आये हर युवा उन्हें यह उम्मीद देकर जाते हैं। यह उम्मीद ही जीवन है।(कम्फर्टेबल नहीं हूँ/पृष्ठ संख्या 90)
लघु-मध्यम-दीर्घ कुल मिलाकर चौवालीस कथा-कहानी और 131 पृष्ठ की रश्मि प्रकाशन,(अशुद्धियों से विरक्ति है) लखनऊ से छपी "किस विधि मिलना होय" नामक पुस्तक प्रत्येक हाथों तक जरूर पहुँचनी चाहिए और आप-हम आंकलन करे अपने आस-पास के परछाईयों का.. घर के अंदर से बाहर तक के रिश्तेदार, विद्यालय , होस्टल, धर्म, जाति सबसे समाधान ढूँढ़ कर समाज की बालाओं-कन्याओं-स्त्रियों को सुरक्षित करने में सहायक हों। लेखिका को असीम शुभकामनाएं ... उम्मीद करती हूँ या छली जा रही या छलने वाले की सहायिकाओं की चेतना जगे... औरत , औरत का साथ दे और बन्द हो यह आपदा... औरत हूँ , अतः सारी कथा की व्यथा अपनी लगी... तलाश में हूँ  "किस विधि मिलना होय"...की जरूरत ही ना पड़े... किसी को भी... वार्डन के मन में सूर्य की प्रथम रश्मि के सौंदर्य का भाव प्रवाहित हुआ, जब तक प्रकृति में यह प्रकाशमय सौंदर्य व्याप्त रहेगा, तबतक संस्कार की बेल सूखेगी नहीं। कुछ अँधेरे जकड़ने की कोशिश करेंगे, पर प्रकाश का ताप उस अँधेरे को निश्चित समाप्त कर देगा।(प्रेम या जाल/पृष्ठ संख्या 115)

पहली "किस विधि मिलना होय" समीक्षा पर नीलू ने रश्मि प्रकाशन की एक पुस्तक लेखिका से भेंट स्वरूप हासिल की।

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विभा रानी श्रीवास्तव 'दंतमुक्ता'
सम्पादक

Thursday, 25 July 2019

"स्त्री-मुक्ति की गूँज"

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग

"आज भोला(ड्राइवर) कितने बजे आयेगा?.. भोला को जरूरत के हिसाब से आने का समय निर्धारित कर आप उसका मनबढ़ा दिए हैं. स्वर बहुत ऊँचा कर जाता है...,"

"ना तो हम हर पल गाड़ी में हो सकते हैं और ना उसे बैठाकर रखना अच्छा लगता है..,"

"अन्य दूसरे को आठ हजार मिलते हैं मासिक तो हम दस हजार देते हैं..,"

"क्योंकि युवा अच्छा इंसान मिल गया है.., आज क्या है और कहाँ जाना है?" पति महोदय का झुँझलाता उग्र स्वर अपनी नाराजगी जाहिर कर दिया उनको मेरा घर से निकलना बिलकुल पसंद नहीं लेकिन कार्यों से खुश होते हैं जब कोई उन्हें बताता है।

"स्त्रियों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरने वाली रैली में शामिल होने जाना है...,"

"क्या? होश तो ठिकाने है... एक लाठी पड़ गई तो... मैं जाने से मना कर रहा हूँ!"

"कोई पल याद है जिसमें आपने यह कहा हो जाओ कर लो तुम्हें जो पसन्द है... यह कार्य तो..., जाऊँगी तो जरूर आपको सूचित कर रही हूँ अनुमति नहीं मांग रही... जब आप जे० पी० आंदोलन में जेल गए थे तो आपको किसी ने रोका तो जरूर होगा?"

"तब मैं बीस साल का युवा था साठ साल में नहीं गया था...!"

"वो क्या कहते हैं-जब जागो... इतने सालों तक किस्सा सुन-सुन कर तो आज़ाद हुई हूँ अब पुनः कैद में नहीं जीना चाहती हूँ...!"

Wednesday, 24 July 2019

"देश त्रस्त आपदाओं से"




 महिलाओं से जुड़े मुद्दे पर विधान सभा भवन घेरने के उद्देश्य ठाने रेडिओ स्टेशन से रैली निकालने के लिए शहर के सभी महिला संगठनों-संस्थाओं के सदस्याओं की अच्छीखासी भीड़ जुट चुकी थी... दौड़ते-हाँफते कविता , संगीता , मीता , विभा , एकता पहुँची... उनके चेहरे बता रहे थे कि वो किसी सैलाब से होकर गुजरी हैं... रैली की नेतृत्व संभाले निवेदिता शकील व रेशमा प्रसाद ने सबको बड़े हौसले से अँकवार में लिया और पूछा ,-"बताओ तो हुआ क्या है?"

कविता :- रवि ने अपनी पत्नी को बीच चौराहे पर चौपड़(मांस काटने वाला तेज धारवाला कसाई का चाकू) से मौत की स्थिति में पहुँचा दिया... अभी-अभी।

संगीता:- "मेरे पड़ोस में रहने वाली गुड़िया की आज मौत हो गई एक लड़के ने उसपर एसिड अटैक कर दिया था।"

मीता:-"सब स्तब्ध रह गये आज सुबह जब रामरती को पकड़ने पुलिस आई उसने अपने तीन बच्चों की हत्या कर खुद मरना चाहती थी... पति दूसरी शादी कर लिया है...!"

विभा- "मेरी सहेली को उसके ससुराल वालों ने जला कर मार दिया ,उसके कमरे से धुँआ निकलता देखकर जबतक हमलोग कुछ कर पाते तबतक सब राख हो गया..!"

एकता:-"मीता मेरी बेटी की सहेली ने आज आत्महत्या कर ली कोई मनचला उसे विद्यालय पहुँचने नहीं देता था!"

   रैली दो-चार घण्टे तक डाकबंगला चौराहा पर आवाजाही बन्द रखे रहा... चारों ओर जाम लगा रहा... नारे गूंजते रहे... बहरा-गूंगा समाज अपने कार्य में लिप्त रहेगा..।

Tuesday, 23 July 2019

गिले-शिकवे



"मेरा तो समय ही नहीं बचता है..! बेटी यहीं डॉक्टर है, गाहे-बगाहे अक्सर आ जाती है.. उसके बच्चे हैं..! कभी बैंगलोर चली जाती हूँ..!आप सामाजिक कार्यों के लिए कैसे समय निकाल लेती हैं? ओह्ह अकेले रहती हैं न..! आप अपने बेटे बहू के पास कब जा रही हैं ?" पुरानी परिचित समाजिक मिलन समारोह में सबकी उपस्थिति का फायदा उठा रही थीं प्रचार-प्रसार कर सकें कि वो बहुत सुखी हैं।

"और आपका सामाजिक दायित्व वहन का क्या... मुझपर तरस नहीं खाइये... अकेले रहने के कारण नहीं, समाजिक ऋण उतारने के लिए, मनुष्य होने के कारण.. पशु तो हूँ नहीं..!"

खुद के बच्चों के परवरिश-नौकरी-शादी के बाद उनके बच्चों को संभालने का भी खुद का दायित्व समझ व्यस्त रहना कोई ना तो अनुचित है और ना यह अधिकार मिल जाता है कि किसी दूसरे को कमतर समझें...

किट्टी-पार्टी, भजन मंडली, आभूषणों को खरीद-बिक्री में, ब्यूटीपार्लरों में उमड़ती भीड़ क्या ख़लीहरों की नहीं होती....,

"आप तो घर में ही नहीं रहतीं, कब आपसे मिलने कोई आये..?" हँसते हुए व्यंग्यात्मक लहजा किसी तरफ से उछला।

"शादी से लेकर पैंतीस साल ड्योढ़ी के अंदर चौके से शयनकक्ष तक ही गुजरा है... कब किसने कितना खोज-खबर ली , दोहरा सकती हूँ किसी बच्ची के द्वारा दोहराई गई कविता की तरह..., मोबाइल सबके हाथों में है... आने की सूचना देकर जरूर आएं.. तब ना मिलूं तो जरूर सामाजिक स्थलों पर उलाहना दें...।"




Thursday, 18 July 2019

दृढ़ता


जितना दिखता है उतना ही सच नहीं होता है



"सोमवार 16 जुलाई 2019 आकांक्षा सेवा का वार्षिकोत्सव आ रहा है दीदी आपको सबके साथ आना है! उस दिन के लिए अपना, लेख्य-मंजूषा तथा अन्य संस्थाओं का समय बचा कर रखियेगा..," मनोज जी (आकांक्षा सेवा संस्थान के सहयोगी) 16 जुलाई से पाँच-छ: दिन पहले बोले मुझसे बोले।
14-15 जुलाई को भेंट हुई जब तो बोले ,–"एक दो दिन बाद देखता हूँ ..."
–"क्यों भाई ? एक दो दिन के बाद क्यों देखोगे?"
"है कुछ बात ऐसी!"
"चलो ठीक है..,"
16 जुलाई को सुबह में मनोज भाई फोन किये कि "ममता शर्मा जी (आकांक्षा सेवा संस्थान की संस्थापिका) को बुखार हो गया है अतः वे बोल रही हैं कि एक दो दिन के बाद वार्षिकोत्सव मनाया जाएगा...,"
"जो बीड़ा उठाया है समाज का बुखार उतारने का वो खुद के लिये साधारण बुखार का बहाना कैसे बना सकता है या समाज सेवा का बुखार उतर गया ?"
"ना दीदी! ना! हरारत बरसात का असर है... एक भोरे से रात तक खड़े रहना , सब काम करना..,"
"सुनो! ज्यादा पैरवी नहीं करो...! जोखिम काम का बीड़ा उठाई हैं तो इतना करना ही पड़ेगा... और अभी बिना सहयोगी का कर रही हैं तो झेलना ही पड़ेगा.. स्व को त्याग कर ही समाज और साहित्य के लिए कार्य किया जा सकता है.. अस्वस्थ्यता को क्रॉसिन या कोई अन्य दवा से दूर करें और थोड़ी देर के लिए ही आएं.. मैं कुछ लोगों को लेकर आ रही हूँ..  'बस बच्चों के संग वृक्षारोपण करेंगे...'  वार्षिकोत्सव आज है तो आज ही मनेगा...! कल से चतुर्थ में प्रवेश कर जाएगा और हम पंचम शोर शराबे के साथ समारोह करेंगे...!"
"जी दीदी! ठीक है आइये...!"



.

Wednesday, 17 July 2019

//भटकते कदम//


"क्या आपलोग भी इसी समुदाय से हैं ?" पाँच सौ मीटर का झंडा लेकर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का किन्नरों के प्राइड परेड में शामिल एर्मिना , अदालिया , इलिना व गुनीत से विशालकाय मानव ने सवाल किया.. सामने से आते एकबारगी से पूछे गए सवाल से पहले तो सब सकपका गई फिर सम्भलकर एक साथ बोल पड़ी, -"नहीं हम समर्थन में शामिल हुए हैं!"
"वो अच्छा! आपलोगों को क्या लगता है इनलोगों को समाज के मुख्य-धारा में जुड़ जाना चाहिए? फिर इनसे मिलने वाली दुआओं व शुभकामनाओं का क्या होगा...!" पूछने वाले विशालकाय मानव का लहजा व्यंग्यात्मक हो गया।
"बिलकुल जुड़ जाना चाहिए... तभी कुछ भ्रांतियाँ नष्ट होंगी।" अदालिया ने कहा।
"कानून बन चुका है,ऐसे बच्चे घर-परिवार से दूर नहीं किए जाएंगे।" एर्मिना ने कहा।
"समाज भी साथ दे इसलिये तो यह आयोजन किया गया है,"इलिना का कहना था।
"हर घर-परिवार-समाज में विभीषण होता है! करोड़ों के उगाही का खपत कहाँ होगा..?" विशालकाय मानव के साथी ने कहा।

"क्या आपलोग भी इसी समुदाय से हैं ?" पाँच सौ मीटर का झंडा लेकर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का किन्नरों के प्राइड परेड में शामिल एर्मिना , अदालिया , इलिना व गुनीत से विशालकाय मानव ने सवाल किया.. सामने से आते एकबारगी से पूछे गए सवाल से पहले तो सब सकपका गई फिर सम्भलकर एक साथ बोल पड़ी, -"नहीं हम समर्थन में शामिल हुए हैं!"
"वो अच्छा! आपलोगों को क्या लगता है इनलोगों को समाज के मुख्य-धारा में जुड़ जाना चाहिए? फिर इनसे मिलने वाली दुआओं व शुभकामनाओं का क्या होगा...!" पूछने वाले विशालकाय मानव का लहजा व्यंग्यात्मक हो गया।
"बिलकुल जुड़ जाना चाहिए... तभी कुछ भ्रांतियाँ नष्ट होंगी।" अदालिया ने कहा।
"कानून बन चुका है,ऐसे बच्चे घर-परिवार से दूर नहीं किए जाएंगे।" एर्मिना ने कहा।
"समाज भी साथ दे इसलिये तो यह आयोजन किया गया है,"इलिना का कहना था।
"हर घर-परिवार-समाज में विभीषण होता है! करोड़ों के उगाही का खपत कहाँ होगा..?" विशालकाय मानव के साथी ने कहा।

Saturday, 13 July 2019

जिंदगी यूँ सँवरता गया।


आसपास की महिलाओं में प्रथम स्थान माँ का ही आता है उनसे समझ और धैर्य लिया तो जीवन सँवरता गया.. बाद में उनसे ही मिलता जुलता रूप हमारे बड़े भैया का रहा जो राह दिखलाने में सारथी बने , जिंदगी जब भी उलझने लगी समझ और धैर्य पतवार बने.. आगे बढ़ने पर बेटा ऊँगली थाम लिया.. फेसबुक-ब्लॉग पर लाया तो उसके ही दोस्त की माँ श्रीमती रश्मि प्रभा संगी बनी.. लेखनी थमाई... हौसला दी जमीं दिया.. अकेले चले थे कांरवा बनता गया... जिंदगी रोज आजमाती है.. कभी बोलती बंद करती है तो कभी दिमाग कुंद करती है .. कभी घुटने टेकने पर विवश करती है.. पर जिंदगी को हराती हूँ सदा.. कभी प्रेम, मौत और ईश पर बात नहीं करती हूँ क्योंकि उसे ना देखा और ना कभी आजमाया.. हाइकु की शोधार्थी हूँ... कल्पनाएं वर्जित है... जिंदगी के हकीकत की अभ्यर्थी हूँ..
छोटी-छोटी खुशी से बड़ी खुशियाँ मिलती है.. 


Friday, 12 July 2019

"का बरसा जब कृषि सुखाने"




"रमुआ! रे रमुआ!" बाहर से ही शोर मचाते रतनप्रसाद घर में प्रवेश किये।
"क्या हुआ ? इतना गुस्सा में क्यों फनफना रहे हैं?" पत्नी रत्ना का सवाल धीमी आवाज में पूछे गये को अनसुना करते हुए फिर जोर से चिल्लाए..
"रे रमुआ! जिंदा भी है कि कहीं मर-मरा गया...,"
"जी मालिक आ गया बताइये क्या काम करना है?"
"चल, छोटी-छोटी कांटी और हथौड़ी लेकर बाहर चल..!"
"मुझे भी तो बताने का कष्ट करें कि क्या बात हुई है जिसके कारण आप इतने गुस्से में हैं...," रत्ना ने पूछा।
"अभी मैं अपने उच्च पदाधिकारी के साथ आ रहा था तो बहू के कमरे की खिड़की से पर्दा उड़ रहा था और बहू बिना सर पर आँचल रखे पलंग पर बैठी नजर आ रही थी। पदाधिकारी महोदय ने कहा भी प्रसाद जी वो आपकी बहू है ? खिड़की के पर्दे पर कांटी ठोकवा देता हूँ ! तुम कितने साल घूँघट में रही हो...।"
"आपके अक्ल पर पर्दा पड़ गया है... कल आपका वृद्धाश्रम जाना आज ही तय कर रहे हैं और आपकी खुद की बेटी अभी जो उड़ाने भर रही है ब्याहनी बाकी है! दुनिया में शोर है ज़माना बदल गया है... इक्कीसवीं सदी की महिलाएं फौज में और फ्लाइट उड़ा रही है... यहाँ उड़ते पर्दे में कांटी ठोका जा रहा है.. !! अक्सर देखा गया है जब मिसालें बनने का मौका मिलता है तो लोग अँधेरा चयन करते हैं मशालें बुझाकर.., कर्म खोटा चाहिए भजनानन्द..!"
स्तब्धता में रतनप्रसाद धम्म से कुर्सी पर गिर पड़े।

Wednesday, 10 July 2019

"हमराही"


"सुबह-सुबह मैराथन में हिस्सा लेने जा रही हैं क्या?" तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरती हुई विमला को देखकर उसकी पड़ोसन कमला ने चुटकी ली! अन्य किसी दिन सा विमला ने चुटकी का जबाब चुटकी से नहीं देते हुए अखबार बाँटने वाले से सभी प्रसिद्ध अखबार खरीद अपने घर में घुस गई। कल उसकी संस्था में आई नामचीन क्लब की सदस्याओं द्वारा अनेक प्रस्तावित बातों की खबरें जानने की उत्सुक सारे अखबारों को बार-बार पढ़ रही थी... खबरें विस्तार से तो थीं लेकिन ना तो उसका नाम और ना तो उसकी संस्था के नाम का जिक्र भी था...
    क्रोध के तिलमिलाहट में क्लब के अध्यक्ष को फोन किया, हेलो की आवाज सुनते फट पड़ी मानों बरसात में बादल फटा हो और सैलाब लाया,-"आपने मेरे साथ धोखाधड़ी किया, आपलोगों के वश में नहीं था कि स्लम के बच्चों को जुटाकर विद्यालय खोल सकें और उन बच्चों की देख-भाल कर सकें तो मेरे संस्थान को सहायता करने के नाम पर , संस्थान को गोद लेने का नाटक कर लिया और मेरे संस्थान के नाम का जिक्र भी नहीं किया कहीं भी...! मूसलाधार बारिश में पौधे सींचती हैं आपलोग..., इस कार्य के नाम पर जो फंड का जुगाड़ होगा उससे आपलोग मौज-मस्ती ऐश करेंगी...! संस्थान के विद्यार्थियों को स्लम के बच्चे- स्लम के बच्चे का प्रचार कर आपलोग महादेवी बन रही हैं...,"
"अरे! अरे! पहले मेरी बात तो सुन लीजिए थोड़ी धैर्य से..,"
"नहीं सुनना आपकी बात, अब क्या होगा सुनकर आपकी खोखली बातों को।"
"हमारा क्लब इस तरह के बीस-इक्कीस विद्यालयों को गोद लिया है ,जिनके विद्यार्थियों को हमारी ओर से सहायता की जाएगी। अधिक से अधिक विद्यार्थियों में उत्साह पैदा होगा ,विद्यालय आने और विद्यालय में टिके रहने के लिए तो सभी विद्यालय का अलग-अलग नामों का जिक्र ना तो उचित है और ना तो संभव... हमारा आपका उद्देश्य एक है, हमारी मंजिल एक है .. हाथों में हाथ ले मजबूत जंजीर बन,संग-संग चलने में समाज को लाभ ज्यादा है! हम मुट्ठी बने रहें!" पूरी तरह संतुष्टि नहीं मिलने पर भी सोचने का समय लेते हुए विमला ने फोन कट किया।

Saturday, 6 July 2019

उलझन

गरिमा पाठक(रांची)
*गरिमा पाठक* :–शुभ प्रभात दोस्तों
हर दिन एक नये दिवस का इन्तज़ार

सबको   ही ...।
अपने अपने वक्त का इन्तज़ार है
हम जिन्दगी में हर वक्त यही तो सीखते रहते हैं
और जिन्दगी भर नहीं सीख पाते।
जन्म लेने के  पहले से लेकर
मृत्यु तक यही  तो किया है।

पहले जन्म लेने का इन्तज़ार
फिर बडे होने का ……...
बुढे होने का ……….
और  अन्ततः मृत्यु का इन्तज़ार..।

जन्म के समय हम कमजोर थे
और अन्त भी ऐसा ही होता  है
मन और तन दोनों ही
कमजोर होने लगता है।
तब सहारे की जरूरत होती है ।
हम  बुद्धिमान जीव सारा जीवन ही
बस इन्तज़ार में ही गवां देते है..।

सुबह में शाम का ……..
शाम को रात का…….
और  फिर से सुबह होने का ..।
बस यही तो चलता है सारा जीवन ।

क्या यही जीवन है ।
क्या हमने बस मरने केलिए जन्म लिया है??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- मरने का ना इंतजार है और सोचने का कि क्यों जन्म लिया है... अभी सुबह से रात तक यह सोचने में निकल जाता है कि समाज से जो ऋण लिया है उसका तो सूद ही नहीं चुके मूल कैसे चुका पाऊँगी... यही इसी पल तो है जिंदगी चूक हो रही है बड़ी-बड़ी..,

*गरिमा पाठक*:–विभा रानी श्रीवास्तव धन्यवाद मै तो सवालों के जवाब की तलाश में हूँ सिर्फ  आपने ही मुझे जवाब दिया...।वाह आह और बेहतरीन शब्दों से दिल खुश होता है लेकिन मन तो अशांत ही रह जाता है..।हम जब अशांत हो और जवाब नहीं समझ आऐ तो अपने बडो से या दोस्तों से समझने की कोशिश करते है मै भी वही टर रही हूँ ।आपके जवाब ने मुझे थोड़ी शान्ति दी है ...और अभी भी तलाश जारी है ..।
धन्यवाद दीदी
.आपको नमन...

मै क्यो आई हूँ दूनियाँ में ??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- माता-पिता के खुशी के पल प्रतिरूप होता है कोई बच्चा
परवरिश-संस्कार और वातावरण के आधार पर बच्चा अपना विचार बनाता बिगाड़ता रहता है
अपना कर्म अपने विचार पर तय करता है
आप क्यों आईं इस दुनिया में आपके अपने किये कर्म बतायेंगे आपको भी आपके समाज को भी

स्वार्थ में केवल स्व के लिए जी रही हैं और अपने खोल में लिपटी हैं या...,

*गरिमा पाठक* :–विभा रानी श्रीवास्तव ओह बहुत अच्छी बात कहा आपने ..।धन्यवाद

*विभा रानी श्रीवास्तव* :– 🤔आपके सवाल समाप्त हो गए...  लेकिन मेरा जबाब अकुलाहट में है लिख लूँ बात पूरी हो जानी चाहिए

हर पुरुष राम कृष्ण बुद्ध गाँधी मोदी नेहरू नहीं होता , अंगुलीमाल का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है
प्रत्येक स्त्री सीता अनसुइया मीरा राधा सरोजनी लक्ष्मी, लक्ष्मी बाई नहीं होती

विभा गरिमा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं अभी तो चल रही हैं...! सदा चलती रहेंगी।

Monday, 1 July 2019

नीलकंठ



कई ने कहा तेरी आदत चुगली की है।
आस्तीन में संभालना अठखेली की है।
चलो पाल रही हूँ तुझे गले लगाकर भी,
हमेशा ही हमारी भक्ति अहिमाली की है।
02
डर सताता रहता हमसे हमारा सब छीन ले जायेगा कोई।
पल-पल बदलती दुनिया में कितना साथ निभायेंगा कोई।
हमारी कोशिश उतना ही दोष दे लेते जितना हमें दंश देते,
भयावह नहीं ना जो चाहेंगे हम कितना हमें सतायेगा कोई।
03.
दम्भ तृष्णा ना दिमाग रोगग्रस्त करो।
गुम रहकर खल का तम परास्त करो।
दे साक्ष्य सपना चपला धीर अचला है,
स्व का मान बढ़ा रब को विश्वस्त करो।

Sunday, 30 June 2019

"अपराधिक भूल"


"क्या यह लघुकथा आपकी लिखी हुई है? पुस्तक में छपी  लघुकथा को दिखलाती हुई करुणा ने विम्मी से पूछा।
"हाँ!बस शीर्षक बदला हुआ है, सम्पादक महोदय ने बदल दिया है, क्यों दी आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं..?" विम्मी सहज थी।
"हु-ब-हु ऐसी ही लघुकथा कविता की लिखी फेसबुक समूह में पढ़ी हूँ और आज कविता फेसबुक पर पोस्ट भी बनाई है अपनी लघुकथा चोरी कर छपवा लेने की बात कर रही है...,"
"मैंने रेडियो पर कुछ अंश सुना था, उसी से प्रेरित होकर, अपने शब्द में प्रयास किया था,गलती तो स्पष्ट है, इनका पोस्ट देखकर ..  मेरी यही गलती है,,कि कुछ सुनकर , कुछ लिख लिया.. अब क्या निदान है,,??"
" यह तो आप सोचिए कि क्या किया जाए
–भाई गुरु जी को मैं दी.. उन्होंने मुझपर विश्वास किया जो टूट गया..
–भाई गुरु जी पर सम्पादक जी का विश्वास टूट गया..
हथेली से जैसे जल व रेत फिसलता है वैसे विश्वास टूटने के बाद साख भी...!"
 "मुझे एक सीख मिली है, वैसे दी! मिलती,जुलती, कभी कुछ नहीं होता है क्या दी ? सर का साख,भी ना धूमिल हो, कोई उपाय करें दी, दी आपहीं इस संकट से निकालिए। बात तो सही कही आपने दी, मुझे खुद बहुत बुरा लग रहा है।"
" मिलती जुलती का अर्थ समझाना होगा क्या आपको ? जो पोस्ट का लिंक मिला है उसके टिप्पणी में क्षमा मांग लीजिये... और पूरे धैर्य से सहन कीजिये... श्री सम्पादक महोदय के नाम ,क्षमा का एक चिट्ठी लिख दीजिये, चिट्ठी लिखने के बाद मुझे दिखा लीजियेगा ... अगले अंक में चर्चा ना करें इसका अनुरोध कीजियेगा.. वैसे उनकी जो मर्जी।"
"नहीं दी, अब सब तो स्पष्ट है, लेकिन मैंने कभी उनका पढ़ा होता, तो ऐसी भयानक गलती,,कभी कोई नहीं करेगा,,फास्ट ,, नेटवर्क के जमाने में.., सबके साख का सवाल है, अपनी अनभिज्ञता पर मैं बेहद पछता रही हूँ जी, सभी कोई अौर कदम ना ले ले ,, गुस्से में...!आपको  कितना बुरा लग रहा होगा दी,,मेरे कारण... !"☹🙏
"कभी खुद के लिए कुछ बुरा नहीं लगता है यह आप अच्छे से जानती हैं ! लेकिन मुझसे जुड़े किसी अन्य को कोई कष्ट/परेशानी होती है तो मेरी व्यथा भी आप जानती हैं... सब रिस जाए उसके पहले चेत जाना चाहिए..!"


Tuesday, 25 June 2019

इकीसवीं सदी : बदले वक़्त की बदली हवा



लू के थपेेड़े–
दस्यु स्त्रियों की भीड़
जूस ठेले पे।


महिला महाविद्यालय के सामने खड़ी हो हर आने-जाने वाली लड़कियों को बहुत गौर से निहार रही थी(आज प्रख्याता के रूप में उसका पहला दिन था) ,लेकिन कोई चेहरा नहीं दिख रहा था।

 सबके चेहरे ढंके हुए थे... "दस्यु सुंदरी बनना है क्या?" दाँत पिसती शिक्षिका की आवाज से उसकी तन्द्रा भंग हुई.. बौखलाहट में वह दाएँ-बाएँ देखने लगी फिर उसे सहमी कन्या याद आई जो एक दिन दुप्पटे को नकाब बनाये खल्ली(चौक) को सिगरेट रूप में उठा ही रही थी कि वर्ग शिक्षिका(क्लास टीचर) चिल्लाती कक्षा में प्रवेश की,"कल तुम अपनी माँ-पापा को लेकर विद्यालय आना, लगता है तुम्हें चंबल जाने का शौक है... अभिभावक को बेटी के शौक का पता होना चाहिए...!" उसकी तो घिघ्घी बंध गई थी और बहुत आरजू-मिन्नतों के बाद वह गुमनाम होने से बच पायी थी।

Saturday, 22 June 2019

"स्नेह का रुतबा"







"यह क्या है?" कुछ तस्वीरें कुमुद के सामने फेंकते हुए कुमुद के पति केशव ने पूछा।
"कोडईकनाल की यादें!"

"बैरे ही मिले थे, सामूहिक तस्वीरों के लिए? अपना जो स्टेटस है उसके स्टैंडर्ड का तो ख्याल करती.., हम संस्था के शताब्दी वार्षिकोत्सव मनाने के लिए हजारों किलोमीटर दूर फाइव स्टार होटल बुक करते हैं , पूरे देश से हर प्रान्त के नामचीन हस्ती और उनकी पत्नियाँ जुटी थीं। और तुम?"

"बच्चे जिस उत्साह से खाना खिला रहे थे उसमें उनका स्तर मुझे नहीं दिखा... उसके बदले में मैं उन्हें यही दे सकती थी...!"
"उन्हें उसके लिए ही पैसे मिलते हैं..,"

"इसलिए तो मैं उन्हें टिप्स में नशा छोड़ने का सलाह-सुझाव दी! बाद में एक बच्चा मेरा पैर छूने आया था जब। मेरे सामने उसने सिगरेट के टुकड़े कर फिर कभी नहीं पीने का वादा किया और हमेशा सम्पर्क में है।"




Wednesday, 19 June 2019

वक्त की परीक्षा-समय से

स्पर्श में भी शब्द सी शक्ति होती होगी पीड़ा सोख लेने की🤔 संग हैं! जब भी कोई ऐसा मौका आएगा जिसमें जरूरत हो, यह जता दे!
16 जून 2019
आँख कुछ जल्दी खुल गई... चौके में काम जरा जल्दी निपटाने थे.. दिल्ली से पम्मी सिंह जी, हजारीबाग से अनिता मिश्रा जी आयी थीं, विशेष उनके लिए काव्य गोष्ठी तय था। जून का तीसरा रविवार पितृ दिवस को समर्पित, बब्लू के जन्मोत्सव पर काव्योत्सव की तैयारी थी। मैं अति उत्साहित शयन-कक्ष से ज्यों बाहर आई भयंकर गर्मी का एहसास हुआ। पूरब दिशा में चौका होना, कैसे हानिकारक हो सकता है उसका प्रभाव दिखा। कुछ पलों में लगा सारा शरीर भट्टी में है , सर में अजीब बैचेनी, खड़ा होने में असमर्थता.. बहुत मुश्किल से एक कप चाय बना पाई... फिर जो लेटी तो शरीर काबू से बाहर... लेकिन दिमाग तैयारी में था किसी तरह शरीर को खड़ा करना है... समय गुजरता जा रहा था तथा मुख्य समस्या भोजन बनाने का था... अपार्टमेन्ट में होने का फायदा, पलंग-कुर्सी-अलमीरा पास-पास होने से खड़ा होने का जोखिम उठा दवा-पानी लिया जा सकता है... ढ़ाई बजे तक किसी तरह से गाड़ी में शरीर को डाली और कार्यक्रम स्थल तक गई पम्मी सिंह



और घर वापस आकर बिस्तर पर गिरी तो
17 जून 2019
दूसरे दिन दोपहर में कुछ देर के लिए फिर अपने शरीर को सम्भालना पड़ा... कर्कश आवाज अपनी पहचान खो रही थी ... स्टेशन आने के पहले ट्रेन की गति के सामान... "तुम्हारी आवाज सदा ऐसी क्यों नहीं रहती..." आईने से सवाल करते फिर धराशाई बिस्तर पकड़ी... पेट साथ छोड़ रहा था तथा हल्का-हल्का दर्द भी.. शरीर पर लाल दाने अपने स्थान बनाने शुरू कर दिए संग खुजलाहट
18 जून 2019
सुबह से पेट पूरी तरह साथ छोड़ चुका था.. पेट-दर्द पूरी गति से तेज रफ्तार में... तथा इशारे से बात समझाने में चूक हो रही थी ... स्टेशन पर गाड़ी ठहर चुकी हो उसी तरह आवाज बिलकुल बंद... रात होते-होते अस्पताल जाने से शरीर बचा.. दाने-खुजलाहट अपने चरम सीमा पर...
19 जून 2019
सुबह शरीर खड़ा करने के जद्दोजहद में उलझे ही थे कि खबर मिली कि आदरणीया दीदी डॉ. कल्याणी कुसुम सिंह जी 17 जून 2019 से पति विछोह सह रही हैं... उनसे मिलने जाना अति आवश्यक था.. सबको खबर की ... पति महोदय पूछे भी "कैसे जाओगी... जाना जरूरी भी है!"
"जब जाना जरूरी है तो अवश्य जाऊँगी!" मिलकर आ गयी हूँ..... तुझे तो सदा हराती आई हूँ ये जिन्दगी...


Tuesday, 18 June 2019

खंडहर का अंत


तन पर भारीपन महसूस करते अधजगी प्रमिला की आँख पूरी तरह खुल गयी। भादो की अंधेरिया रात और कोठरी में की बुझी बत्ती में भी उसे उस भारी चीज का एहसास उसके गन्ध से हो रहा था, "कौन है ?" सजग होकर परे हटाने की असफल प्रयास करती पूछी।
"मैं! मुझे भूल गई?"
" तुझे इस जन्म में कैसे भूल सकती हूँ.. तेरे गन्ध को भली-भांति पहचानती हूँ..!"
"फिर धकिया क्यों रही है?"
"सोच-समझने की कोशिश कर रही हूँ, तुझे मेरी याद इतने वर्षों के बाद क्यों और कैसे आई?"
"मैं तेरा पति हूँ!"
"तब याद नहीं रहा, जब दुनिया मुझे बाँझ कहती रही और मेरा इलाज होता रहा.. तेरे इलाज के लिए जब कहती तो कई-कई इल्ज़ाम मुझपर तुमदोनों माँ-बेटे लगा देते!"
"इससे हमारा रिश्ता तो नहीं बदल गया या तुझपर से मेरा हक़ खत्म हो गया?"
"हाँ! हाँ.. बदल गया हमारा रिश्ता.. खत्म हो गया मुझपर से तेरा हक़..," चिल्ला पड़ी प्रमिला,"जब तूने दूसरी शादी कर ली और उससे भी बच्चा नहीं हुआ तो तूने अपना इलाज करवाया और उससे बेटी हुई।"
"तुझे भी जरूरत महसूस होती होगी?"
"जिस औरत को तन की दासता मजबूर कर देती है, वह कोठे पर बैठी रह जाती है।"
"तुझे बेटा हो जाएगा! तेरा ज्यादा मान बढ़ जाएगा..!"
"तेरी इतनी औकात कि तू मुझे अब लालच में फँसा सके..!" पूरी ताकत लगा कर परे धकेलती है और पिछवाड़े पर पुरजोर लात लगा कमरे से बाहर करती हुई चिल्लाती है, "दोबारा कोशिश नहीं करना, वरना काली हो जाऊँगी..!"

Saturday, 15 June 2019

स्वप्न




कह देने से
रिश्ते टूटने से
बच गए
चुप रहने से
टूटते रिश्ते
सम्भल गए
बस तय करने में
चूक ना हुआ कि
कब क्या कहना है या
कब चुप रह जाना
पजल बॉक्स है जिंदगी
या बिछी बिसात
गोटी फिट करना
या प्यादे की चाल
हद से ज्यादा दर्द होता
साँसों की डोर कट जाती
जब तक साँसें है
खुशियों को वितरित करने में
सहायक बन गुजरते जाना है

Wednesday, 12 June 2019

फिक्र

देख गुलमोहर-अमलतास
ठिठक जाती हूँ
ठमका देता है
सरी में दिखता जल।
अनेकानेक स्थलों पर
विलुप्तता संशय में डाले हुए है
बचपन सा छुप जाए
तलाश में हो लुकाछिपी।
है भी तो नहीं
अँचरा के खूँट
कैसे गाँठ बाँध
ढूंढ़ने की कोशिश होगी
जब कभी उन स्थलों पर
वापसी होगी।

अंत का सत्य



अवलम्बन
पुत्री-पत्नी का
पिता-पति
थोड़े रूप में स्वीकार
किये जा सकते हैं
जनक-पोषण कर्त्ता होते हैं

लेकिन
अवलम्बन माता का?
पुत्र बने कुछ नहीं जमता
वृद्ध होकर कहाँ जाएगी
 यह तन का साथ
छूटने के पहले
सोचना क्या
बुद्धिमान होना कहलाता

गर्भनाशक अमरबेल
एकशाकीय परजीवी
क्वाथ कराये गर्भपात
जर्द पड़े शजर क्यों नहीं
मोहभंग कर विरोध करता
दो ही रास्ते मिलते हैं
कुढ़ कर मूढ़ होकर जी लो
मुन्नी/मुन्ना बन मस्ती से
जीवन गुजार लो


Wednesday, 5 June 2019

मेरी ईदी



रात में बाहर खुले में मत टहलना
गर्भवती बहू को सासु जी का आदेश,
उबाली गई जल में नीम की पत्तियाँ
नहाने के लिए जच्चा जरूर प्रयोग करे।
धुला कमरा, धुली चादर,  साफ बिछावन पर
पूरे पत्तों वाली टहनियाँ नीम की,
अंधविश्वास मान लेते हो!
उनको कसो न वैज्ञानिक
कसौटी पर एक-एक कर।

रवि-शशि का दान,
वृक्षों का परिदान।
छठ-चौथ को निहोरा/मनुहार
वट को धागे में लपेट लेना,
कान्हा को मानो जैसे
यशोदा ने बाँधा हो ओखल
यमलार्जुन का शाप-मुक्त होना
सृजक स्त्रियाँ
बखूबी सब समझती हैं।

सागर में बूँदों की तरह,
अनेकानेक हैं जो सालों भर,
पर्यावरण पर सोच-विचार करते हैं।
हम जैसों की नींद खुलती है
जब संकट में खुद को घिरा पाते हैं।
आ जाओ ईदी में वृक्ष लगाते हैं,
सारे रिश्तेदारों को
हम सदा जीवित रखते हैं।
छाल में विष्णु ,जड़ में ब्रह्मा और
 शाखाओं में शिव का वास मानने वाले कहते हैं,
सिर्फ और सिर्फ ऑक्सिजन प्रदाता
रोग निवारक वट अक्षय होते हैं।


Monday, 3 June 2019

बस यूँ ही


हमें क्या पसंद हमें क्या अच्छा लगता
इससे आगे हमारा दायरा कहाँ बढ़ता
रात रात क्यों है रोने का ढूंढ़ता बहाना
चक्रव्यूह अभेदक स्व गढ़कर रखता

मरु पै पड़ी रश्मि प्यासा माखौल रब कहता।
दूसरा दूसरे के दर्द का थाह ले नहीं सकता।
गुलशन के सजे सँवरे में भौंरा अटका रहे,
अंदर का बिखरा समेट लेने में समय लगता।

होड़ लगी है कितना का कितना हसोत लें।
छल-बल से मेढ़ खा सारा का सारा जोत लें।
जो संग जाता दुनिया को गठरी में बाँध लेते
परवरिश भुला संस्कार पर कालिख पोत लें।

Friday, 24 May 2019

"ऊँच-नीच"





"कहाँ गए थे इस हाल में?" चौकीदार काका को उनकी साइकिल थमाते इशर से उसके पिता ने पूछा। इशर जिस पार्टी का कार्यकर्त्ता था उसी पार्टी की जिम्मेदार नेत्री से मिलकर वापस आया था।
"महिबा जी से भेंट करने!"
"इस तरह, इतनी रात को..ऐसी क्या बात हो गई ?"
"दिन महिबा जी के सोने का समय होता है.., अचानक कामरेड का सन्देश आ गया था , महिबा जी से मिलना बेहद जरूरी था... आपको पता है न अभी मतदान का समय है!"
"हाँ तो ! हमारे हैसियत का तो ख्याल रखते... ड्राइवर घर में ही रहता है।"
"अगर आपको किसी चीज से नफरत है तो अपने मन को शुद्ध कीजिये, अपने लिए अपने मन से नफरत को मिटा दीजिये... वैसे भी उनकी गली में हवा भी उनके दलाल के इजाज़त से टहलती है..,  सरकार के हाकिमों की नजरें दिन में वहाँ से गुजरती नहीं..।"
"क्क्य्य्या?" इशर के पिता इतनी जोर से चीखें मानो उन्हें  करेंट लगा हो ।



Wednesday, 22 May 2019

"मुक्ति"



"यह क्या है! बाहर के लोग क्या कहेंगे भाभी?" विधवा भाभी को बड़ी बिंदी लगाती देखकर ननद ने सवाल किया।
"मकड़जाल से निकल चुकी हूँ। हौसले को याद दिलाने में चूक ना जाऊँ... इसलिए...,"
"आप शायद भूल रही हैं कि बड़े भैया (धीमे से:आपके पति -परमेश्वर) को आपका बिंदी लगाना पसंद नहीं था!"
"कैसे भूल सकती हूँ कहीं भी किसी मौके पर अपने रुमाल से मेरे माथे का बिंदी पोछ देना और गंवार कहकर बुलाना... उन्हें तो मेरा सांस लेना पसंद नहीं था (धीमे से:चलचित्र युगपुरुष का नाना पाटेकर)।"
"ना कोइ रोके, ना कोई टोके!" दही-चीनी से मुँह मीठा कराती... बहू के भाल पर उग आए पसीने को अपने आँचल में सोखती सास ने कहा ,-"माँ का आँचल मकड़जाल को नष्ट कर देता है!"

Friday, 17 May 2019

मतदान स्व विवेक से करें


"चाय बना दो!"
"बस जरा दूध ले आऊँ..।"
गिरते भागते दूध लाई चाय बना कर दी... साबूत मूंग बनाने चली तो टमाटर लहसुन नहीं था... फिर घर-बाजार-घर तक का दौड़ लगाई..।
"समाज से फुर्सत मिले तो घर देख लेना..!"
मतदान के लिए समाज का आवाह्न करने प्रातःकाल से फेरी लगा घर वापस आई थी। ताने का तीखा छौंक लगना स्वाभाविक था।
{"देश चला रहा है बिजनेसमैन और नाम हो रहा है मोदी-मोदी।" ठेले पर आलू प्याज बेचने वाला जब किसी से बोल रहा था, थोड़ी देर पहले तो #फेसबुक_लाइव नहीं कर पाने का अफसोस हो गया था। #इसी_तबके_के_लोगों_द्वारा_अब_तक_उलटफेर_होता_आया_है_बिहार_की_राजनीति_में...}
 "आज तो देश का सवाल है, देश तब समाज तब घर...।"
"बुजुर्ग कह गए हैं कि घर में दीया जलाकर तब मंदिर में दीया जलाया जाता है!"
"इसलिए न नेताओं की तिजोरी भरती चली जाती है और...!"

Friday, 10 May 2019

गुलमोहर


01.गुलमोहर-
छज्जे में सज गया
मधु के छत्ते।
02.गुलमोहर-
बच्चें पेंच भिड़ाये
खेलमखेल/कूदमकूद।


बच्चों का बड़ा होना
अब खलने लगा है
मन उबने लगा है
शतरंज खेलना और पेंच लगाना
गुलमोहर के गुल Image result for गुलमोहर फुल परागसे
नाजुक शाखाओं का
जरा तेज हवा चली कि विछोह निश्चित
महबूब को मानों खजाना मिल जाता था
"माँ-माँ आओ न पेंच लड़ाते हैं
देखते हैं कितनी बाज़ी कौन जीत लेता है"
"तुम अभी जितना हारोगे
उतना जीतने के लिए ललकोगे"


बड़ी बारीकी से,
बड़ी कुशलता से,
कलम के लिए,
लगाए जाते हैं चीरे।
उगाए जाते हैं नए पौध,
धैर्य रहा सदा विषय शोध,
सहजता असर करता धीरे।
भगवान के समता में बागवान,
चीरे से नवजीवन का सच्चा ज्ञान,
बन बागवान होड़ भगवान से लगाती।
नहीं बदलना ना अतुराना,
पा जाएँ सभी लक्ष्य ठिकाना,
सम तुला स्नेह शासन माँ तौल अपनाती।
सूरज से रौशनी चाँद पा जाता
तभी तो धवल विभा चमकती।