Sunday, 26 January 2020

नेकी की मूर्ति


"दंग रह जाती हूँ, इस उम्र में भी सासु-माँ घर का सारा काम कर लेती हैं..! अपने शौक पूरा करने के लिए हौसला रखती हैं... दस लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है! जब से वे हमारे पास रहने आई हैं.. मुझे तो मायके में रहने का सुख मिलने लगा है। शायद मायके से भी ज्यादा...। दादी-सासु जी और सासु-माँ को कभी साथ नहीं देख पायी। दादी-सासु जी भी इतना ही सहयोगी रही होंगी तभी न...," देर रात कार्यालय से लौटी नैनी अपने पति प्रभास से बोली।

"आओ अभी मेरी माँ से उनकी बहू होने के किस्से सुन लो.. जबतक मेरी नानी जीवित रही तभी तक मेरी माँ रानी रही..!"प्रभास नैनी को लेकर अपनी माँ के कमरे में पहुँच गया। उसकी माँ प्रतियोगिता में भेजने के लिए लघुकथा लेखन में उलझी हुई थी।

"बताइये न माँ जब आप बहू थीं तब क्या आपको इतना ही सुख था, जितना मुझे मिल रहा है ?" नैनी ने सास से पूछा।

"मेरी सासु-माँ की सासु-माँ सौतेली थीं.. वो ज़माना भी बहुत अलग था..! हमारे ज़माने कुछ अलग हुए लेकिन शिक्षा की कमी तो रही...। दर्द देने वाली पुरानी बातों को याद करने से खुद के ही जख्म हरे करने पड़ते हैं। मैं पूरी शिक्षित हूँ यह कैसे साबित हो सकेगा..। बदलते युग के साथ बेटियों का युग बदलना चाहिए। पहले बेटियाँ रोटी पकाती तो थीं खा नहीं पाती थी आज बेटियाँ रोटियाँ कमा लेती हैं... खाती पिज्जा बर्गर हैं। हर पीढ़ी में बेटियों की जिंदगी कंटीली झाड़ में खिले गुलाब सी होती है... और मैं एक बेटी को मिले कंटीली झाड़ को हटाने की कोशिश करती हूँ।" प्रभास को अपनी माँ बेहद खूबसूरत लग रही थीं।

"चलो माँ आज बाहर से आइसक्रीम खाने चलते हैं..।" प्रभास अपनी नम आँखें सबसे छुपाने में कामयाब रहता है।

कोरी बातें


मुझे मेरे बचपन में देशप्रेम बहुत समझ में नहीं आता था। आजाद देश में पैदा हुई थी और सारे नाज नखरे आसानी से पूरे हो जाते थे। लेकिन झंडोतोलन हमेशा से पसंदीदा रहा। स्वतंत्रता दिवस के पच्चीसवें वर्षगांठ पर पूरे शहर को सजाया गया था। तब हम सहरसा में रहते थे। दर्जनों मोमबत्ती , सैकड़ों दीप लेकर रात में विद्यालय पहुँचना और पूरे विद्यालय को जगमग करने में सहयोगी बनना आज भी याद है और पुनः उस पल को जी लेने की इच्छा बनी हुई है।
खुद की अंग्रेजी की गाड़ी राम भरोसे खींच जाती थी। लेकिन दूसरों का बोलना चुम्बकीय (अरूण/माया/महबूब फर्राटे से बोलते हैं तो सम्मोहित होती हूँ पर चुप्प ही रहती हूँ) असर करता था।
      बिहार का पड़ोसी देश नेपाल होने से विदेश यात्रा का सुख बचपन से मिलता रहा। लेकिन सात समुन्द्रों को पार कर विदेश यात्रा की अलग बात होती होगी। कल्पना करना जारी रहा। विदेश में रहने वाले भारतीय भारत के मुद्दों पर बात करते तो उनका सम्मान बहुत रहता।
    सारे सुख में रहकर दुख की बात करना कैसा लगता है अब अनुभव कर रही हूँ... जाके फटे ना बिवाई...

Wednesday, 22 January 2020

छल

बेवकूफी पर शायरी के लिए इमेज परिणाम

घर में प्रवेश करने और लैपटॉप-पुस्तकों वाले बैग रखने के ढ़ंग से उप-प्राचार्या बिटिया के पापा को एहसास हो गया कि बिटिया बहुत गुस्से में है। उसके गुस्से को शांत करने के प्रयास में पापा ने कारण पूछा और बिटिया ने जो अपने पापा को बताया...
   दिल्ली में विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का सेमिनार चल रहा था... एक ही शहर के दो विश्वविद्यालयों के कुलपति होने से वेदोनों पूर्व परिचित तो थे ही, सेमिनार के दौरान मित्रवत हो गये...। अपने शहर वापिस होने पर उनदोनों कुलपतियों का लगातार मिलना-जुलना चलता रहा..। राज रहने वाली बातें भी साझा होने लगी...। 'अ' विश्वविद्यालय के कुलपति का (जो बिटिया का महाविद्यालय था के) प्रधानाचार्य से सम्बंध अच्छे नहीं चल रहे थे... 'ब' विश्वविद्यालय के कुलपति 'स' महाविद्यालय के प्रधानाचार्य की शिकायतों/बुराइयों का गठरी खोले रहते... बहुत गंदे-गंदे शब्दों का प्रयोग कर लांछित करते थे... तथा साथ ही कहते, "जिस दिन उन्हें प्रधानाचार्य के पद से हटा दिया जायेगा उस दिन मेरे कलेजा को ठंढक पहुँचेगा..!"
कुछ महीनों के बाद 'स' महाविद्यालय के प्रधानाचार्य के निलंबन का पत्र आ जाता है। निलंबित होने की सूचना प्राप्त होते ही प्रधानाचार्य त्यागपत्र देते हैं और महाविद्यालय परिसर छोड़ देते हैं।
    दो चार दिनों के बाद ही उनकी नियुक्ति 'ब' विश्वविद्यालय के अंतर्गत एक महाविद्यालय में हो जाती है तथा 'स' महाविद्यालय के उप-प्राचार्या को 'ब' विश्वविद्यालय के कुलपति का फोन आता है कि अगर वो चाहेगी तो उसकी नियुक्ति भी..!
"जानते हैं पापा! मैं दंग तो नहीं हूँ.. लेकिन उनके चतुराई पर पहले बहुत गुस्सा आ रहा था, अब हँसी जरुर आ रही है...।"
 "बिटिया! महोदय की यह चतुराई नहीं है, धुर्त्तई है। ऐसे हीं लोगों से दुनिया भरी हुई है। तुम्हें शायद अपने बचपन की बातें याद हो.. खेल-खेल में जयपुर से आई काठ की हांडी को चावल पानी डालकर चूल्हे पर चढ़ा दी थी।"

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Friday, 3 January 2020

वशीकरण


 "हमेशा अपने गाँव की प्रशंसा करती रहीं, अभी तो विदेश जाकर बहुत अच्छा लग रहा होगा! सब जगह साफ-साफ देखकर?" कई स्वर एक साथ गूंज रहे थे , फोन का स्पीकर ऑन था।
"क्या हमारे देश में स्वच्छता नहीं है.. और जहाँ ज्यादा स्वच्छता हो वहीं बस जाना चाहिए तो पूरा हिन्दुस्तान घूम चुके हों तो चूक गए अनेकों महानगरों की स्वच्छता देखने से? पहाड़ों की खूबसूरती भारत में ज्यादा है"
"जी मेरे कहने का मतलब यह था...,"
"आपके कहने का जो भी मतलब रहा हो, मेरे विचार पूरी तरह से स्पष्ट हैं , जिन्हें अपनी मिट्टी से प्रेम नहीं वे देश के गद्दार हैं..  ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसके लिए विदेश जाकर बसना हो। भारत में जो दान कर देने की शक्ति है,केवल दधीचि-कर्ण की बात नहीं अभी हाल में ही तीन सौ करोड़ में बिकने वाला होटल कैंसर अस्पताल को दान किया गया...,"
"क्या माँ! आप भी किससे विवाद कर रही हैं उनलोगों के वाणी-विवेक-विद्या में ताल-मेल ही नहीं।" श्रीमती सान्याल की बहू ने समझाने की कोशिश किया।
"माँ भी न! किसी बात को बहुत लंबा खिंचती हैं इतना लंबा तो च्यूंगम को नहीं खिंचता है। आप निश्चिंता से रहें हम देश वापस जल्द लौट जायेंगे।" बेटे के आश्वासन से श्रीमती सान्याल को सबेरा ज्यादा चमकीला लग रहा था ।


चूल्हे पे चढ़ी
लेवा लगी हंडिया–
दादी की हँसी।

Thursday, 2 January 2020

"आग का छल्ला"(रिंग ऑफ फायर/ज्वालामुखी)

     नागरिकता संशोधन अधिनियम के पक्ष/विपक्ष पर युवतियों-महिलाओं में चल रहे गर्मागर्म विचार-विमर्श के साथ चल रही किट्टी पार्टी में पूरी तन्मयता से पप्पी सबके थाली को पवित्रता प्रदान करने में भी लगा हुआ था।
    लपलपाती जीभ और एक व्यंजन का स्वाद ग्रहण कर वह दूसरी सजी थाली की ओर बढ़ जाता। इस प्रकार वह कई चक्करों में प्राय सभी थालियों में सजे व्यंजनों का स्वाद ले चुका था...। किन्तु इससे वहाँ उपस्थित किसी सदस्य को कोई अन्तर नहीं पड़ रहा था।
   मेजबान महोदया जिनके यहाँ यह पार्टी चल रही थी ने अपनी थाली में भी पप्पी द्वारा चखे व्यंजनों को नहीं बदला, अपितु प्रफुल्लित होते हुए पप्पी की प्रशंसा करते हुए सारी उपस्थिति को पप्पी की पॉटी के बारे में सगर्व बताने लगी कि एक दिन वह कुछ विलम्ब से घर पहुँची तो पप्पी की समझदारी देखकर अचम्भित रह गई थी बताने लगी कि,–"मेरे प्यारे पप्पी ने सोफे, किचन, बेडरूम को बचा दिया.. मुझे साफ करने में अधिक परेशानी न हो, इसलिए वह वाशिंग मशीन के कोने में जाकर फारिग हुआ..।"
  "आपके माता-पिता कब आने वाले हैं..?" श्रीमती सान्याल ने पूछा जो अपनी थाली में अपनी उंगलियों को दोबारा जुम्बिश नहीं दे रही थीं.. हदप्रद हुई जब मेजबान पप्पी के पॉटी के बारे में विस्तार से बता रही थी।
"जब इस पिल्ले को घर के बाहर रखने लगेंगी...।" मेजबान की युवा बेटी ने हँसते हुए कहा ।
"जरा आपलोग ही बताइए कि इसे कैसे बाहर रखूँ.. इसी की वजह से तो यहाँ अमेरिका में नागरिकता मिली है! इस देश के नियमानुसार जिस पिल्ले का जन्म यहाँ होता है उसको यहाँ की नागरिकता मिल जाती है।"￰
सारी उपस्थितियों में सन्नाटा बिखरा था और
ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन ब-रंजिश
ब हाल-ए-हिज्रा बेचारा दिल है..
का शोर गूंज रहा था...।

परबचन गीत

अ नोखी रीत समझ में बात है आयी, आ त्ममुग्धता  समझ में घात है आयी। थ मे राह लो परंजय उँगली थमाया क्यों झट गर्दन दबोचने नहीं दिया ...