
घर में प्रवेश करने और लैपटॉप-पुस्तकों वाले बैग रखने के ढ़ंग से उप-प्राचार्या बिटिया के पापा को एहसास हो गया कि बिटिया बहुत गुस्से में है। उसके गुस्से को शांत करने के प्रयास में पापा ने कारण पूछा और बिटिया ने जो अपने पापा को बताया...
दिल्ली में विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का सेमिनार चल रहा था... एक ही शहर के दो विश्वविद्यालयों के कुलपति होने से वेदोनों पूर्व परिचित तो थे ही, सेमिनार के दौरान मित्रवत हो गये...। अपने शहर वापिस होने पर उनदोनों कुलपतियों का लगातार मिलना-जुलना चलता रहा..। राज रहने वाली बातें भी साझा होने लगी...। 'अ' विश्वविद्यालय के कुलपति का (जो बिटिया का महाविद्यालय था के) प्रधानाचार्य से सम्बंध अच्छे नहीं चल रहे थे... 'ब' विश्वविद्यालय के कुलपति 'स' महाविद्यालय के प्रधानाचार्य की शिकायतों/बुराइयों का गठरी खोले रहते... बहुत गंदे-गंदे शब्दों का प्रयोग कर लांछित करते थे... तथा साथ ही कहते, "जिस दिन उन्हें प्रधानाचार्य के पद से हटा दिया जायेगा उस दिन मेरे कलेजा को ठंढक पहुँचेगा..!"
कुछ महीनों के बाद 'स' महाविद्यालय के प्रधानाचार्य के निलंबन का पत्र आ जाता है। निलंबित होने की सूचना प्राप्त होते ही प्रधानाचार्य त्यागपत्र देते हैं और महाविद्यालय परिसर छोड़ देते हैं।
दो चार दिनों के बाद ही उनकी नियुक्ति 'ब' विश्वविद्यालय के अंतर्गत एक महाविद्यालय में हो जाती है तथा 'स' महाविद्यालय के उप-प्राचार्या को 'ब' विश्वविद्यालय के कुलपति का फोन आता है कि अगर वो चाहेगी तो उसकी नियुक्ति भी..!
"जानते हैं पापा! मैं दंग तो नहीं हूँ.. लेकिन उनके चतुराई पर पहले बहुत गुस्सा आ रहा था, अब हँसी जरुर आ रही है...।"
"बिटिया! महोदय की यह चतुराई नहीं है, धुर्त्तई है। ऐसे हीं लोगों से दुनिया भरी हुई है। तुम्हें शायद अपने बचपन की बातें याद हो.. खेल-खेल में जयपुर से आई काठ की हांडी को चावल पानी डालकर चूल्हे पर चढ़ा दी थी।"

मानो कोई सत्य घटना पर आधारित लघुकथा हो ..।
ReplyDeleteआपकी लिखी लघु कथाएँ
सार्थक संदेश प्रेषित करती है अपने आस पास की हलचल को शब्दों में पिरोना भी एक कला है।
सस्नेहाशीष छूटकी
Deleteआपकी इस प्रस्तुति का लिंक 23.01.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3589 में दिया जाएगा । आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी ।
ReplyDeleteधन्यवाद
दिलबागसिंह विर्क
हार्दिक आभार आपका
Deleteबहुत अच्छी लघु कथा
ReplyDeleteबधाई