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देवनागरी में लिखें

Wednesday, 31 July 2019

बेबसी

01.
चढ़ता वेग ऊँची पेंग ढ़लता पेग सब सावन में सपना।
टिटिहारोर कजरी प्रघोर छागल शोर सावन में सपना।
व्हाट्सएप्प सन्देश वीडियो चैट छीने जुगल किलोल,
वो झुंझलाहट कब हटेगा मेघ है अब सावन में सपना।
02.
सावन-भादो के आते ही
याद आती है
मायके की
माँ के संग-संग ही रहती
भाई-बहनों की
हरी चूड़ियों की
मेहंदी की
सजी हथेलियों में
कुछ दिनों की कहानी
सजाने वाले की कोर
सजी रहती बारहमासी रवानी
राखी की सतरंगी कनक_भवानी
बेहद खूबसूरत लगती है दुनिया
बात बस महसूस करने की
परन्तु महसूस करने नहीं देती
रोग की परेशानी आर वाली
लाइलाज रोग भ्रष्टाचार बलात्कार
तिरस्कार तमोविकार भोगाधिकार

Friday, 26 July 2019

*"किस विधि मिलना होय"*

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, पाठप्रकाशक का कहना है 
किताब नहीं है बे, ज़हर है 

सत्य कथन ... इस पुस्तक की सारी कथाएं जहर है स्त्रीत्व के लिए

लेखिका : न्यास योग ऊर्जा उपचारक डॉ. रीता सिंह/सहायक प्राध्यापिका
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा
   
          समय रहते समयानुसार ही उतारते चलना, खुद के सेहत और लंबी उम्र के लिए जरूरत है ,चाहे बोझ किसी भी तरह का हो.. बोझ के घर्षण से दाग व दर्द ही मिलता है... रचनाकार से दो-चार बार आमने-सामने का मिलन था हमारा... उनकी आध्यात्मिक और संत वाणी सुनकर वो सदा सम्मानित लगी... स्नेहमयी तो कुछ ज्यादा...  आध्यात्मिक यानी आत्म-उत्कर्ष , जीवन सिद्धि का मार्ग.. रामायण-गीता-महाभारत के अजीबोगरीब    किस्से, जिसके उदाहरण हिस्से से वे कल्पना और सपना में जीते हैं, मुझे ऐसा लगता है।
                   जब रचनाकार ने अपनी पुस्तक "किस विधि मिलना होय" की चर्चा की तो मुझे लगा कि पूरी तरह आध्यात्मिक पुस्तक होगी तो मेरी रुचि की नहीं होगी... क्यों कि मुझे रामायण-महाभारत-गीता से उदाहरण लेकर बात करने वाले आज की दुनिया की समस्याओं को समझने की कोशिश में नहीं लगे, महसूस होते हैं...। परन्तु जब लेखिका ने पुस्तक मुझे दिया तो पढ़ने के लिए उत्सुकतावश पन्ने पलट लिए... पन्ना पलटते मैं भौचक्की रह गई और पढ़ती रही और स्तब्ध होती रही। एक चीज जो बहुत ज्यादा आकर्षित किया वह था डॉ. उषा किरण खान जी की लिखी भूमिका... क्या लेखन है? अरे! जब आप पुस्तक पढ़ेंगे/पढेंगी तभी समझ में आ सकेगा...!
   मैं ईश विषय से भागने वाली, प्रेम विषय पर पुस्तक पढ़ रही थी..। इस विषय से भी भागती हूँ कुछ भी बोलना और लिखना अपने वश में नहीं समझती हूँ...। जितने भी सफल प्रेम के उदाहरणों को दिया जाता है वे सब जुदाई की अति सफल कहानी है.. यानी जो सच्चा प्रेम करता है वह शादी नहीं कर सकता है... प्रेम कहानी पुरातन युग से चलती जा रही है... जटिलता और जुझारूपन लिए।
      बहुत पुरानी कहावत है "पाँच डेग पर पानी बदले पाँच कोस पर वाणी" इतने बदलाव में रहने के लिए समझ और समझौते की बेहद जरूरत पड़ती है। पहले जब शादी तय होती थी तो एक गाँव का दोनों परिवार नहीं होता था... विभिन्न परिवेश - विभिन्न संस्कृति.. कितना निभाये! कितना ना निभाये...!! एक तरफ कुंआ तो दूजी ओर खाई... कभी रिश्ते में तो कभी जिंदगी में... यही तो लेखिका ने पुस्तक के सारी कहानियों में बताने की कोशिश की है... प्रत्येक कथा में व्याप्त व्यथा पाठक/समाज के समक्ष एक सवाल छोड़ता है... पाठक के लिए कठिन है जबाब देना... अगर जबाब होता ही तो लेखिका जबाब के साथ कथा लेखन करती...
     जब मेरी शादी 1982 में हुई थी तो मेरे करीबी रिश्तेदार के पास काफी किस्से थे देवर-भाभी के बीच पनपे प्यार के... मुझे वो अविश्वसनीय सत्यकथाएं सुनने में बहुत अटपटा लगता था । तब सीता-लक्ष्मण मेरे दिमाग में स्थायी रूप से निवास कर रहे थे... इतने वर्षों के बाद उसी विषय पर आधारित इस पुस्तक की पहली कथा पढ़कर समाज के यथार्थ पर विश्वास हो आया... (नवेली विधवा प्रेमिका/पृष्ठ संख्या 11)...
    बहन की जचगी के लिए आई और बहनोई से प्रेम कर शादी कर ली... मेरे अनुभव में भी दो कहानी है... एक कहानी के पात्र पर तो कभी सवाल नहीं की क्यों कि अन्य कोई पात्र मेरे करीब नहीं था... पत्नी घर त्याग दी थी... सौत बनी बहन के साथ रहना स्वीकार नहीं की... लेकिन दूसरी कहानी के पात्र जब हमारे सामने आए तो वे दिन रात दिखते थे और पत्नी से जो बेटी थी वह शादी के योग्य थी और साली पत्नी बनी से एक बेटा था जो उम्र में बहुत छोटा था... प्रतिदिन गाड़ी निकलता पत्नी दोनों बच्चों संग पीछे की सीट पर और साली बनी पत्नी आगे की सीट पर... बहुत खुश दिखाने की कोशिश करते... मेरी मकानमालकिन अक्सर मुझसे पूछती कि तीनों की रात में कैसे सामंजस्य बैठता होगा... कौन कितनी खुश रहती होगी... । लेकिन लेखिका के कथा में छोटी सौत बनी बहन को दूध में पड़े मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया गया है (फोन की घंटी/पृष्ठ संख्या 47) एक छेद पर कशीदाकारी की जा सकती है, लंबे चीर लगे को दो टुकड़ा करना मजबूरी हो जाती...
पूरी किताब पढ़ते समय किसी कथा पर खुद कुछ ना कर पाने की बेबसी पर खुद से नफरत होने लगेगा... किसी कथा से रोंगटे खड़े हो जाएंगे.. कभी घृणा होगी समाज में ऐसे भी परिवार है जहाँ हम जी रहे हैं पिता शादी कर लाता है और बेटा अपने दोस्तों के साथ सौतेली माँ को... (किस प्रेम की करे उपासना/ पृष्ठ संख्या 55)...
बच्ची की माँ से शादी करता है धन का लालच दिखाकर लेकिन बच्ची जब बड़ी होती है तो उसे पिता का नाम नहीं देता है उस बच्ची को प्रेमिका बनाने के लिए धन का आदि बनाता है... बच्ची के असली पिता से ही बचाव का गुहार लगाती है..(सन्तोष/पृष्ठ संख्या 63) हल्की दरार को समय पर पाट लिया जाए तो सैलाब आने से रोका जा सकता है...
     डॉ. रूही चाहती है कि बच्चे जागरूक बने। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों से ऊपर उठें और राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी निभाएं। काउंसिलिंग के लिए आये हर युवा उन्हें यह उम्मीद देकर जाते हैं। यह उम्मीद ही जीवन है।(कम्फर्टेबल नहीं हूँ/पृष्ठ संख्या 90)
लघु-मध्यम-दीर्घ कुल मिलाकर चौवालीस कथा-कहानी और 131 पृष्ठ की रश्मि प्रकाशन,(अशुद्धियों से विरक्ति है) लखनऊ से छपी "किस विधि मिलना होय" नामक पुस्तक प्रत्येक हाथों तक जरूर पहुँचनी चाहिए और आप-हम आंकलन करे अपने आस-पास के परछाईयों का.. घर के अंदर से बाहर तक के रिश्तेदार, विद्यालय , होस्टल, धर्म, जाति सबसे समाधान ढूँढ़ कर समाज की बालाओं-कन्याओं-स्त्रियों को सुरक्षित करने में सहायक हों। लेखिका को असीम शुभकामनाएं ... उम्मीद करती हूँ या छली जा रही या छलने वाले की सहायिकाओं की चेतना जगे... औरत , औरत का साथ दे और बन्द हो यह आपदा... औरत हूँ , अतः सारी कथा की व्यथा अपनी लगी... तलाश में हूँ  "किस विधि मिलना होय"...की जरूरत ही ना पड़े... किसी को भी... वार्डन के मन में सूर्य की प्रथम रश्मि के सौंदर्य का भाव प्रवाहित हुआ, जब तक प्रकृति में यह प्रकाशमय सौंदर्य व्याप्त रहेगा, तबतक संस्कार की बेल सूखेगी नहीं। कुछ अँधेरे जकड़ने की कोशिश करेंगे, पर प्रकाश का ताप उस अँधेरे को निश्चित समाप्त कर देगा।(प्रेम या जाल/पृष्ठ संख्या 115)

पहली "किस विधि मिलना होय" समीक्षा पर नीलू ने रश्मि प्रकाशन की एक पुस्तक लेखिका से भेंट स्वरूप हासिल की।

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विभा रानी श्रीवास्तव 'दंतमुक्ता'
सम्पादक

Thursday, 25 July 2019

"स्त्री-मुक्ति की गूँज"

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग

"आज भोला(ड्राइवर) कितने बजे आयेगा?.. भोला को जरूरत के हिसाब से आने का समय निर्धारित कर आप उसका मनबढ़ा दिए हैं. स्वर बहुत ऊँचा कर जाता है...,"

"ना तो हम हर पल गाड़ी में हो सकते हैं और ना उसे बैठाकर रखना अच्छा लगता है..,"

"अन्य दूसरे को आठ हजार मिलते हैं मासिक तो हम दस हजार देते हैं..,"

"क्योंकि युवा अच्छा इंसान मिल गया है.., आज क्या है और कहाँ जाना है?" पति महोदय का झुँझलाता उग्र स्वर अपनी नाराजगी जाहिर कर दिया उनको मेरा घर से निकलना बिलकुल पसंद नहीं लेकिन कार्यों से खुश होते हैं जब कोई उन्हें बताता है।

"स्त्रियों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरने वाली रैली में शामिल होने जाना है...,"

"क्या? होश तो ठिकाने है... एक लाठी पड़ गई तो... मैं जाने से मना कर रहा हूँ!"

"कोई पल याद है जिसमें आपने यह कहा हो जाओ कर लो तुम्हें जो पसन्द है... यह कार्य तो..., जाऊँगी तो जरूर आपको सूचित कर रही हूँ अनुमति नहीं मांग रही... जब आप जे० पी० आंदोलन में जेल गए थे तो आपको किसी ने रोका तो जरूर होगा?"

"तब मैं बीस साल का युवा था साठ साल में नहीं गया था...!"

"वो क्या कहते हैं-जब जागो... इतने सालों तक किस्सा सुन-सुन कर तो आज़ाद हुई हूँ अब पुनः कैद में नहीं जीना चाहती हूँ...!"

Wednesday, 24 July 2019

"देश त्रस्त आपदाओं से"




 महिलाओं से जुड़े मुद्दे पर विधान सभा भवन घेरने के उद्देश्य ठाने रेडिओ स्टेशन से रैली निकालने के लिए शहर के सभी महिला संगठनों-संस्थाओं के सदस्याओं की अच्छीखासी भीड़ जुट चुकी थी... दौड़ते-हाँफते कविता , संगीता , मीता , विभा , एकता पहुँची... उनके चेहरे बता रहे थे कि वो किसी सैलाब से होकर गुजरी हैं... रैली की नेतृत्व संभाले निवेदिता शकील व रेशमा प्रसाद ने सबको बड़े हौसले से अँकवार में लिया और पूछा ,-"बताओ तो हुआ क्या है?"

कविता :- रवि ने अपनी पत्नी को बीच चौराहे पर चौपड़(मांस काटने वाला तेज धारवाला कसाई का चाकू) से मौत की स्थिति में पहुँचा दिया... अभी-अभी।

संगीता:- "मेरे पड़ोस में रहने वाली गुड़िया की आज मौत हो गई एक लड़के ने उसपर एसिड अटैक कर दिया था।"

मीता:-"सब स्तब्ध रह गये आज सुबह जब रामरती को पकड़ने पुलिस आई उसने अपने तीन बच्चों की हत्या कर खुद मरना चाहती थी... पति दूसरी शादी कर लिया है...!"

विभा- "मेरी सहेली को उसके ससुराल वालों ने जला कर मार दिया ,उसके कमरे से धुँआ निकलता देखकर जबतक हमलोग कुछ कर पाते तबतक सब राख हो गया..!"

एकता:-"मीता मेरी बेटी की सहेली ने आज आत्महत्या कर ली कोई मनचला उसे विद्यालय पहुँचने नहीं देता था!"

   रैली दो-चार घण्टे तक डाकबंगला चौराहा पर आवाजाही बन्द रखे रहा... चारों ओर जाम लगा रहा... नारे गूंजते रहे... बहरा-गूंगा समाज अपने कार्य में लिप्त रहेगा..।

Tuesday, 23 July 2019

गिले-शिकवे



"मेरा तो समय ही नहीं बचता है..! बेटी यहीं डॉक्टर है, गाहे-बगाहे अक्सर आ जाती है.. उसके बच्चे हैं..! कभी बैंगलोर चली जाती हूँ..!आप सामाजिक कार्यों के लिए कैसे समय निकाल लेती हैं? ओह्ह अकेले रहती हैं न..! आप अपने बेटे बहू के पास कब जा रही हैं ?" पुरानी परिचित समाजिक मिलन समारोह में सबकी उपस्थिति का फायदा उठा रही थीं प्रचार-प्रसार कर सकें कि वो बहुत सुखी हैं।

"और आपका सामाजिक दायित्व वहन का क्या... मुझपर तरस नहीं खाइये... अकेले रहने के कारण नहीं, समाजिक ऋण उतारने के लिए, मनुष्य होने के कारण.. पशु तो हूँ नहीं..!"

खुद के बच्चों के परवरिश-नौकरी-शादी के बाद उनके बच्चों को संभालने का भी खुद का दायित्व समझ व्यस्त रहना कोई ना तो अनुचित है और ना यह अधिकार मिल जाता है कि किसी दूसरे को कमतर समझें...

किट्टी-पार्टी, भजन मंडली, आभूषणों को खरीद-बिक्री में, ब्यूटीपार्लरों में उमड़ती भीड़ क्या ख़लीहरों की नहीं होती....,

"आप तो घर में ही नहीं रहतीं, कब आपसे मिलने कोई आये..?" हँसते हुए व्यंग्यात्मक लहजा किसी तरफ से उछला।

"शादी से लेकर पैंतीस साल ड्योढ़ी के अंदर चौके से शयनकक्ष तक ही गुजरा है... कब किसने कितना खोज-खबर ली , दोहरा सकती हूँ किसी बच्ची के द्वारा दोहराई गई कविता की तरह..., मोबाइल सबके हाथों में है... आने की सूचना देकर जरूर आएं.. तब ना मिलूं तो जरूर सामाजिक स्थलों पर उलाहना दें...।"




Thursday, 18 July 2019

दृढ़ता


जितना दिखता है उतना ही सच नहीं होता है



"सोमवार 16 जुलाई 2019 आकांक्षा सेवा का वार्षिकोत्सव आ रहा है दीदी आपको सबके साथ आना है! उस दिन के लिए अपना, लेख्य-मंजूषा तथा अन्य संस्थाओं का समय बचा कर रखियेगा..," मनोज जी (आकांक्षा सेवा संस्थान के सहयोगी) 16 जुलाई से पाँच-छ: दिन पहले बोले मुझसे बोले।
14-15 जुलाई को भेंट हुई जब तो बोले ,–"एक दो दिन बाद देखता हूँ ..."
–"क्यों भाई ? एक दो दिन के बाद क्यों देखोगे?"
"है कुछ बात ऐसी!"
"चलो ठीक है..,"
16 जुलाई को सुबह में मनोज भाई फोन किये कि "ममता शर्मा जी (आकांक्षा सेवा संस्थान की संस्थापिका) को बुखार हो गया है अतः वे बोल रही हैं कि एक दो दिन के बाद वार्षिकोत्सव मनाया जाएगा...,"
"जो बीड़ा उठाया है समाज का बुखार उतारने का वो खुद के लिये साधारण बुखार का बहाना कैसे बना सकता है या समाज सेवा का बुखार उतर गया ?"
"ना दीदी! ना! हरारत बरसात का असर है... एक भोरे से रात तक खड़े रहना , सब काम करना..,"
"सुनो! ज्यादा पैरवी नहीं करो...! जोखिम काम का बीड़ा उठाई हैं तो इतना करना ही पड़ेगा... और अभी बिना सहयोगी का कर रही हैं तो झेलना ही पड़ेगा.. स्व को त्याग कर ही समाज और साहित्य के लिए कार्य किया जा सकता है.. अस्वस्थ्यता को क्रॉसिन या कोई अन्य दवा से दूर करें और थोड़ी देर के लिए ही आएं.. मैं कुछ लोगों को लेकर आ रही हूँ..  'बस बच्चों के संग वृक्षारोपण करेंगे...'  वार्षिकोत्सव आज है तो आज ही मनेगा...! कल से चतुर्थ में प्रवेश कर जाएगा और हम पंचम शोर शराबे के साथ समारोह करेंगे...!"
"जी दीदी! ठीक है आइये...!"



.

Wednesday, 17 July 2019

//भटकते कदम//


"क्या आपलोग भी इसी समुदाय से हैं ?" पाँच सौ मीटर का झंडा लेकर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का किन्नरों के प्राइड परेड में शामिल एर्मिना , अदालिया , इलिना व गुनीत से विशालकाय मानव ने सवाल किया.. सामने से आते एकबारगी से पूछे गए सवाल से पहले तो सब सकपका गई फिर सम्भलकर एक साथ बोल पड़ी, -"नहीं हम समर्थन में शामिल हुए हैं!"
"वो अच्छा! आपलोगों को क्या लगता है इनलोगों को समाज के मुख्य-धारा में जुड़ जाना चाहिए? फिर इनसे मिलने वाली दुआओं व शुभकामनाओं का क्या होगा...!" पूछने वाले विशालकाय मानव का लहजा व्यंग्यात्मक हो गया।
"बिलकुल जुड़ जाना चाहिए... तभी कुछ भ्रांतियाँ नष्ट होंगी।" अदालिया ने कहा।
"कानून बन चुका है,ऐसे बच्चे घर-परिवार से दूर नहीं किए जाएंगे।" एर्मिना ने कहा।
"समाज भी साथ दे इसलिये तो यह आयोजन किया गया है,"इलिना का कहना था।
"हर घर-परिवार-समाज में विभीषण होता है! करोड़ों के उगाही का खपत कहाँ होगा..?" विशालकाय मानव के साथी ने कहा।

"क्या आपलोग भी इसी समुदाय से हैं ?" पाँच सौ मीटर का झंडा लेकर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का किन्नरों के प्राइड परेड में शामिल एर्मिना , अदालिया , इलिना व गुनीत से विशालकाय मानव ने सवाल किया.. सामने से आते एकबारगी से पूछे गए सवाल से पहले तो सब सकपका गई फिर सम्भलकर एक साथ बोल पड़ी, -"नहीं हम समर्थन में शामिल हुए हैं!"
"वो अच्छा! आपलोगों को क्या लगता है इनलोगों को समाज के मुख्य-धारा में जुड़ जाना चाहिए? फिर इनसे मिलने वाली दुआओं व शुभकामनाओं का क्या होगा...!" पूछने वाले विशालकाय मानव का लहजा व्यंग्यात्मक हो गया।
"बिलकुल जुड़ जाना चाहिए... तभी कुछ भ्रांतियाँ नष्ट होंगी।" अदालिया ने कहा।
"कानून बन चुका है,ऐसे बच्चे घर-परिवार से दूर नहीं किए जाएंगे।" एर्मिना ने कहा।
"समाज भी साथ दे इसलिये तो यह आयोजन किया गया है,"इलिना का कहना था।
"हर घर-परिवार-समाज में विभीषण होता है! करोड़ों के उगाही का खपत कहाँ होगा..?" विशालकाय मानव के साथी ने कहा।

Saturday, 13 July 2019

जिंदगी यूँ सँवरता गया।


आसपास की महिलाओं में प्रथम स्थान माँ का ही आता है उनसे समझ और धैर्य लिया तो जीवन सँवरता गया.. बाद में उनसे ही मिलता जुलता रूप हमारे बड़े भैया का रहा जो राह दिखलाने में सारथी बने , जिंदगी जब भी उलझने लगी समझ और धैर्य पतवार बने.. आगे बढ़ने पर बेटा ऊँगली थाम लिया.. फेसबुक-ब्लॉग पर लाया तो उसके ही दोस्त की माँ श्रीमती रश्मि प्रभा संगी बनी.. लेखनी थमाई... हौसला दी जमीं दिया.. अकेले चले थे कांरवा बनता गया... जिंदगी रोज आजमाती है.. कभी बोलती बंद करती है तो कभी दिमाग कुंद करती है .. कभी घुटने टेकने पर विवश करती है.. पर जिंदगी को हराती हूँ सदा.. कभी प्रेम, मौत और ईश पर बात नहीं करती हूँ क्योंकि उसे ना देखा और ना कभी आजमाया.. हाइकु की शोधार्थी हूँ... कल्पनाएं वर्जित है... जिंदगी के हकीकत की अभ्यर्थी हूँ..
छोटी-छोटी खुशी से बड़ी खुशियाँ मिलती है.. 


Friday, 12 July 2019

"का बरसा जब कृषि सुखाने"




"रमुआ! रे रमुआ!" बाहर से ही शोर मचाते रतनप्रसाद घर में प्रवेश किये।
"क्या हुआ ? इतना गुस्सा में क्यों फनफना रहे हैं?" पत्नी रत्ना का सवाल धीमी आवाज में पूछे गये को अनसुना करते हुए फिर जोर से चिल्लाए..
"रे रमुआ! जिंदा भी है कि कहीं मर-मरा गया...,"
"जी मालिक आ गया बताइये क्या काम करना है?"
"चल, छोटी-छोटी कांटी और हथौड़ी लेकर बाहर चल..!"
"मुझे भी तो बताने का कष्ट करें कि क्या बात हुई है जिसके कारण आप इतने गुस्से में हैं...," रत्ना ने पूछा।
"अभी मैं अपने उच्च पदाधिकारी के साथ आ रहा था तो बहू के कमरे की खिड़की से पर्दा उड़ रहा था और बहू बिना सर पर आँचल रखे पलंग पर बैठी नजर आ रही थी। पदाधिकारी महोदय ने कहा भी प्रसाद जी वो आपकी बहू है ? खिड़की के पर्दे पर कांटी ठोकवा देता हूँ ! तुम कितने साल घूँघट में रही हो...।"
"आपके अक्ल पर पर्दा पड़ गया है... कल आपका वृद्धाश्रम जाना आज ही तय कर रहे हैं और आपकी खुद की बेटी अभी जो उड़ाने भर रही है ब्याहनी बाकी है! दुनिया में शोर है ज़माना बदल गया है... इक्कीसवीं सदी की महिलाएं फौज में और फ्लाइट उड़ा रही है... यहाँ उड़ते पर्दे में कांटी ठोका जा रहा है.. !! अक्सर देखा गया है जब मिसालें बनने का मौका मिलता है तो लोग अँधेरा चयन करते हैं मशालें बुझाकर.., कर्म खोटा चाहिए भजनानन्द..!"
स्तब्धता में रतनप्रसाद धम्म से कुर्सी पर गिर पड़े।

Wednesday, 10 July 2019

"हमराही"


"सुबह-सुबह मैराथन में हिस्सा लेने जा रही हैं क्या?" तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरती हुई विमला को देखकर उसकी पड़ोसन कमला ने चुटकी ली! अन्य किसी दिन सा विमला ने चुटकी का जबाब चुटकी से नहीं देते हुए अखबार बाँटने वाले से सभी प्रसिद्ध अखबार खरीद अपने घर में घुस गई। कल उसकी संस्था में आई नामचीन क्लब की सदस्याओं द्वारा अनेक प्रस्तावित बातों की खबरें जानने की उत्सुक सारे अखबारों को बार-बार पढ़ रही थी... खबरें विस्तार से तो थीं लेकिन ना तो उसका नाम और ना तो उसकी संस्था के नाम का जिक्र भी था...
    क्रोध के तिलमिलाहट में क्लब के अध्यक्ष को फोन किया, हेलो की आवाज सुनते फट पड़ी मानों बरसात में बादल फटा हो और सैलाब लाया,-"आपने मेरे साथ धोखाधड़ी किया, आपलोगों के वश में नहीं था कि स्लम के बच्चों को जुटाकर विद्यालय खोल सकें और उन बच्चों की देख-भाल कर सकें तो मेरे संस्थान को सहायता करने के नाम पर , संस्थान को गोद लेने का नाटक कर लिया और मेरे संस्थान के नाम का जिक्र भी नहीं किया कहीं भी...! मूसलाधार बारिश में पौधे सींचती हैं आपलोग..., इस कार्य के नाम पर जो फंड का जुगाड़ होगा उससे आपलोग मौज-मस्ती ऐश करेंगी...! संस्थान के विद्यार्थियों को स्लम के बच्चे- स्लम के बच्चे का प्रचार कर आपलोग महादेवी बन रही हैं...,"
"अरे! अरे! पहले मेरी बात तो सुन लीजिए थोड़ी धैर्य से..,"
"नहीं सुनना आपकी बात, अब क्या होगा सुनकर आपकी खोखली बातों को।"
"हमारा क्लब इस तरह के बीस-इक्कीस विद्यालयों को गोद लिया है ,जिनके विद्यार्थियों को हमारी ओर से सहायता की जाएगी। अधिक से अधिक विद्यार्थियों में उत्साह पैदा होगा ,विद्यालय आने और विद्यालय में टिके रहने के लिए तो सभी विद्यालय का अलग-अलग नामों का जिक्र ना तो उचित है और ना तो संभव... हमारा आपका उद्देश्य एक है, हमारी मंजिल एक है .. हाथों में हाथ ले मजबूत जंजीर बन,संग-संग चलने में समाज को लाभ ज्यादा है! हम मुट्ठी बने रहें!" पूरी तरह संतुष्टि नहीं मिलने पर भी सोचने का समय लेते हुए विमला ने फोन कट किया।

Saturday, 6 July 2019

उलझन

गरिमा पाठक(रांची)
*गरिमा पाठक* :–शुभ प्रभात दोस्तों
हर दिन एक नये दिवस का इन्तज़ार

सबको   ही ...।
अपने अपने वक्त का इन्तज़ार है
हम जिन्दगी में हर वक्त यही तो सीखते रहते हैं
और जिन्दगी भर नहीं सीख पाते।
जन्म लेने के  पहले से लेकर
मृत्यु तक यही  तो किया है।

पहले जन्म लेने का इन्तज़ार
फिर बडे होने का ……...
बुढे होने का ……….
और  अन्ततः मृत्यु का इन्तज़ार..।

जन्म के समय हम कमजोर थे
और अन्त भी ऐसा ही होता  है
मन और तन दोनों ही
कमजोर होने लगता है।
तब सहारे की जरूरत होती है ।
हम  बुद्धिमान जीव सारा जीवन ही
बस इन्तज़ार में ही गवां देते है..।

सुबह में शाम का ……..
शाम को रात का…….
और  फिर से सुबह होने का ..।
बस यही तो चलता है सारा जीवन ।

क्या यही जीवन है ।
क्या हमने बस मरने केलिए जन्म लिया है??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- मरने का ना इंतजार है और सोचने का कि क्यों जन्म लिया है... अभी सुबह से रात तक यह सोचने में निकल जाता है कि समाज से जो ऋण लिया है उसका तो सूद ही नहीं चुके मूल कैसे चुका पाऊँगी... यही इसी पल तो है जिंदगी चूक हो रही है बड़ी-बड़ी..,

*गरिमा पाठक*:–विभा रानी श्रीवास्तव धन्यवाद मै तो सवालों के जवाब की तलाश में हूँ सिर्फ  आपने ही मुझे जवाब दिया...।वाह आह और बेहतरीन शब्दों से दिल खुश होता है लेकिन मन तो अशांत ही रह जाता है..।हम जब अशांत हो और जवाब नहीं समझ आऐ तो अपने बडो से या दोस्तों से समझने की कोशिश करते है मै भी वही टर रही हूँ ।आपके जवाब ने मुझे थोड़ी शान्ति दी है ...और अभी भी तलाश जारी है ..।
धन्यवाद दीदी
.आपको नमन...

मै क्यो आई हूँ दूनियाँ में ??

*विभा रानी श्रीवास्तव* :- माता-पिता के खुशी के पल प्रतिरूप होता है कोई बच्चा
परवरिश-संस्कार और वातावरण के आधार पर बच्चा अपना विचार बनाता बिगाड़ता रहता है
अपना कर्म अपने विचार पर तय करता है
आप क्यों आईं इस दुनिया में आपके अपने किये कर्म बतायेंगे आपको भी आपके समाज को भी

स्वार्थ में केवल स्व के लिए जी रही हैं और अपने खोल में लिपटी हैं या...,

*गरिमा पाठक* :–विभा रानी श्रीवास्तव ओह बहुत अच्छी बात कहा आपने ..।धन्यवाद

*विभा रानी श्रीवास्तव* :– 🤔आपके सवाल समाप्त हो गए...  लेकिन मेरा जबाब अकुलाहट में है लिख लूँ बात पूरी हो जानी चाहिए

हर पुरुष राम कृष्ण बुद्ध गाँधी मोदी नेहरू नहीं होता , अंगुलीमाल का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है
प्रत्येक स्त्री सीता अनसुइया मीरा राधा सरोजनी लक्ष्मी, लक्ष्मी बाई नहीं होती

विभा गरिमा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं अभी तो चल रही हैं...! सदा चलती रहेंगी।

Monday, 1 July 2019

नीलकंठ



कई ने कहा तेरी आदत चुगली की है।
आस्तीन में संभालना अठखेली की है।
चलो पाल रही हूँ तुझे गले लगाकर भी,
हमेशा ही हमारी भक्ति अहिमाली की है।
02
डर सताता रहता हमसे हमारा सब छीन ले जायेगा कोई।
पल-पल बदलती दुनिया में कितना साथ निभायेंगा कोई।
हमारी कोशिश उतना ही दोष दे लेते जितना हमें दंश देते,
भयावह नहीं ना जो चाहेंगे हम कितना हमें सतायेगा कोई।
03.
दम्भ तृष्णा ना दिमाग रोगग्रस्त करो।
गुम रहकर खल का तम परास्त करो।
दे साक्ष्य सपना चपला धीर अचला है,
स्व का मान बढ़ा रब को विश्वस्त करो।