Thursday, 28 May 2026

सूत और साँसें

जेठ की दुपहरी उतरान पर थी। गाँव के पुराने बरगद के नीचे बिछा वट-सावित्री का उत्सव अभी-अभी समाप्त हुआ था। सुहागिनें अपने-अपने पतियों की दीर्घायु का वर माँगकर लौट चुकी थीं। पंडित जी दक्षिणा की भारी गठरी सँभाले जा चुके थे। चबूतरे पर अब केवल बिखरा सिंदूर, उलझे कच्चे धागे, भीगे चने और धूल में लिथड़े फल-पकवान बचे थे। बरगद के तना के पीछे से दो जोड़ी आँखें धीरे-धीरे उभरीं।बालक मंगरू और उसकी छोटी बहन बुचिया दबे पाँव चबूतरे की ओर बढ़े। दोनों की निगाहें जमीन पर ऐसे दौड़ रही थीं, जैसे भूख भी तलाशना सीख जाती है।

“देख भैया! कितना बड़ा केला!” बुचिया ने आधा साफ़ केला उठाकर अपनी फटी फ्रॉक में छुपा लिया। उसके चेहरे पर वही चमक थी, जो किसी अमीर बच्चे के हाथ नया खिलौना आने पर होती है।

मंगरू मिट्टी में पड़े बताशे और भीगे चने बीन रहा था। दूसरों की पूजा का बचा हुआ प्रसाद, उनके कुछ अंश का भोजन था।

“अरे! हटो वहाँ से…! पूजा की जगह अपवित्र कर दी तुम लोगों ने!” उनके पीछे से तभी तेज आवाज गूँजी—

गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।

बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।

“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।

“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।

“आज मैंने अपने पति की लम्बी उम्र के लिए सोने का धागा चढ़ाया था, और इस बच्चे ने टूटी मिट्टी के दीये में अपने पिता की पूरी जिन्दगी समेट ली।” बुदबुदाती चाची के हाथ काँपने लगे और चाँदी की थाली अचानक बहुत डगमगाने लगी। कुछ क्षण तक वे निश्चल खड़ी रहीं। फिर चुपचाप थाली में बचे फल और लड्डू बुचिया के फ्रॉक में डाल दिए। बच्चे खिल उठे। वे दौड़ते हुए मुसहरी की ओर भाग गए। बरगद की छाँव अब भी वैसी ही थी-

Monday, 25 May 2026

दीये में बची लौ

शहर के एक प्रसिद्ध महाविद्यालय में वार्षिक विज्ञान प्रदर्शनी चल रही थी। समर और उसके दोस्तों ने महीनों रात-दिन एक करके 'स्मार्ट विलेज' का एक बेहतरीन वर्किंग मॉडल तैयार किया था। पूरा महाविद्यालय उनकी तारीफ कर रहा था। शाम को जब नतीजों की घोषणा होने वाली थी, तब महाविद्यालय के ट्रस्टी के बेटे, रोहन, ने समर को अकेले में बुलाया। रोहन ने टेबल पर पैसों से भरा एक लिफाफा रखा और कहा, "समर, इस प्रोजेक्ट पर मुख्य नाम मेरा और मेरे दोस्तों का रहेगा। तुम बस बैकस्टेज रहना। इस पैसे से तुम अपनी पूरे साल की फीस भर सकते हो और वैसे भी, तुम्हें आगे इंटर्नशिप के लिए मेरी सिफारिश की ज़रूरत पड़ेगी ही।"

समर एक बेहद साधारण परिवार से था। उसके पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीन का एक हिस्सा बेच दिया था। रोहन की बात सुनकर समर के भीतर एक गहरा द्वंद्व छिड़ जाना स्वाभाविक हो गया! एक तरफ आर्थिक सुरक्षा और भविष्य का रास्ता था, तो दूसरी तरफ उसकी महीनों की मेहनत और उसका स्वाभिमान।

वह भारी कदमों से पुस्तकालय की तरफ चला गया। वहाँ दीवार पर महापुरुषों के सुविचार लिखे थे। अचानक उसकी नज़र एक पुरानी डायरी के पन्ने पर पड़ी, जिस पर किसी ने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था :-

“आप अपने सम्मान की रक्षा नहीं करते हैं तो मर जाते हैं और मरी आत्मा से आप शव होते हैं-”

इन शब्दों ने समर के भीतर जैसे एक बिजली का करंट दौड़ा दिया। उसे अपने पिता का वह चेहरा याद आया, जिन्होंने तंगी में भी कभी किसी के सामने अपना सिर नहीं झुकाया था। “अगर आज मैंने अपने स्वाभिमान का सौदा कर लिया, तो मैं खुद की ही नज़रों में हमेशा के लिए गिर जाऊँगा! तब तो मैं केवल एक ज़िन्दा लाश बनकर रह जाऊँगा!” समर लगातार बुदबुदाने लगा।

नतीजों की घोषणा का समय हो गया था, मुख्य अतिथि माइक पर आए और बोले, "इस साल का बेस्ट प्रोजेक्ट अवॉर्ड जाता है—रोहन और उनकी टीम को!"

पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। रोहन स्टेज की तरफ बढ़ने लगा। तभी समर अपनी सीट से खड़ा हुआ और उसने ज़ोर से कहा, "रुकिए!"

हॉल में सन्नाटा छा गया। 

"सर, यह प्रोजेक्ट रोहन का नहीं, मेरा और मेरी टीम का है। रोहन ने इसे पैसों के दम पर खरीदने की कोशिश की है। मेरे पास इस प्रोजेक्ट के कोडिंग लॉग्स, शुरुआती डिज़ाइन्स और हर एक स्टेज के वीडियो प्रूफ हैं, जो साबित कर देंगे कि इसे किसने बनाया है।" समर मंच पर गया और मुख्य अतिथि से सीधे मुखातिब होकर कहा।

"तुम जानते हो तुम किससे बात कर रहे हो? तुम्हारा करियर बर्बाद हो सकता है।" ट्रस्टी ने समर को डराने की कोशिश की।

"सर, करियर फिर बन सकता है, लेकिन बिका हुआ आत्मसम्मान कभी वापस नहीं आता।" समर ने मुस्कुराकर कहा, 

समर के हौसले और पुख्ता सबूतों के आगे कॉलेज प्रशासन को झुकना पड़ा। जाँच हुई और अवॉर्ड समर की टीम को मिला।

रात को जब समर अपने हॉस्टल के कमरे में लौटा, तो बिजली कटी हुई थी। उसने मेज़ पर एक छोटा सा मोम का दीया जलाया। हवा के झोंकों के बीच भी वह दीया पूरी ताकत से जल रहा था। समर ने उस दीये की लौ को देखा और मुस्कुरा दिया— “आज मैंने अपने भविष्य की ही नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की भी रक्षा की है।” समर बुदबुदाते हुए कहा। वह भी दीये में बची लौ की तरह, विपरीत परिस्थितियों में भी शान से प्रज्वलित हो रहा था।

Thursday, 21 May 2026

२१ मई -चाय दिवस

 सन्धान

उधड़ रहे थे रिश्ते धीरे-धीरे,

जैसे पुरानी रज़ाई का कोना,

बातों के धागे टूट चुके थे,

और मौन ने घर भर में

शुरू कर दिया अँधेरा बोना!

तभी रसोई में

चाय ने धीमे से उबाल लिया।

केतली की भाप में

कुछ अनकहे दुख पिघले,

अदरक की खुशबू ने

थके हुए मन पर

माँ के हाथ-सा स्पर्श कमाल किया!

इस तेज़ भागती दुनिया में

जहाँ लोग

मोबाइल की स्क्रीन पर

अपनापन खोज रहे हैं,

वहाँ चाय आज भी

पुरानी सिलाई मशीन की तरह

घर-घर रिश्तों की

तुरपाई कर रही है।

कभी पिता की थकान में

चीनी बन घुल रही है,

कभी माँ की चिन्ता में

इलायची-सी महक रही है,

कभी दोस्तों के बीच

ठहाकों की भाप बन उड़ रही है,

तो कभी प्रेमियों के मौन में

एक कप की गरमी बन टिक रही है।


पद्य प्रबन्ध—

धूल की परतें

केतली पर

तप की लौ

लाल मखमली कुर्सियों पर,

सजी साड़ियों का एक समन्दर है,

पर कौन जानता है कि किस चेहरे के,

कितना गहरा द्वंद्व अन्दर है!


एक हाथ में बनारसी का आँचल है,

दूजे में मिट्टी का वो कुल्हड़ गर्म,

एक कलाई पर बँधी है आधुनिक घड़ी,

जो याद दिलाती है घर के नियम और धर्म।


मंच पर चल रहा है विमर्श बड़ा,

'सशक्तीकरण' के ऊँचे-ऊँचे नारों का,

पर यहाँ फुसफुसाहट में दर्ज है दर्द,

ज़िम्मेदारियों के अन्तहीन किनारों का।


ये सजना-धजना कोई शौक नहीं,

ये तो दुनिया के लिए एक ओट है,

मुस्कुराहटों के इस सघन वीराने में,

छिपी हर दिल पर कोई न कोई चोट है।


चाय की हर चुस्की के साथ यहाँ,

कोई अपनी थकान बिसरा रही है,

तो कोई अपनों की बंदिशों से सुस्ता

बस! चुपचाप तनिक पल चुरा रही है।


ये मिट्टी के कुल्हड़ गवाह हैं इस बात के,

कि हर औरत भीतर से कितना तपती है,

औरों की ज़िंदगी में ज़ायका भरने को,

वो ख़ुद को साँचों में कितना खपाती है।


Wednesday, 20 May 2026

शिकायतें और ग़ज़ल

मैं रेत हूँ—

हर बार

आँखों में किरकिरी

पैरों के नीचे ही क्यों आती हूँ?

कभी किसी ने

मेरे कणों में छिपी

टूटी हुई सदियों को पढ़ा है?

सबने मुझ पर

अपने-अपने महल बनाए,

फिर एक दिन

मुझे ही बिखरा हुआ

कहकर चले गए।

समन्दर रोज़

मुझसे मिलने आता है,

पर मेरी प्यास

कभी क्यों नहीं पूछता!

हवाएँ

अपनी मनमानी से

मुझे उड़ाती रहती हैं,

और लोग कहते हैं—

“रेत का कोई घर नहीं होता!”

मैंने तो

हर कदम के निशान सँभाले,

पर किसी ने

मेरी हथेली पर

अपना नाम स्थायी नहीं लिखा।

तपती धूप में

मैं जलती रही चुपचाप,

फिर भी

मरुभूमि का दोष

मेरे हिस्से ही आया।

मुट्ठी से फिसलती रेत की अजब कहानी

मुट्ठियों में कैद हुई,

तो फिसल जाने का इल्ज़ाम मिला,

बिखरी रही धरती पर,

तो बेवफ़ा कहलायी।

मैं रेत हूँ—

समय की सबसे पुरानी गवाह,

फिर भी

हर लहर

मुझे मिटा देने का दावा करती है।

मुझसे ही

(Hourglass) रेत घड़ी का आविष्कार हुआ था, जो सीधे तौर पर समय के बीतने को दर्शाती है।

रेत का गिला/रेत की शिकायतें क्या-क्या नहीं हो सकती हैं?

    मैं मरुभूमि बनूँ तो अभिशाप, और तट बनूँ तो सौंदर्य— यह भेदभाव क्यों है?

कविताओं और शेरो-शायरी में मेरा उपयोग अक्सर 'बेबसी' और 'उदासी' को दर्शाने के लिए ही क्यों किया जाता है-


ग़ज़ल

हौसलों का नया एक थल देखिए,

मुश्किलें हो रहीं कैसे हल देखिए।

ठोकरों ने तराशा है इंसाँ को यूँ,

पत्थरों से निकलता महल देखिए।

वक्त चुपचाप चेहरों को पढ़ता रहा,

कौन अपना रहा, कौन छल देखिए।

आँखों में ख़्वाब कितने सजाए मगर,

जो हक़ीक़त में बदला वो पल देखिए।

आँधियों ने उड़ाने की कोशिश तो की,

है चमन का मगर आत्मबल देखिए।

रास्ते ही सिखाते हैं चलना यहाँ,

हमसफ़र बन के ही साथ चल देखिए।

अब 'विभा' को दिखाते हैं तारा यहाँ,

आसमानों में कोई भी दल देखिए।


Saturday, 16 May 2026

छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

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बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों में दीपक टिमटिमा रहे थे और मंत्रों की धीमी ध्वनि हवा में घुल रही थी। नंदिनी भी महिलाओं की भीड़ में थी। उसके हाथ में पाँच रंगों वाला मौली था, परन्तु वह कभी बरगद को देखती कभी अपने हाथों में पकड़े मौली को निहारती। तीन महीने पहले ही उसकी शादी हुई थी। 

“वट-सावित्री का व्रत पति की लम्बी उम्र और अटूट दाम्पत्य के लिए होता है।” दादी-नानी, मामी-मौसी, बुआ-चाची, माँ को कहते सुना था। सासू माँ ने भी तो वही दोहराया था।

“क्या सिर्फ पति की उम्र लम्बी होना ही शादी का रिश्ता बचा लेता है? फिर मेरे दादा और दादा ससुर जी ने दूसरी शादी कर परदेश-विदेश क्यों जाकर बस गए! दादी और दादी सासू माँ के किए व्रत से ससुर जी की लम्बी आयु है या उनकी दूसरी पत्नी के किए व्रत से?” नन्दनी बुदबुदाते हुए, चुपके से सामने बैठे आरव को देखा। वह मुस्कुरा रहा था, उसकी पूजा की टोकरी सम्भाल रहा था ताकि धागा उलझे नहीं।

“इतनी कसकर क्यों बाँध रही हो?” आरव ने हल्के से पूछा।

“ताकि रिश्ता कभी ढीला न पड़े।” नन्दनी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“धागे से नहीं, साथ निभाने से रिश्ते बन्धे रहते हैं।” आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया!

“यह धागा सिर्फ पति की लम्बी उम्र का नहीं, बल्कि हमारे विश्वास, हमारा सम्मान और हमारे साथ के उस वचन का प्रतीक है, जिसे हर दिन निभाने का प्रयास हमें करना होगा।” बरगद के चारों ओर घूमते हुए नन्दनी बुदबुदा रही थी। 

“हे वटवृक्ष, हमारे रिश्ते की जड़ें भी इतनी ही गहरी होने में साक्षी रहना कि समय की आँधियाँ भी इन्हें हिला न सकें।” आरव ने पेड़ को प्रणाम करते हुए कहा।

अवहित्था

सम्मान समारोह के लिए मंच सज चुका था। मंच पर पुरस्कार की घोषणा होने ही वाली थी। इस साल के 'सर्वश्रेष्ठ लेखक' के रूप में मीरा का नाम लगभग तय माना जा रहा था। मंच से लेकर सभागार में बैठे सभी लोग मीरा की तरफ देख रहे थे, और राघव की नजरें भी लगातार सामने की पंक्ति में बैठी अपनी पूर्व मित्र और सह-लेखिका मीरा पर टिकी थीं। कुछ साल पहले दोनों के रास्ते एक कड़वाहट के साथ अलग हो गए थे।

अचानक उद्घोषक ने माइक संभाला, "और इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ लेखक हैं... राघव!"

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। राघव मंच की ओर बढ़ने लगा। उसने अनजाने में ही मीरा की तरफ देख लिया, मीरा के चेहरे पर एक पल के लिए घोर निराशा और दुःख का भाव आया, उसकी आँखें नम हुईं—शायद वह अपनी हार या पुराने दिनों को याद कर बैठी थी।

लेकिन अगले ही पल, जैसे ही बगल में बैठी सहेली ने मीरा की तरफ देखा, मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसने एक गहरी साँस ली, चेहरे पर दुनिया भर की कृत्रिम सहजता और एक बड़ी सी मुस्कान ओढ़ ली। वह खड़े होकर सबसे ज्यादा उत्साह से तालियाँ बजाने लगी, जैसे राघव की इस जीत से ज्यादा खुशी उसे जीवन में कभी मिली ही न हो।

राघव मंच पर था, पर उसकी नजरें मीरा के उन हाथों पर थीं जो ताली बजा रहे थे,। थोड़ी देर के बाद वह मंच से उतर गया और “मैं समझ रहा हूँ कि इन कंगन की खनक के पीछे तुमने अपने भीतर कितने बड़े तूफ़ान को दबाए बैठी हो! लेखन में तो अव्वल थी ही, अभिनय भी बाकमाल कर लेती हो!” मीरा के पास से गुजरते हुए राघव ने कहा।


Monday, 11 May 2026

माँ की प्रतिक्षाएँ

 


ना कोई गिला

दंश सहे की कला

प्रश्न माँ जबाब माँ

स्व सोती गीला

स्वेच्छा से स्वत्व त्याग

थाती धैर्य का मिला

माँ प्रतीक्षा करती है

द्वार पर टँगी घड़ी की तरह

हर लौटते क़दम की।

सिर्फ़ सन्तान के लौट आने की नहीं,

कभी अपने नाम से पुकारे जाने की भी।

सुबह की पहली रोटी के साथ

वह रख देती है

दिनभर की छोटी-छोटी आशाएँ—

बिना झुँझलाए कोई बात कर ले,

कोई उसके सिरदर्द को भी

समाचार समझे।

कोई पूछे—

“आज तुमने क्या खाया?”

जैसे वह बरसों पूछती रही है सबसे।

वह प्रतीक्षा करती है

कि बच्चे जब सफल हों

तो परिचय में सिर्फ़ पिता का नाम नहीं,

उसकी जागी रातें भी दिखाई दें।

रसोई से बाहर की एक सुबह का,

जहाँ चाय की भाप में

उसके अपने सपने भी उबलें थे!

बरसों पुराने सन्दूक में

उसने कुछ इच्छाएँ छिपा रखी हैं—

एक अधूरी यात्रा,

एक बिना टोके हुई नींद,

एक शाम

जब वह सिर्फ़ अपने लिए सज सके।

पुरानी अलमारी में तह किए

अपने अधूरे शौकों की—

कभी फिर से रंग उठाने की,

कभी किताबों में लौट जाने की।


माँ को प्रतीक्षा रहता है

उस फ़ोन का

जो केवल काम से न आया हो,

जिसमें कोई कहे—

“बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।”


वह प्रतीक्षा करती है

कि घर के निर्णयों में

उसकी चुप्पी को सहमति न माना जाए।

कभी-कभी माँ को

अपने ही जन्मदिन की तारीख़

याद रखे जाने की प्रतीक्षा भी होती है।

वह चाहती है कि बुढ़ापे में

उसे बोझ नहीं, घर का इतिहास समझा जाए।

उसे प्रतीक्षा रहती है

कि घर में उसकी उपस्थिति

सिर्फ़ सुविधा की तरह नहीं,

एक सिद्धान्त की तरह महसूस की जाए।

माँ प्रतीक्षा करती है—

त्योहारों पर

सिर्फ़ पकवानों की तारीफ़ न हो,

उसकी थकान भी पढ़ी जाए

बच्चे सिर्फ कमाने वाले हाथ न बनें,

उसके काँपते हाथ भी थामने वाले बनें।

बिना किसी अपराधबोध के

उसे भी आराम मिल सके।

और इन सब के सबसे भीतर—

एक बहुत धीमी, बहुत निजी प्रतीक्षा—

कि जिस तरह उसने

सबको बिना शर्त अपनाया,

कभी कोई उसे भी उसी तरह थाम ले।

माँ की प्रतिक्षाएँ

बहुत ऊँची-ऊँची मीनारें नहीं होतीं—

होती हैं बस इतना कि

जिस घर को उसने जीवन दिया,

उस घर में उसका अपना एक कमरा,

अपना एक समय, और एक सम्मान

सभी की आँखों में बचा रहे। 


Saturday, 9 May 2026

मातृ दिवस : आस की गूँज



तपकर रिश्तों की अगन, सींचा सबका भाग

माँ का अनुपम त्याग है, जीवन उसका राग

 मेघ गर्जन—

माँ की सिखलायी

धुन में नाचे

मृण शिल्प में

बोसा जुड़ रहा है—

मातृ दिवस


पहला तारा

माँ सिखला रही है

गाँठ खोलना

गुलदस्ते में वट

पिता ने दिया काया तो उस काया को निरोग रखना योग की माया पिता का साया धूप में शीतल छाँव बन जाता है, जीवन का हर कठिन रास्ता सहज बन जाता है। सदा...