Thursday, 21 May 2026

२१ मई -चाय दिवस

 सन्धान

उधड़ रहे थे रिश्ते धीरे-धीरे,

जैसे पुरानी रज़ाई का कोना,

बातों के धागे टूट चुके थे,

और मौन ने घर भर में

शुरू कर दिया अँधेरा बोना!

तभी रसोई में

चाय ने धीमे से उबाल लिया।

केतली की भाप में

कुछ अनकहे दुख पिघले,

अदरक की खुशबू ने

थके हुए मन पर

माँ के हाथ-सा स्पर्श कमाल किया!

इस तेज़ भागती दुनिया में

जहाँ लोग

मोबाइल की स्क्रीन पर

अपनापन खोज रहे हैं,

वहाँ चाय आज भी

पुरानी सिलाई मशीन की तरह

घर-घर रिश्तों की

तुरपाई कर रही है।

कभी पिता की थकान में

चीनी बन घुल रही है,

कभी माँ की चिन्ता में

इलायची-सी महक रही है,

कभी दोस्तों के बीच

ठहाकों की भाप बन उड़ रही है,

तो कभी प्रेमियों के मौन में

एक कप की गरमी बन टिक रही है।


पद्य प्रबन्ध—

धूल की परतें

केतली पर

तप की लौ

लाल मखमली कुर्सियों पर,

सजी साड़ियों का एक समन्दर है,

पर कौन जानता है कि किस चेहरे के,

कितना गहरा द्वंद्व अन्दर है!


एक हाथ में बनारसी का आँचल है,

दूजे में मिट्टी का वो कुल्हड़ गर्म,

एक कलाई पर बँधी है आधुनिक घड़ी,

जो याद दिलाती है घर के नियम और धर्म।


मंच पर चल रहा है विमर्श बड़ा,

'सशक्तीकरण' के ऊँचे-ऊँचे नारों का,

पर यहाँ फुसफुसाहट में दर्ज है दर्द,

ज़िम्मेदारियों के अन्तहीन किनारों का।


ये सजना-धजना कोई शौक नहीं,

ये तो दुनिया के लिए एक ओट है,

मुस्कुराहटों के इस सघन वीराने में,

छिपी हर दिल पर कोई न कोई चोट है।


चाय की हर चुस्की के साथ यहाँ,

कोई अपनी थकान बिसरा रही है,

तो कोई अपनों की बंदिशों से सुस्ता

बस! चुपचाप तनिक पल चुरा रही है।


ये मिट्टी के कुल्हड़ गवाह हैं इस बात के,

कि हर औरत भीतर से कितना तपती है,

औरों की ज़िंदगी में ज़ायका भरने को,

वो ख़ुद को साँचों में कितना खपाती है।


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