Monday, 22 June 2026

गुलदस्ते में वट

पिता ने दिया काया तो उस काया को निरोग रखना योग की माया

पिता का साया धूप में शीतल छाँव बन जाता है,

जीवन का हर कठिन रास्ता सहज बन जाता है।

सदा स्मरण करते पिता के मौन तपस्या को,

जिससे घर का हर कोना उजियारा पाता है।


तन को बल, मन को शांति, प्राणों को नव प्रकाश,

सदा योग देता है जीवन को सुन्दर विश्वास।

बाहर जितनी दौड़-धूप है, भीतर उतनी ही ख़ामोशी,

स्वयं को खोजो, मिल जाएगा अपना ही आकाश।

वही संस्कृति चाहिए वहीं के वहीं आँगन के कुशल टिकाई में

सुख, शांति और सफलता की खोज में निकले हम,

दुनिया भर में उत्तर ढूँढ़ते रहे हरदम।

योग ने सिखाया—अपने भीतर उतरना सीखो,

पिता ने कहा—सत्य और श्रम का पथ चुनो।

फिर समझ में आया जीवन का यह रहस्य,

जिसे खोजते रहे हम यहाँ-वहाँ,

वही-वहीं था—पिता की सीख और अपने ही योग के बीच।

संयम, साहस, श्रम और सच्चाई,

ये सब आसान नहीं थे,

पिता की रोज़मर्रा की साधना थी।


योग ने जब मन के भीतर दीप जलाया,

पिता का चेहरा उसी उजाले में नज़र आया।


पिता ने उँगली थामकर चलना सिखाया है,

योग ने गिरकर भी सम्भलना सिखाया है।


योग तन को साधता है, पिता मन को गढ़ते हैं,

वही दोनों मिलकर जीवन को वहीं ऊँचाई देते हैं।


पिता ने कहा था—

जीत से पहले स्वयं पर विजय पाना,

योग ने वही बात

श्वासों की भाषा में दोहराई है।


एक ने जीवन का अनुशासन दिया,

एक ने मन का सन्तुलन दिया


वहीं दोनों मिलकर संस्कार को वही गहराई देते हैं।

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