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देवनागरी में लिखें

Saturday, 13 July 2019

जिंदगी यूँ सँवरता गया।


आसपास की महिलाओं में प्रथम स्थान माँ का ही आता है उनसे समझ और धैर्य लिया तो जीवन सँवरता गया.. बाद में उनसे ही मिलता जुलता रूप हमारे बड़े भैया का रहा जो राह दिखलाने में सारथी बने , जिंदगी जब भी उलझने लगी समझ और धैर्य पतवार बने.. आगे बढ़ने पर बेटा ऊँगली थाम लिया.. फेसबुक-ब्लॉग पर लाया तो उसके ही दोस्त की माँ श्रीमती रश्मि प्रभा संगी बनी.. लेखनी थमाई... हौसला दी जमीं दिया.. अकेले चले थे कांरवा बनता गया... जिंदगी रोज आजमाती है.. कभी बोलती बंद करती है तो कभी दिमाग कुंद करती है .. कभी घुटने टेकने पर विवश करती है.. पर जिंदगी को हराती हूँ सदा.. कभी प्रेम, मौत और ईश पर बात नहीं करती हूँ क्योंकि उसे ना देखा और ना कभी आजमाया.. हाइकु की शोधार्थी हूँ... कल्पनाएं वर्जित है... जिंदगी के हकीकत की अभ्यर्थी हूँ..
छोटी-छोटी खुशी से बड़ी खुशियाँ मिलती है.. 


8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 14 जुलाई 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. सस्नेहाशीष व असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक धन्यवाद छोटी बहना

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति आदरणीया दी

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  3. बेहतरीन और लाजवाब..., बहुत बहुत बधाई विभा दीदी !

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  4. बहुत सार्थक सोच दी आत्म सम्मान और आत्मबल के साथ
    यथार्थ में जीना।

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  5. वाह दी,
    जीवन के प्रति सकारात्मक नज़रिया आत्मविश्वास हर परिस्थिति को जीतने में सक्षम है।

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  6. सर मैं आपके ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ और मुझे आपकी लिखने की कला काफी अच्छी लगती है। आप मेरी भी लिखी हुई कविता पढ़ सकतें है यहाँ क्लिक कर

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