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देवनागरी में लिखें

Monday, 13 November 2017

"मसक गया"


"बहुत देर हो गई दी आज ... रात के दस बज गए... 
ये लोग दिन में कार्यक्रम क्यों नहीं रखते हैं? 
रात में ही रखना जरूरी हो तो परिवार संग आने की अनुमति देनी चाहिए... है न दी...
वैसे विमर्श में सभी की बातें बहुत जोश दिलाने वाली थी"
"बातों में मशगूल हो हम गलत रास्ते पर आ गए बहना... ज्यादा देर होने से घबराहट और अंधेरा होने से शायद हम भटक गये... आधा घन्टा बर्बाद हो गया और देरी भी हो गई..."
दो क्लब के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम जिसमें विषय था कि "आज की सामाजिक दृष्टिकोण के कारण एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण वक्तव्य सामने आया है कि क्या पुरुष की दृष्टि में नारी का महत्व उसके शारीरिक आकर्षण और पहरावे के कारण है जिसकी कल्पना और कामना वह अपने लिये करता है ? क्या आधुनिक नारी केवल शारीरिकक सुन्दरता का प्रतीक है" से शामिल हो जोश से भरी ऑटो की तलाश कर रही बहनें देर होने से चिंताग्रस्त थी... तभी एक का फोन घनघनाया
हैलो!"
"इतनी रात तक कहाँ बौउआ रही हो?"
"बैठ गए हैं ऑटो में बस पहुंचने वाले ही हैं"
"बहुत पंख निकल गया है ... बहुत हो गई मटरगश्ती... 
कल से बाहर निकलना एकदम बन्द तुम्हारा..."
"पूछ! नहीं लौटूँ जेल, चली जाऊँ दीदी के घर..."

12 comments:

  1. शुभ प्रभात दीदी
    सादर नमन
    "पूछ!
    नहीं लौटूँ जेल,
    चली जाऊँ
    दीदी के घर..."
    हम भी ऐसा ही कहेंगे
    सादर

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    1. 🤣🤣😍😍
      सदा स्वागत रहेगा
      सस्नेहाशीष संग शुक्रिया छोटी बहना

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  2. नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 16-11-2017 को प्रकाशनार्थ 853 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। प्रातः 4:00 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक चर्चा हेतु उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

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    1. सस्नेहाशीष संग शुक्रिया

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  3. दी, बहुत सूक्ष्म विश्लेषण किया आपने मनोभावों का, जितना भी आधुनिकता का दिखावा कर ले लोग नारी उत्थान के भाषण दे ले पर मानसिकता आज भी ऐसी ही है।
    बहुत अच्छा लिखा आपने दी।

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  4. बहुत गहरा चिंतन , स्त्री जीवन की विवशताएँ बस थोड़े से शब्दों में । बधाई।

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  5. इन बंधनों के कारण ही ना जाने कितनी स्त्रियों की प्रतिभाएँ दम तोड़ देती हैं....

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  6. बहुत सुन्दर
    आधुनिकता का दिखावा कर ले नारी स्त्री जीवन की विवशताएँ बस बंधनों के कारण ही हैं

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  7. बहुत संजीदा लेखन। बहुत सुंदर

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  8. गहरा चिंतन सूक्ष्म विश्लेषण किया आपने

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