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देवनागरी में लिखें

Thursday, 11 April 2019

माँ



सन् 1972 की बात है मेरे पापा का तबादला सहरसा से सिवान हुआ था... सिवान से नजदीक गाँव में हमारा घर था.. तब गाँव में रहने से गाँव के घर के रहन-सहन का पता चला... पहली रोटी गाय को दी जाती तो एक रोटी कुत्ते को डाली जाती... दो रोटी जोड़े बैल को भी दी जाती... जब दादा जी भोजन करने बैठते तो एक बिल्ली उनके समीप आकर बैठ जाती उसके लिए दूध रोटी दादा के भोजन संग रखा जाता.. दादा खुद भी खाना खाते और बिल्ली के लिए भी दूध में भीगी रोटी का टुकड़ा डालते रहते... गाँव में कहावत है बिल्ली मनाती रहती है कि घर का मालिक अंधा हो जाये इसलिए बिल्ली पाली-पोसी नहीं जाती जबकि हमारे दादा जी के घर का नियम विपरीत दिख रहा था... वो बिल्ली और किसी के पास ना तो जाती और ना परेशान करती.. बल्कि दुबकी-सहमी रहती.. हमलोग ही उसको तंग करते रहते... कुछ महीनों के बाद एक दिन वह बिल्ली छज्जे पर रखे समानों में बैठी नजर आई, आदतन ज्यों उसके समीप जाने के लिए हम अपना पैर बढ़ाये वह गुर्रा उठी मानों शेरनी हो... जबतक वह हमपर झपटती तबतक हम पीछे खींच लिए गए.. उसका यह बदला रूप हमें भयभीत कर दिया.. बाद में हमें पता चला कि उस समय वह अपने बच्चे को जन्म दी है और उसे लगा कि उसके बच्चे को खतरा है इसलिए वो खूँखार हो उठी... बच्चे पर खतरा महसूस कर बिल्ली शेरनी बन जाती है...

5 comments:

  1. माँ..
    चिंता जायज है..
    सादर नमन..

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  2. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति 102वां जन्म दिवस : वीनू मांकड़ और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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  3. सुंदर संस्मरण

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