Wednesday, 15 April 2026

बन्धनों का बसन्त

लघुकथा 1️⃣ 

“तुम्हें तितली बनना है! तुम कब तितली बन जाओगी ?” कमरे की खिड़की पर रखे गमले में एक हरी-सी इल्ली कई दिनों से चुपचाप पड़ी थी। राधिका रोज़ उसे देखती और पूछती। घर के भीतर उसकी अपनी दुनिया भी कुछ वैसी ही थी—नियमों के धागों में लिपटी, उम्मीदों के खोल में बन्द।

“अच्छी लड़कियाँ ज़्यादा उड़ान नहीं भरतीं, बस! अपने घर की होकर रह जाती हैं…। सभी कन्याओं का तितली बनना ठीक नहीं होता है।” उसकी माँ की आवाज़ रोज़ गूँजती रहती। राधिका मुस्कुरा देती है, पर उसकी आँखें खिड़की के उस कोने में टिक जाती हैं, जहाँ इल्ली अब कोकून बन चुकी थी। एक सुबह, हल्की धूप के साथ कोकून फटा। रंगों से भरी एक तितली बाहर आई—धीरे-धीरे पंख फैलाए, फिर एक झटके में उड़ गई। राधिका ने गहरी साँस ली।

“देखा? तितली बनकर उड़ गई न? अब कहीं मसल दी जाएगी!” उसके पीछे से माँ ने कहा।

“हाँ माँ… वह तितली बन गई।” राधिका ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—

थोड़ी देर रुकी, फिर धीमे से पूछा-

“और मैं…! मेरे लिए माँ तुम कब कहोगी, बनना तितली!?”

“जा, बन जा तितली! -वायुयान चालक बनने की तैयारी कर ले!” माँ ने कहा

“देखना माँ! मेरे पंखों के रंग किसी अन्य की हथेलियों में नहीं दिखेंगे!” उस दिन पहली बार, राधिका ने खिड़की बन्द नहीं की।

लघुकथा 2️⃣

“ऐसी रहस्यमयी दुनिया जिसमें सेवा-निवृत्त पदाधिकारी गुम हो जाता है और वर्षों बाद पता चलता है कि वह किसी दूसरी औरत के साथ नई ज़िन्दगी बसा ली! उसी दुनिया में साठ साल का शिक्षक, अट्ठाइस साल की शिक्षिका से शादी कर लेता है—यह समय किस काल से गुजर रहा है?” पूछते हुए सीमा की आवाज़ में खिंचाव था।

“तुम्हें आज इस फिसलने वाले काल की बेचैनी क्यों है?” राघव ने चाय का कप रखते हुए पूछा।

“बेचैनी?” सीमा हँसी, पर हँसी में कड़वाहट थी— “जाके पाँव न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई!” व्यंग्य की धार तीखी थी।

“अगर तुम सच में इस पीर से गुजर रही हो, तो कहो… यूँ पहेलियों में बात करोगी तो कोई नहीं समझेगा।” पहले राघव कुछ पल चुप रहा, फिर पूछा।

सीमा ने खिड़की के बाहर देखा। सामने स्कूल का प्रांगण था। एक कोने में बासठ साल के सेवानिवृत्त गुरुजी खड़े थे—सफेद बाल, हल्की मुस्कान। उनके पास एक नई शिक्षिका थी—हँसती, कुछ कहती हुई।

 “आइए प्रिय। आज तो आप सच में तितली लग रही हैं।” गुरुजी ने सहजता से उसे पुकारा।

“देखा? यही है आज का फिसलपट्टी का काल। उम्र, मर्यादा, संबंध—सब घुल गया है जैसे।” सीमा का चेहरा कस गया था।

“या फिर हम देखने का नज़रिया खो चुके हैं। क्या पता… दोनों ने अपने जीवनसाथी खोए हैं, दोनों अकेले हैं! एक-दूसरे की खाली जगह को भरने का प्रयास कर रहे हों। हर रिश्ता छल नहीं होता, सीमा।” राघव ने धीरे से कहा।

सीमा मौन साधे रही। उसके चेहरे का ज्यामिति विभिन्न आकार दर्शा रहा था।

“तितली बनना हमेशा देह का ही नहीं होता है, कई बार यह मन का खोल तोड़ने का साहस भी होता है।” राघव ने आगे कहा— शायद वे ‘तितली बनना’ नहीं, ‘बनना तितली’ सीख रहे हैं—देर से ही सही।”

सीमा की आँखें फिर उस दृश्य पर टिक गईं। गुरुजी और वह शिक्षिका अब साथ-साथ चल रहे थे—धीमे, मगर सन्तुलित कदमों से। सीमा ने पहली बार उनके चेहरे पढ़ने की कोशिश की—वहाँ कोई उछाल नहीं था, बस एक थकी हुई शान्ति थी… जैसे दो टूटे पंखों ने मिलकर उड़ना सीख लिया हो।

“शायद… हर उड़ान उच्छृंखल नहीं होती।”-उसने धीमे से कहा।

“और प्रत्येक तितली बनने की कहानी, एक जैसी भी नहीं होती।” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा।




6 comments:

  1. व्वाहहह
    शानदार
    वंदन

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 17 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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    Replies
    1. 🙏आत्मीय आभार के संग बहुत-बहुत धन्यवाद आपका🤲🏻

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  3. शायद मन कभी प्रौढ़ नहीं होता या होना नहीं चाहता

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