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देवनागरी में लिखें

Sunday, 19 August 2012

#यूँ ही कुछ बेमानी #



आकाश को कागज और
समुन्दर को स्याही बना लिया जाए और
तब कोई रचना की जाए तो भी ,
पापा - माँ की और उनलोगों  के ममता की ,
वर्णन 
नहीं किया जा सकता ..... !!

२० अगस्त मेरे लिए मनहूस :'(

आज मेरी माँ की पुण्य-तिथि है !
मेरी माँ को गुजरे 33 साल गुजर गए .... :'( 
मैं आभारी हूँ ,अपनी जन्मदात्री की .... !!
15 वर्ष तो गुजर गए ....
नकचढ़ी - मनसोख बेटी बने रहने में .... 
माँ कुछ भी सिखाना चाहती ,
उसमें मेरा टाल-मटोल होता ,
किसी दिन .... किसी दिन ,अगर चावल चुनने बोलती ,
मेरा सवाल होता *आज ही बनाना है .... ?
तब ,तभी मुझे पढ़ना होता ....
मुझे जब जो चाहिए ,तभी चाहिए होता ....
पापा का नाश्ता-खाना निकलता ,उसी में मुझे खाना होता ....
पापा के खाना खा के उठने के पहले ,मुझे उठ जाना होता ....
अलग खाने से या पापा के खाने के बाद ,
उठने से थाली हटाना होता ....
जो मुझे मंजूर नहीं होता ,भैया जो नहीं हटाता .... !!
(छोटी सी घटना :- मैं ,स्कूल के ,15 अगस्त के झंडोतोलन की हिस्सा थी .... मुझे नई ड्रेस चाहिए थी(वो तो एक बहाना था ,मुझे तो रोज नई चाहिए होता था) ....11अगस्त को स्कूल से आकर शाम में बोली मुझे नयी ड्रेस चाहिए....13अगस्त को शाम में नयी ड्रेस हाजिर .... लेकिन गड़बड़ी ये थी मुझे चुड़ीदार पैजामा चाहिए था वो सलवार था .... रोने-चिल्लाने के साथ सलवार के छोटे-छोटे टुकड़े कैंची से कर दी ....
मझले भैया के बदौलत 14अगस्त को शाम तक नई चुड़ीदार पैजामा हाजिर .... :D)
 पापा ज्यादा प्यारे लगते ,
वे अनुशासन नहीं करते ....
भैया माँ को चढ़ाते ,
*बबुआ के दूसरा के घरे जाये के बा ,
लड़की वाला कवनों गुण नइखे ,
हंसले छत उधिया जाला* .....
माँ की भृकुटी क्यों तनी रहती ,
मैं आज तक भी नहीं समझी ,
मैंने बेटी नहीं *जना है ....
लेकिन भैया के मरने के साथ ,
आपका आत्मा से मरना खला है ....
एक बेटी-एक बहन ,एक समय में 
दोनों की माँ की भूमिका अदा की है ....
एक हथेली की थपकी ,
भाई(बहुत छोटा था,रोने लगता था) जग जाए....
एक हथेली की थपकी ,माँ कुछ पल सो जाय ....
और हर रात मेरी जागते कट जाती .....
आप ये नहीं सोचीं ,बचे हम ,
चारो(भाई-बहन) को भी आपकी जरुरत होगी ....
आप ये क्यों सोची .... 
जो चला गया वो आपका था ,
जो आपका था , आपके साथ था ....
कुछ तो सोची होती .... !!
जब मेरी शादी हुई  .... ,
बिदाई के वक्त ,घर-भराई के चावल ,

आपके आँचल के मोहताज रहे ....
जब पग-फेरे के वक्त या जब-जब घर आई ,
आपके आलिंगन की मोहताज रही ....
जिन्दगी ने जो लू के थपेड़े दिए ,
आपकी ममता ,शीतल छाँव तो देती ....
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की हूँ दिमाग कहता है ,
आज तक ,आप ना होती ....
दिल करता है ....
आप होतीं ,गोद में सर रख ,
रोती-खिलखिलाती-सोती ....
आपको ,किसने हक़ दिया ,
आप मेरे गोद में ,चिरनिंद्रा में सो गईं .... :'(
माँ - मार्गदर्शिका ,सखी खो गई .... !!
आपने बीच मंझधार में छोड़ा है .... :'(


माँ ,मैं जो हूँ .... जैसी हूँ .... आपने गढ़ा है .... !!

22 comments:

  1. बहुत मार्मिक लिखी हैं आंटी!
    आदरणीया माता जी को हार्दिक श्रद्धांजलि!


    सादर

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  2. हम बावन के हो जाए या अठावन के , माँ के आँचल दुआओं आशीष को कभी भूला नहीं सकते ...
    मां को नमन !

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  3. जी भर आया विभा जी....
    आँखें नम हो चलीं....
    लगता है ..माँ है कहीं आस पास.....शायद आपकी लेखनी में स्याही बन दौड रहा हो उनका नेह....
    श्रद्धा सुमन..

    सादर
    अनु

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  4. बुजुर्गों को याद करने से खुद को बल मिलता है , दिल को सुकून मिलता है इसलिए उन्हें याद करते रहना चाहिए |

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  5. समय ना खुशियों की यादों को कम कर पाता है , न घाव भरते हैं !!!

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  6. यादें मन की पीड़ा को सहलाता है..समय मलहम का काम करता है..मन भर आया ..

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  7. shabd nahi kehne ko ki kaisa likha hai....na koi anklan hai...man ko chu gayi ye rachna....ma shabd khud hi sab kuch keh jata hai......

    sadar...

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  8. मान की स्मृति मेन बहुत संवेदनशील पोस्ट .... माँ को नमन और श्रद्धांजली ....

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  9. बहुत मार्मिक ! आपकी माँ जी को विनम्र श्रद्दान्जलि !
    जब हमारे पास कुछ होता है...अक्सर उसकी क़द्र नहीं करते हम..! :(
    बहुत खलता होगा...उस ममता के आँचल का साया सिर से उठ जाना...! पर बीता वक़्त लौटता भी तो नहीं! आपकी रचना एक सीख है...जिसे हम सब जानते हैं..मगर सोचते हैं तब..जब वक़्त हाथों से निकल जाता है..! शुक्रगुज़ार हूँ भगवान की....कि उसने अभी अपने साए से महरूम नहीं किया...!!!
    ~सादर !

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  10. पढ़ कर मन बहुत भारी हो गया ..... मुझे लगता है कि शायद ही कोई ऐसा होगा जो माँ के अनुशासन ,उनके दुलार को उनके जीवित रहते समझ पाता हो .....

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  11. बहुत ही भावपूर्ण,मार्मिक और हृदयस्पर्शी संस्मरण.
    माँ ईश्वर की सर्वप्रथम पहचान है.

    माँ को सादर नमन और विनम्र श्रद्धांजलि.

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  12. आँखें नम कर गयी आपकी रचना ....वाकई जब हमसे कोई छिन जाता है, तभी हम चेतते हैं ....और माँ का आँचल ...इश्वर करे हर बच्चे के सर पर बना रहे ....

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  13. माता के प्रति 'मार्मिक' -'काव्यात्मक' श्रद्धांजली का उपयुक्त प्रस्तुतीकरण किया है। मैं तो अपने बहन-भाई ही नहीं और भी तमाम लोगों की आँखों की सिर्फ इसलिए किरकिरी हूँ कि माता -पिता के न रहने के 17 वर्षों बाद आज भी उनके निर्धारित नियमों पर चल रहा हूँ।
    आपने माँ को याद किया यही उचित है।

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  14. माँ ,मैं जो हूँ .... जैसी हूँ .... आपने गढ़ा है ..

    .. माँ को नमन और श्रद्धांजली ....

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  15. भावमय कर गई यह प्रस्‍तुति ... मां को सादर नमन

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  16. माँ मैं निशब्द हूँ आज |

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  17. आपकी बातें पढ़ीं फोटो भी देखी , क्या कहूं कौन खुशनसीब अधिक आप या वो जो आपके अपने जिनको इतना चाहती हैं आप।

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  18. आप एक अचछी इंसान हैं , इतना कहना है मुझे

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  19. और सब मायने रखते , बेमानी कुछ भी नहीं जो लिखा आपने

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