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देवनागरी में लिखें

Sunday, 16 December 2012

गलती गुनाह बन गई

कभी-कभी सच्चाई की तलाश में भी कोई बात फिसल ही जाती है ....
किसी दुसरे इंसान पर भरोसा करके , गलती इंसान से हो ही जाती है .........  ....
भरोसा वो काठ की हांडी जो चूल्हे पर दोबारा ना चढ़ती है ....
गलती मुझसे भी हुई है , जो मेरी गुनाह बन गई ....
शर्मिन्दा हूँ , यकीं ना दिला पाई , जब ख़ुद मुझे यकीं नहीं ....  
ख्याल था हाथी पचा जाने का , वहाँ चना हज़म नहीं हुई ....
उन्हें मुझ पर यकीं नहीं , मुझे इस जमाने पर भरोसा नहीं ....
"बात तब तक अपनी है, जब तक अपने पास है"  सहमत हूँ आप से ............ 


समय सीखा ही देता है ........ !!

7 comments:

  1. बहुत बढ़िया आंटी

    सादर

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  2. बिल्कुल सच...सुन्दर

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  3. हम्म्म ...होता तो है ऐसा , मगर किसी से भी कहे बिना रहे कैसे !

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  4. बहुत बेहतरीन अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,,,,

    recent post: वजूद,

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  5. सच कहा.. बहुत बढ़िया

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  6. galti mujhse bhi huyi
    jo mera gunah ban gayi..
    bahut khoob..
    http://ehsaasmere.blogspot.in/

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