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देवनागरी में लिखें

Tuesday, 28 May 2013

Mrs.मोतिया


मेरे ब्लॉग के पिछले पोस्ट पर मेरे एक बेटे का कहना था कि कहानी के पात्र को बदल दिया जाये तो पुरुष की जगह महिला होगी सज़ा की हकद्दार ....
उन्हे कहना चाहती हूँ .... किसी भी ऐसी घटना में दोषी दोनों होते हैं , बराबर के .... क्यूँकि ऐसी किसी वारदात तो दोनों के शामिल होने से ही घटित होती है ....
चुकि मैं पीड़िता को जानती हूँ .... तो मैं पुरुष के लिए सज़ा की मांग कर रही हूँ ....मेरे वो बेटे के कोई पीड़ित पुरुष होगा .... जिसकी पत्नी बेवफा होगी .... जिस घटना को मैं लिख रही हूँ ,उसमें भी तो एक बदचलन पत्नी भी तो है .... वो है, दूसरी औरत .... जो अपने पति से बेवफाई ही तो कर रही है ....सज़ा उसे भी तो मिलनी चाहिए ....
खैर ....
पत्नी को अपने विश्वास टूटने पर सब विखरता नज़र आया ..... पत्नी दुख और गुस्सा के ऐसे सैलाब में डूबी कि पहले तो उसे लगा कि वो खुद को खत्म कर ले ....जीने का कोई वजह नहीं रह गया है .... अवसाद ,पत्नी को भी तो हो सकता है .... लेकिन जो जुझारू रही हो .... उसे अपने इस विचार को त्यागने में कुछ घंटे लगे .... फिर सोची अलग हो जाये .... लेकिन अलग होने के पहले अपना भड़ास तो निकाल ले .... इस लिए पति पर चिल्लाना शुरू की .....
जो पत्नी कभी भी किसी को भी एक अपशब्द .... एक गाली अपने इतने लंबे जीवन में ,मज़ाक में भी नहीं बोली होगी .... वो जीतने गाली दे सकती थी .... दी .... ऐसे-ऐसे शब्द बोली कि मैं यहाँ लिख नहीं सकती हूँ .... पति बहुत परेशान हुआ .... उसे अब तक समाज में , परिवार की कमाई अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती नज़र आई .... बहुत समझाने का प्रयास किया अपने पत्नी को ....

पति ,पत्नी से बोला :- मैं कोई बेबवफ़ाई नहीं किया हूँ .... आज भी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा हूँ .... स्थिति को समझो ....

पत्नी पुछी :- तुम्हें जो msg  आते हैं या तुम जो msg करते हो .... वैसा कोई मुझे करे तो बर्दास्त कर लोगे .... ?? वो सब मैं तुम्हारे रखैल के पति को बताना चाहती हूँ .... मुझे उसके घर ले चलो .... जिसके लिए उस पत्नी के पति नहीं तैयार हुये ....

पति बोला कि :- एक बार और मुझे मौका दो .... ऐसा कुछ नहीं करो .... वो औरत संयुक्त परिवार में रहती है .... देवर - जेठ का परिवार रहता है .... अगल-बगल में किराएदार रहता है .... हँगामा मत करो .... वो कुछ महीनों में मर जायेगी .... उसे चैन से मर जाने दो ....

ऐसा कैसे हो सकता था कि पत्नी का सब कुछ लूट लेने वाली को कुछ पता ना चले .... वो पति पर ज़ोर देने लगी .... उस औरत को फोन करो .... मैं उससे बात करूंगी .... पति टालता रहा .... लेकिन इस बार पत्नी पर जैसे किसी और का साया हो .... वो जिद करती रही .... फोन होना शुरू हुआ .... लेकिन वही हालात .... पूरा रिंग होकर कट जाये .... और फोन कोई उठाए नहीं .... दिन बैचनी में और रात आंखो में कट गई .... दूसरे दिन सुबह 6 बजे पत्नी अपने पति के ही mobile से phone की 
तो वो औरत ही phone उठाई :- hello

पत्नी :- कैसी हो ?

रखैल :- ठीक नहीं हूँ .... कल सिर में बहुत दर्द हो गया था ....

पत्नी :- ऑफिस नहीं जा रही हो ?

रखैल :- जाती हूँ .... सब बहुत तंग करते हैं , छुट्टी देने में .... बहुत गर्मी है तो नाक से खून आ जाता है .... sir ,आपके साहब ही तो मुझे छुट्टी दिलाने में मदद कर देते हैं .... उनकी बात सब सुनते हैं .... छुट्टी मिलने में आसानी हो जाती है .... कोई बात है मैडम ? ....

पत्नी :- नहीं .... कोई बात नहीं है .... कल रात में तुम्हारा Good Night का और आज सुबह में Good Morning का msg नहीं आया तो .... मैं देखना चाही कि तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया है ....

रखैल :- कुछ हुआ है ? .... कोई बात कहनी है ? ....

पत्नी :- नहीं .... कोई बात नहीं है .... तुम आराम करो .... फिर बात होगी .... फोन रख रही हूँ .... ना जाने क्यूँ पत्नी को कटु बात करने कि इच्छा नहीं हुई ....

फोन रख देने के बाद भी पत्नी को चैन नहीं मिला .... अकेली बैचैनी में दिन-रात कटी .... पत्नी के पति एक शादी में चले गए थे ....
फिर दूसरे दिन करीब 8-8:30 बजे सुबह में उस औरत को पत्नी फोन की .... फोन वो औरत ही उठाई ....

औरत :- hello

पत्नी :- आज मेरे पति से तुम्हारी बात हुई है ? 
शक का कीड़ा न जीने देता है न मरने ....

औरत :- नहीं .... कल रात में मेरे पति के पास Sir साहब का फोन आया था .... उनका फोन खराब हो गया है ना ? खराब था ? .... उसे ठीक करवाने के लिए बोल रहे थे ....

पत्नी :- उनका फोन परसो मैं ही गुस्से में पटक कर फोड़ दी थी .... कुच-कुच कर चकनाचूर कर दी थी .... तुम जो msg करती हो या मेरे पति जो msg तुम्हें करते हैं .... वो तुम्हारे पति जानते हैं ?

औरत :- नहीं ....

पत्नी :- कोई कमी है तुम्हें ?

औरत :- नहीं .... मुझे किसी चीज की कमी नहीं है .... मेरे पास सब चीज है ....
पत्नी :- तुम्हारे पति को कोई दूसरी औरत ऐसा msg करती तो तुम्हें कैसा लगता ?? ....

औरत :- मैं तो मर ही जाती मैडम जी ....

पत्नी :- तो तुम क्या सोच कर ऐसा msg की ,कि मैं मर जाऊँ .... मैं मरने वालों में से नहीं हूँ .... मारने वालों में से हूँ .... तुम्हें और तुम्हारे पति और अपने पति को भी मार डालती .... लेकिन उसके बाद भी तो मुझे भी तो मरना ही  होता ....

औरत :- आप गलत समझ रही हैं , मैडम जी ....  Sir साहब सब की मदद करते हैं .... मैं उन्हे भगवान की तरह मानती हूँ ....

पत्नी :- तुम अपने को मीरा-राधा समझती हो .... मुझे कृष्ण-राधा+मीरा का प्रेम भी समझ में नहीं आता है .... भगवान ऐसे msg करते हैं या भगवान को ऐसा msg किया जाता है .... ?? तुम मरने वाली हो ....

औरत :- जानती हूँ मैडम जी ....

पत्नी :- अपने पति से बेवफ़ाई करने में घिन नहीं आई .... मेरे पति मेरे भगवान होने चाहिए थे .... ले जाओ ऐसे भगवान को अपने घर में रखना .... मैं अपने घर से निकाल रही हूँ ....

औरत :- ऐसा नहीं कीजिये मैडम जी .... मुझ से ही गुनाह हुआ है .... मुझे सज़ा दीजिये ....

पत्नी :- तुम्हारे msg से मुझे कोई शिकायत नहीं है .... तुम हरामजादी बेश्या हो .... सज-धज कर ऑफिस जाती थी मर्दो को रिझाने के लिए .... हरामजादी गाली किसे दिया जाता है .... पता है .... ?? आज तुम्हारे कारण तुम्हारी माँ को भी गाली सुननी पड़ी .... तुम्हें मैं एक बेटी की तरह समझती थी .... क्यूँ कि तुम मेरे पति के साथ काम करने वाले की बेटी थी .... जो बाप के मरने के बाद अनुकंपा पर चतुर्थवर्गीय की नौकरी पर काम कर रही थी .... तुम अपनी  औकात भूल गई थी .... तुम्हारा पति ऑफिसर था .... तो तुम्हें चतुर्थ वर्गीय नौकरी छोड़ देनी चाहिए थी .... तुम मेरे बराबरी में मेरे स्तर  की होती .... तुम्हें ऐसे msg करने के पहले कुछ सोचना चाहिए था .... तुम अभी अपने पति के साथ मेरे घर आओ .... नहीं तो मैं आती हूँ .... तब क्या होगा .... इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती तुम ....

औरत :- plz .... मैडम जी .... मेरे पति को कुछ नहीं बताइये - कुछ नहीं कहिये ....

पत्नी :- क्यूँ ? मुझे तुम्हारे पति को सब बताना भी है .... और साथ में राय भी देना है .... आज तुम्हारी पत्नी मेरे पति के साथ है .... कल तुम अपनी बेटी को मेरे पति के साथ कर देना .... उनकी जिंदगी कट जायेगी ....

औरत :- plz ..... मैडम जी मुझ से गुनाह हो गया हैन .... अब मैं क्या करूँ .... मेरे गुनाहों की सज़ा–बददुआ मेरी बेटी को मत दीजिये ....

पत्नी :- आओ तो तुम .... देखूँ कि तुम मुझसे नजरे कैसे मिलाती हो .... ??
औरत :- plz .... plz मैडम जी ऐसा नहीं कीजिये .... plz मैडम जी ....

पत्नी :- तुम आओगी , कि मैं आऊँ .... ??

औरत :- plz .... कृपा कीजिये मुझ पर .... दया ही कीजिये .... अब मैं कितना दिन जियूँगी .... मुझ से अब आपको कोई दुख नहीं मिलेगा .... plz ,मैडम जी .... मुझ से कोई सहानुभूति नहीं .... कोई दया नहीं .... तो मेरे बच्चो पर रहम कीजिये  .... plz मैडम जी ....

पत्नी निरा बेबकूफ .... शाम में जब उसके पति आए तो बोली कि आज फिर वो उस औरत से बात  की है .... सब बात बताई .... पति का सिट्टी-पिट्टी गुम .... मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी .... कुछ देर के बाद ... बहुत हिम्मत कर के , थूक निगलते हुये ,थर्रायाये गले से पति अपनी पत्नी से बोला :- मुझ से गलती हो गई ... मुझे जो सज़ा देनी हो तुम दो .... समाज में जलील ना करो .... मुझे जलील कर के या उसे ,उस औरत के पति को सब बता कर तुम्हें क्या मिलेगा ....

पत्नी :- संतुष्टि ....। आत्म-संतुष्टि .... ना बताऊँ .... ?? क्यूँ ना बताऊँ .... ?? ना बताऊँ तो क्या मिलेगा .... ?? जो मुझे खोना था मैं खो चुकी .... क्यूँ नहीं बताऊँ .... ?? पत्नी तो बिफर रही थी ....

पति :- तुम कुछ नहीं खोई हो .... वो केवल सहानभूति था .... मैं उस औरत से कभी नहीं मिलूँगा .... ना कभी msg करूंगा .... कल भी तुम्हारा था .... आज भी और आने वाले कल में भी तुम्हारा ही रहूँगा ....

पत्नी :- अब मैं तुम पर विश्वास नहीं कर सकती .... कभी कर ही नहीं सकती ....

पति :- आज मैं कुछ क्या बोलूँ .... बस एक मौका दे दो .... हमें जलील ना करो ....

समाज का डर पति और उस दूसरी औरत के बीच का भगवान और भक्त का नाता पानी के बुलबुले या रेत के महल साबित हो रहे थे (ये तो समय तैय करेगा) पत्नी को लगा कि ये डर उनदोनों को दूर कर देगा )
क्षमा और विश्वास कोई चीज है .... जो कोई किसी को भी बार-बार उठा कर दे दे .... ??
लेकिन ....
पत्नी एक मौका देने के लिए अपने को तैयार करने लगी .... या यूं कहें हो गई है ....
उसका दिल कोई टूटा शीशा था .... जो उठा कर कूड़ेदान में फेंक दे .... दिल तो बार-बार टूटने के लिए ही बना है ....

ऐसी पत्नी को (जो महान बनाने के चक्कर में होती हैं)को मेरी मित्रा-भाभी Mrs.मोतिया(कुतिया) बुलाती हैं .... Mrs.मोतिया(कुतिया)श्रेणी की पत्नी को जरा चोट लगी .... उछल-कूद ... धूम-धड़ाम ... घुरना-गुर्राना ... चीखना-चिल्लाना करती हैं .... जैसे कोई शेरनी हों .... अब जीवन लील कर ही .... किसी की जिंदगी समाप्त कर के ही दम लेगी .... लेकिन .... और जरा सा खोखले प्यार का भी गोस्त-विहीन सुखी हड्डी भी मिली .... कि .... पतली सी दम को टीक-टीक  हिलाती हुई पति के सामने बिछ जाती हैं और अपने अस्तित्व को समाप्त कर डालती हैं  ....
इस बार देखते हैं ,Mrs.मोतिया में कितनी हिम्मत हैं , कि कितनी बार वो सजती-सँवारती .... टूटती-विखरती .... समेटती-संभालती .... बैठती-उठती हैं .... अपने रोएँ झाड़ कर .... अभी तो Mrs.मोतिया मुस्कुराना भी भूल गई हैं ....
बस आप भी दुआ कीजिये कि Mrs.मोतिया ,अपने को अवसाद से पूरी तरह बाहर निकाल लाएँ ....

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Sunday, 26 May 2013

क्या सज़ा मिलनी या होनी चाहिए .... ??


एक पत्नी जब भी अपने पति का mobile छूती .... उसके पति झपाटा मार कर mobile छिन लेते और अक्सर डांट पड़ती पत्नी को कि वो पति का mobile ना छूए .... किसी का फोन आए तो वह फोन ना उठाए .... ऐसा मौका कम ही मिलता .... जब कभी वो mobile छूए और उसके पति आस-पास ना हों .... लेकिन पत्नी को भी ,पति का फोन छूना - देखना अपना हक़ समझती अच्छा लगता .... कभी – कभी जब ऐसा मौका मिलता .... वह उस फोन का msg पढ़ती .... msg-box में एक नंबर से ही हमेशा प्यार में पगी पगली का msg होता .... पत्नी को पढ़ कर ,बड़ा अजीब लगता .... कभी तो पढ़ कर छोड़ देती .... कभी वो अपने पति से सवाल करती कि ये किसका नंबर है , जो आपको इस तरह का msg करती है .... पति अक्सर टाल जाते कि अनजाना नंबर है .... उन्हें इसके बारे में नहीं पता .... पत्नी झुँझलाती - कहती कि आपका नंबर उसके पास कैसे आया होगा .... तो पति बोलते कि वो सरकारी नौकर हैं .... जनता के सेवक हैं .... उनका नंबर निकालना कौन सा मुश्किल काम है .... कोई मज़ाक करता है .... मुझे इतनी फुरसत कहाँ कि पता करूँ कि कौन मेरे से इतना प्यार करता है .... कभी वो ही नंबर ,missing नंबर में भी होता तो .... कभी receiving में भी होता तो .... उनका जबाब हाजिर होता .... फोन आया था .... hello किया तो कट गया .... मज़ाक में आई - गई बात हो जाती ....
खैर ....
 ये वर्षो चलता रहा .... हाल के दिनों में Good Morning .... Good Night के msg भी आने लगे .... पत्नी को जब मौका लगता पढ़ कर .... कट कर रह जाती .... जबाब तो उसे मालूम ही था , क्या मिलेगा ... कभी , अगर वो अपने mobile से या land-line से फोन करती तो उसे कोई उठाता ही नहीं .... पूरा रिंग हो कर कट जाता ....
लेकिन .... एक बार receving call को पत्नी उठा ली और जब तक वो कुछ बोलती , उधर से आवाज आई और फोन करने वाली ने अपना नाम जो बताई .... उस औरत को पत्नी बहुत अच्छे से जानती - पहचानती थी ....
पति के ऑफिस में ही वो औरत काम करती थी .... बहुत ही खूबसूरत .... चंचल - वाचाल .... धनी ,जाना माना प्रतिष्ठित परिवार से .... पत्नी से प्यार करने वाला सीधा-मासूम पति भी .... सरकारी बड़ा ऑफिसर .... बड़े प्यारे - अच्छे तीन बच्चे दो बेटी एक बेटा ....
पत्नी को विश्वास ही नहीं हुआ कि वो ऐसा कर सकती है .... उसे लगा अभी गलत नंबर लग गया है .... पत्नी को तब भी कोई शक अपने पति पर नहीं हुआ ....
इसे कहते हैं आँख बंद कर विशवास करना ....
पति को अपने मेहनत और लगन के बल पर promotion तो नहीं मिला लेकिन उसी पद का जिम्मा मिला .... वो उस पद के लिए हकदार तो हो गए थे .... लेकिन उसमें देरी थी .... क्यूँ कि सरकारी काम था .... promotion सिलसिलेवार ढ़ंग से सब के साथ होने वाला होता है ....
दूसरे दिन न्यूज़-पेपर में न्यूज़ था .... तो शाम में बधाई का msg भी मिला ....
पति अपने पत्नी से बोले कि आज शुक्रवार है .... कल - परसो (शनिवार-रविवार) छुट्टी है .... सोमवार को अपने नए office में कार्यकाल संभाल लूँगा ....
शुक्रवार को ही शाम से रात गुजरने लगी .... करीब रात के 10-10:30 बजे पति महोदय थके - हारे घर आए और बोले कि आज ही उन्हें join करना पड़ा .... ऑफिस वालों के दबाब में .... पत्नी बोली तो एक फोन कर देते कि इतनी देर क्यूँ हो रही थी .... पति चिल्ला पड़े .... तुम्हें तो केवल अपने बारे में सोचना होता है ....  अपने बारे से अलग , दूसरे के बारे में सोचना पड़ता .... तब ना सोच रही होती कि इतना काम था कि दम मारने का फुरसत नहीं था .... ना जाने तुम्हें फोन कैसे करता .... पति बेचारे थके - हारे थे .... खाना खा कर सो गए .... तो पत्नी उनका phone ली , और देखी कि उसमें msg था कि वो सबसे ज्यादा प्यार करती है इस लिए आज join करने के उपलक्ष में सबसे पहले Celebration मेरे साथ होना चाहिये ....
उस दिन भी वो बेबकूफ पत्नी ये नहीं सोची कि ये अचानक हुआ भी तो उसे ये कैसे पता चला ....
पत्नी को कभी ये सोच में भी नहीं आया कि send-box को ही जरा खंगाल ले ....
उसे अपने पति पर पूरा विश्वास था .... उसका मानना था कि जहां प्यार है , वहाँ पूरा विश्वास रहना चाहिए और जहां विश्वास है वहाँ ना तो जलन की गुंजाइश होती है और ना कोई शक का कोई जगह होता है ....
वो बेबकूफ ये नहीं जानती थी कि जहां अति विश्वास होता है , वहीं बारीक रेखा की दूरी पर विश्वासघात रहता है ....
उस रात पत्नी को mobile लंबे समय के लिए मिला तो वो send-box को इस विश्वास के साथ देखी कि उसमें उस औरत को कोई msg उसके पति नहीं किए होंगे ....
लेकिन पत्नी स्तब्ध रह गई जब उसे ये देखने को मिला कि उस औरत के सारे msg का जबाब उतने ही प्यारे अंदाज में दिया गया है .... और सारे सूचनाएँ भी उसके पति द्वारा ही दिया गया है ....
पत्नी के क्रोध का कोई ठिकाना नहीं रहा .... फिर भी सुबह उठ कर नाश्ता बनाई .... नाश्ता करा दी .... तब वो पुछी कि ये msg आप जो किए हैं .... उसका मतलब वो क्या समझे .... ??
पति तब भीय झूठ बोले किया  तुम जिसके बारे में सोचा रही हो वो नहीं है .... ये मेरा ही लड़का साथी है .... तो पत्नी बोली कि आप समलैंगिग हैं .... ठीक है अगर वो लड़का है तो मुझे अपने ही mobile से एक call करने दीजिये कि या वो लड़का है या वो है जिसके बारे में main निश्चित रूप में जानती हूँ .... तब पति दौड़ कर भाग कर bathroom में घुस कर सारे msg और No. को delete कर दिये और पत्नी को समझाने लगे कि जो तुम सोच रही हो एकदम गलत है .... उस औरत को कैंसर है और वह बहुत परेशान रहती है .... उसके मानसिक सांत्वना – संबल देने के लिए मैं इस तरह का msg दे रहा हूँ ....
पत्नी बोली :- ऑफिस के इतने सारे लोगों में एक आप ही उसे मिले .....  अगर आप के मन कोई पाप नहीं था तो जब मैं पुछती थी तो आप मुझे क्यूँ नहीं बताए और आज भी झूठ पर झूठ बोलते रहे .... आप पहले जब भी उससे मिलने जाते थे .... तो मुझे भी बताते थे या मुझे भी साथ ले जाते थे .... एक दिन वो औरत मुझ से बोली कि ऑफिस सब लोग मुझे आपके साहब की रखैल बोलते हैं .... तो मैं घर आकर आपको बोली कि आपके office के लोगों का कितना संकुचित मानसिकता  है कि ऐसी गंदी -घटिया बातें करते हैं .... तब से आप मुझे बाहर कहीं भी ले जाना छोड़ दिये .... और आज उसी औरत से इस तरह का msg का क्या अर्थ निकालूँ मैं .... ?? अगर वो मर रही है तो और जरूरी था , आपको मुझे उसमें शामिल करना .... पति भी माने कि हाँ ,ये गलती हो गयी .... मुझे तुम्हें शामिल(अगर वो पति ,अपनी पत्नी को बता भी देता तो जो msg हुआ था .... उसका उसे अधिकार मिल जाता .... उन msg का कोई गलती नहीं होता ) करना चाहिए था .... वह मेरी गलती है .... उसका जो तुम सज़ा देना चाहो सज़ा दो ....
अब आप ब्लॉगर मित्र बताएं कि उस पति को क्या सज़ा मिलनी या होनी चाहिए .... ??

Saturday, 25 May 2013

औरत को घर बचाना है कैसे बचाए ??........

रामायण में एक प्रसंग है कि राम जब वनवास में थे और एक बार नदी पार करने के क्रम में मल्लाह उनके पैर धो कर नाव में चढ़ने का अनुरोध करता है ,क्यों कि राम जी पैर के धूल लगने से पत्थर भी औरत हो गई थी ....
 खैर ....
प्रश्न उठता है कि दूसरी स्त्री क्यों किसी विवाहित पुरुष को चुनती है ?
इसके कई कारण हो सकते हैं पर उसमें सबसे महत्वपूर्ण कारण है ,पुरुष-प्रधान व्यवस्था .... यह व्यवस्था महत्वाकांक्षी स्त्री को अपने सपने पूरा करने का सीधा रास्ता नहीं देती .... ऐसी अवस्था में वह मजबूत पुरुष के कंधे का सहारा ले बैठती है .... यौनाकर्षण भी ऐसे रिश्ते का एक बहुत बड़ा कारण  हो सकता है ....
अकेली , अविवाहित ,परित्यक्ता ,विधवा ,आश्रयहीन परिवार से उपेक्षित स्त्रियाँ भी ऐसा कदम  उठा  लेती हैं .... पर रिश्ते बन जाने  के बाद  दूसरी औरत को महसूस  होता  होगा  कि उसके  भीतर  के दादी -नानी  वाले  संस्कार  अभी  मरे  नहीं हैं .... और भारतीय  समाज अभी इतना  आज़ाद  ख्याल  नहीं हुआ है  कि अवैध  रिश्तों  को आसानी  से हजम  कर ले ....  तभी उसकी महत्वाकांक्षा  भी उसके  अंदर की रूढ़िवादिता  में घिरी  स्त्री के आगे  हार  जाती  होगी  और वह  पारंपरिक  पत्नी  और माँ  बनाने  के लिए  छटपटाने  लगती  होगी  .... ऐसी मनोस्थिति  में वह  प्रेमी -पुरुष पर दबाब  बनाने  लगती  होगी  ....
वह  भूल  जाती  है कि रिश्ते  बनाते  समय  उसने  सामाजिक  मर्यादा  की शर्त  नहीं रखी  थी .... जब उसने  पहले  पत्नी और माँ  का अधिकार  नहीं चाहा  था  , फिर  वह  सब उसे कैसे मिले  ?
पुरुष चाह  कर भी उसे  यह सब  दे  ही  नहीं सकता  .... यह सब  तो  उसके  पास पहले  से ही  होता  है .... पूरी  सामाजिक  मान्यता  और प्रतिष्ठा  के साथ  ....
दूसरी औरत यह भी भूल  जाती  है कि  अगर  पुरुष उसे  वह  सब दे देता है ,तो  पहली  स्त्री के जायज  हक़  मारे  जाएंगे  ....
लेकिन 
शादीशुदा ,सम्पन्न प्यारे-प्यारे बच्चे प्यार करने वाला पति और एक अच्छी सैलरी पर काम करने वाली औरत दूसरे शादीशुदा मर्द के साथ नाजायज रिश्ता रख कर क्या पाती है ....? आज का बौद्धिक पुरुष मानसिक अर्धगिनी चाहता है वो स्त्री के बौद्धिकता से प्रभावित होता है अगर उसकी पत्नी बौद्धिक स्तर में भी कम ना हो तो .... ?? 
एक स्त्री की बर्बादी  पर दूसरी स्त्री अपना  घर  कैसे  आबाद  कर सकती  है ?
दूसरी तरफ  पुरुष यौनाकर्षण  में दूसरी औरत को अतिरिक्त  आत्मविश्वास  से भर  देता  है .......। पुरुष भी भूल  जाता  है कि यह नवीनता  का आकर्षण  है ,जो  बहुत  जल्द  ही अपनी  चमक  खो  देगा  और होता  भी वही  है ......।
दूसरी औरत को देह - स्तर पर हासिल  करते  ही  नशा  हिरण  हो जाता  है .......। पुरुष को महसूस  होता  है कि देह -स्तर  पर सब  स्त्री एक जैसी  ही  है ......। अत: उसे  दूसरी स्त्री के लिए  अपना  सब -कुछ  दांव  पर लगाना  मूर्खतापूर्ण  कदम  लगने लगता  है और वह बदलने   लगता  है ..........। पुरुष के बदलाव  का जब दूसरी औरत विद्रोह  करने लगती  है ,तब पुरुष उस  दूसरी औरत से छुटकारा  पाने  के लिए घृणित  कदम  उठा  लेता  है और वापस  पत्नी  की शरण  में ही  आ  जाता है …. और  पत्नी  अपने  बच्चों  परिवार  समाज तथा  अपनी पराश्रयता  के  कारण  खून  का  घूंट  पीकर  भी  ऐसे  पति  को  क्षमा  कर  देती  है ....... पुरुष  भी सारा दोष  दूसरी  औरत  पर  मढ़  कर  पल्ला  झाड  लेता  है  …….
ऐसे हालातो  के  बाद  उस  दूसरी  औरत  को  क्या  मिलता  है  …. मारी  जाती  तो  वो  दूसरी औरत  ही  है   ……… एक  तो  वो  दूसरी  औरत  पुरुष  के  प्रेम (जो तो  होता  ही  नहीं है, सिवाय  वासना  के) से  वंचित  हो  जाती  है  ,दूसरे  ये  बौना  समाज  उसे  क्षमा  नहीं  करता  …. ऐसे  हालातों  में  उसके  मन  में  ये  अपराध -बोध  आ  जाता  है  कि  वो  एक  पत्नी  से उसका  हक़  छिनने  का कोशिश  की थी  जिसमें  कुछ  समय  के  लिए  कामयाब  भी  हुई  थी ….
इन  सारी  विसंगतियों  के  कारण  दूसरी  औरत  टूटने - बिखरने  लगती  है  और  उसके पास कोई  संभालने  वाला  नहीं  होता  ऐसे  में  वो  मौत  को  गले से  लगा  बैठती  है  ……
एक  स्त्री  को  पुरुष  की  स्त्री  बनने  के  बजाय  पहले  सिर्फ  एक  स्त्री  बनाना  चाहिए एक पूर्ण  आत्मनिर्भर  स्वाभिमानी  स्त्री  ….. तभी  वह  कठपुतलिपन  से  छुटकारा  पा  समाज  से  अपने अधिकार  पा  सकेगी ....
आत्मनिर्भर  स्त्री  ही  बिना  कुंठित  हुये  तीव्रता   और  साहस  के  साथ   समाज   की  बंद  कोठिरियों  की  अर्गलायें  अपने  लिए  खोल  सकेगी  ……..
ऐसा नहीं है कि पहली पत्नी बहुत सुखी होती  है  …. उसकी छटपटाहट का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता .... पर  …. वह  पति  त्याग  का साहस  नहीं  जुटा  पाती  है  .... कुछ विद्रोह  करती है तो अपना घर तबाह कर  लेती है ….
हर हाल में  घर  बनाने  से  लेकर  बिखरने  के   हालात  तक  की जिम्मेवार  एक  औरत ही होती है ?? …………
बस  एक  औरत  ??
दादी को सजना सीखना है
माँ को घर संवारना है
पत्नी को नहीं बिखरना है
औरत को घर बचाना  है
कैसे बचाए .........
??

विभा रानी श्रीवास्तव

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Thursday, 23 May 2013

अनमोल पल ~~~~~ अनमोल रत्न




                                    





  


      









Mrigank Nandan जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई
जुग-जुग जियो
कयामत तक कामयाब रहो
हार्दिक शुभकामनायें 
तुम्हें मिलें
इतनी मुश्किलें
कि
जो तुम्हें बेहद
मजबूत बना दें

तुम्हें मिलें
इतने दुख
कि
तुम इंसान बने रहो

तुम्हें मिलें
इतने सपने
कि
तुम्हारी उम्मीदें बनी  रहें

तुम्हें मिलें
इतनी खुशियां
कि
तुममें मिठास बनी रहे

तुम्हें मिले
कमजोर याददाश्त
कि
तुम बीते बुरे वक्त
को भुला सको

और
तुम्हें मिलें
इतने जोश ओ जुनून
कि
भविष्य में आगे बढ़ते जाओ

तुम्हारे हाथ
हमेशा आगे  बढ़े
किसी से दोस्ती के लिए
किसी की मदद के लिए
किसी को बस देने के लिए

तुम्हें अपनी जिंदगी में मिलें तमाम साल
और
भरपूर जिंदगी मिले उन तमान सालो में

लोग क्या कहेगें
इसकी परवाह
हम पागल नहीं किया करते




Tuesday, 21 May 2013

पागल



मैं
एक पागल
और
आप
 अलग - अलग
श्रेणी के पागल
जनता ही गूंगी बहरी हो गयी है !
पागल सारी दुनिया पागल है !!
           विभा

पागल

एक कवि लिखता है कविता  --------
बहुजन हिताय की !
समाज सुखाय की  !!
करता है ,वर्णन
कुंठा ,संत्रास घुटन ह्त्या बलात्कार का
भूख बेरोजगारी आतंक और उग्रवाद का
व्यवस्था परिवर्तनकामी एक पाठक
पढ़ता है जब इसे
बढ़ जाता है रक्तचाप उसका
आने लगता है इससे चक्कर उसको
डाक्टर देता है परामर्श ----
ऐसी कविताओं का पढ़ना फौरन बन्द करें
वरना । उसका तो अहित होगा ही
उसके स्वजन को भी
खामियाजा भुगतना पड़ेगा इसका
मगर बहुजन को कोई फर्क नहीं पड़ेगा
परिवर्तनकामी वह पाठक तब
देता है गाली ,ऐसे लिखानेवाले कवि को !
जिसे सुनकर कवि हँसता है और उसे -----
पागल कहता है!!

एक दूसरा कवि
लिखता है कविता स्वान्त: सुखाय की ----
करता है वर्णन जिसमें -
नारी के मांसल सौंदर्य का ,
प्रकृति के मनोरम दृश्य का ।
इस कविता का पाठक भी
व्यवस्था परिवर्तन का पक्षधर है
पढ़ता है जब वह इस कविता को तो
देता है गली उस कवि को की
जिसकी बहन जवान हो रही है
पिता कर गए हैं रिटायर
खेत पड़े हैं रेहान जिसके
महाजन सूद  के लिए तक़ाज़ा कर रहा है
वह बेशर्म और बेखबर बनाकर
औरत की नंगी देह पर कविता लिख रहा है .....।
ताज्जुब होता है उस पाठक को कि
जब कवि के स्वजन -सहित सारी दुनिया
दुख में है तो
अपनी कविता से
दुनिया में आग लगाने कि जगह
सुख कि अनुभूति करते हुये
स्वान्त:सुखाय की कविता वह
किस प्रकार लिख रहा है ?
तब कवि को देता है गाली और
उसके मुंह पर पच्छ से थूक देता है
इस पर हँसता है कवि और
थूकने वाले को ही पागल कहता है ........।

कृष्ण अंबष्ट  10 अप्रैल 2000
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Tuesday, 14 May 2013

Family Day



परिवार ,समाज की एक इकाई अंग है ..... परिवार , हर इन्सान की जन्म-से मृत्यु तक की जरुरत है .... जैसा परिवार ,वैसा उस परिवार में रहने वाले इन्सान का व्यक्तित्व  होता है .....
घर में दिया न जलाया और मंदिर में दिया जलाने पहुँच गए तो वो कुबूल नहीं होता है ...
परिवार की ही बात करनी है ..... क्यूँ ना मैं अपने मैके के परिवार की ही बात करूँ ....
मेरे दादा दो भाई थे .... मेरे दादा अपने भाई  से बहुत प्यार करते थे ....
मेरी दादी को 14 - 15 बच्चें थे .... उन बच्चों के पालनपोषण के साथ मेरी दादी  , मेरे छोटे दादा का भी ख्याल रखती थीं .... उन बच्चों के बच्चे और उन बच्चों के बच्चे के बच्चे मिला कर हमलोग करीब  250 - 300 सदस्य हैं ....
हर साल घर में ननद-भौजाई ,देवरानी-जेठानी को मिला कर 5-6 बच्चे तो होते ही थे ....
सोचिये ... सोचिये  .... जब सब बच्चे एक जगह एक साथ रोते-गाते होंगे तो कैसा माहौल होता होगा (*_*) ....
जब मेरे बड़े बाबू जी  की शादी हुई .... तो मेरी बड़ी माँ को डोली से उतरते - उतरते देवर-ननद की जिम्मेदारी मिली .... जिसे उन्होने बखूबी निभाया .... उस जमाने में सास - बहू , माँ - बेटी ,ननद-भौजाई सबको एक साथ ही बच्चे होते थे .... वे बड़े बाबूजी के साथ नौकरी पर भी गईं तो मेरे चाचा - मेरे पापा उनके साथ थे .... चाचा पढ़ने के लिए और मेरे पापा नौकरी करने के लिए ....
जब मेरी माँ उस घर में आयीं तो उन्होने मेरी बड़ी माँ की जिम्मेदार बांटी .... 
मेरी माँ ....
मेरी माँ का गला बहुत ही सुरीला था .... जब वे गाती थी तो सब मंत्र-मुग्ध हो जाते थे .....
वे 30-40 आदमी का (मैं तो 5 रोटी सेकने में आज-कल हाफती हूँ ....लेकिन उनसे मिला संस्कार ही  था कि मैं अपने सास-ससुर का साथ दे सकी ) खाना हँसते हुये बना लेती थी .....
 जब चाची आई तो उनको अपनी जेठानियों का माँ जैसा ही प्यार मिला .... मेरी चाची ,मेरी चचेरी दीदी से भी छोटी थीं .... दीदी की शादी हो चुकी थी .... और उन्हे एक बेटा भी था ......  
हम बच्चों को शादी -ब्याह ,तीज-त्यौहार का बहुत इंतजार रहता था .... बहुत मस्ती-मौज करने का मौका तभी मिलता था .... जब हम सब जुटते तो हमारा खाना ,परात में निकलता और सब बच्चे एक साथ खाना खाते .... खिलाने के लिए माँ-चाची-मौसी -मामी बैठती .... तो वे खिला भी लेती .... खुद खा भी लेती .... वो प्यार झलकता कि पेट के साथ आत्मा भी तृप्त हो जाती .... एक बार मेरे बड़े भैया और अजित भैया (बड़े बाबूजी के पुत्र जो बड़े भैया के ही हम-उम्र थे) मेरे दादा से बोले कि हम भी हाट जाएगें(उस समय सप्ताहिक हाट लगता था ,जिससे जरूरत के समान खरीदा जाता था .... दादा किसी को हाट भेज रहे थे ..... मेरे दादा रुपया को ढेबुया कहते थे या उस समय ढेबुया ,कहा ही जाता होगा ) हमें भी ढेबुया दीजिये ....  दादा पुछे क्या लाओगे ?? ..... भैया बोले :- माँ बोल रही थी .... आलू खत्म हो गया है .... आलू लाना है .... इसलिए हम आलू लाने जाएगें .... दादा बोले :- घर में बहुत आलू है ..... तुम बच्चे हो हाट नहीं जाओगे ....  लेकिन दोनों भैया को , आलू माँ के लिए लानी थी .... बहुत  सोच-विचार कर दोनों भाई झोला लिए और घर के पीछे खेत में गए .... खेत में उसी दिन आलू का बीज लगाया गया था .... उस आलू को निकाल कर ........ झोला में भर कर .... दोनों भाई उठा कर घर लाये और माँ को दिये .... उसी दिन बीज़ का आलू खत्म हुआ था .... माँ उसी आलू की बात की थी कि खत्म हो गया ..... अब दोनों भैया ठहरे अबोध .... उन्हे तो माँ के लिए आलू लाना था इसलिए वे ले आए (*_*) .......
बच्चे बड़े होते गए सखायें देश-विदेश में फैलती गई .....
लेकिन नीव बहुत मजबूत बना था प्यार संवेदना से बनाया गया था .... आज भी जब घर पर कोई शादी या त्योहार में सब जुटते हैं तो एक साथ होते हैं .... आज भी खेती एक है .... जर्जर घर होने पर नया घर बना तो एक ही बना  और वहीँ पर बना ....
 मेरे मैके का जर्जर घर होने पर नया घर  
मेरे भाई और मेरी भतीजी 


जी लूँ .... तब कुछ कहने की हिमाकत करूँ ....

परिवार नव चेतना दे
परिवार नूतन शरीर में नव श्वास दे
परिवार खुशियों भरा संसार दे
परिवार आनंद का समुंदर उपहार दे
परिवार दुनिया की अंधी दौड़ में कुछ दिल्लगी के पल दे
परिवार सबको ही अनुपम प्यार दे
चढ़ें जब नव कर्म-रथ पर
परिवार बुद्धि को प्रखर कर दे
परिवार हर चिरंतन साधना पर सबको अटल विश्वास दे
इस अवनि तल पर उतरकर, अब कर दे रौशन ये फिज़ा
परिवार उल्लास ही उल्लास दे चीरती अज्ञान तम
परिवार न कल्पना रूकने देता है,
परिवार नहीं रुकने देता है उसमें से उगता सूरज 
परिवार से ही समाज का निर्माण होता है ............


Saturday, 11 May 2013

माँ के बारे में क्या लिखूँ ....


माँ के बारे में क्या लिखूँ ....

आज तक बहूत सारे महिमा-मंडित आलेख कविता पढ़ चुकी हूँ .... खुद एक बहुत ही अच्छी माँ की बेटी और एक बेटे की माँ हूँ ....
लेकिन एक सवाल है , मेरे मन में ....
उसके जबाब ढूंढ रही हूँ ....

एक माँ के तीन बेटे थे .... वे बेटे अनुशाषित परिवेश में परिवरिश पाकर बड़े हुये थे .... उनकी शादी हुई .... बेटों की माँ का किसी भी बहू से मधुर संबंध नहीं हो सका .... क्यूँ कि सुबह से शाम और शाम से रात तक , माँ एक औरत की तरह सोचती ही नहीं थी .... एक हिटलर की तरह थी माँ ....
शादी के बाद भी माँ चाहती थी कि बेटे केवल उसकी बात मानें , और अपनी पत्नी का ख्याल न रखे .…
सबसे बड़ा बेटा माँ के कथनानुसार ही चलता .... माँ जो जब कहती ,वही सुनता-समझता-करता …. माँ का आज्ञा-पालन करना अच्छी बात है .... लेकिन सूरज के गोले को चाँद कहना .... थोड़ा ज्यादा हो जाता था .... जिसके कारण उस बेटे का बैवाहिक जीवन सुचारु -रूप से नहीं चला ....
तलाक़ नहीं हुआ .... लेकिन प्यार नहीं हो सका ....
उस बड़े बेटे को भी बच्चे हुये .… एक दिन बड़े बेटे का बेटा बाहर पढ़ने के लिए दूसरे शहर जा रहा था …. पोता ,दादी का पैर छु कर आशीर्वाद लेने के लिए झुका तो दादी उससे बोली कि तुम ,अपने पापा (श्रवण-पुत्र) जैसा ही बनाना …. उनके पैर से सीधा होते हुये पोता बोला ,दादी ,पापा जैसा पढ़ाई में ,इंसानियत में बनने का कोशिश करूंगा .... लेकिन माँ सूरज को चाँद बोलने के लिए बोलेगी तो बोलूँगा ना दादी ……??
उस दिन से दादी -पोते में अनबन हो गई ............

एक घर में एक माँ को दो बेटियाँ थीं .... बड़ी बेटी पढ़-लिख कर नौकरी करने के लिए बड़े शहर में रहने लगी .... उसके साथ ,उसकी माँ भी रहने लगी .... छोटी बेटी पापा-दादा के साथ गाँव में रहती थी .... कुछ दिनो के बाद बड़ी बेटी की मुलाकात एक लड़के से हुई .... बात-चीत का जरिया facebook - phone बना .... एक - दो महीने के बाद उस लड़की ने ,लड़के को बोली कि मैं तुम्हें पहले दिन से ही पसंद करती हूँ ....
तुम मुझसे शादी करोगे .... लड़का बोला कि तुम ना मेरी जाति की हो और ना हम एक राज्य के हैं .... मेरे घर में तो कोई परेशानी नहीं होगी .... क्यूँ कि मैं अपने माता -पिता के विचार जानता हूँ ....
वे धर्म-जाति नहीं मानते हैं .... लेकिन तुम्हारे घर में हंगामा हो सकता है ....
पहले तुम अपने माता-पिता से बात कर उनके विचार जान लो .... उसके बाद हम इस पर सोचेगें और तब मैं अपने घर में माता-पिता से बात करूंगा ....
लड़की अपनी माँ से बात की .... तो उसकी माँ अचंभित हो गई और बहुत गुस्सा हुई ....
कुछ दिन तक तकरार होता रहा .... अंत में एक दिन उसकी माँ बोली कि वो मंदिर जाएगी (उस मंदिर की विशेषता ये है कि अगर इच्छा पूरी होनी हो तो सफेद फूल और अगर मनोकामना पूरी ना होनी हो तो लाल फूल हांथों में आता है)
उसकी माँ मंदिर गई .....कतार में लगी ....उसके हांथों में सफेद फूल आ गया ....माँ बहुत खुश हुई ....
अपनी बेटी को उस लड़के से मिलने -डिनर पर जाने की इजाजत दे दी ....
लड़के को लगा कि सब ठीक है ....
तो वो भी अपने घर में बता दिया कि उसने शादी के लिए लड़की पसंद कर ली है और कुछ दिनों में लड़की की माँ आपलोगों से बात करेंगी ....
लड़के के माता-पिता बिना लड़की को देखे ....
बिना उसके परिवार के लोगों से मिले शादी की स्वीकृति दे दिये ....
लेकिन लड़की की माँ को एक दिन लगा कि लड़की-लड़के कि कुंडली मिला कर देख लिया जाये ....
वे दोनों का कुंडली मिलवाईं तो नहीं मिला फिर क्या था .....
फिर बैताल पेड़ पर .....
अब लड़की की फिर से परेशानी बढ़ गयी ....वो जितना ही माँ को मनाने कि कोशिश करती .... उसकी माँ उसको उतना ही तंग करती .... बीच सड़क पर मारती ....लेकिन लड़की अपने जीद पर अड़ी रही .... लड़की की माँ का कहना था कि लड़की अपनी माँ के पसंद के लड़के से शादी कर ले ....
इसी बहस के दौरान एक दिन लड़की की माँ लड़की को उसके सारे सामानों के साथ रात के 9 बजे घर से निकाल दी .... उस अंधेरी-सुनसान रास्ते पर बेटी को छोड़ते माँ का कलेजा कैसे माना होगा .... ??

उस लड़की को क्या चाहिए था
अपने हिस्से का एक मुट्ठी धूप
उस एक मुट्ठी धूप पर
लड़की का क्या हक़ नहीं था... ?



स्त्री विरुद्ध स्त्री
रूढ़ि सन्नद्ध स्थिति
जटिल मसला

स्त्री विरुद्ध स्त्री
पुरुष तरफदारी
खोटा समझ

स्त्री विरुद्ध स्त्री
दमन अनिवार्य
सतही सोच

स्त्री विरुद्ध स्त्री
सनातनी व्यवस्था
वैर निभाना

स्त्री विरुद्ध स्त्री
सत्ता परिवर्तन
टूटा सपना

स्त्री विरुद्ध स्त्री
जुल्मो-सितम ढाती
दूषित मन

स्त्री विरुद्ध स्त्री
(मेरे साथ हुआ था ,तुम्हारे साथ क्यूँ ना हो ??)

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Tuesday, 7 May 2013

मैं





काश !
मैं एक विशाल वृक्ष और
छोटे-छोटे पौधे ही होती ....

 एक विशाल वृक्ष ही होती जो मैं ....
 मेरी शाखाओं-टहनियों पर
पक्षियों का बैठना - फुदकना
 मेरे पत्तों में छिपकर
 उनका आपस में चोंच लड़ाना ,
 उनकी चह-चहाहट - कलरव को सुनना ,
उनका ,शाखाओं-टहनियों पर ,पत्तों में घर बनाना ,
 गिलहरी का पूछ उठाकर दौड़ना-उछलना मटकना   ,
मेरी छाया में थके मनुष्य ,
 बड़े जीव जंतुओं का आकर बैठना
उनको सुकून मिलना ,
सबको सुकून में और खुश देख कर
मेरी खुशी को भी पंख लग जाते ....
मेरे शरीर से निकली आक्सीजन की
स्वच्छ वायु जीवन को सुकून देते  ,

छोटे-छोटे पौधे ही होती जो मैं ....
मेरे फूलो से निकले खुसबु ,
वातावरण को सुगन्धमय बनाती ....
मेरे पत्तों-बीजों से
औषधि बनते
 सबको नवजीवन  मिलते
 कितनी खुश होती मैं ...........
मुझे बयाँ करना मुश्किल है ......

लेकिन एक नारी औरत स्त्री हूँ मैं
जुझारू और जीवट
 जोश और संकल्पों से लैस मैं
सामाजिक-राजनीतिक चादर की गठरी में कैद मैं

सामाजिक ढाँचे में छटपटातीं-कसमसातीं मैं
नए रिश्तों की जकड़न-उलझन में पड़ कर
पर पुराने रिश्तों को भी निभाकर
हरदम जीती-चलती-मरती हूँ मैं
रिश्तों में जीना और मरना काम है मेरा ....
ऐसे ही रहती आई हूँ मैं
ऐसे ही रहना है मुझे ?

उलझी रहती हूँ उनसुलझे सवालों में मैं
जकड़ी रहती हूँ मर्यादा की बेड़ियों में मैं
जीतने हो सकते हैं बदनामी का ठिकरा
हमेशा लगातार फोड़ा जाता है मुझ पर
उलझी रहती हूँ मैं
 लेकिन
हँसते-हँसते सब बुझते -सहते
हो जाती हूँ कुर्बान मैं

कब-कब , क्यूँ-क्यूँ , कहाँ-कहाँ , कैसे-कैसे
 छली , कुचली , मसली और तली गई हूँ मैं
मन की अथाह गहराइयों में
दर्द के समुद्री शैवाल छुपाए मैं
शोषित, पीड़ित और व्यथित मैं
मन, कर्म और वचन से प्रताड़ित मैं

मानसिक-भावनात्मक और
सामाजिक-असामाजिक
कुरीतियों-विकृतियों की शिकार मैं
लड़ती हूँ पुराने रीति-रिवाजों से मैं
करती हूँ अपने बच्चों को सुरक्षित मैं
अंधविश्वासों की आँधी से
खुद रहती हूँ हरदम अभावों में मैं
पर देती हूँ सबको अभयदान मैं

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Saturday, 4 May 2013

बस चार दिन


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चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात की जगह
चारो दिन ,आठों पहर ,स्याह दिन ,कपाती रहती रूह
बस चार दिन
बस चार दिन
चार दिन पहले शोक-संताप
परसो आक्रोश-भड़ास
कल संकोच-सन्नाटा
आज सम्पूर्ण-शांति
बस चार दिन
बस चार दिन
फिर
इंतजार
फिर
एक घटना के लिए
बस चार दिन
बस चार दिन
चारो घड़ी आठों पहर
बस जीतने चाहो
गले फाड़ लो
बस जीतने चाहो
मोमबत्तियाँ जला लो
बस जीतने चाहो
शब्द उढेल लो
बस जीतने चाहो
कागज़ काला लो
फायदा व्यापारियों को भले हो
किसी और का भला हो
ऐसा हो नहीं सकता
हो ही नहीं सकता
चौथा हो चूका है
उसके जमीर का
जो कुछ कर सकता है
वो जानता है
ये उबाल भी है ,
बस चार दिन का ..................




Thursday, 2 May 2013

पाक के नीयत कितने पाक़ हैं

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सबरजीत के शव से
किडनी और दिल नहीं मिला
पाक के नीयत कितने पाक़ हैं
दिल
दिल जहाँ रह गया
वहीँ आत्मा भी तो रह गई
दिल तक वे संवेदनाएं पहुँच जाती
वो मिटटी बन कर आया
लेकिन वतन की मिट्टी को चूम न सका
जिनकी वज़ह से
वे आज उसकी बहन - बेटी के
आंसू पोछ रहा और गले मिल रहा  है
उसकी बहन उन्हीं लोगों के
सियासी दांव-पेंच को
मजबूत करने की गुहार लगा रही  है
बेटियों को नौकरी देने की दरकार है
क्यूँ कि चलानी तो सरकार है
दिल मजबूर कर देता
आत्मा को दुआएं देने के लिए
शायद
शायद नहीं यकीनन
एक पाक़ हिन्द दिल से
 एक पाक दिल पाक़ हो जाये
शायद
एक स्वस्थ्य सोच की
शुरुआत हो जाए पाक में भी
.पाक के नीयत कितने पाक़ हैं .....

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