Wednesday, 26 August 2026

२६ अगस्त २०२६

आज ना तो संयुक्त परिवार है और ना सासू जी के नुकीले दाँत बचे हैं- बेटियाँ ससुराल में नहीं रह रही -बेटों का रूप बदला है… समाज में अभी अनेक ऐसे मुद्दे फैले हुए हैं जिनपर दम्पति विमर्श होने बाक़ी हैं -आपकी लेखनी उड़ान भरे- २६ अगस्त २०२६ को यादगार बना लें

काल से दो-दो हाथ : २५ अगस्त २०२६

शाम की सुनहरी धूप आँगन से बिछुड़ रही थी। तुलसी के चबूतरे के पास दीनानाथ जी लड़खड़ाते कदमों को सम्भालने की कोशिश कर ही रहे थे कि मालती देवी चाय की प्यालियाँ समेटते हुए उनके पास आ गईं।

“आज आपके मित्र ने भी टोका न—छड़ी लेकर चला कीजिए। कई साल से बेटे और भाई की सलाह को नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं!” मालती ने कहा।

दीनानाथ जी हल्के से मुस्कुराए। काँपती उँगलियों से उन्होंने मालती की चूड़ियों भरी कलाई थाम ली।

“मुझे तुम्हारा हाथ पकड़कर चलना ज़्यादा सुरक्षित लगता है।”

मालती के चेहरे पर ठहरी शिकायत अचानक पिघल गई।

“छड़ी तो सिर्फ़ ज़मीन का सहारा देती है, मालती… तुम्हारा हाथ थामता हूँ तो मन को सहारा मिलता है।”दीनानाथ जी ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, वे कुछ पल रुके

“पचास साल पहले जब इस हाथ को थामा था न, तब से आज तक कभी लगा ही नहीं कि मैं अकेला चल रहा हूँ।” दीनानाथ जी ने कहा।

मालती ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी दूसरी हथेली भी उनके हाथ पर रख दी। शाम की ठंडी हवा में दोनों आँगन की पगडंडी पर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। छड़ी तुलसी के चबूतरे से लगी रह गई।


क़लमी का आकाश : २६ अगस्त २०२६

“सुमन, अगर किसी देश के सर्वोच्च नेतृत्व का दावेदार किसी विदेशी मूल की महिला का बेटा हो, तो क्या उसकी निष्ठा पर सवाल उठना स्वाभाविक नहीं?” चाय के बीच सतीश ने अख़बार की सुर्खियाँ पढ़ते-पढ़ते अचानक पूछा।

“क्यों?” सुमन ने प्याली मेज़ पर रखते हुए पूछा।

“क्योंकि उसकी जड़ें कहीं और भी हैं। संकट की घड़ी में हितों का टकराव हो सकता है।”

सुमन कुछ क्षण उसे देखती रही।

“आलोक, निष्ठा को तुम खून और भूगोल से क्यों माप रहे हो? वैसे भी क्या दोचित्तेपन का नारा है, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’? इसी मिट्टी में जन्मा-पला व्यक्ति देशद्रोही हो सकता है नहीं तो देश ग़ुलाम नहीं हुआ होता और बाहर से आया कोई व्यक्ति इसी देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर सकता है।”

आलोक चुप रहा।

“देशभक्ति वंशावली में नहीं मिलती,” सुमन ने कहा, “वह कर्म से साबित होती है।”

“लेकिन जनता का संशय?”

“संशय का अधिकार जनता को है, पर फैसला पूर्वाग्रह नहीं, संविधान और जनादेश करें—यही लोकतंत्र है।”

आलोक ने अख़बार मोड़ दिया।

“तो तुम्हारे लिए जन्म से ज्यादा कर्म मायने रखते हैं?”

“जन्म तो संयोग है, आलोक। निष्ठा चुनाव है।”

कुछ देर दोनों चुप रहे।

आलोक ने अख़बार के सम्पादकीय पन्ने को फिर खोला। वहाँ देश का नक्शा छपा था।

“सही कहती हो… देश शायद जन्मस्थान नहीं, जिम्मेदारी और जवाबदेही का नाम है।” उसने नक्शे पर उँगली रखी और धीमे से कहा!



Wednesday, 19 August 2026

राग की थाती

 

धुँध इतनी घनी थी कि बालकनी के पार सब कुछ सफेद रहस्य में डूब गया था। बच्ची देर तक उस अँधेरी खिड़की को देखती रही। फिर उसने अपने घर जाकर, अपनी गुल्लक तोड़ी और थोड़ा-सा तेल लेकर लौटी। दीपक जल गया। हवा ने टूटे तारों को छू लिया- धुँध में चित्र उभरने लगे।
मीनाक्षी के सामने पड़ी वायलिन के तार टूटे थे। हवा उन्हें छूती तो एक करुण-सी ध्वनि उठती—उस धुन का टुकड़ा, जिसे उसका पति पूरा किए बिना चला गया था। वह वायलिन ठीक नहीं करवाती थी। हर शाम खिड़की पर दीपक जलाती और उसी अधूरे राग के साथ बैठी रहती।
“दादी! आप रोज़ क्यों खिड़की पर दीपक जलाती हैं?” एक दिन पड़ोस की बच्ची ने पूछा।
“कोई लौटे और उसे रास्ता याद नहीं रहे तो उसकी मदद हो!” मीनाक्षी ने धुँध में देखते हुए कहा था।
आज शाम अँधेरी खिड़की थी। मीनाक्षी जा चुकी थी। वही अधूरा राग उठने लगा। बच्ची ने सड़क की ओर देखा—


Sunday, 9 August 2026

सन्ध्या का आलोक

दिन अपनी अन्तिम देहरी पर ठिठका खड़ा था।

पार्क में पुराने नीम के नीचे बैठे लगभग पचहत्तर-सतहत्तर वर्षीय वृद्ध अपने घुटने सहला रहे थे। हर शाम उनका यह दर्द लौट आता था। तभी सामने वाली बेंच पर बैठने की कोशिश करती एक वृद्धा लड़खड़ा गईं। वृद्ध छड़ी के सहारे उठे। धीरे से उनके पास पहुँचे और पानी की बोतल बढ़ा दी।

“लीजिए… थोड़ा सुस्ता लीजिए।” वृद्ध ने कहा।

कुछ घूँट पानी पीकर वृद्धा ने म्लान मुस्कान ओढ़ ली।

“धन्यवाद…! अब तो लगता है, शरीर ही नहीं, मेरी ज़रूरत भी खत्म हो गई हैं।” वृद्धा ने कहा।

वृद्ध की नज़रें उनके पास रखे ऊन के उलझे लच्छों पर पड़ीं। उन्होंने उसे उठा लिया।

“ऐसा मत कहिए,” वे मुस्कराए, “उम्र काम नहीं छीनती, बस काम का ढँग बदल देती है। आप बुनिए…, उलझों को मैं सुलझा देता हूँ।”

वृद्धा की आँखों में हल्की-सी चमक उतर आई।

धागे सुलझते रहे और बातें भी। पता चला, उनका नाम सुमित्रा था। पास के वृद्धाश्रम में रहती थीं। वृद्ध का नाम रामनाथ था। उनकी पत्नी को गुज़रे कुछ वर्ष बीत चुके थे। उनकी सन्तान अपने कामों में इतना व्यस्त रहती थी कि उनका स्नेह-सम्मान भी अब मोबाइल की घंटियों में सिमट गया था। दोनों ने अपने-अपने दुःखों का ब्योरा नहीं दिया; शायद उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। क्यों कि वे भविष्य की योजना बना रहे थे। आगे रामनाथ ऊन लाएँगे। फ़ौजियों-अनाथों के लिए स्वेटर तैयार होंगे। कुछ पीड़ाएँ शब्दों से नहीं, केवल उपस्थिति से पढ़ी जाती हैं।

नीम की पत्तियों से छनती साँझ धीरे-धीरे गहराने लगी।

रामनाथ ने सुलझा हुआ ऊन सुमित्रा की हथेलियों पर रख दिया। सुमित्रा जी की सलाइयाँ फिर चल पड़ीं।

घर लौटते समय फाटक तक पहुँचकर रामनाथ ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

नीम की छाँव में सुमित्रा जी चुपचाप बुन रही थीं। रामनाथ ने मुस्करा दिए। उनके घुटनों का दर्द वैसा ही था, पर कदम पहले से हल्के लग रहे थे।

धर्म की सीमा

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