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Tuesday, 11 November 2014

चोका



विषय - सूखे गीले का गिला 

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घटा घरनी 
सूखे गीले का गिला 
कान उमेठूँ
मनुहार सुनोगे 
जाल विछाये
मनोहर दृश्य हो 
भ्रम फैलाये
श्वेत श्याम बादल 
साथ धमके 
बरसे न बरसे
दे उलझन 
दुविधा में सताए
काम बढाये
आँख मिचौली खेले 
घर बाहर 
दौड़ती गृहलक्ष्मी 
वस्त्र सुखाती 
माथापच्ची करती
रेस लगाती 
पल दुरुपयोग
क्रोध बढ़ाये 
स्वयं की आपबीती
भयावहता
मेघ पर बरसे 
दे उलाहना 
नौटंकी तुझे सूझे 
परे तू हट 
बरसो या घिसको
समझूँ तुझे 
ना उलझाओ मुझे
धनक दिखा
काम है निपटाने
सीलन है हटाने 

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22 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 13-11-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1796 में दिया गया है
    आभार

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    1. आभारी हूँ ..... बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  2. वाह ! अति सुन्दर ! बादलों के साथ यह संवाद बहुत मन भाया !

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  3. विभा जी चोका के बारे में विस्तार से बताइये ना प्लीज़ !

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    1. शुभ प्रभात
      जपानी विधि कविता लिखने की
      हाइकु 5/7/5 ..... ताँका 5/7/5/7/7 .... सेदोका 5/7/7/5/7/7 .....
      चोका 5/7/5/7/5/7/5/7/5 की अनगिनत पंक्ति हो सकती है लेकिन अनर्थक ना हो ये लम्बी गाने वाली कविता होती है जो लिखी जाती है अंत में 7/7 हो
      सादर

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    2. बहुत सुन्दर और रोचक...

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  4. बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार आपका विभा जी ! आपसे इन नयी विधाओं के बारे में जानकारी मिली ! अब इनमें अभ्यास करने का प्रयास करूँगी ! अब तो आप मेरी गुरू बन गयी हैं ! शिष्या का प्रणाम स्वीकार करें !

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    1. आप अग्रजा हमेशा रहीं ..... plz गुरु कह शर्मिंदा ना करें सादर ..... आशीर्वाद बनायें रखें .... लिखना तो आपलोगों का लिखा पढ़ कर ही सीख रही हूँ ....

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  5. उफ़ .. कितने काम ...

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  6. काम ही काम
    कभी नहीं आराम
    .बहुत सुन्दर चोका ..

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  7. सुन्दर भावाभिव्यक्ति, कमाल का चोका...

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  8. चोका समझ नहीं आया आज तो हमे

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    1. कोई एक पंक्ति बताने का कष्ट करें जहां से शुरुआत करे समझाने की plz

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  9. बहुत सुन्दर और रोचक...

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  10. बरसो या घिसको
    समझूँ तुझे

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    1. मेघ को गृहस्वामिनी बोल रही है बरसना है तो बरसो नहीं तो यहाँ से जाओ घिसको

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