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देवनागरी में लिखें

Monday, 13 January 2014

विनम्र क्षमा




हमें गुमान होता है कि हम अपने देश को जानते हैं 
जबकि मैं अपने राज्य के खैनी के पत्ते उपजाने वाले 
दलसिंहसराय के हिन्दू के दफनाय जाने की रीत से अनभिज्ञ थी 
जबकि हिन्दू का दाह संस्कार होता है .....

शव के शरीर पर , 
जो रामनाम लिखा चादर ओढ़ाया जाता है , 
उसे एक पेड़ में वहीं पर बांध दिया जाता है .....


परसो शाम में ,चौधरी जी की मौत की खबर मिलते ही ,बैचैन हो गई ,अंजू से मिलने के लिए ,उनकी क्या हालत होगी ,इसकी कल्पना भी नहीं करना चाहती थी ,कर भी नही सकती थी ना,बस बैचैनी थी ,जल्दी से जल्दी उनके पास पहुँचने की । इनसे बोली जाना है तो बोले ,काम बहुत है ,श्राद्ध कर्म में जायेंगे ,मेरी बैचैनी देख कर बोले ,तुम जाओ ,कब जाना चाहती हो ?
मैं बोली अभी ,अभी तुरंत 
वो बोले इतना खराब मौसम(बारिश और घनघोर कुहास) है ,रात का समय है,कोई ड्राइवर गाड़ी ठीक से नही चला सकेगा,कुछ हो गया तो लेनी की देनी हो जाएगी ,सुबह 6 बजे जाओ 9 बजे तक मुजफ्फरपुर पहुंच जाओगी ,
बहुत गुस्सा आया ......
लेकिन जाहिर नहीं कर सकी .....
गुस्सा मौसम ,उपर बैठे कठपुतली की तरह नचाने वाले पर थी .....
किस पर निकलती ....
सुबह ठीक 6 बजे घर से निकली तो सोची , 
5 बजे ही निकलती तो एक घंटा और पहले पहुंच जाती 
लेकिन थोड़ी दूर आने के बाद ,
गाड़ी के नीचे का पट्टी टूट गया 
जिसे बनाने में दो घंटा से अधिक तक समय लग गया है
अनजान रास्ता गांव है दलसिंहसराय ,
पहली बार गुजर रही थी , इस तरफ से 
शायद गांव है इसलिए गाड़ी बन रही है
रास्ते के एक अनजान आदमी ने मिस्त्री को फोन किया ,
मिस्त्री आया तो दुकानवाला को फ़ोन कर बुलाया ,
गाड़ी की पट्टी जो खरीदनी थी , दुकानवाला आया तो पट्टी खरीदने के बाद , 
कुछ काट - छांट के लिए दुसरे दुकानवाले की और जरुरत पड़ी ,
उसे भी फ़ोन कर बुलाया गया 
छोटा गांव , गरीबी चारो ओर बिखरी पड़ी है ,
लेकिन इंसानियत , शर्मसार कर दे महानगर को
जो होता है अच्छे के लिए होता है .....
रात में अकेले निकलना ,बहुत परेशानी होती ...

…… 
अंजू का सवाल "बताइए न अब कैसे रहेंगे " निरुत्तर हम सब
कैसी लोहडी कैसा खिचड़ी 
सबसे पहले , शुभकामनाये , अंजू से मैं शुरू करती थी हरसाल 

आप सबों से विनम्र क्षमा इस बार के लिए…… 



9 comments:

  1. मन को छूती हुई बातें ...

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  2. छोटा गांव , गरीबी चारो ओर बिखरी पड़ी है ,
    लेकिन इंसानियत , शर्मसार कर दे महानगर को
    जो होता है अच्छे के लिए होता है .....
    रात में अकेले निकलना ,बहुत परेशानी होती ...
    .....सच गांव में इंसानियत बसती है तभी तो हम कहीं भी कभी भी बेहिचक दिन-रात आ- जा पाते हैं ..

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  3. जीवन की कैसी कैसी विडम्बनाएं हैं ..

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  4. हृदयस्पर्शी मार्मिक प्रस्तुति।।।

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  5. आदरणीय ताई जी मन को छू गई बातें ....बहुत हृदयस्पर्शी प्रस्तुति !!

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  6. जीवन की अलग अलग विडम्बनाएं,,मार्मिक प्रस्तुति...!

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  7. बहुत दुःख हुआ पढ़कर |

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  8. गाँव की सहजता, काश सब सीखते।

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  9. दलसिंहसराय के इस रीत का पता आपके पोस्ट से ही लगा. सच है अपने ही देश में कितनी तरह की प्रथाएँ हैं जिन्हें हम जानते भी नहीं.
    आपके किसी अपने का सदा के लिए चले जाने का पढ़कर बहुत दुःख हुआ.

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