Wednesday, 26 November 2014

ये ……… यूँ ही .....


एक मुक्तक

प्यार का बदला मिले सम्मान कम से कम हक़ तो होता है
मृत सम्वेदनाओं वाले पले आस्तीन में सांप शक तो होता है
अदब-तहज़ीब को भूल कर खुद को ख़ुदा से ऊपर समझे
हाय से ना डरने वाला जेब से नही दिल से रंक तो होता है

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एक क्षणिका

 मौत का आभास नहीं मुझे
लेकिन
जिन्दगी में युद्ध नही
जीने के लिए तो
जीने में मज़ा नही
उबना नही चाहते
बिना समय मारे
मरना नही चाहते।

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ताँका 

1
बेदर्दी शीत
विग्रही गिरी हारे
व्याकुल होता 
विकंपन झेलता
ओढ़े हिम की घुग्घी।

फिरोजा होती
प्रीत बरसाती स्त्री
शीत की सरि
ड्योढ़ी सजी ममता
अंक नाश समेटे।

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9 comments:

  1. एक साथ आपने तो सारे रंग बिखेर दिये दीदी! मुक्तक की प्रशंस करूँ या क्षणिका की तारीफ... सब बहुत ख़ूबसूरती से पिरोये हुये!!

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  2. बहुत ख़ूब...मुक्तक, क्षणिका और ताँका सब के सब उम्दा...

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  3. अदब-तहज़ीब को भूल कर खुद को ख़ुदा से ऊपर समझे
    हाय से ना डरने वाला जेब से नही दिल से रंक तो होता है


    सही कहा है.

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  4. बहुत सुन्दर .....नमस्ते दी

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  5. ख़ूबसूरती से पिरोये मुक्तक

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  6. अति सुन्दर भाव

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