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देवनागरी में लिखें

Wednesday, 31 July 2013

सगी माँ का ये कैसा रूप ??

माँ

रिश्ते में बहू से मुलाकात वर्षो बाद हुई ....
बात-चीत के क्रम में ....
आपबीती सुनते सुनाते दौरान ,
बहू अपने पति की जुल्म की इंतहा सुनाने लगी ...
फिर वो अपने आप को दिलासा भी देती जाती ....
इसी क्रम में वो बताई कि
जब उसका पति छोटा था ....
एक दिन सास(पति की माँ) पुआ तल रही थी ,
पति दौड़ता आया और माँ से पुआ की मांग कर बैठा ....
माँ ,खौलते घी से पुआ निकाल कर ,
खौला पुआ ,बेटे के हथेली पर रख दी ....
पुआ की चाह ....
बेटे ने हथेली को बचाने के चक्कर में पुआ मुंह में डाल लिया ....
हथेली ,मुंह और पेट की जलन ,
उस बेटे को औरत के प्रति क्रूर बना दिया ...
बेटे से छोटी सी भी गलती हो जाती .... माँ मारते-मारते लहूलुहान कर देती ....
वही बेटा जब पत्नी के साथ जुल्म करता तो
माँ कहती मर्द है .... मर्दांगी दिखा रहा है ....          
सगी माँ का ये कैसा रूप ??

मुझे तो लगता है
माँ के हाथो में
मिल जाता है आसमां
तभी ,जब पहली बार
सुनती है माँ ....

http://sarasach.com/vibha-7/

Monday, 29 July 2013

क्या मिला चाची को ?






चाचा(पड़ोसी ,हम 10 साल से साथ थे)की मिट्टी कल( 29-07-2013)मिट्टी में मिल गई ....
चाची अकेली रह गई ....
चाची बहुत ,बहुत ,जल्दी-जल्दी और अस्पष्ट बोलती हैं .... और ... एक ही बात को बहुत बार दोहराती हैं .... इस लिए दूसरे उन्हें झेलना पसंद नहीं करते हैं .... ये बात चाची कहती भी और समझती भी हैं .... लेकिन मेरे पास उनके लिए हमेशा समय रहा .... उनकी बेटी और मैं एक ही उम्र की होने के कारण और प्यार-सम्मान के कारण भी चाची और मेरे बीच ,माँ-बेटी का संबंध बना रहा ....
चाची जब 10 साल की और चाचा 20 साल के थे तो उनकी शादी हुई थी  .... चाची की शादी एक बड़े परिवार में हुई थी .... चाचा 12-13 भाई-बहन थे .... चाचा सबसे बड़े थे .... देवर-ननद के साथ ही चाची भी बड़ी हुई .... चाची को एक बेटी और एक बेटा हुआ .... चाचा की जब नौकरी लगी तो चाची साथ रहने लगी .... चाचा की आमदनी साधारण थी .... किसी तरह से जोड़-गाँठ कर अपने बच्चों की परवरिश और बेटी की शादी की .... बेटा ONGC में एक अच्छे पद पर नौकरी करने लगा लेकिन शादी के लिए तैयार नहीं हो रहा था .... क्यूँ कि ना जाने उसकी पत्नी कैसी आये .... उसके माता-पिता का ख़्याल ना रखे तो घर में कलह होगा .... बेटा अपने माता-पिता से बहुत प्यार करता है .... परिवार-समाज के समझाने और दबाब बनाने पर बेटा की शादी हुई .... परंतु बहू और सास-ससुर में ताल-मेल नहीं ही बैठ सका .... बेटा अपनी पत्नी को बहुत समझाने का प्रयास करता .... बहू समझौता करने की कोशिश भी करती .... लेकिन सोच की समस्या थी .... ससुर पुराने विचारों के और बहू नए विचारो की ....
 जिंदगी गुजरती रही .... बेटा के साथ जब माँ-बाप रहने के लिए तैयार नहीं हुये तो पटना में ही एक फ्लैट खरीद कर , सब सुख-सुविधा का इंतजाम कर , एक नौकर रख दिया ....लेकिन.... बुढ़ापा तो सुख-सुविधा से नहीं कटती .... वो किसी अपने के देखभाल से कटती है .... करीब 3-4 साल पहले, पटना के घर में ताला लगा कर माँ-बाप को अपने साथ(बरौदा, जहां वो नौकरी करता है)ले गया .... चाची जाते समय मेरे गले लग कर बहुत रोई कि वे अब वापस नहीं आ सकेगी और बहू के साथ वहाँ कैसे रहेंगे ....
लेकिन एक साल के बाद ही वापस आ गए चाची-चाचा .... बेटा के घर में चाची का मन नहीं लगा .... चाचा को अच्छा लगता था ,पोता का साथ था ....
चाची का कहना था कि बहू ध्यान नहीं रखती थी .... वे लोग को रखना नहीं चाहती थी .... यहाँ पटना आने के बाद चाचा-चाची दोनों बीमार रहने लगे .... चाची को ब्रेन-हेमरेज हो गया .... चाचा को बुढ़ापा परेशान करने लगा .... बेटा बार-बार आता ले जाने की जिद करता .... लेकिन चाची जिद पर अड़ी रही .... नहीं जाना था नहीं गई .... इस बीच बहू भी आई .... मेरी बहू से भी बात हुई .... नासमझी का मामला था .... जरूरत तो चाची का था बेटा -बहू का साथ .... एक साल पहले चाचा के बीमारी के कारण चाचा - चाची बेटी के घर (पटना में ही) रहने लगे .... हर महीने होता कि कुछ तबीयत संभल जाता है तो अपने घर लौट आयेंगे .... लेकिन चाचा नहीं आ सके .... आज चाची बेटे बहू के साथ घर लौटीं हैं .... चाचा का श्राद्ध-कर्म बेटे के घर से ही होना चाहिए ....
 श्राद्ध-कर्म बेटे के हाथो ही हो सकता है ना ....
चाचा को बेटी के घर अच्छा नहीं लगता था .... वे अपने पोता के साथ रहना चाहते थे .... अब चाची उसी बहू के साथ रहेगी .... क्या मिला चाची को .... ??


Friday, 5 July 2013

कितने सहमत हैं आप आलेख से


हम सोच सकते हैं कि विकट परिस्थितियाँ ही पैदा ना हो जिससे किसी प्रकार की विकृति को पनपने का अवसर मिले .... ऐसा बस सोचा जा सकता है , पर ऐसा हो नहीं सकता , हो ही नहीं सकता .... यदि ऐसी परिस्थिति पैदा ही ना हो तो ,हमें परखने की कसौटी का क्या होगा .... किसी प्रतिकूल परिस्थिति में घबराहट हो जाये तो साधना कैसी होगी ....
साधना ....
कबीर के शब्दों में :- ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया ;  जिस उज्जवल चादर को ओढा ,उसे उतनी ही उज्जवलता की स्थिति में उतार कर रख देना .... 
जबतक शरीर है ,पग-पग पर बीमारी की संभावना बनी रहती है …. पर उससे भयभीत होकर हताश हो जाए तो जीना कठिन हो जाता है ….
कौन है जो बीमार नहीं होता ,बल्कि आज के दौर में कम ही लोग हैं ,जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं नहीं झेल रहे होते  हैं .... लेकिन क्या कोई है जो सार्वजनिक तौर पर बीमार आदमी कहलाना पसंद कर पता है .... वैसे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं ,जिन्हे ऐसे पात्र बन कर रहना अच्छा लगता है .... अपनी बीमारियों को बढ़ा-चढ़ा कर जिन्हे प्रचार करने की आदत हो जाती है …. जिम्मेदारी वहन करने में अपनी हर विफलता का ठीकरा वे बीमारी पर ही फोड़ते  हैं  …. लेकिन दुनिया में ऐसे लोगो की संख्या ज्यादा है …. जो अपनी बीमारियों को दरकिनार करके नई राह बनाते हैं ....
शिंडलर  कहते हैं कि डॉक्टर के पास केवल इसलिए पहुंचते हैं कुछ कि उन्हें अपने भावनाओं पर काबू रखने की कला नहीं मालूम होती है ....
आस्तिक का अर्थ यह नहीं कि जो भगवान में विश्वास करता है ….
नास्तिक वह है जो भगवान में विश्वास नहीं करता ....  ये अर्थ गलत है ....
जो जीवन को पूरी तरह से स्वीकार करता है वह आस्तिक है .... जीवन के नियमों को अस्वीकार करना नास्तिकता है ....
इस अर्थ में ,हर मांग हर चाह नास्तिक है .... जब भी हम अस्तित्व(ईश्वर)के सामने अपनी चाह रखते हैं ,उसी वक़्त हम उस अस्तित्व के विपरीत हो जाते हैं .... चाह उठती ही है इसलिए कि जो है  ,पसंद नहीं है …. और उससे कुछ अलग चाहिए ....
अस्तित्व(ईश्वर)की मर्ज़ी के खिलाफ हम जब भी करेंगे ,तो उसमें हारेंगे भी ,और टूटेंगे भी …… तो सभी चाह , हमें ईश्वर के खिलाफ करती है ….. हम तो परमपिता परमेश्वर से भी उसके खिलाफ ही प्रार्थना करते हैं , उस परमेश्वर के दर-मंदिर में भी ……..
घर  में कोई बीमार है तो प्रार्थना करते हैं , हे ईश्वर ! मेरे अपने बहुत कष्ट में हैं, इसे ठीक कर दो …. 
अगर परमात्मा ही सब कुछ करता है तो यह बीमारी भी उसके द्वारा ही प्रदत्त है ….
जब हम कहते हैं, इसे ठीक कर दो, तो हम यह कह रहे हैं कि हम तुझसे ज्यादा समझदार हैं और  तूने हमसे सलाह क्यों नहीं ले ली ,इस आदमी को बीमार करने के पहले ? 
हमारी पूरी जिंदगी ऐसी ही घटनाओं से भरी हुई है …. सच में .... सुख चाहते हैं लेकिन दुख मिलता है …. सफलता चाहते हैं ,पर विफलता हांथ लग जाती है …. जीतना चाहते हैं ,परंतु हर के सिवाय कुछ नहीं मिलता ….
फिर हम सब रोते रहते हैं कि ना जाने कौन से कर्मों का फल है ….. पिछले जन्म का पाप-पुण्य का हिसाब करना चाहते हैं  …..
जो जैसा हैं ,उसे जब तक उसी रूप में हम स्वीकार नहीं करेंगे , तब तक जो भी हम चाहेंगे ,उससे उल्टा ही होगा …सभी मांग-चाह को छोड़ लें और जो हो रहा हैं  ,उसे स्वीकार कर लें तो हमें आस्तिकता का अनुभव होगा ……. 
कितने सहमत हैं आप उपर्युक्त आलेख से ..... ??