Sunday, 18 December 2016

षड्यंत्र


असुविधा जनक थी बात
परिवर्तन की हुई शुरुआत
फिर क्यों चल रही हवा घात

बात 1968-1972 के आस पास की है
कभी लठ्ठो वाला आये
कभी मूंगफली वाला आये
कभी बायस्कोप वाला आये
कभी चूड़ीहारन आये
कभी मछली वाला/वाली आये
दादी धान या गेंहू से बदल लेती थीं
खेतों में काम करने वाले मजदूर हों
धोबी हो
नाई हो
कुम्हार हो
भुजा भुजवाना हो
आनाज ही पाते देखी या खेत मिला है बोओ खाओ
मजदूरी करो
यानि कैसलेश दुनिया हमने देखी है
कुछ नया देखें तो कोई बात नई लगे

Saturday, 17 December 2016

विपदा खेल


"क्या बहू तुम्हें यही जगह मिला !
हमारी उम्र मन्दिर में हरे राम हरे कृष्ण जपने का है । तुम हमें कलियुगी रास लीला दिखलाने विक्टोरिया मेमोरियल ,काली घाट घूमा रही हो । झाड़ियों के ओट में ,अंधेरों को साया बनाये ,आँखों में बेहयाई की लाली लगाये ये युवा साबित क्या करना चाहते हैं ?" इंजीनियर्स नेशनल कॉंग्रेस में शामिल होने आये बेटा गुप्ता जी के साथ आई उनकी माँ अपनी बहु पर गुस्सा कर बैठीं
सह दे बैठीं श्रीमति सिन्हा। "अभी समय है ,कठिन संघर्ष का । मेहनत कर अपने को एक मुकाम पर ला खड़े करने का । जो समय घर पहुंच कर अध्ययन करने का है ,उस समय को यूँ चुम्मा चाटी करते हुए नष्ट करते हुए जग को नजरें चुराने में विवश कर रहा सब ।"
तभी सबकी नजर पड़ी ,एक लड़का एक लड़की को बलजोरी कलाई पकड़ घसीटने का प्रयास कर रहा था । लड़की अपने सामर्थ्य भर छुड़ाने का प्रयास कर रही थी । एक अन्य जोड़ी काफी तेजी से आकर उनदोनो को समझाने का प्रयास करने लगी ।
देखो देखो क्या फ़िल्मी अंदाज है गुप्ता जी की माँ फिर अपनी बहू पर दांत पीसने लगी



ना स्त्री है ना पुरुष
तो उसे का कहें
मांग रहा था
या
मांग रही थी
जब दोनों नहीं है
तो
दोनों कैसे लगे
खैर
हर जोड़े से वसूली हो रहा था
मानों जोड़े में बैठे होने का
 टैक्स भर रहे थे जुगल जोड़ी
बच्चे दस या बीस का नोट
देने के क्यों मजबूर थे
अपने जोड़े में बैठे को
जुर्म समझ रहे थे जो जुर्माना दे रहे थे
मुझे वो जुर्म ही लग रहा था
क्या उस स्थिति में बैठे होना
क्या कहलाता होगा
प्यार इश्क तो कतई नहीं
कहला सकता है
प्रिंसेप घाट (कलकत्ता)में
बेटिकट कई शो
देखने को मिल सकता है

Wednesday, 14 December 2016

आपदा



01.
वर्तुल चाँद
भूख की स्याह छाया
मीन की काया ।
02.
पोस के खल
जल में रह जल
सिताम्बु ढ़ल ।
03.
बूझा है चूल्हा
नोटबन्दी में पंक्ति
बैंक में खड़ी ।
04.
वरदा शूल
लहूलुहान चैने
आपदा मूल ।


*मुक्तक*

जब तक धरा धारा मिटती नहीं
लगा लो जोर स्त्रियाँ टूटती नहीं
भीड़ रिश्तों ,जीती जाती तन्हाई
तपी ऐसी भट्ठी में कि फूटती नहीं



वर्ण पिरामिड


ज
लीले
आपदा
सनै सनै
दंड वरदा
बदहाल जीव
लहुलुहान चेन्नै
ना !
चारा
सम्पत्ति
परिवृत्ति
चले कुचाल
कर्म दिष्ट धारा
शक्ति फल विपत्ति

Tuesday, 13 December 2016

हिसाब मिले बेअक्ली की कैसे



निसंदेह गलतफहमियां यूँ होती
स्याह पाये जाते क्या गजमोती
चाँद ! सोच में उभरती ज्योत्स्ना
धवल मक्खन उजास शोभना
स्वर्णिम हुए पूनो बताओ कैसे
रवि से चुराए तेज तुम्हारे जैसे
अक्ल भोथराए कला-कलाएं
मिले अहोरा-बहोरा यात्राएं


चित्र में ये शामिल हो सकता है: रात

Tuesday, 6 December 2016

डर से आगे जीत





तिनका हूँ खुद का वज़ूद ही कितना
चलती गई जिसने राह बताई जितना

    


एक साल के बाद वो घड़ी आ ही गई
अपने किये वादों के अनुरूप एक दिन पहले पटना आये अतिथि

 


हाइकु लिखते समय
छोटे छोटे कम वर्ण के शब्द चुने
और
चुकि आधे वर्ण की गिनती नहीं होती
तो
ऐसे शब्द चुने जिनमें आधे वर्ण हो
! ये चिह्न लगे शब्द भी महत्वपूर्ण होते हैं
श्री भट्ट जी की ये बताई बातें हमें बहुत पसंद आई 




तलाश जारी
एक सौ इक्यावन
शत के बाद





Thursday, 1 December 2016

काला धन


 
काला धन के नाम पर अत्याचार

स
तंज़
स्वाश्रयी
मरी मीन
तिज़ोरी कैद
कत्ल शिष्यकारु
काला धन रंगीन 【01】
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लो
चर्चा
बयानी
अम्र कौमी
नंगा कहर
दाग बेदखल
काला धन महर 【02】

Thursday, 17 November 2016

दिमाग डाल डाल - सोच पात पात


"पंखुरी ! तुम्हारे घर से ऐसी आवाजें किस चीज से आ रही है ?"
पंखुरी अपने फ्लैट से सटे फ्लैट में ,अपनी सहेली के संग खेल रही थी तो सहेली की माँ उससे सवाल की।
"कैसी आवाजें आपको सुनाई दे रही है चाची ?"
"धम - धम की आवाजें ! जैसे कुछ कुटाई हो रही हो। चुड़ा-चावल बनाने के लिए धान कूटते हैं वैसा ?"
"हाँ चाची ! माँ और मेरी चाची मिल कर कुटाई कर रही हैं। "
"वही तो पूछ रही हूँ किस चीज की कुटाई हो रही है ?"
"लुगदी है चाची।"
"लुगदी ! लुगदी कूट कर क्या करेंगी तुम्हारी माँ व चाची ?"
"लुगदी कूट कर बड़ा दउरा बनाया जायेगा चाची।"
"इतनी मेहनत ! और इस जमाने में ? अपार्टमेंट में रहने वाले के लिए दउरा का प्रयोजन !" पड़ोसन होने  का धर्म उनके दिलो दिमाग में खलबली मचाये हुए था .... दोनों घरों में एक ही जासूस सहायिका थी। .. उससे उन्हें खबर मिली कि 500-1000 के नोट को खपाया जा रहा है ... मिक्सी में पिस कर कब तक बहाते रहते !"

Tuesday, 15 November 2016

वजूद


घर मेरा है
चलेगी मर्जी मेरी
स्व का सोचना
छी खुदगर्जी तेरी
पुरातन ख्याल
वजूद पर सवाल
दिल को जलाता
सकूं मिटा जाता
उधेड़े पत्ती पत्ती
ज्ञान अनावर्त्ती
सत झंझकोरता
ज्ञान हिलोरता
बिना स्व बिखेरे
धन्यवाद बोल तेरे
महक आती
 नर्गिसी फूलों
चहक जाती
धमक शूलों

Saturday, 12 November 2016

जलजला






"आज देवोत्थान है तारा ... चलो गंगा स्नान कर आते हैं .. लेकिन उसके पहले थोड़ा नाश्ते की तैयारी कर लेते हैं ताकि जब हम गंगा स्नान से लौटें तो किसी को कोई परेशानी ना हो।" तारा की सास सावित्री देवी आवाज लगाई
                       "किसी को कोई परेशानी नहीं होगी अम्मा जी ... हम रोज पांच बजे उठते हैं तो बच्चों का टिफिन आसानी से बन जाता है। अभी तो सुबह के 3 ही बजे हैं। हम इतनी जल्दी क्यूँ जा रहे हैं ? पौ फटने में तो अभी बहुत देर है "....
"इस समय ही गंगा में काफी भीड़ होगी। .. कार्तिक स्नान करने वाले इसी समय गंगा किनारे जुटने लगते हैं बहू तारा। .. सत्संग लाभ होगा हमें भी "
"ठीक है .. मैं तुरंत आई "
"क्या तुम रमन को फोन की थी कि वो अपने परिवार संग ,हमलोगों से आकर मिले ?"
"नहीं अम्मा जी ! आपकी बताई बातें याद हो आई। "
"कौन सी बातें ?"
"ननदोंई अपने पैसे ,जमीन को साले की पत्नी और उनके बच्चों के नाम पर खर्च करते हैं ,ये सोचते हुए कि कुछ दिनों के बाद उन्हें मिल जायेगा .. ससुराल से मिले तौहफे पर आयकर मुक्त होता । लेकिन पूरी जिन्दगी वापसी की प्रतीक्षा रह जाती है कोई नहीं लौटाता है। "
"अरे हाँ ! चलो छोड़ो ! अच्छा की कि तुम फोन नहीं की। .... मेरी बताई बातें तुम याद रखी। मैं ही भूल गई। ... मैं कपड़े का गट्ठर ले आई हूँ ,चलो स्नान कर आते हैं। " गप्प करते करते दोनों सास बहू गंगा किनारे पहुंच गई थीं।
घाट पर काफी अँधेरा था। तब .... भी बहुत लोग जुटे हुए थे। कार्तिक स्नान ब्रह्ममुहूर्त में या यूँ कहें अँधेरे में करने का नियम है।  ..... सबके स्नान कर जाने के बाद ... जब रवि रश्मियाँ धरा पर फैली तो लक्ष्मी को तैरते देख कर शोर मच गया। .... हजार हजार का बज़ार देख कर।
जलसमाधि ... चिता जलना .... लक्ष्मी के साथ यही होता है .... हो गृह लक्ष्मी या हो कागज की।
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01.
मोक्षदायनी
लक्ष्मी कार्तिक स्नान
पाप तरणी।
02.
लक्ष्मी है पाती
जमाखोरों की सजा
जल समाधि।

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Friday, 11 November 2016

"चहुँमुखी"







घर घर घूम कर हज्जाम न्योता दे रहा था कि आज साहूकार की बहु का जन्मदिन है .... सभी घरनियों का बुलावा है , बहु ! गांव के पुरुषों के सामने आ नहीं सकती है , इसलिए पुरुषों का आना जरूरी नहीं है । जो कोई आये भी तो वो ड्योढ़ी पर ही रुके ।
गांव के सभी लोग अचंभित भी हो रहे थे और दबी जुबान में कानाफूसी भी कर रहे थे कि जो जोंक आज तक हमारे खून पर जी रहा था वो हमारे घरनियों को जीमने बुला रहा है । किसी में बोलने की ना तो हिम्मत थी या ना कुछ पूछने की ।
शाम हुई सभी महिलायें साहूकार के घर उनके बहु के जन्मदिन में शामिल हुईं । देर रात तक आयोजन चलता रहा .... नाच गाना और खाना खाने के बाद महिलाएं लौटीं तो घर के पुरुष सो चुके थे ।
दूसरे दिन बैंक के सामने उन्हीं महिलाओं की लम्बी पंक्ति रुपया जमा कराने और रुपया बदलने की लगी हुई थी । सबके पास 500-1000 की थैली थी । किसी का 2 लाख 8 हजार का , किसी का २ लाख 10 हजार का , किसी का  २ लाख 15 हजार का , किसी का 2 लाख 20 हजार का  ..... गृहणियों को ढाई लाख तक की आयकर छूट मिली हुई है .... साहूकार के कुछ आदमी बैंक के आस पास उनके सुरक्षा के लिए खड़े थे ।

Sunday, 6 November 2016

"विकल्प"



मंडप के बेदी पर माता पिता , बेटी का हाथ होने वाले दामाद के हाथों में थमा कन्यादान करने वाले ही थे कि छोटा बेटा मुन्ना तूफान ला दिया कि कन्यादान की रस्म होने नहीं देगा ।
 "मेरी दीदी कोई वस्तु नहीं , जो दान कर दी जाये । दो इंसानों की शादी हो रही है तो दीदी की ही दान क्यों की जाए ? बारात हमारे घर दान लेने आई है या दहेज से खुद को बेचने आई है तो वर का दान , वर के माता पिता क्यों नहीं कर रहे हैं ?"।
सारा समाज हदप्रद रह गया । रिश्तेदारों में कानाफुंसी शुरू हो गई कि आज कोई नई चीज थोड़े न हो रही है , ये तो सदियों से होती आ रही रस्म है । दो चार उम्र में बड़े लोग ,कन्यादान का विरोध कर रहे बेटे को समझाने में लग गए क्यों कि विवाह विधि रुकी हुई थी और मुहूर्त बीता जा रहा था । परन्तु दीदी का लाड़ला भाई पगलाये हाथी की तरह आक्रोश में विरोध पर अड़ा रहा । उसके अड़ियल व्यवहार को देखते हुए वर ने वादा किया कि "आपकी दीदी का दान नहीं होगा । इस रस्म का मैं भी विरोध करते हुए आपके साथ हूँ ।"
          मिथिला में कन्यादान के रस्मों में तिल का प्रयोग नहीं होता है , जिससे लड़की का सम्बन्ध पूरी तरह माता पिता से खत्म नहीं होता है । बेटियां माता पिता के सुख दुःख की सहयोगी होती ही हैं , उनके मरणोपरांत उनके श्राद्ध भी तीन दिन का करती हैं । बेटी या बहू है ,इसका पता चल जाता है कि तीन में कि तेरह में से ।"
इस विधा को समझते हुए मुन्ना का क्रोध थोड़ा शांत हुआ और शादी शांतिपूर्वक संपन्न हुई | साथ ही मुन्ना कहावत का अर्थ भी समझ गया .... "ना तीन में ना तेरह में" .....

जड़ों की साँसें

अन्तरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर पर, विशेष ज्ञान- परबचन का शौक नहीं है– अनुभवजन्य बाँटने का प्रयास है— “हम उलझे रहते हैं —ऐसा हुआ रहता तो ऐ...