Wednesday, 23 November 2022

तपस्वी


 तेरा वो वाला घर सवा - डेढ़ करोड़ में बेचा जा सकता है। चालीस - पैतालीस लाख में अन्य कोई फ्लैट खरीदकर उनमें उनलोगों को व्यवस्थित कर सकते हो और बचे एक करोड़ में...,"

"क्या बक रहा है तू..! ऐसा कैसे किया जा सकता है..?"

"क्यों नहीं किया जा सकता है उनलोगों ने तेरे लिए किया ही क्या है?"

"मुझे जन्म दिया। वो डुप्लेक्स घर, जिसका ड्योढ़ी-छत उनके सपने का है। अन्य फ्लैट जेल सा लगेगा..।"

"तुम्हारे ददिहाल-पिता के घर में तुम्हें शरण मिला था जब उन्हें पता चला था कि तुम्हारा शरीर लड़का का है लेकिन तुम्हें चलना, बोलना, वस्त्र पहनना लड़कियों सा अच्छा लगता है..!"

"तो क्या हो गया...! क्या मैं चींटी का खाया बीज हो गया जिससे अंकुर नहीं फूट सकता है..! मेरा चिकित्सक बनना बेकार चला जायेगा।"


Wednesday, 9 November 2022

संजीवनी


"समय के चपेट में आकर ठूंठ बने वृक्ष के कोटर में रह रहा दृढ़ पक्षी हमारे सामने उदाहरण है मेरे दोस्त..।"

"हर ठूंठ हरा नहीं हो जाता...। अभी कलयुग चल रहा है! इंद्र नहीं मिलेंगे...।"

"कलयुग, द्वापरयुग, सतयुग मानव व्यवहार से ही निर्मित होता है..!"

"इसलिए तुम विदेशी अपनी नौकरी और वहाँ बसी-बसाई अपनी गृहस्थी उजाड़ रहे हो?"

"स्थान परिवर्तन को उजाड़ना कहते हैं? तब तो कोई उन्नति ही नहीं होगी...!"

"उन्नति के लिए ही तो विदेश गए थे न?"

"तब जा सकता था..। अब यहाँ मेरे रहने से ज्यादा उजास फैलेगा। मेरे वृद्ध माता-पिता को सहारा मिलेगा। और विदेशी मृगतृष्णा का क्या है...!"

"सुबह का भूला...!"


अँधेरे घर का उजाला

"किसे ढूँढ़ रहे हो?" शफ्फाक साड़ी धारण किए, सर पर आँचल को संभालती महिला ने बेहद मृदुल स्वर में पूछा। तम्बू के शहर में एक नौजवान के...