Sunday 25 June 2023

किस्सा की कहानी


किस्सा की कहानी : डायरी में दर्ज

नवम्बर 1993

छठवीं बच्ची की भी शादी हो गयी। चिकित्सक पिता के लिए आसान नहीं था दो बेटों और चार बेटियों की अच्छी परवरिश और उच्च स्तर की पढ़ाई करवा लेना। समय पर सबकी शादी करवा गृहस्थी बसा देना। कभी-कभी पहाड़ को स्पर्श पाकर फफ़क पड़ते देखा गया।

अगस्त 1980

बड़ा बेटा चिकित्सक की पढ़ाई छोड़कर माँ के पास आ गया। उसे खर्च के लिए पिता पर बोझ नहीं बनना है। अपनी बहनों की पढ़ाई और शादी के खर्चों में सहयोग कर सके इसलिए खेती और व्यापार पर ध्यान देना है। मौसी माँ की छोटी बेटी चिकित्सक बनने की तैयारी कर रही है। उनके बेटे को भी चिकित्सक बनने हेतु प्रेरित करना है। जिम्मेदारी की दवा की कुछ खुराक ज्यादा ली है।

जून 1963

हैजा महामारी विकराल रूप धरे हुए है। ना जाने क्या विचारकर वादी-प्रतिवादी सलट लिए और उनका आपस के समझौता पत्र के साथ अदालत में मुकदमा वापस लेने की अर्जी लग गयी। अधिवक्ताओं में खलबली मच गयी वे भौंचक्क रह गए। वाद निरस्त करने का फैसला सुनाते हुए न्यायधीश ने कहा, "खुशी की बात है। जीवन में बदलते वक़्त के साथ विचारों में बदलाव हो जाता है। कई बार जिंदगी में समझौता करना पड़ता है। अगर समझौते से रिश्ता बचता है, जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है, किसी का भला हो जाता है और नफरत मिट जाती है तो समझौता कर ही लेना चाहिए। और सुलह इस आधार पर हुई कि तीन दिन पति एक पत्नी के साथ और तीन दिन दूसरी पत्नी के साथ रहेगा। रविवार और पर्व वाले दिन पूरा परिवार एक को साथ, यदि चाहें  मिलते रहेंगे और कोई भविष्य में किसी पर किसी तरह का मुकदमा नहीं कर सकेगा।

मार्च 1960

माता-पिता की पसंद से बड़ी बहन से शादी किया था।तीसरे प्रसव के समय बच्चों का ख्याल रखने के लिए बहन आयी थी। उसके गर्भ ठहर जाने के कारण बहनोई से शादी करनी पड़ी। दोनों ने मिलकर अदालत में पहली पत्नी से तलाक का मुकदमा दायर कर दिया। फिर प्रयत्नशील हुआ गया,  संघर्ष की लंबी और अंधेरी रात काटकर सफलता की प्रकाशित भोर सबके हिस्से में लाया जा सके।



Wednesday 21 June 2023

जैसी दिशा वैसी दशा


"कोई कार्य शुरू करने से पहले हमें मेहनत बहुत करनी पड़ती है। अपना और आपके दिल-दिमागों की धुलाई करनी पड़ती है।और साथ ही नजरों से धुँध छाँटनी पड़ती है। जी हाँ, मित्रों! वैद्युतकशास्त्र संचार माध्यम (इलेक्ट्रानिक मीडिया) से मैं आपकी पत्रकार मित्र मानवी और मेरे संग हैं चलचित्रकार चेतन

फोटोग्राफी का मजा बढ़ जाएँ,

अगर कोई दृश्य दिल में उतर जाएँ

आज योग दिवस है और आप तक विस्तृत सूचना पहुँचाने के लिए हम अस्पताल में आ पहुँचे हैं। आइए आज जानते हैं दो महोदय से योग से लाभ और हानी के बारे में। जी हाँ! आप बताएँ अरुण जी•••

"मैं अपने युवाकाल शायद उच्चतर माध्यमिक विज्ञान (intermediate science) का छात्र था तभी से नेति क्रिया, मयुरासन, पैर से पीछे का जमीन छू लेना इत्यादी अनेको आसान करता रहा। मेरे लिए समय बेहद महत्त्वपूर्ण रहा रात में 9 बजे तक सो जाना और प्रातकालीय 5 बजे उठ जाना।सुबह खाली पेट चाय नहीं लेना। दो बार ब्रेन स्ट्रोक हुआ और एक बार हल्का पक्षाघात लेकिन ना मुझे पता चल पाया और ना और किसी को शायद कारण योग ही रहा हो जी। सेवा निवृति के छ सात के बाद आज मैं अस्पताल में हूँ। ठीक से बोल नहीं सकता ठीक से चल नहीं सकता। बेहद गुस्सा आता है। समय है•••,"

"आप बताएँ मोहन जी! आप अस्पताल के बिस्तर पर क्यों पड़े हैं?"

"मैं योग को अपनी दिनचर्या में कभी भी शामिल नहीं किया। योग जरूरी है यह कभी समझ ही नहीं पाया। दो-दो पाँच के चक्कर में रहा। अपने पैसों के बल पर स्व के बल को इक्कीस समझता रहा। मुझसे उम्र में बीस और आर्थिक रूप से उन्नीस सरपट दौड़े जा रहे हैं। और मैं•••,"

"अच्छा, तो आज आपको यह दिन नहीं देखने पड़ते अगर समय से आप योग कर लिए होते? लेकिन आपके संग रह रहे अरुण जी तो सारी जिन्दगी योग करते रहे।? फिर?"

"मैं बताता हूँ। योग के अभ्यास के माध्यम से, व्यक्ति आंतरिक शांति पैदा करने, तनाव का प्रबंधन करने और अपने आध्यात्मिक क्षितिज का विस्तार करने के लिए सशक्त हो सकते हैं।अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर क्या••, प्रतिदिन उन प्राचीन ऋषियों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करना आवश्यक है, जिन्होंने निस्वार्थ रूप से पूरी मानवता के लाभ के लिए अपने ज्ञान को साझा किया। संगीत और मन का भी योग करें फल शान्ति मिलेगा। रोज संगीत दिवस भी मनाएँ।"

 "चिकित्सक के दिए सुझाव सभी को मानने चाहिए और हमें अब आप जनता से विदा लेनी चाहिए।"

Tuesday 20 June 2023

मृगमरीचिका

"विदेश में नाम कमाता, शिखर पर पहुँचता बेटे की माँ होकर आप कैसा अनुभव कर रही हैं?"

"नजर रही वही पुरानी

दुनिया बिखर जायेगी

नजरिया बदल गया

दुनिया सँवर जायेगी

पापा आपके सेवा निवृति में अभी डेढ़ साल बाकी है। मैं यूँ गया और यूँ आया।आजाद परिंदों की रुकती नहीं परवाजे

जाते हुए कदमों से आते हुए क़दमों से

भरी रहेगी रहगुजर जो हम गए तोह कुछ नहीं

इक रास्ता है जिंदगी जो थम गए तोह कुछ नहीं

यह कदम किसी मुकाम पे जो जम गए तोह कुछ नहीं। विदेश में रहने का अवसर आसानी से कहाँ मिलता है! वेतन वृद्धि का अवसर खोना नहीं चाहता।"

"मेरे बाद भी इस दुनिया में

जिन्दा मेरा नाम रहेगा

जो भी तुझको देखेगा

तुझे मेरा लाल कहेगा

तेरे रूप में मिल जायेगा

मुझको जीवन दोबारा

–जाओ जी लो प्राण धारण अत्यधिक प्यारा!"

"पिता लू भरी दोपहरी में यह काम किया पूत के लिए छाँव ढूँढ़ने का वह वट बना।

ओझल होना ना था एक पल भी गंवारा

पिता ही साथी रहे हैं, पिता ही थे सहारा।

आज आठ साल के बाद भी पिता दिवस के दिन प्रवासी पूत का मुझ माता को विडियो कॉल आया, इतनी सुबह? अभी तो वहाँ 5 ही बजे होंगे न!"

"वहाँ तो शाम है न। मैं अन्य कॉल पर व्यस्त हो जाऊँगा। पापा से बात करवा दो। आज पापा दिवस है।"

"इकलौता बेटे का वहाँ विदेश में पिता के दर्शन से ही दिन शुरू और यहाँ शामें ख़त्म अन्धेरा शुरू।"


Friday 16 June 2023

मेड़कटवा

मेड़कटवा

"तुमने सुना, मुन्ना ने चाचा को डंडे से पीटा और दीवाल पर ढ़केल दिया। सर में गुमड़ निकल गया है।"

इस सूचना से मुझे स्तब्धता होनी चाहिए थी क्या•••! बिलकुल नहीं होनी चाहिए थी। यादों के गुफा में बहुत दंश छुपा हुआ था।  हमारा संयुक्त परिवार था। चाचा की जब शादी हुई तो चाचा ससुराल के गाँव के किनारे नहीं जाते थे। कुछ सालों में ऐसा हुआ कि वे केवल ससुराल के होकर रह गये। चाची शहर में पली हैं तो अन्य बड़ी माँ, माँ से तुलना में श्रेष्ठ समझी जातीं। गृहस्थी के सामान्य कार्य में सहयोग नहीं लिया जाता। चाची की पढ़ाई चलती रहती लेकिन कोई मंजिल नहीं मिला। चाची को शिकायत थी कि महानगर में बसी होतीं तो सफल होती। अच्छे बड़े शहर में भी होती तो चलता। चाची शादी के बाद उस संयुक्त परिवार में बिना सर पर पल्ला रखे जेठ लोगों के संग बहस कर लेतीं जबकि उनकी जेठानियों की परछाई जेठ के सामने से नहीं गुजरती। गाँव के घर में चाची को कम ही रखा गया। 

चाची के बच्चे हुए तो वे ननिहाल को जानते थे। मामा मौसी नानी इतने ही रिश्ते पहचाते थे।

दादा-दादी के पास नहीं आते थे कि दाल-सब्जी तो ठीक है गाँव का चावल मोटा होता है, शहरी बच्चे हैं ठीक से खा नहीं सकते हैं। समय के साथ गाँव में चावल के किस्म में बदलाव होता गया। 

उनके बच्चे पढ़ने में बहुत होशियार हैं, यहाँ उनके स्तर का कोई नहीं मिलता है। अन्य बच्चे अपनी-अपनी मंजिल पाते गये। उनकी तुलना में बीस ही साबित हुए।

चाचा-चाची के नजरों से सबसे ज्यादा होशियार मुन्ना घर में भी सबका दुलारा। मुन्ना की शादी सफल नहीं हुई कि उसे अपने पिता के बनाए मकान में रहना और उनके पेंशन पर मौज मस्ती से जीवन गुजर-बसर करना था। 

बुजुर्ग की दशा ऐसी•••!

Wednesday 14 June 2023

समर कैम्प

समर कैम्प
"हाँ तो बिग ब्रेव गाइज़! आपसे एक सवाल पूछती हूँ, आपकी मामी की ननद की ननद की गोतनी के बेटा या बेटी से आपका क्या रिश्ता होगा?"

"••••••"

"अर्ली मॉर्निंग ऐण्ड इन इवनिंग में सूरजमुखी का फेस किधर होता है?"

"••••••"

"यह तो झोके हैं पवन के

हैं यह घुंघरू जीवन के

यह तो सुर है चमन के

खो न जाऐ

तारे ज़मीन पर

इसलिए मैं मनाकर रहा था कि इसे यहाँ मत भेजो। उसे माता-पिता के संग पहाड़ों पर घूमने जाने दो। लेकिन ना! तुम्हारी ज़िद थी। अब वो भुगते।"

"इसमें भुगतना क्या है! समय के साथ धीरे-धीरे सब सीख जायेगा।"

दुनिया की भीड़ में क्यों खो रहा

मिलेगा कुछ भी न फल जो बो रहा

तू आँखें अब खोलकर सब जाँच ले

तू अब सच और झूठ के बीच खाँच ले

जब तक सीख पायेगा तब तक••• और ना सीख पाया तो•••?"

"इसका उत्तर तुम्हें तब सोचना चाहिए था, जब तुम 'एकल परिवार में एक बच्चे' का झण्डा उठाये हुए थे। हमलोगों की पीढ़ी के बच्चे गर्मी की छुट्टी में दादी-नानी के गाँव जाते थे। तीस-चालीस बच्चों का समूह दिन में अमराई, ताल किनारे और रात में छत को भींगाकर तारों के चँदोआ तले ना जाने कितने रिश्ते जिए जाते थे और ना जाने कितने किस्से गढ़े जाते थे।"

"••••••"

"ये बचपन का प्यार अगर खो जाएगा

दिल कितना खाली खाली हो जाएगा

तेरे ख्यालों से इसे आबाद करेंगे,

तुझे याद करेंगे

मामी का भतीजा, बुआ की जयधी गुनगुनाते•••।"

Sunday 11 June 2023

अपाहिज

 अपाहिज


"अपरिहार्य कारणों से मेरी शादी स्थगित हो गई है। मानसिक स्थिति ठीक होते ही मैं खुद बात करूँगा।"

"धैर्य बनाए रखना•••,"

"लड़कीवाला सब फ्रॉड निकला। शादी बड़ी बेटी से करवाना था। फ़ोटो छोटी बेटी का भेजा। फ़ोन और वीडियो कॉल पर छोटी बेटी रहती थी। बड़ी बेटी बचपन से पागल है। छोटी सुंदर है तो उसकी शादी पहले से फिक्स है। लेकिन बड़ी बेटी के कारण उसकी शादी हो नहीं रही थी। तो उन लोगों ने मेरे पर एटेम्पट लिया कि हो जाये तो हो जाये।"

"लड़की वालों पर सब दया दिखलाते हैं। जबकि जितना कांड हो रहा है, लड़की वाले करते हैं और आजकल लड़की की होशियारी का तो कुछ हद ही नहीं है•••। स्त्री विमर्श का काला पक्ष।"

"प्लानिंग था कि शादी छोटी से करवाया जाता और विदाई के समय बड़ी को भेज दिया जाता।"

"वक्त के खेल के आगे सबकी जो मजबूरी हो जाए••।"

"छेका के अगले दिन ही पता चल गया।"

"कोई अगुवा होगा?"

"मेरी अपनी मौसी की बड़ी गोतनी की छोटी बहू लड़की की अपनी चेचेरी बहन है।उसने पहले कहा था कि लड़की बहुत अच्छी है।"

"पिटाने लायक तो वही है। उसकी ऐसी क्या मजबूरी थी जो इस साज़िश का हिस्सा बन गयी?"

"और जिस दिन कैंसिल हुआ उस दिन मुकर गयी कि आप लोग खुद पता कर लिए होते। कल उसको फोन किये और बोले कि आपके पूरे परिवार का खून खराब है। और आपके घर मे जितनी भी बेटी और बहन सबको कोठा पर बैठा देंगे। और अगले बार से मेरे बारे में पता करने का कोशिश कीजियेगा तो बीच से चीर देंगे। उसके बाद मेरी मौसी मुझे फ़ोन पर डांटने लगी

"अपशब्द बोलने से अपना संस्कार खराब होता है। कोई गाली ऐसी नहीं बनी है जो दोषी/अपराधी को सीधे-सीधे कहा जा सके। शादी और बहूभोज की तैयारी में पैसा तो बहुत बर्बाद हो गया लेकिन भविष्य की परेशानियों से बचना हो गया। स्त्री विमर्श का काला पक्ष है, कानून का दुरुपयोग और स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छन्दता समझ लेना•••।"


Thursday 8 June 2023

समृद्धि

 समृद्धी

पाँच-सात पसेरी सट से पसर गया

दो-तीन पन्नी की थैली में ससर गया

सबरे के आठ बजे सब्जी लेने इतनी जल्दी पहुँच गये कि सब्जी विक्रेता की सपने से विमुखता ही नहीं हुई थी। सड़क पर झाडू लगाने वाला साँकल बजा रहा था। दूकान से सटकर खड़ी गाड़ी को पीट रहा था। सब्जी लेने आई अन्य महिला शोर कर रही थी। कुम्भकरण से बाज़ी लगाये युवा विक्रेता के जागने की प्रतीक्षा करुँ या लौट जाऊँ मेरे लिए निर्णयात्मक क्षण उलझन वाला था। घर वापसी पर 'क्या पकाऊँ?' वाला सौ अँक वाला प्रश्न के लिए सीमांत पर लड़े जाने वाले जंग से कम कठिन जंग नहीं होने वाला था।

लगभग बीस वर्षों से उसी दूकान से सब्जी-फल आ रहे हैं। अक्सर शाम में ही लाती रही। सुबह का यह दृश्य पहली बार की अनुभूति थी। कोरोना काल की रात्रि में सब्जी पहुँचा देता था।

आधे घन्टे के शोर के बाद हलचल दिखी। लगभग चौदह ताले खोले गये जिससे बाँस के बने चार पल्ले हटे। उसके अन्दर मोटरसाइकिल भी था और सब्जियों के ढ़ेर के बीच बिछावन। सब्जी और चूहे के  बीच की गहरी दोस्ती(दाँत कटी रोटी वाली) के साक्षात्कार दिखे।

"बिन बुलाए मेहमानों का कोई इलाज़ क्यों नहीं करते हो?" मैंने विक्रेता से पूछा।

"मेरे अतिथियों को प्याज की बदबू से चिढ़ है क्योंकि यह उनके लिए टॉक्सिक साबित होती हैं। इनके प्रवेश द्वार पर जहाँ भी उनका ठिकाना है वहाँ चिली फ्लेक्स या लाल मिर्च पाउडर छिड़क दिया जाता है। किसी ने कहा छीला लहसुन परोसा जाए। अति से अभ्यस्त हो जाना भी कोई चीज होती है न?" युवा विक्रेता ज्ञानी ने कहा।

तबाही अभ्यस्त विध्वंसक पुजारी

राख़ में जिसे दिख गया हो चिंगारी।" किसी के शब्दों को भुनभुनाती मैं सब्जियाँ छाँटने लगी।

दाँव का गणित

यादें बिसर गया ठूँठ सँवर गया

वक्त गुज़र गया.. दुःख मुकर गया

सम्पूर्ण क्रान्ति और पर्यावरण दिवस मधु जी के आवास पर नमन कार्यक्रम और काव्य गोष्ठी लोकनायक जयप्रकाश विश्व शान्ति प्रतिष्ठान द्वारा मध्याह्न में आयोजित की गई थी। भट्ठी बने भुवन में मेघोत्प्लावित देखकर भी परिंदे छिपे हुए थे। लम्बी प्रतीक्षा के बाद इ रिक्शा युवा चालक के संग दिखा। सौ की जगह दो सौ लेकर पहुँचाने के लिए तैयार होता हुआ बोला, "आप आंटी माँ जैसी हैं इसलिए इतने कम में पहुँचा दे रहा हूँ।"

"अगर सवारी कोई युवती होती तो शायद मुफ़्त में पहुँचा देते तीन सौ लेकर।" मेरी बात सुनकर चालक छलछला आये पसीना पोंछने लगा।

कार्यक्रम समाप्ति कर घर लौटने में अन्धेरा और हड़बड़ी उबर कार का पिछला गेट खोलकर ज्यों उतरना चाही त्यों पीछे से आता साइकिल सवार गेट से टकरा गया। बगल में ठेला था जिसको साइकिल सवार पकड़ लिया और वह गिरने से बच गया तथा चोट नहीं लगी। फिर भी वह उत्तेजित होना चाहा लेकिन मुझे देखकर आगे बढ़ने लगा लेकिन सामने से गलत दिशा में आती महिला जोर से बोलने लगी "गाड़ी वाले बड़े लोग रास्ते पर चलने वाले को कुछ समझते ही नहीं हैं। बस अपने जल्दी में सबको कुचलकर आगे बढ़ना चाहते हैं।"

महिला को बोलते देखकर सामने खड़े मजदूरों की भीड़ से एक बोलने लगा "दायें-बायें देखकर गाड़ी रोकना और उतरना चाहिए। इल्जाम बड़े लोग पर ही लगता है। गनीमत है कि भीड़ नहीं जुटी नहीं तो अभी पता चल ही जाता।"

"आपदा में अवसर देख लेते हो आपलोग। परबचन-परोपदेश देना जरूरी लगा। पीछे से आने वाले को नहीं दिखी कि सामने गाड़ी रुकी है और उसमें से कोई उतरेगा। उतरने वाले को पीछे से आता सवार दिख जाना चाहिए। वर्तुल घूमने वाला गर्दन होता।"

 असमंजस में थे विरोध धर्मी

मिट रही थी उनकी बेशर्मी


Tuesday 6 June 2023

जाल से फिसली

जाल से फिसली

ट्रिन ट्रिन ट्रिन

"हैल्लो"

"................"

"हाँ! इतनी भोर में जगी हूँ। रात में लगभग एक-डेढ़ बजे आँखों का लगना और भोर चार बजे नींद का उड़ जाना रोज का नियम हो गया है...!"

"................"

"नहीं! मेरी तबीयत नहीं खराब होगी,"

"................"

"नहीं! मैं फ़ौलाद की नहीं बनी हूँ। सब जानते ही हैं, जब बच्चों के दादा बीमार रहे तो रात-रात भर जगना पड़ता था तो आदत लग गई। बचपन से कम सोने की आदत भी रही।"

"................"

"करना क्या है! कभी लॉकर का कागज ढूँढ़ते हैं, कभी एटीएम का पासवर्ड, कभी गाड़ी का पेपर, कभी बैंक का..., पता चला, शहर का कोई बैंक नहीं बचा था जिसमें अकाऊंट ना खोला गया हो!"

"................"

"हाँ! लॉकर खाली हो चुका है। सारे बैंक अकाऊंट भी...! गाड़ी बिके सालों गुजर गए, लेकिन उन्हें याद नहीं रहता न!" 

"................"

"हाँ! तुम्हें नहीं पहचानते! इसलिए तो तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहते। हमारी शादी दस साल ही निभ पायी थी, यह भी इन्हें याद नहीं।"

"................"

"बच्चे तो चाहते ही हैं लेकिन एनआरआई बच्चों के पास रहने से भौतिक सुखों का अतिरेक, एकांत दमघोंटू परिवेश से भाग कर ही तो वृद्धाश्रम में सुकून से हैं...!"

"................"

"तुम्हारे साथ रहने के अनुरोध को स्वीकार करना कठिन है। चिन्ता नहीं करो, यहाँ समवयस्क लूडो, कैरमबोर्ड, शतरंज के संगी-साथी...,"​ 

"................"

"इस जन्म के लिए मेरे हालात को तुम्हारी मित्रता और तुम्हारी सहनशक्ति को आजमाने की जरुरत नहीं लग रही है। मित्रता प्यार में बदल सकता है लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि प्यार मित्रता में बदल जाए?"

"................"

"सही कहा! बिसात बिछा रह जायेगा। कौन पँछी पहले उड़ेगा यह कौन जान सका है...! लेकिन मैं पहले जाना ही नहीं चाहती।"



Sunday 4 June 2023

आग्नेयगिरि पर गौरेया (डायरी शैली)

10 अक्टूबर 1982

दशहरे की पूजा में घी-चीनी की जरुरत पड़ी तो आज पुन: माँ ने अपने अलमारी में टँगी साड़ियों के पीछे से डिब्बों को प्राप्त कर लिया। यह वही सामग्री थे जिन्हें भोग लगा जाने की जिम्मेदार हम बहनों को माना गया था।

30 जून 1985

आज माँ-पापा गर्मी की छुट्टियाँ बिताकर लौट आये। हम बहनों ने राहत की साँस ली। दोनों छोटे भाईयों के संग डेढ़-दो महीने के लिए पहाड़ों-ताल-झील के शहरों में रहने जाते हैं तो हम तीन बहनों को सौ-डेढ़ सौ रुपया दे जाते हैं। घर में थोड़ा आटा-चावल रहता है।

15 मई 1990

"सुबह हम बहनें विद्यालय-महाविद्यालय जाती हैं घर के और दोनों भाईयों के कार्य पूरा करते-करते। हम नाश्ता नहीं कर पातीं और वापसी पर कुछ नहीं मिलता। हमारे पास दो रुपया भी नहीं होता कि हम बाहर कुछ खा लें!" आज पापा से मैंने कह दिया। कहा तो पहले भी बहुत बार था।

"तुमलोग समझौता करना सीखो। तुम्हें यहीं सदा नहीं रहना है। यहाँ के लिए तुमलोग परदेशी हो।" पापा ने कहा।"

काश! परदेशी की जगह अतिथी ही मान लिया जाता।

22 फरवरी 1991

आज दीदी के संग मैंने युवा-बुजुर्गों के लिए सन्ध्या-रात्रि कोचिंग सेन्टर खोल लिया। अत्यधिक युवती-स्त्री-महिलाओं की उपस्थिति देखकर अच्छा लगा। पापा पर भार कम होगा और अब हम तीनों बहनें अपना पेट भर पायेंगीं। पापा के स्तर को देखते हुए कोई कल्पना भी नहीं करता होगा कि हमारे पेट में दाना नहीं होते!

17 नवम्बर 2000

आज माँ-पापा के घर गई तो पता चला बड़ी बुआ आई थीं। महीना दिन रहीं। कुछ महीने पहले छोटी बुआ भी आई थीं। बुआ-चाची लोग जब माँ के पास आती हैं तो महीना भर जरुर रुकती हैं। माँ के संग बाज़ार जाना। माँ से पसन्द की चीजें खरीदवा लेना। रोज मीट-मछली बनवाना बहुत सरल काम है। ननद-भाभी की मस्त जोड़ी। बुआ-चाची को हम बहनों के अंग वस्त्रों के छेद नहीं दिखलाई देते। पापा की दूसरी पत्नी को खुश रखना भली-भाँति जानती हैं।

23 अप्रैल 2008

आज छोटी की भी शादी हो गयी। दीदी की शादी 2004 में हो चुकी है। ससुराल से माँगकर ले गयी बहनें मायके के हिस्से का सुख पा रही हैं। दीदी और छोटी दोनों बहनों की जिम्मेदारी अच्छे से निभा लेने का सुकून है। आसानी से दोनों का पेट भर रहा है

बस! अब अपनी नौकरी से केवल अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी है। शादी में आए नकारा चचेरे भाईयों ने संग रहने की इच्छा प्रकट की। सोचना होगा क्या किया जाए। माँ के दोनों लाड़ले फ़ुर्र हो चुके हैं। जबसे संघ लोक सेवा आयोग में मेरी नौकरी लगी है तबसे मैं पूजनीय हो गयी हूँ। क्या सच में दया का सबसे छोटा कार्य सबसे बड़े इरादे से अधिक मूल्यवान है!

Friday 2 June 2023

सहयोग

 Rajnish Dixit :- लेखक/पाठक कृपया ध्यान दें। 🙏🏼🙏🏼 जानकारी भेजने की अंतिम तिथि 30 जून 2023 कृपया पोस्ट को ध्यान से पढ़ें। मुझे 100 से अधिक वरिष्ठ लेखकों के बारे में जानकारी चाहिए। एक बड़ी योजना है। वरिष्ठता का आशय सिर्फ उम्र से नहीं है।

विभा रानी श्रीवास्तव :- लगभग चार साल पहले लू दोपहरी में मोबाईल बजा, गुरु पुष्करणा जी का फोन था

हैलो कहते

जोरदार डाँट पड़ी

हुआ यूँ था•••

आदरणीय मधुदीप गुप्ता जी फेसबूक पर पोस्ट बनाए थे कि "अपनी पसन्द की दस (या पन्द्रह था) लघुकथाओं का शीर्षक और लेखक का नाम लिखें।"

अपनी पसन्द की दस लघुकथाओं का शीर्षक और लेखक का नाम तो चुटकी बजाते लिखा जा सकता और लिखकर खुश भी हो रही थी। डाँट इसलिए पड़ी कि उसमें वरिष्ठ लेखकों के एक दो ही नाम थे। मधुदीप भाई अपने मित्र से सवाल किया कि "विभा वरिष्ठ लेखकों को नहीं पढ़ती है क्या?"

गुरु पुष्करणा जी ने पूछा "हुआ क्या है?"

"फेसबूक पर बनाए मेरे पोस्ट पर उसके उत्तर देख लो। उसे कहें वो पढ़े। आपके मार्गदर्शन में उसे बड़ा काम करना है।"

आज पुन: उन दोनों के मार्गदर्शन की तलाश है•••

दस की जगह तीस देखकर सर मत ठोकियेगा••• आज फिर डाँटने वाला कोई तो हो•••

Er Ganesh Jee Bagi :- विभा रानी श्रीवास्तव! इस टिप्पणी पर बहुत कुछ कही जा सकती है, किन्तु बेवजह विवाद होगा। बस इतना कि उन्हें यह बात बर्दास्त नही हुई कि विभा को नए लिखने वालों की लघुकथा ही पसंद क्यों आयी!!

Er Ganesh Jee Bagi :- विभा रानी श्रीवास्तव! जो नही रहे उनके e mail का क्या प्रयोजन ?

विभा रानी श्रीवास्तव :- जो हैं उनका सम्पर्क सूत्र आयोजक के पास ना हो यह ही विश्वास करने की बात नहीं। वैसे भी डाँट खाना है ऐसे भी डाँट खाना है भाई Er Ganesh Jee Bagi जी

विभा रानी श्रीवास्तव :- और माँगी गई है सूची में दस वरिष्ठतम और कहा जा रहा है कि अपना नाम लिख सकते हैं

अब अपना नाम लिखने पर सवाल होगा न दस वरिष्ठतम की कमी कैसे हो गई? और दसवें नम्बर पर होने पर वरिष्ठतम में पासंग ना हो जाए भाई Er Ganesh Jee Bagi!

मानी पत्थर

 “दो-चार दिनों में अपार्टमेंट निर्माता से मिलने जाना है। वो बता देगा कि कब फ्लैट हमारे हाथों में सौंपेगा! आपलोग फ्लैट देख भी लीजिएगा और वहीं...