Wednesday 22 February 2023

अपरिमेय


"यह है? इसी के लिए...!" अनेक जोड़ी आँखें विस्फारित थीं।

"कभी विद्यालय के शिक्षक और छात्राओं के साथ इसे यहाँ आने की अनुमति मिली थी। इसे यह जगह इतनी पसंद आई थी कि इसने अपनी सखियों के सामने कहा कि यह पुन: आएगी। इसके घर में घुमक्कड़ी का किसी को ना तो शौक था और ना इसे बाहर वालों के साथ कहीं जाने की अनुमति मिलती थी। बहुत ज़िद करने के बाद तो इसे यहाँ आने दिया गया था। उसी साल इसके पिता का तबादला उस इलाके से बहुत दूर हो गया। इसके अभियंता पति को यात्रा का शौक तो था, तभी तो यह पूरा देश घूम चुकी है। लेकिन पूरे राज्य को विद्युत बँटवारा करने की जिम्मेदारी होते हुए भी अपने राज्य के इस छोटे से इलाके में इसे लेकर नहीं आ सके, अपनी अति व्यस्तता और राज्य के बाहर यात्रा करवा ही रहे थे। समय गुजरता रहा अपने जेहन में वादों को जीवित रखे साहित्य और समाज के दरिया में उबचुभ करती रही। जब तीसरे भारत-नेपाल साहित्य महोत्सव का स्थल तय होने लगा तो इसे लगा अगर इस सीमांत से सटे नेपाल के इलाके में कार्यक्रम हो तो इसकी इच्छा पूरी हो सकती है। झट से इसने आयोजक महोदय को यहाँ कार्यक्रम करने का सुझाव दे दिया। और वक्त का करिश्मा सुझाव मान भी लिया गया।"

"कौन यकीन करेगा...! जो गोवा, मुंबई, चेन्नई, केरल के समुंद्री उफानों का अवलोकन कर चुकी हो, यहाँ तक सात समुंदर पार बे एरिया का नज़ारा देख चुकी उसके लिए यह पतली सी धारा आकर्षित करने वाली होगी..?"

 "बरसों ही तरसी आँखें, जागी है प्यासी रातें

आयी हैं आते-आते होठों पर दिल की बातें"

"आखिरकार तू आ ही गयी...!"

"तू कोशी की मौज, मैं गंगा की धारा ... चले आए मौजों का ले कर सहारा, होकर रहा मिलन हमारा।"

"लगभग पचास साल पहले का किया वादा पूरा कर सकी।"

"हमें लगा था कि पुराने प्रेम का चक्कर..,"

"तुमलोगाें को ऐसा लगना स्वाभाविक ही था क्योंकि यह अकेले यात्रा का विचार प्रकट कर रही थी।"

अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो सारी कायनात उसे तुम से मिलाने में लग जाती है..

हम अपनी सोच के दम पर जो चाहे वो बन सकते हैं। और यह कोई नयी खोज नहीं है, बुद्ध ने भी कहा है “हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है।"

स्वामी विवेकानंद ने भी यही बात इन शब्दों में कही है "हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का धयान रखिये कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं। विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं।"

Wednesday 8 February 2023

परस्परवाद

परस्परवाद


अनेकानेक लोग अखबार पढ़-पढ़कर आपस में चर्चा कर रहे हैं,"इस बार तो इस नेता जी की जीत पक्की है..."

 जिसे सुनकर तोता ने मैना से पूछा,"ऐसा क्यों?"

"चुनाव लड़ रहे नेता ने अपने मित्र से विमर्श किया, "यार! पता नहीं क्या बात है कि कोई अखबार मेरा समाचार छापता ही नहीं है, गर छापता भी है तो इस कदर कि उसका कोई मानी-मतलब ही न हो।"

"यार चुनाव का समय ... इसे पहचानो... आज के समय में तुम अखबार को लाभ पहुँचाओ... वो तुम्हें पहुँचाएगा...।" नेता जी के मित्र ने कहा।

"मतलब?" नेता जी ने पूछा।

"अख़बार का प्रकाशन... एक धंधा है... व्यापार है...। मालिक को अख़बार चलाना है तो उसे भी पैसा चाहिए..!" मित्र ने कहा।

"अख़बार तो तटस्थ होता है न! जो आँखों देखता है उसे समाजहित में यानी समाज को सही दिशा देने की दृष्टि से ईमानदारी से पत्रकारिता का दायित्व निभाना होता है..।" नेता जी ने कहा।

"यार! यह गणेश शंकर विद्यार्थी का युग नहीं है...; अब यहाँ पत्रकारिता क्या, सबकुछ लेनदेन के आधार पर चलता है...।" मित्र ने कहा।

"तो मुझे क्या करना चाहिए?" नेता जी ने पूछा।

"चुनाव जीतना है तो अख़बार को बड़े-बड़े विज्ञापन दो..., संवाददाताओं को पैसे और बढ़िया-बढ़िया उपहार दो फिर देखो!" मित्र ने सुझाव दिया।

"चुनाव जीतने हेतु तो यार कुछ भी करूँगा..., जो तुमने कहा उसे अभी इसी वक्त...," नेता जी ने कहा।

"और आनन फानन में नेता जी ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई.. जो वो अपने हित में छपवाना चाहते थे.. विज्ञप्ति बनवाकर हर प्रेस के संवाददाता को दे दिया। 

और देख लो आज के सारे अख़बार में नेता जी - ही -  नेता जी छाए हुए हैं..," मैना ने कहा।

"और जनता...?" तोता ने सवाल किया।

"हिसाब करेगी न...!" मैना ने कहा।

आज भी अधिकांश जनता अख़बार से ज्यादा अपने आस-पास से मिले अनुभव से समझती है न...।



लड्डू : फूटना मन का!

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, “दुनिया में दो ही तरह के दु:ख हैं —एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए!” हमलोग कामख्या मन्दि...