Sunday, 27 February 2022

अक्ल की चाभी

"यह तुमने क्या किया ? ढ़ाई-तीन सौ वैक्सीन फ्रीज से बाहर निकाल कर रख दी। फ्रिज से कुछ घण्टे बाहर रह जाएं तो बर्बाद हो जाते हैं। यह तो रात भर बाहर रह गए।"

"मुझे वैक्सीन पर कोई भरोसा नहीं है। मैं नहीं चाहती थी कि यह किसी को दिया जाए।"
"तुम नर्स होकर ऐसा कैसे सोच सकती हो?"
"नर्स हूँ इसलिए तो रोगियों का भला सोच रही हूँ।"
"ये वैक्सीन रोगियों को नहीं दिया जा रहा है। रोगी ना हो सकें, रोग से बचाव के लिए दिया जा रहा है और पहले हम चिकित्सक को और सत्तर साल उम्र वालों को दिया जा रहा है। क्या तुम वैक्सीन ली?"
"जी नहीं..,"
"बिना उपयोग-प्रयोग के तुमने यह कैसे निर्णय कर लिया कि यह वैक्सीन रोग से बचाव के योग्य नहीं?"
"वो.. जी वो.. नपुंसक बनाने की खबर...,"
"तुम्हारे भेजा में भूसा..., दाद देता हूँ नर्स मारिया को । सब उसके आभारी भी होंगे, फ्रिज काम नहीं कर रहा यह जानते ही उसने सबसे सम्पर्क किया और 600 लोगों को वैक्सीन लगवा कर वैक्सीन बर्बाद होने से बचा लिया । "
"शायद मैं ट्यूबलाइट हूँ सर..।"

Thursday, 24 February 2022

कालोत्परिवर्तन


हाथ पसारे अम्मा आँचल के छोर से सुहाग का धागा माँग रही थी। धोबिन काकी का मुँह सीधा ही नहीं हो रहा था और सीधा हो भी कैसे..! कुछ दिनों पहले दूसरे टोला में शादी थी और दादी ने धोबिन काकी और उनकी बहू-बेटे, पोता-पोती को अपने घर के पोशाक में देखकर लताड़ लगायीं तो लगायीं अपने घर का दरवाजा बन्द कर दी थीं। "यह भी कोई बात हुई, हमारे खेत भी लो धुलाई के अनाज भी लो और धुलने गए कपड़ों को पहन भी लो।" दादी के गुस्से का बादल फट पड़ा था।

बड़ी अम्मा रंग बिरंगी चिड़ियों की लड़ी से पिटारा भर रही थीं जिसे उन्होंने दर्जी काका से कतरनें लाकर बनायी थीं। "छ महीने से लेकर तीन साल के बच्चे  की पोशाक तुम हमारे कपड़ों से बना लेते हो!" जोर की डाँट और खेत वापस लेने की धमकी भी दे आई थीं।

बुआ धान का लावा भुनने के लिए नेग में झुमका ठानी थीं लेकिन गोंड़ दादी के कान पर जूं नहीं रेंग रहा था। उन्हें भी अपने गोंसार उजाड़े जाने का मलाल था जो दादा के अमराई में था। अमराई की शोभा कटहल, अड़हड़-बड़हड़ भी बढ़ाते थे।

चिकित्सक बन्नी के होने वाले ससुराल की मांगों को पूरा करने के लिए बाबा उन जमीनों के कागजात के बदले लाखों रुपये ले ही रहे थे कि चिकित्सक बन्ना ने रोक दिया। लू दोपहरी में धोरे के दौरे में बादल उमड़ रहे थे।

Tuesday, 22 February 2022

22022022

दो दो लड्डू दो दो लड्डू दो दो
खिली सरसों–
बवंडर में नाचे
पत्ते व पन्ने
°°
कुर्सी कुछ ऐसी है
जिससे चिपकते ही
राग बदल जाता है

पंच में परमेश्वर नहीं दिखता है
न्याय का क्रय-विक्रय होता है
अपने होने का उपहार पाता है

Tuesday, 15 February 2022

सोच में हूँ

सह जाने की मिसालें नहीं दी जाती

काश गुलाब में कांटे नहीं होते

जीवन आतंक में सिमटे नहीं होते

जंग में मिसाइलें नहीं होते

कहीं सास बहू से पीड़ित है

कहीं बहू सास से पीड़ित है

कहीं बेटी के लिए माँ का दुखड़ा है

कहीं भाई-भाई में झगड़ा है

सोच के कचरे की अति भीड़ का रगड़ा है

नासमझ, काल का बड़ा विशाल जबड़ा है

जो पीड़ित वो किसी के दिल का टुकड़ा है

जाल में मकड़ी का रहना ही बड़ा लफड़ा है


मिसाइलें /प्रक्षेपास्त्र

Sunday, 13 February 2022

ताजमहल


बोसा की नमी 

पंखुड़ी पर छायी–

रूपा तितली

°°

प्यार का बोसा–

तृण कोर अटकी

ओस की कनी

°°

"क्या कर रही हो?"

"साड़ी के मिलान का शॉल ढूँढ़ रही हूँ..,"

"लाओ मैं मिलाकर ढूँढ़ देता हूँ। तुम दूसरा काम देख लो।"

"क्या कर रही हो, खाना बन गया?"

"भुजिया बनाना बाकी है,"

"मैं देख लेता हूँ, तुम तब तक तैयार हो जाओ।"

"जोरू का गुलाम हो गया है।"

"हाँ! आपने सही कहा। सेवा निवृति के बाद तो पता चला कि मैं कितना ऋणी होता रहा। बच्चों को सोये देखा। माता-पिता मुझे श्रवण पूत कहते रहे। लेकिन मैं उनके लिए कभी कुछ नहीं किया । सारी जिम्मेदारियों में जोरू को जोते रखा।"

"अब तू घर में बैठा रहता है और तेरी..."

"समाजिक ऋण उतार रही है।"

Tuesday, 8 February 2022

चक्रव्यूह

"कैसे हो?"

"ठीक नहीं हूँ , उलझनें बहुत हैं।"

"जब तक जीवन है तबतक उलझनों को रहना ही है। कुछ मोह के धागे हैं। कुछ स्नेह के धागे हैं। कुछ इश्क के धागे हैं। कुछ कर्त्तव्य के धागे हैं। कुछ अधिकार के धागे हैं। अब तुम पर है किस सिरे को किस सिरे से अलग रख पाते हो। जीवन जंग हो तो प्रयास करो कि जिन्दगी दंग हो..!"

"तनाव से मुक़ाबिला ही करना पड़ता है। वही कर रहा हूँ। आपसे यों भी कुछ छुप नहीं सकता। कार्यालय के संग घर में भी बहुत अशान्ति चल रही है। दोहरा तनाव है। फिर भी जंग जारी है। जीत ही एकमात्र विकल्प।"

"बस अपनी भूमिका के प्रति सचेत और ईमानदार रहो। बाकी वक्त पर छोड़ दो वह गणित पढ़ाता रहता है। तनाव से तुम्हारे शरीर पर भी प्रभाव पड़ेगा..।"

"सचेत हूँ। ईमानदार रहता हूँ, पर विश्वास नहीं दिला पाता।"

"विश्वास दूसरों को दिलाने की आवश्यकता ही नहीं, गवाही स्वयं की आत्मा देती है। ...कभी-कभी कोई फोड़ा बिना शल्यक्रिया के ठीक नहीं हो पाता है। अब चिकित्सक मोह तो नहीं कर सकता।"

"सभी अपनी आत्मा में साफ होते हैं। जब हम लोग अपना स्पष्टीकरण देते हैं तो सामने वाले को वह बचाव की दलील लगती है।"

"स्पष्टीकरण किसे और क्यों देना? जब सामने वाला तय कर बैठा हो कि अपराधी बनाकर ही छोड़ना है। अब अपराधी हैं या नहीं यह तो अपनी आत्मा के गवाही पर निर्भर..,"

"सुनिए न कुछ कहना है :-  कि कैकेयी सदैव कुटिल नहीं होती।

:- कि हर दशरथ इतना "भाग्यशाली" नहीं होता कि विछोह के पश्चात प्राण त्याग दे।

:- कि दशरथ को पौत्र नहीं था।

:- कि लक्ष्मण भी साथ जाए, और पीछे भरत शत्रुघ्न भी न हो, तो दशरथ का क्या होता?"

"अपने स्वास्थ्य हेतु और मुखिया होने के नाते तुम्हें अपने मन पर काबू रखना होगा। मुझे कलयुग में सतयुग व द्वापरयुग की बातें समझ में बिलकुल नहीं आती हैं और ना सभी परिस्थितियाँ एक सी होती हैं कि उससे उदाहरण ली -दी जा सके। 

°°

–कैकयी कुटिल नहीं थी । रावण के लिए राम को वन में भेजना जरूरी था तो सरस्वती को मन्थरा के जिह्वा पर विराजमान होना पड़ा... मात्र एक घटना से किसी के व्यक्तित्व का निमार्ण नहीं होता है।

°°

–दशरथ को श्रवण के पिता के श्राप को फलीभूत करना था... एक कड़ी से दूसरी कड़ी का जोड़.. ।

°°

यह तो उनका भाग.. आठ पौत्र का सुख भोगने को नहीं मिला।

°°

राम-लक्ष्मण के वन गमन के बाद दशरथ के साथ भरत -शत्रुघ्न कितने दिन-माह साथ रहे ?

°°

माँ का व्यवहार छोटी भाभी के साथ न्यायसंगत नहीं होता था। उनका शिकायतों का पिटारा भरा ही रहता था। बड़ी भाभी और बच्चों के संग बड़े भैया अपना दुर्ग अलग बसा चुके थे। माता-पिता की सेवा से वे चूक गए थे। छोटा भाई जितनी देर घर में होता, उस पिटारे से शिकायत झाँकते ही नहीं, उच्छृंखल हो जाते। सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब छोटे भाई की बहू आ गयी। दादी और पोते की बहू में गहरी दोस्ती हो गयी या यों कहें कि दोनों सिरे छोटे भाई की पत्नी के हाथों से फिसल गए। तीनों का मायका एक ही शहर में था। छोटी भाभी के मायके का घर वीरान पड़ा था। उन्हें बुलावा भेजने वाला कोई नहीं था जबकि उनकी बहू और सास का मायका पूरी तरह से गुलजार था। सभी को दोनों की दोस्ती का मुख्य कारण वह भी लगता था। पर्व-त्योहार पर या तो दोनों अपने-अपने मायका चली जातीं या उनके मायके से लोग आ जाते। किसी भी हालात में सिर्फ छोटी भाभी से जिम्मेदारी-समझदारी की उम्मीद की जाती थी। छोटा भाई तीन पाट में पीस रहा था।

मायके आयी ज्योत्स्ना ने छोटे भाई को सुझाव दिया था कि बेटे बहू को अलग घर में रहने को कहा जाए।

Friday, 4 February 2022

तुझ में रब दिखता है

 "फरवरी : वसन्त आ गया...वसन्त आ गया.. इश्क का मौसम आ गया...

°°
मुझे चम्पा से इश्क हुआ...,
°°
और आपको ?"

"सभी जगह ये मौसम इस बार इश्क़ ले कर नहीं आया।"

"ऐसा हो ही नहीं सकता..। शुरू हुआ इश्क कभी समाप्त नहीं हो सकता..।
मुझे बचपन से चम्पा से लगाव था, तब पागलपन समझने की उम्र नहीं थी। गुड़ियों से या घर-घर खेलना रुचिकर नहीं रहा। चम्पा के पेड़ के नीचे कंचा खेलना अच्छा लगता था। जब-तब अमरूद के पेड़ पर चढ़कर अमरूद खाना और चम्पा को निहारना अच्छा लगता। जब सन् 1994 में पटना निवास की तो बगीचा में चम्पा से पुनः भेंट हो गयी। कुछ सालों के बाद एक दिन पथ चौड़ीकरण में कट गया पेड़। रात को भोजन नहीं किया जा सका। लेकिन बहुत ज्यादा देर उदास रहने की मोहलत नहीं मिली। कुछ दिनों के बाद कटे ठूँठ बने मृतप्राय तने में से कोपल झाँक रहा था। "तुम्हारी उदासी मुझसे बर्दाश्त नहीं हो सकी। वृक्ष बनने का स्थान बनाओं..।"
सन् 2017 में हरिद्वार साहित्यिक सम्मेलन में उपहार स्वरूप चम्पारण के चम्पापुर से आया चम्पा का पौधा मिला। "तू जहाँ -जहाँ चलेगा, मेरा साया, साथ होगा.." 

14 जुलाई 2019 को वृक्षारोपण के लिए कुछ पौधा मंगवाया गया था। सवाल आया "किस चीज का पौधा भेज दूँ?"

"अपने मन से भेज दो जो तुम्हारे पास उपलब्ध हो!"

और पौधों के झुंड में चम्पा मुस्कुरा रहा था..। उसे द इंस्टीच्यूशन ऑफ इंजीनियर्स(इंडिया) पटना में बड़ा होने का मौका दिया जा रहा है पर अभी तक खिला नहीं। हर गोष्ठी में पूछती हूँ, "तू मुकम्मल कब होगा?"

"जो मुकम्मल हो जाऊँ तो बिखड़ना पड़ेगा न...,"

एक ऋतु या कुछ पल का मोहताज नहीं हो सकता इश्क!

–जीवन में ऐसे ही तो आता है..


Wednesday, 2 February 2022

हाइकु

2, 2, 22
2 फरवरी 2022

चिन/सीने से लगा

घुटनों को हटाये

हिम का स्राव

भैया ने कहा तू एकदम माँ सी लगती है..

9 जून 1982 से 9 जून 2022 शादी के चालीस साल पूरे होंगे


रूबी जयंती–

शीशे की छवि देख

माँ का स्मरण

या

शीशे में दिखी

मुझमें माँ की छवि

रूबी जयन्ती

उऋण

बैताल ने कहना शुरू किया :- पूरी तरह से उषा का सम्राज्य कायम नहीं हुआ था लेकिन अपनों की भीड़ अरुण देव के घर में उपस्थित थी। मानों निशीथकाल मे...