Tuesday, 15 February 2022

सोच में हूँ

सह जाने की मिसालें नहीं दी जाती

काश गुलाब में कांटे नहीं होते

जीवन आतंक में सिमटे नहीं होते

जंग में मिसाइलें नहीं होते

कहीं सास बहू से पीड़ित है

कहीं बहू सास से पीड़ित है

कहीं बेटी के लिए माँ का दुखड़ा है

कहीं भाई-भाई में झगड़ा है

सोच के कचरे की अति भीड़ का रगड़ा है

नासमझ, काल का बड़ा विशाल जबड़ा है

जो पीड़ित वो किसी के दिल का टुकड़ा है

जाल में मकड़ी का रहना ही बड़ा लफड़ा है


मिसाइलें /प्रक्षेपास्त्र

7 comments:

  1. सादर प्रणाम
    आदरणीय हार्दिक आभार आपका

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  2. यथार्थ का सटीक चित्रण ।

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  3. बिल्कुल सटीक कहा आपने!

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  4. सटीक अभिव्यक्ति।

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  5. सुन्दर रचना

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  6. वर्तमान समय के सच को उजागर करती
    अच्छी रचना
    सादर

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