Tuesday, 8 February 2022

चक्रव्यूह

"कैसे हो?"

"ठीक नहीं हूँ , उलझनें बहुत हैं।"

"जब तक जीवन है तबतक उलझनों को रहना ही है। कुछ मोह के धागे हैं। कुछ स्नेह के धागे हैं। कुछ इश्क के धागे हैं। कुछ कर्त्तव्य के धागे हैं। कुछ अधिकार के धागे हैं। अब तुम पर है किस सिरे को किस सिरे से अलग रख पाते हो। जीवन जंग हो तो प्रयास करो कि जिन्दगी दंग हो..!"

"तनाव से मुक़ाबिला ही करना पड़ता है। वही कर रहा हूँ। आपसे यों भी कुछ छुप नहीं सकता। कार्यालय के संग घर में भी बहुत अशान्ति चल रही है। दोहरा तनाव है। फिर भी जंग जारी है। जीत ही एकमात्र विकल्प।"

"बस अपनी भूमिका के प्रति सचेत और ईमानदार रहो। बाकी वक्त पर छोड़ दो वह गणित पढ़ाता रहता है। तनाव से तुम्हारे शरीर पर भी प्रभाव पड़ेगा..।"

"सचेत हूँ। ईमानदार रहता हूँ, पर विश्वास नहीं दिला पाता।"

"विश्वास दूसरों को दिलाने की आवश्यकता ही नहीं, गवाही स्वयं की आत्मा देती है। ...कभी-कभी कोई फोड़ा बिना शल्यक्रिया के ठीक नहीं हो पाता है। अब चिकित्सक मोह तो नहीं कर सकता।"

"सभी अपनी आत्मा में साफ होते हैं। जब हम लोग अपना स्पष्टीकरण देते हैं तो सामने वाले को वह बचाव की दलील लगती है।"

"स्पष्टीकरण किसे और क्यों देना? जब सामने वाला तय कर बैठा हो कि अपराधी बनाकर ही छोड़ना है। अब अपराधी हैं या नहीं यह तो अपनी आत्मा के गवाही पर निर्भर..,"

"सुनिए न कुछ कहना है :-  कि कैकेयी सदैव कुटिल नहीं होती।

:- कि हर दशरथ इतना "भाग्यशाली" नहीं होता कि विछोह के पश्चात प्राण त्याग दे।

:- कि दशरथ को पौत्र नहीं था।

:- कि लक्ष्मण भी साथ जाए, और पीछे भरत शत्रुघ्न भी न हो, तो दशरथ का क्या होता?"

"अपने स्वास्थ्य हेतु और मुखिया होने के नाते तुम्हें अपने मन पर काबू रखना होगा। मुझे कलयुग में सतयुग व द्वापरयुग की बातें समझ में बिलकुल नहीं आती हैं और ना सभी परिस्थितियाँ एक सी होती हैं कि उससे उदाहरण ली -दी जा सके। 

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–कैकयी कुटिल नहीं थी । रावण के लिए राम को वन में भेजना जरूरी था तो सरस्वती को मन्थरा के जिह्वा पर विराजमान होना पड़ा... मात्र एक घटना से किसी के व्यक्तित्व का निमार्ण नहीं होता है।

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–दशरथ को श्रवण के पिता के श्राप को फलीभूत करना था... एक कड़ी से दूसरी कड़ी का जोड़.. ।

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यह तो उनका भाग.. आठ पौत्र का सुख भोगने को नहीं मिला।

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राम-लक्ष्मण के वन गमन के बाद दशरथ के साथ भरत -शत्रुघ्न कितने दिन-माह साथ रहे ?

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माँ का व्यवहार छोटी भाभी के साथ न्यायसंगत नहीं होता था। उनका शिकायतों का पिटारा भरा ही रहता था। बड़ी भाभी और बच्चों के संग बड़े भैया अपना दुर्ग अलग बसा चुके थे। माता-पिता की सेवा से वे चूक गए थे। छोटा भाई जितनी देर घर में होता, उस पिटारे से शिकायत झाँकते ही नहीं, उच्छृंखल हो जाते। सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब छोटे भाई की बहू आ गयी। दादी और पोते की बहू में गहरी दोस्ती हो गयी या यों कहें कि दोनों सिरे छोटे भाई की पत्नी के हाथों से फिसल गए। तीनों का मायका एक ही शहर में था। छोटी भाभी के मायके का घर वीरान पड़ा था। उन्हें बुलावा भेजने वाला कोई नहीं था जबकि उनकी बहू और सास का मायका पूरी तरह से गुलजार था। सभी को दोनों की दोस्ती का मुख्य कारण वह भी लगता था। पर्व-त्योहार पर या तो दोनों अपने-अपने मायका चली जातीं या उनके मायके से लोग आ जाते। किसी भी हालात में सिर्फ छोटी भाभी से जिम्मेदारी-समझदारी की उम्मीद की जाती थी। छोटा भाई तीन पाट में पीस रहा था।

मायके आयी ज्योत्स्ना ने छोटे भाई को सुझाव दिया था कि बेटे बहू को अलग घर में रहने को कहा जाए।

7 comments:

  1. इसीलिये जो लोग सीधी नाक में चलते चले जाते हैं कहीं ना कहीं पहुंच ही जाते हैं। बहुत सुन्दर।

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 10 फ़रवरी 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  3. वाह!बहुत खूब!

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  4. प्रभावशाली लेखन

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  5. गज़ब तोड़ निकाला ।
    सुंदर लघुकथा।

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  6. बहुत बढ़िया प्रस्तुति प्रिय दीदी 🙏🙏🌷🌷

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तपस्वी

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